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Posts Tagged ‘गांधी’

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‘खादी का मतलब है देश के सभी लोगों की आर्थिक स्वतंत्रता और समानता का आरंभ। लेकिन कोई चीज कैसी है , यह तो उसको बरतने से जाना जा सकता है – पेड की पहचान उसके फल से होती है। इसलिए मैं जो कुछ कहता हूं उसमें कितनी सचाई है, यह हर एक स्त्री-पुरुष खुद अमल करके जान ले। साथ ही खादी में जो चीजें समाई हुई हैं,उन सबके साथ खादी को अपनाना चाहिए। खादी का एक मतलब यह है कि हम में से हर एक को संपूर्ण स्वदेशी की भावना बढ़ानी चाहिए और टिकानी चाहिए;यानी हमें इस बात का दृढ़ संकल्प करना चाहिए कि हम अपने जीवन की सभी जरूरतों को हिन्दुस्तान की बनी चीजों से,और उनमें भी हमारे गांव में रहने वाली आम जनता की मेहनत और अक्ल से बनी चीजों के जरिए पूरा करेंगे।इस बारें में आज कल हमारा जो रवैया है,उसे बिल्कुल बदल डालने की यह बात है।मतलब यह कि आज हिन्दुस्तान के सात लाख गांवों को चूस कर और बरबाद कर के हिंदुस्तान और ग्रेट ब्रिटेन के जो दस-पांच शहर मालामाल हो रहे हैं,उनके बदले हमारे सात लाख गांव स्वावलंबी और स्वयंपूर्ण बने,और अपनी राजी खुशी से हिंदुस्तान के शहरों और बाहर की दुनिया के लिए इस तरह उपयोगी बनें कि दोनों पक्षों को फायदा पहुंचे।‘ महात्मा गांधी ने खादी के अपने बुनियादी दर्शन को इन शब्दों में अपनी प्रसिद्ध पुस्तिका ‘रचनात्मक कार्यक्रमः उसका रहस्य और स्थान’ में प्रस्तुत किया है। अब हमें गांधीजी के ‘पेड के फल की पहचान’ करनी है। यह रचनात्मक कार्यक्रम सत्याग्रह के लिए आवश्यक अहिंसक शक्ति के निर्माण हेतु बनाये गये थे।इन कार्यक्रमों का प्रतीक था-चरखा।लोहिया ने कई बरस बाद कहा कि हम रचनात्मक कार्यक्रम का प्रतीक ‘फावडा’ को भी चुन सकते हैं।

दावोस में शुरु हो रहे विश्व आर्थिक सम्मेलन के मौके पर इंग्लैण्ड की एक स्वयंसेवी संस्था ने एक रपट जारी की है जिसके मुताबिक भारत के सबसे दौलतमन्द एक फीसदी लोग देश की कुल दौलत के अट्ठावन फीसदी के मालिक हैं।यह आंकड़ा देश में भीषण आर्थिक विषमता का द्योतक है। यानी गांधीजी ने खादी के जिस कार्यक्रम को 1946 में ‘आर्थिक समानता का आरंभ’ माना था उसकी यात्रा उलटी दिशा में हुई है। इस देश में खेती के बाद सबसे बडा रोजगार हथकरघे से मिलता था ।उन हथकरघों तथा उन पर बैठने वाले बुनकरों की तथा खादी के उत्पादन के लिए आवश्यक ‘हाथ-कते सूत’ और उसे कांतने वाली कत्तिनों की हालत की पड़ताल जरूरी है। इसके साथ जुड़ा है ग्रामोद्योग तथा कुटीर व लघु उद्योग का संकट।

हाथ से कते सूत को हथकरघे पर बुनने से गांधी-विनोबा की खादी बनती है। दुनिया के प्रारंभिक बड़े अर्थशास्त्री मार्शल के छात्र और गांधीजी के सहकर्मी अर्थशास्त्री जे.सी. कुमारप्पा के अनुसार ,’दूध का वास्तविक मूल्य उससे मिलने वाला पोषक तत्व है।‘ इस लिहाज से खादी का वास्तविक मूल्य वह है जो कत्तिनों ,बुनकरों और पहनने वालों को मिलता है।खादी के अर्थशास्त्र में गांधीजी के समय नियम था कि उसकी कीमत में से व्यवस्था पर 6.15 फीसदी से अधिक खर्च नहीं किया जाना चाहिए ताकि कत्तिनों और बुनकरों की आमदनी में कटौती न हो।कीमत निर्धारण की तिकड़मों के अलावा अब ‘व्यवस्था खर्च’ पर 25 फीसदी तक की इजाजत है। मुंबई के हुतात्मा चौक के निकट स्थित खादी भण्डार में ‘जया भादुड़ी कलेक्शन’ और दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित खादी भंडार में विख्यात डिजाइनरों के डिजाइन किए गए वस्त्र जिस कीमत पर बिकते हैं उसका कितना हिस्सा कत्तिनों और बुनकरों के पास पहुंचता है इसका अनुमान लगाया जा सकता है। इसके अलावा खादी उत्पादन करने वाली संस्थाओं को फैशन-शो जैसे आयोजनों के लिए खादी कमीशन से अधिक आर्थिक मदद मिलती है किन्तु कताई केन्द्रों में अम्बर चरखों के रख-रखाव के लिए आर्थिक मदद नहीं मिलती। सूती-मिलों के बने सूत को हथकरघे पर बुने कपडे तथा पावरलूम पर बने कपड़ों के अलावा मोटर से चलने वाले अम्बर-चरखों पर काते गये सूत के कपडों को खादी भण्डारों से बेचने के लिए अनिवार्य प्रमाणपत्र खादी कमीशन द्वारा दिया जा रहा है। इन्हें ‘लोक वस्त्र’ कह कर खादी भंडार में बेचा जा रहा है।पूर्वोत्तर भारत के हथकरघों पर मिलों के धागे से बुने गये कपडों को भी खादी में सम्मिलित करने की नीति वर्तमान सरकार ने बनाई है। ताने में मिल का सूत और बाने में हाथ-कता सूत भी खादी भंडारों से अधिकृत रूप से बेचा जा रहा है।

केन्द्र सरकार की वर्तमान खादी-नीति की समीक्षा करते वक्त हमें यह तथ्य भी नजरअन्दाज नहीं करना चाहिए कि आठ घन्टे खादी का कपड़ा बुनने वाले को 100 रुपये तथा आठ घन्टे सूत कांतने वाली कत्तिन को मात्र 25 रुपए मजदूरी मिलती है।यह सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से बहुत कम है। आजादी के पहले खादी और ग्रामोद्योग की गतिविधियां चलाने वाली संस्था अखिल भारत चरखा संघ की सालाना रपट से कुछ आंकड़ों पर ध्यान दीजिए,इन्हें गांधीजी ने उद्धृत किया है- ‘सन 1940 में 13,451 से भी अधिक गांवों में फैले हुए 2,75,146 देहातियों को कताई ,पिंजाई,बुनाई वगैरा मिला कर कुल 34,85,609 रुपये बतौर मजदूरी के मिले थे। इनमें 19,645 हरिजन और 57,378 मुसलमान थे ,और कातनेवालों में ज्यादा तादाद औरतों की थी।’ जब आंकडे खादी की बाबत हों तब उसके मापदन्ड ऐसे होते हैं। चरखा संघ किस्म के रोजगार और आमदनी वाले आंकडे खादी कमीशन ने देने बन्द कर दिए हैं। खादी का मौलिक विचार त्याग देने के कारण अब ऐसे आंकड़ों की आवश्यकता नहीं रह गयी है।

विकेंद्रीकरण से कम पूंजी लगा कर अधिक लोगों को रोजगार मिलेगा, इस सिद्धांत को अमली रूप देने वाले कानून को दस अप्रैल को पूरी तरह लाचार बना दिया गया है। सिर्फ लघु उद्योगों द्वारा उत्पादन की नीति के तहत बीस वस्तुएं आरक्षित रह गई थीं। जो वस्तुएं लघु और कुटीर उद्योग में बनाई जा सकती हैं उन्हें बड़े उद्योगों द्वारा उत्पादित न करने देने की स्पष्ट नीति के तहत 1977 की जनता पार्टी की सरकार ने 807 वस्तुओं को लघु और कुटीर उद्योगों के लिए संरक्षित किया था। 1991 के बाद लगातार यह सूची संकुचित की जाती रही। 1 अप्रैल, 2000 को संरक्षित सूची से 643 वस्तुएं हटा दी गर्इं। 10 दस अप्रैल 2015 को उन बीस वस्तुओं को हटा कर संरक्षण के लिए बनाई गई सूची को पूरी तरह खत्म कर दिया गया। विकेन्द्रीकृत छोटे तथा कुटीर उद्योगों के उत्पादों के बजाए देश के कुछ खादी भण्डारों में एक ऐसी उभरती हुई दानवाकार कम्पनी के उत्पाद बेचे जा रहे हैं।इस कम्पनी के 97 फीसदी पूंजी के मालिक की मिल्कीयत फोर्ब्स पत्रिका ने ढाई अरब डॉलर आंकी है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का वास्तविक स्वदेशी विकल्प लघु एवं कुटीर उद्योग होने चाहिए कोई दानवाकार कम्पनी नहीं।

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खादी ग्रामोद्योग आयोग के इस वर्ष के कैलेण्डर और डायरी पर गांधीजी के स्थान पर प्रधान मंत्री का चरखा जैसी आकृति के यंत्र के साथ चित्र प्रकाशित होने के बाद देश में जो बहस चली है उसे मौजूदा सरकार की खादी,हथकरघा और कुटीर उद्योग संबंधी नीति के आलोक में देखने का प्रयास इस लेख में किया गया है।प्रधान मंत्री ने स्वयं उस नीति की बाबत एक नारा दिया है-‘आजादी से पहले थी खादी ‘नेशन’ के लिए,आजादी के बाद हो खादी ‘फैशन’ के लिए’।खादी संस्थाएं विनोबा के सुझाव के अनुरूप खादी कमीशन की जगह ‘खादी मिशन’ बनाएंगी तब वह ‘अ-सरकारी खादी’ ही असरकारी खादी होगी।

(अफलातून)

राष्ट्रीय संगठन सचिव ,समाजवादी जनपरिषद।

816 रुद्र टावर्स,सुन्दरपुर,वाराणसी-221005.

aflatoon@gmail.com

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अपनी आवाज अपना गला ( दुनिया मेरे आगे )

Monday, 26 December 2011 06:10

अफलातून जनसत्ता 26 दिसंबर, 2011: हरे राम, हरे कृष्ण’ संप्रदाय द्वारा रूसी में अनूदित गीता पर रूस में आक्षेप लगाए गए हैं और उस पर प्रतिबंध लगाने की बात की गई है। विदेश मंत्री ने संसद और देश को आश्वस्त किया है कि वे रूस सरकार से इस मामले पर बात करेंगे। मामला पर-राष्ट्र का है। क्या भारत में ही इस पुस्तक को लेकर परस्पर विपरीत समझदारी नहीं है? यह मतभेद और संघर्ष सहिष्णु बनाम कट्टरपंथी का है। लोहिया ने इसे ‘हिंदू बनाम हिंदू’ कहा। उन्होंने गांधी-हत्या (हत्यारों की शब्दावली में ‘गांधी-वध’) को भी हिंदू बनाम हिंदू संघर्ष के रूप में देखा। देश के विभाजन के बाद एक बार गांधीजी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शिविर में निमंत्रित किया गया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गीता के प्रति समझदारी भी उसी प्रसंग में गांधीजी के समक्ष प्रकट हुई थी। सरसंघचालक गोलवलकर ने गांधीजी का स्वागत करते हुए उन्हें ‘हिंदू धर्म द्वारा उत्पन्न किया हुआ एक महान पुरुष’ बताया। उत्तर में गांधीजी बोले- ‘मुझे हिंदू होने का गर्व अवश्य है, लेकिन मेरा हिंदू धर्म न तो असहिष्णु है और न बहिष्कारवादी हैं। हिंदू धर्म की विशिष्टता, जैसा मैंने उसे समझा है, यह है कि उसने सब धर्मों की उत्तम बातों को आत्मसात कर लिया है। अगर हिंदू यह मानते हों कि भारत में अ-हिंदुओं के लिए समान और सम्मानपूर्ण स्थान नहीं है और मुसलमान भारत में रहना चाहें तो उन्हें घटिया दर्जे से संतोष करना होगा तो इसका परिणाम यह होगा कि हिंदू धर्म श्रीहीन हो जाएगा। मैं आपको चेतावनी देता हूं कि अगर आपके खिलाफ लगाया जाने वाला यह आरोप सही है कि मुसलमानों को मारने में आपके संगठन का हाथ है तो उसका परिणाम बुरा होगा।’
गोलवलकर से गांधीजी के वार्तालाप के बीच में गांधी-मंडली के एक सदस्य बोल उठे- ‘संघ के लोगों ने निराश्रित शिविर में बढ़िया काम किया है। उन्होंने अनुशासन, साहस और परिश्रमशीलता का परिचय दिया है।’ गांधीजी ने उत्तर दिया- ‘लेकिन यह न भूलिए कि हिटलर के नाजियों और मुसोलिनी के फासिस्टों ने भी यही किया था।’ उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को ‘तानाशाही दृष्टिकोण रखने वाली सांप्रदायिक संस्था’ बताया।

(पूर्णाहुति, चतुर्थ खंड, पृष्ठ- 17) इसके बाद जो प्रश्नोत्तर हुए उसमें गांधीजी से पूछा गया- ‘क्या हिंदू धर्म आतताइयों को मारने की अनुमति नहीं देता? अगर नहीं देता तो गीता के दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने कौरवों का नाश करने का जो उपदेश दिया है, उसके लिए आपका क्या स्पष्टीकरण है?’ गांधीजी ने कहा- ‘पहले प्रश्न का उत्तर ‘हां’ और ‘नहीं’ दोनों है। मारने का प्रश्न खड़ा होने के पहले हम इस बात का अचूक निर्णय करने की शक्ति अपने में पैदा करें कि आततायी कौन है? दूसरे शब्दों में- हमें ऐसा अधिकार मिल सकता है, जब हम पूरी तरह निर्दोष बन जाएं। एक पापी दूसरे पापी का न्याय करने या फांसी लगाने के अधिकार का दावा कैसे कर सकता है? रही बात दूसरे प्रश्न की, तो यह मान भी लिया जाए कि पापी को दंड देने का अधिकार गीता ने स्वीकार किया है, तो भी कानून द्वारा उचित रूप में स्थापित सरकार ही उसका उपयोग भली-भांति कर सकती है। अगर आप न्यायाधीश और जल्लाद, दोनों एक साथ बन जाएं तो सरदार और पंडित नेहरू दोनों लाचार हो जाएंगे। उन्हें आपकी सेवा करने का अवसर दीजिए। कानून को अपने हाथों में लेकर उनके प्रयत्नों को विफल मत कीजिए।’ (संपूर्ण गांधी वांग्मय, खंड: 89)
आध्यात्मिक सत्य को समझाने के लिए कई बार भौतिक दृष्टांत की आवश्यकता पड़ती है। यह भाइयों के बीच लड़े गए युद्ध का वर्णन नहीं है, बल्कि हमारे स्वभाव में मौजूद ‘भले’ और ‘बुरे’ के बीच की लड़ाई का वर्णन है। मैं दुर्योधन और उसके दल को मनुष्य के भीतर की बुरी अंत:प्रेरणा और अर्जुन और उसके दल को उच्च अंत:प्रेरणा मानता हूं। हमारी अपनी काया ही युद्ध-भूमि है। इन दोनों खेमों के बीच आंतरिक लड़ाई चल रही है और ऋषि-कवि उसका वर्णन कर रहे हैं। अंतर्यामी कृष्ण, एक निर्मल हृदय में फुसफुसा रहे हैं। गांधीजी तब भले ही एक व्यक्ति हों, आज तो उनकी बातें कालपुरुष के उद्गार-सी लगती हैं और हमारे विवेक को कोंचती हैं। उस आवाज को तब न सुन कर हमने उसका ही गला घोंट दिया था। अब आज? आज तो आवाज भी अपनी है और गला भी अपना!

गांधी जी और संघ

जनसत्ता 29 दिसंबर, 2011: अपनी आवाज अपना गला’ (दुनिया मेरे आगे, 26 दिसंबर) में अफलातून जी ने कुछ तथ्यों को सही संदर्भों के साथ प्रस्तुत नहीं किया है। इसमें संघ-द्वेष से आपूरित पूर्वग्रह की झलक मिलती है। देश विभाजन के बाद गांधीजी किसी संघ शिविर में नहीं गए थे। दिल्ली में भंगी बस्ती की शाखा में उन्हें 16 सितंबर, 1947 को आमंत्रित किया गया था। आमंत्रित करने वाले व्यक्ति सरसंघचालक गोलवलकर नहीं, बल्कि दिल्ली के तत्कालीन प्रांत प्रचारक वसंत राव ओक थे। गांधीजी सदैव खुद को गौरवशाली सनातनी हिंदू कहते थे। वसंत राव ओक ने शाखा पर गांधीजी का परिचय ‘हिंदू धर्म द्वारा उत्पन्न किया हुआ एक महान पुरुष’ कह कर करवाया। गांधीजी ने इस परिचय पर अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
गोलवलकर से गांधीजी की बातचीत का वर्णन अफलातून जी ने ‘पूर्णाहुति’ का संदर्भ देकर किया है। इस मुलाकात का गांधी संपूर्ण वांग्मय में दो बार जिक्र है। पहला, 21 सितंबर, 1947 को प्रार्थना-प्रवचन में- ‘अंत में गांधीजी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गुरु (गोलवलकर) से अपनी और डॉ दिनशा मेहता की बातचीत का जिक्र करते हुए कहा कि मैंने सुना था कि इस संस्था के हाथ भी खून से सने हुए हैं। गुरुजी ने मुझे आश्वासन दिलाया कि यह बात झूठ है। उनकी संस्था किसी की दुश्मन नहीं है। उसका उद्देश्य मुसलमानों की हत्या करना नहींं है। वह तो सिर्फ अपनी सामर्थ्य भर हिंदुस्तान की रक्षा करना चाहती है। उसका उद्देश्य शांति बनाए रखना है। उन्होंने (गुरुजी ने) मुझसे कहा कि मैं उनके विचारों को प्रकाशित कर दूं।’
इसका जिक्र गांधीजी ने भंगी बस्ती की शाखा पर अपने भाषण में किया- ‘कुछ दिन पहले ही आपके गुरुजी से मेरी मुलाकात हुई थी। मैंने उन्हें बताया था कि कलकत्ता और दिल्ली में संघ के बारे में क्या-क्या शिकायतें मेरे पास आई थीं। गुरुजी ने मुझे आश्वासन दिया कि हालांकि संघ के प्रत्येक सदस्य के उचित आचरण की जिम्मेदारी नहीं ले सकते, फिर भी संघ की नीति हिंदुओं और हिंदू धर्म की सेवा करना मात्र है और वह भी किसी दूसरे को नुकसान पहुंचा कर नहीं। संघ आक्रमण में विश्वास

नहीं रखता। अहिंसा में उसका विश्वास नहीं है। वह आत्मरक्षा का कौशल सिखाता है। प्रतिशोध लेना उसने कभी नहीं सिखाया।’
इस मुलाकात का जैसा वर्णन अफलातून जी ने किया है और अंत में लिखा है कि ‘उन्होंने (गांधीजी ने) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को ‘तानाशाही दृष्टिकोण रखने वाली सांप्रदायिक संस्था’ बताया।’ ये विचार प्यारेलाल जी के हो सकते हैं, गांधीजी के नहीं। गांधीजी ने अपने भाषण में जो संघ के विषय में कहा, वह इस प्रकार है- ‘संघ एक सुसंगठित और अनुशासित संस्था है। उसकी शक्ति भारत के हित में या उसके खिलाफ प्रयोग की जा सकती है। संघ के खिलाफ जो आरोप लगाए जाते हैं, उनमें कोई सच्चाई है या नहीं, यह संघ का काम है कि वह अपने सुसंगत कामों से इन आरोपों को झूठा साबित कर दे।’
अफलातून जी ने लिखा है- ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गीता के प्रति समझदारी भी उसी प्रसंग में गांधीजी के समक्ष प्रकट हुई।’ इसका भी वर्णन संपूर्ण वांग्मय में है। किसी संघ अधिकारी ने गीता के संदर्भ में वहां कुछ भी नहीं कहा था। एक स्वयंसेवक ने गांधीजी द्वारा प्रतिपादित अहिंसा के संदर्भ में गीता का हवाला देते हुए यह पूछा था- ‘गीता के दूसरे अध्याय में भगवान कृष्ण कौरवों का नाश करने के लिए जो उपदेश देते हैं, उसकी आप किस तरह व्याख्या करेंगे?’ गांधीजी ने स्वयंसेवक की समझदारी पर कोई सवाल नहीं उठाया, संजीदगी से जवाब दिया- ‘… पापी को सजा देने के अधिकार की जो बात गीता में कही गई है, उसका प्रयोग तो केवल सही तरीके से गठित सरकार ही कर सकती है।’ बाद में गांधीजी ने आग्रह किया कि कानून को अपने हाथ में लेकर सरकारी प्रयत्नों में बाधा न डालें।
लेख के अंत में गीता के अर्थ का जो आध्यात्मिक आयाम अफलातून जी ने प्रस्तुत किया है, उस पर किसी को आपत्ति नहीं होगी। अनावश्यक रूप से संघ को बदनाम करने और घृणा फैलाने के प्रयासों को जब इन आयामों में मिश्रित किया जाता है, तब हम समाज की सेवा नहीं, बल्कि उसका नुकसान कर रहे होते हैं।
’महेश चंद्र शर्मा, (पूर्व सांसद), द्वारका, नई दिल्ली

प्रार्थना-प्रवचन , दिल्ली, चित्र में एम.एस. सुब्बलक्ष्मी भी

प्रार्थना-प्रवचन , दिल्ली, चित्र में एम.एस. सुब्बलक्ष्मी भी

खुले मन की जरूरत

जनसत्ता 30 दिसंबर, 2011: जिस तरह महेश चंद्र शर्मा जी ने ‘संघ’ के बचाव में गांधीजी के निकट के साथी, सचिव और जीवनीकार प्यारेलाल जी पर लांछन लगाया है, वह ‘संघ’ के गोयबल्सवादी तौर-तरीके से मेल खाता है। संपूर्ण गांधी वांग्मय में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार के दौरान छेड़छाड़ की गई थी, उस पर यूपीए-एक सरकार ने वरिष्ठ सर्वोदयकर्मी नारायण देसाई की अध्यक्षता में जांच समिति गठित की थी। जांच समिति ने शोधकर्मियों द्वारा लगाए गए छेड़छाड़ के सभी आरोप सही पाए थे और उक्त संस्करण की पुस्तकों और सीडी की बिक्री पर तत्काल रोक लगाने और असंशोधित मूल रूप की ही बिक्री करने की संस्तुति की थी। बहरहाल, जितनी तफसील में इस विषय पर लिखा जा सकता है, उसका मोह न कर मैं इतिहास-क्रम में उलटा जाते हुए सिर्फ ठोस प्रसंगों को रखूंगा।
गांधी को ‘संघ’ के प्रात:-स्मरणीयों में शरीक करने की चर्चा हम महेश जी, प्रबाल जी, अशोक भगत जी, रामबहादुर जी जैसे स्वयंसेवकों से जेपी आंदोलन के दौर (1974-75) से सुनते आ रहे थे। सितंबर और अक्टूबर 2003 में प्रकाशित संघ के काशी प्रांत की शाखा पुस्तिका मेरे हाथ लग गई। स्मरणीय दिवसों में गांधी जयंती के विवरण में ‘देश विभाजन न रोक पाने और उसके परिणामस्वरूप लाखों हिंदुओं की पंजाब और बंगाल में नृशंस हत्या और करोड़ों की संख्या में अपने पूर्वजों की भूमि से पलायन, साथ ही पाकिस्तान को मुआवजे के रूप में करोड़ों रुपए दिलाने के कारण हिंदू समाज में इनकी प्रतिष्ठा गिरी।’ संघ के साहित्य-बिक्री पटलों पर ‘गांधी-वध क्यों’ नामक पुस्तक में ‘वध’ के ये कारण ही बताए गए हैं।
संघ की शाखा में गांधीजी के जाने की तारीख के उल्लेख में अपनी चूक मैं स्वीकार करता हूं। प्यारेलाल जी द्वारा लिखी जीवनी ‘महात्मा गांधी दी लास्ट फेस’ पर महेश जी ने पूर्वाग्रह का आरोप लगाया है। इसलिए दिल्ली डायरी, प्रार्थना प्रवचन और गांधी द्वारा संपादित पत्रों से ही उद्धरण पेश हैं।
गीता की बाबत दिया गया उद्धरण संपूर्ण गांधी वांग्मय (खंड 89) में मौजूद है।
‘अगस्त क्रांति-दिवस’ (9 अगस्त, 1942) को प्रकाशित ‘हरिजन’

(पृष्ठ 261) में गांधीजी ने लिखा- ‘शिकायती पत्र उर्दू में है। उसका सार यह है कि आसफ अली साहब ने अपने पत्र में जिस संस्था का जिक्र किया है (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) उसके 3,000 सदस्य रोजाना लाठी के साथ कवायद करते हैं, कवायद के बाद नारा लगाते हैं- हिंदुस्तान हिंदुओं का है और किसी का नहीं। इसके बाद संक्षिप्त भाषण होते हैं, जिनमें वक्ता कहते हैं- ‘पहले अंग्रेजों को निकाल बाहर करो, उसके बाद हम मुसलमानों को अपने अधीन कर लेंगे। अगर वे हमारी नहीं सुनेंगे तो हम उन्हें मार डालेंगे।’ बात जिस ढंग से कही गई है, उसे वैसी ही समझ कर यह कहा जा सकता है कि यह नारा गलत है और भाषण की मुख्य विषय-वस्तु तो और भी बुरी है।
नारा गलत और बेमानी है, क्योंकि हिंदुस्तान उन सब लोगों का है जो यहां पैदा हुए और पले हैं और जो दूसरे मुल्क का आसरा नहीं ताक सकते। इसलिए वह जितना हिंदुओं का है उतना ही पारसियों, यहूदियों, हिंदुस्तानी ईसाइयों, मुसलमानों और दूसरे गैर-हिंदुओं का भी है। आजाद हिंदुस्तान में राज हिंदुओं का नहीं, बल्कि हिंदुस्तानियों का होगा, और वह किसी धार्मिक पंथ या संप्रदाय के बहुमत पर नहीं, बिना किसी धार्मिक भेदभाव के निर्वाचित समूची जनता के प्रतिनिधियों पर आधारित होगा।
धर्म एक निजी विषय है, जिसका राजनीति में कोई स्थान नहीं होना चाहिए, विदेशी हुकूमत की वजह से देश में जो अस्वाभाविक परिस्थिति पैदा हो गई है, उसी की बदौलत हमारे यहां धर्म के अनुसार इतने अस्वाभाविक विभाग हो गए हैं। जब देश से विदेशी हुकूमत उठ जाएगी तो हम इन झूठे नारों और आदर्शों से चिपके रहने की अपनी इस बेवकूफी पर खुद हंसेंगे। अगर अंग्रेजों की जगह देश में हिंदुओं की या दूसरे किसी संप्रदाय की हुकूमत ही कायम होने वाली हो तो अंग्रेजों को निकाल बाहर करने की पुकार में कोई बल नहीं रह जाता। वह स्वराज्य नहीं होगा।’
महेश जी खुले दिमाग से तथ्यों को आत्मसात करें और ‘प्रात: स्मरणीय’ के पक्ष से परेशान न हों।
’अफलातून, काहिवि, वाराणसी

अप्रासंगिक विषय

चौपाल’ (30 दिसंबर) में अफलातून का जवाब पढ़ा।  उन्होंने अप्रासंगिक विषयों को अपने पत्र में उठाया है, जैसे गांधी संपूर्ण वांग्मय से राजग सरकार ने छेड़छाड़ की और संघ ने महात्मा गांधी का नाम कैसे ‘प्रात: स्मरण’ में जोड़ा। इन मुद्दों का न तो मेरे पत्र में उल्लेख था, न ही अफलातून के मूल लेख में। इस संदर्भ में केवल इतना  कहना है कि मैं संपूर्ण वांग्मय के जिन खंडों को उद्धृत कर रहा हूं, वे राजग सरकार के समय छपे हुए नहीं, बल्कि मई 1983 में नवजीवन ट्रस्ट, अमदाबाद द्वारा प्रकाशित हैं। जो उद्धरण मैंने दिए हैं वे किसी छेड़छाड़ के नहीं, उसी अधिकृत संपूर्ण वांग्मय के हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शिविरों में भारत के महान पुरुषों के नामों का स्मरण ‘प्रात: स्मरण’ में करता है। अफलातून इससे क्यों नाराज हैं! मैंने प्यारेलाल जी पर कोई लांछन अपने पत्र में नहीं लगाया, कृपया पत्र को पुन: ध्यान से पढ़ें। मैंने अफलातून को ‘पूर्वाग्रह-ग्रस्त’ अवश्य कहा है। यदि अफलातून को संघ विषयक कोई ‘पूर्वाग्रह’ नहीं है, तो निश्चय ही यह खुशी की बात है।
अफलातून ने पुन: गांधीजी को सही प्रकार से उद्धृत नहीं किया। जिस तथाकथित नारे और भाषण की शिकायत दिल्ली प्रांत कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष ने गांधीजी से की थी, उसके संदर्भ में गांधीजी ने जो कुछ ‘हरिजन’ में लिखा उसके वे अंश जो अफलातून ने उद्धृत नहीं किए उन्हें उद्धृत करने से पूरी वास्तविकता ही बदल जाती है।
गांधीजी ने कहा है ‘‘मैं तो यही उम्मीद कर सकता हूं यह नारा अनधिकृत है, और जिस वक्ता के बारे में यह कहा गया है कि उसने ऊपर के विचार व्यक्त किए हैं, वह कोई जिम्मेदार आदमी नहीं है।’’ एक अनधिकृत, गैर-जिम्मेदार नारे और वक्तव्य को लेकर अफलातून क्या सिद्ध करना चाहते हैं, जिसके लेखक के बारे में किसी को कुछ पता नहीं। ऐसे वाहियात नारों और वक्तव्यों के आधार पर आप संघ का आकलन करना चाहते हैं और चाहते हैं कि कोई आपको पूर्वाग्रही भी न कहे! संघ को थोड़ा भी जानने वाला व्यक्ति जानता है कि शाखाओं में कभी नारेबाजी नहीं होती।
उस वाहियात भाषण का भी गांधीजी जवाब देते हैं, यह उनकी संजीदगी है।
अफलातून से केवल इतना निवेदन है कि उन्हें संघ से जो शिकायत हो, वे स्वयं अपने तर्कों से उसे प्रस्तुत करें, किसी महापुरुष की आड़ लेकर उन्हें प्रहार करने की जरूरत क्यों पड़ रही है। पता नहीं काशी प्रांत की कौन-सी शाखा पुस्तिका उनके हाथ लग गई। देश विभाजन को न रोक पाने के कारण महात्मा जी बहुत दुखी थे, वे 15 अगस्त 1947 के उत्सव में भी शामिल नहीं हुए और द्वि-राष्ट्रवादी पृथकतावादियों के आक्रमण से परेशान हिंदुओं ने गांधीजी के सामने अपनी पीड़ाओं और आक्रोश को व्यक्त किया था। इसका उल्लेख करने में अफलातून को उस पुस्तिका से क्या शिकायत है?
’महेश चंद्र शर्मा, नई दिल्ली

हिन्दू द्विराष्ट्रवादी

महात्मा गांधी का संपूर्ण वांग्मय हिंदी और अंग्रेजी (कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी) में प्रकाशन विभाग, भारत सरकार ने छापा है, नवजीवन ट्रस्ट ने नहीं। उसका स्वत्वाधिकार जरूर 1983 से 2008 तक नवजीवन ट्रस्ट के पास रहा। ‘गांधीजीनो अक्षरदेह’ (गुजराती वांग्मय) जरूर नवजीवन ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित किया गया है। जिस उद्धरण का हवाला महेश जी ने दिया है, उसे मैंने ‘हरिजन’ (गांधीजी का अंग्रेजी मुखपत्र) के पृष्ठ 261 से लिया है। द्वि-राष्ट्रवादी केवल मुसलिम लीग के लोग नहीं थे, हिंदुओं के लिए हिंदू राष्ट्र को मानने वाले भी द्वि-राष्ट्रवादी हैं।
यह ऐतिहासिक तथ्य है कि मुसलिम लीग से पहले सावरकर ने धर्म के आधार पर देश के बंटवारे

की बात शुरू कर दी थी। हिंदू-राष्ट्रवादी गांधी के समक्ष अपनी शिकायत कभी प्रार्थना सभा में बम फेंक कर कर रहे थे। अंतत: उन्हीं गांधी जी को गोली मार दी। महेश जी के शब्दों में यह उनकी पीड़ा और आक्रोश मात्र था, जिन्हें शाखा-पुस्तिका में असली हिंदू माना गया है। महेश जी ने शाखा-पुस्तिका के उद्धरण का खंडन नहीं किया है, भले ही उन्हें यह पता न हो कि मेरे हाथ कौन-सी पुस्तिका लग गई। शाखा में नारे नहीं उद्घोष होते हैं, पथ-संचलन भी मौन नहीं हुआ करते।
गांधी-हत्या को ‘गांधी-वध’ कहने वालों की किताबें भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय कार्यालय 11, अशोक मार्ग पर भी बिक रही थीं-

http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2011/09/post-195.html
’अफलातून, वाराणसी

 

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गांधीजी की नजर में जेपी

    जयप्रकाश जमजात योद्धा है , उसने अपने देश की मुक्ति के लिए सबकुछ का त्याग किया है । परिश्रम और प्रयत्न करने से वह कभी चूकता नहीं । कष्त और यातना सहने की उसकी क्षमता का कोई जवाब नहीं ।
    – महात्मा गांधी

    यह सम्पूर्ण क्रान्ति है

    यह संघर्ष केवल सीमित उद्देश्यों के लिए नहीं हो रहा । इसके उद्देश्य तो बहुत दूरगामी है: भारतीय लोकतंत्र को ’ रीयल ’ याने वास्तविक तथा सुदृढ़ बनाना है ,जनता का सच्चा राज कायम करना है , समाज से अन्याय , शोषण आदि का अन्त करना , एक नैतिक , सांस्कृतिक तथा शैक्षणिक क्रान्ति करना , नया बिहार बनाना और अन्ततोगत्वा नया भारत बनाना है । यह सम्प्पूर्ण क्रान्ति है – total revolution है । और इसके आप अगुआ हैं । यह बड़ा कठिन है , परन्तु आपकी सफलता निश्चित है , क्योंकि यह युगधर्म की पुकार है ।
    – ( ५ जून ’७४ को पटना के गांधी मैदान में आयोजित विराट जन-सभा में दिए गए ऐतिहासिक भाषण की टेप – ट्रान्स्क्रिप्ट से )

    ( दोनों चित्र राजनारायण लाल )

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खादी की राखी

खादी की राखी

प्यारे आफ़्लू,                                                                      वेड़छी/०१/०८/०९

रक्षाबन्धन के बहाने कम से कम एक पत्र लिख देती हूँ – मुझे ही आश्चर्य होता है । फोन, ईमेल , चैट का जमाना है । पिछले एक सप्ताह से बारिश के कारण ’मोडेम’ खराब हो गया है । फोन दो दिनों से कर्कश स्वर से नाम के वास्ते चालू हुआ है। कभी बंद , कभी चालू ऐसे ही बाहरी धूप-छाँव की तरह चल रहा है ।

इस वर्ष मेरे वस्त्रविद्या कार्यक्रम में एक नया मोड़ आया है । वार्षिक आवश्यकता का २५ मीटर कपड़ा ३० जनवरी २०१० तक बनाना है । १०० गुण्डी सूत लगेगा । ७५ गुण्डी हो चुका है। बारिश खतम होते अपने हाथों से कुछ सूत रंग कर दिसम्बर में बुनाई करना है । यरवड़ा चक्र से रोज के एक से देढ़ घण्टा कताई करने से हो जायेगा । बीच – बीच में प्रवास में रहती हूँ इसलिए आज कल रोज तीन घण्टा कताई करती हूँ । अंबर चरखा (दो तकुआ) से तो पूरे परिवार की कपड़ों की आवश्यकता पूरी की जा सकती है – एक घण्टा प्रति दिन समय देकर । मुझे अंबर रुचता नहीं है ।

बाबूभाई आजकल एक किताब लिखने में व्यस्त हैं । अभी तो पढ़ाई कर रहे हैं । विभाजन और गांधी । अगस्त की २२ तारीख तक घर पर ही हैं । अभी तो किताब हाथ में लिये बैठे बैठे सो रहे हैं !

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५ या ६ को रक्षाबन्धन है । जब भी हो प्यार से बाँधना ।

खूब खूब प्यार –

उमादीदी .

बहन के हाथ – कते सूत से बनी यह राखी हाथ – लिखे इस ख़त के साथ ही मिल सकती थी , इन्टरनेट से नहीं । आज बात हुई तो पता चला ९३ गुण्डी सूत कात चुकी है ।  एक गुण्डी यानी १०० मीटर , १० गुण्डी = एक किलोमीटर और उसकी सालाना जरूरत की १०० गुण्डी मतलब १० किलोमीटर सूत । हाल ही में पढ़ी हबीब तनवीर की कविता याद आई – एक जरूरी हिसाब यह भी होता !

आज पिताजी से पूछा , ’आप बड़े या गांधी की खादी ?’ उन्होंने बताया कि खादी के प्रसार और विकास के लिए बना संगठन (अखिल भारत चरखा संघ ) उनके जन्म के कुछ माह बाद १९२५ में गठित हुआ था लेकिन १९२१ में मदुरै में काठियावाड़ी पग्गड़ छोड़ने के बाद गांधी ने खादी अपना ली थी । पारम्परिक चरखा एक बड़े चक्र और तकुए वाला था । उसे यात्रा में ले कर चलना कठिन था । यरवदा जेल से साबरमती आश्रम में मगनलाल गांधी और श्री आशर को गांधी चरखे में सुधार के बारे में लगातार ख़त लिखते – ’ एक की जगह दो चक्र लगाओ , एक बड़ा और एक छोटा । क्या दोनों चक्र एक बक्से (’पेटी’ शब्द मराठी – गुजराती में चलता है ) में अट सकते हैं ?’  गांधी की इन चिट्ठियों की मदद से साबरमती और बारडोली आश्रम के ’सरंजाम केन्द्रों’(वर्कशॉप) में पोर्टेबल पेटी चर्खा बना – यरवदा चक्र । मगनलाल गांधी ने एक डिबरी भी विकसित की थी – इसका मगन-दीप नाम पड़ा ।

यूँ तो हमारे बाप की पैदाईश के वक़्त भी उनका गू-मूत खादी के कपड़े से हुआ होगा । उसका महत्व नहीं है । बाप – दादा के कारण खादी अपनाने को अपनाना नहीं कहा जा सकता । ’ कातो ,समझ – बूझ कर कातो । जो काते से पहने , जो पहने सो काते ’ – इसे अपनाना असल बात है । वस्त्र स्वावलंबन का मर्म समझाने वाली इन काव्यमय पंक्तियों के रचयिता गांधी थे ।

We need production by masses not mass production.

अथवा The Earth has enough to fulfill everyone’s need but does not have enough to satisfy even a single person’s greed.

गांधी के मानवीय अर्थशास्त्र के उसूलों को इन काव्यमय सूक्तियों से आत्मसात करना कितना आनन्दकर है ।

पिछली सरकार द्वारा असंगठित क्षेत्र के अध्ययन के लिए बनी सेनगुप्ता कमिटी के अनुसार देश की ८७ फीसदी आबादी असंगठित क्षेत्र से जुड़ी है । बचपन से सुनते आए थे कि असंगठित क्षेत्र में रोजगार देने वाला सबसे बड़ा धन्धा हथकरघा है । हमारे पूर्वांचल में ही आजमगढ़ , मऊ , मोहम्मदाबाद, बस्ती , गोरखपुर, बस्ती , बहराईच, अकबरपुर , फैजाबाद में हथकरघे पर बेशकीमती साड़ियाँ ही नहीं आम आदमी की जरूरत को पूरा करने वाला सूती कपड़ा , चादर ,धोती,गमछा,शर्टिंग बनता था ।

राजीव गांधी सरकार की कपड़ा नीति ढाका की मलमल बनाने वाले कारीगरों के अंगूठे काटने वाली नीति के समान थी । इस नीति की बदौलत एक अन्जान व्यक्ति देश का सबसे अमीर बन गया और साथ – साथ रोजगार देने वाला सबसे बड़ा हथकरघा क्षेत्र अत्यन्त सिकुड़ गया । सिंथेटिक तागे और डिटर्जेन्ट बनाने में सरकारी रियायत और छूट की नीति के चलते गरीब आदमी के तन से सूती कपड़ा हटा , सिंथेटिक कपड़ा आ गया । किसानों की तरह बुनकर भी खुदकुशी करने को मजबूर होने लगे । सरकार के छोटे से फैसले से कैसे बना – बनाया बाजार , गारण्टीशुदा मुनाफ़ा- बिना खर्च मिल जाता है ! मानिए सरकार फैसला ले कि देश भर के पुलिस थाने में मारुति कम्पनी की जिप्सी रखी जाएगी तो इससे बिना विज्ञापन आदि के खर्च के हजारों जिप्सी बिक जाती हैं । ठीक इसी प्रकार अम्बानी समूह को छोटे छोटे फैसलों से करोड़ों – अरबों का मुनाफ़ा पहुंचाया गया ।

मुझे बनारस में सुना चौधरी चरण सिंह का भाषण याद है जिसमें उन्होंने माचिस बनाने वाली एकमात्र विदेशी (और ऑटॉमैटिक संयंत्र वाली)  विमको को बन्द करने के फैसले के औचित्य को बखूबी समझाया था ।

वैसे ही आपातकाल के दौरान गांधी आश्रम के एक खादी भण्डार के उद्घाटन की याद आती है । अंग्रेजी राज में पूर्वी उत्तर प्रदेश में खादी उत्पादन की प्रमुख संस्था – गांधी आश्रम की स्थापना धीरेन्द्र मजुमदार और आचार्य जे. बी. कृपलानी जैसे नेताओं ने की थी । कमलापति त्रिपाठी इन लोगों द्वारा प्रशिक्षित हुए थे । आपातकाल के दरमियान बनारस के शास्त्री नगर के खादी भंदार के उद्घाटन कार्यक्रम में गुरु (आचार्य कृपलानी) – शिष्य (कमलापति ) दोनों मंच पर मौजूद थे । पंडितजी रेल मन्त्री थे । सभा में आचार्यजी ने पंडितकी को सलाह दी थी कि रेल महकमा चाहे तो खादी की कितनी खपत कर सकता है । यह गौरतलब है कि स्वतंत्रता-पूर्व जब आचार्यजी कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव थे तब जवाहरलाल नेहरू चवन्निया सदस्य भी नहीं थे ।  वरिष्टता के कारण आपातकाल में गिरफ़्तार न किए जाने के शायद एक मात्र अपवाद भी वे ही थे । उस सभा में आचार्यजी द्वारा सरकार की आलोचना सुन कर लोकपति त्रिपाठी यह बड़बड़ाते हुए बहिर्गमन कर गए थे कि , ’ बाबू बैठे हैं नहीं तो इस बूढ़े को बन्द करवा देता ’ । राजीव गांधी और लोकपति की कांग्रेसी पीढ़ी खादी के मर्म को भूल चुकी थी।

बहन और पिताजी ने गांधीजी के वस्त्र स्वावलम्बन के सूत्र(कातो समझ-बूझ कर कातो,…..) को समझ – बूझ कर अपनाया है । आज खादी कमीशन की अध्यक्षा द्वारा युवा पीढ़ी के नाम पर खादी – सुधार (’फेसलिफ़्ट’) के लिए एशियाई विकास बैंक से कर्जा लेकर नये शो-रूम बनाने की बात एक साक्षात्कार में पढ़ी तो मुझे सदमा लगा और कोफ़्त हुई । बहन के विद्यार्थी-जीवन को याद किया । उसने कोलकाता के सियालदह स्थित नीलरतन सरकार मेडिकल कॉलेज से डॉक्टरी पढ़ी । कॉलेज की दीवारों पर तब माओ-त्से-तुंग की स्टेन्स्लि के साथ नारे लिखे होते थे , ’ चीनेर चेयरमैन – आमादेर चेयरमैन’ । फिर पूर्व पाकिस्तान से आए लाखों शरणार्थियों के बीच मेडिकल छात्र- छात्राओं की टीम बनाकर शरणार्थी शिबिरों में टीकाकरण आदि में लगी । तब इन तरुण – तरुणियों का नारा होता था – ’ओपार थेके आश्छे कारा ?-आमादेरी भाई बोनेरा ।’ कॉलेज यूनियन की वह महामन्त्री चुनी गयी थी ।

डॉ. संघमित्रा गाडेकर

डॉ. संघमित्रा गाडेकर

खादी का एक बुनियादी सिद्धान्त है कि शोरूम ,विक्रेता-वेतन ,प्रचार पर एक निश्चित प्रतिशत से ज्यादा खर्च नहीं किया जाना चाहिए ताकि कत्तिनों और बुनकरों के श्रम की कीमत इन फिजूल के खर्चों में न जाए तथा कत्तिनों और बुनकरों को ज्यादा लाभ दिया जा सके । दिक्कत यह है कि जो सरकार बुनकर और कत्तिन विरोधी कपड़ा नीति अपनाती है वह खादी का क्ल्याण करे यह कैसे मुमकिन है ? विदेशी वित्तीय एजेन्सी पर अवलम्बन स्वावलम्बन के अस्त्र का पराभव है ? लगता है खादी वालों को विनोबा के सूत्र के सहारे अब चलाना होगा – अ-सरकारी = असरकारी । खादी की मूल भावना के प्रचार से सरकार क्यों भाग रही है ?

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जो महत्व कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं के लिए मार्क्स और एंगेल्स के ’कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ का है ,बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा लाहौर के जाति तोड़क सम्मेलन(जिसमें आयोजकों ने उन्हें बुलाने के बाद फिर निमन्त्रण वापस ले लिया था) के लिए लिखे गये ’भारत में जाति-प्रथा का उच्छेद’ नामक पुस्तिका का जो महत्व हर समतावादी कार्यकर्ता के लिए है, वैसा ही महत्व ’आधुनिक सभ्यता की सख़्त टीका’ करने वाली गांधीजी द्वारा लिखी गई पुस्तिका ’हिन्द स्वराज’ का है ।
’किलडोनन कैसल’ नामक जहाज पर १९०९ में इस किताब को गांधीजी ने ’पाठक’ और ’सम्पादक’ के बीच हुए सवाल-जवाब के रूप में लिखा । २००९ शताब्दी वर्ष है ।
गांधीजी की पत्रकारिता इसके पहले शुरु हो चुकी थी । दक्षिण अफ़्रीका के उनके सत्याग्रह के बहुभाषी मुखपत्र ’इंडियन ओपीनियन’ के बारे में उन्होंने अपनी मौलिक पुस्तक ’दक्षिण अफ़्रीका में सत्याग्रह का इतिहास’ में एक अध्याय लिखा है । ’सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा’ में भी उन्होंने अपने अखबार ’नवजीवन’ तथा ’यंग इंडिया’ पर एक अध्याय लिखा है ।
’हिन्द स्वराज’ में पाठक द्वारा पूछे गए पहले सवाल के जवाब में ही वे बतौर ’सम्पादक’ अखबार का काम बताते हैं :

अखबारका एक काम तो है लोगों की भावनायें जानना और उन्हें जाहिर करना ; दूसरा काम है लोगोंमें अमुक जरूरी भावनायें पैदा करना ; और तीसरा काम है लोगोमें दोष हों तो चाहे जितनी मुसीबतें आने पर भी बेधड़क होकर उन्हें दिखाना ।’

जहां तक वाणी स्वातंत्र्य की बात है गांधी उसमें किसी तरह के हस्तक्षेप के खिलाफ़ थे । इस आज़ादी को वे अकाट्य मानते थे। अखबारों को गलत छापने के भी वे हक़ में थी । जब अखबारों के खिलाफ़ अंग्रेजों का दमन चल रहा था तब उन्होंने कहा कि –

’हमें प्रेस की मशीनों और सीसे के अक्षरों की स्थापित प्रतिमा को तोड़ना होगा । कलम हमारी फौन्ड्री होगी नकल बनाने वाले कातिबों के हाथ प्रिंटिंग मशीन! हिन्दू धर्म में मूर्ति-पूजा की इजाजत तब होती है जब वह किसी आदर्श हेतु सहायक हो । जब मूर्ति ही आदर्श बन जाती है तब वह पापपूर्ण वस्तु-रति का रूप धारण कर लेती है । अपने विचारों की बेरोक अभिव्यक्ति के लिए हम मशीन और टाइप का जब तक उपयोग कर सकते हों करें । बाप बनी सत्ता जब टाइप-अक्षरों के हर संयोजन तथा मशीन की हर हरकत पर निगरानी रखने लगे तब हमे असहाय नहीं हो जाना चाहिए ।…. यह मैं जरूर कबूलूंगा कि हाथ से निकाले गये अखबार वीरोचित समय में अपनाया गया वीरोचित उपाय है ।….इस अधिकार की बहाली के लिए हमे सिविल नाफ़रमानी भी अपनानी होगी क्योंकि संगठन और अभिव्यक्ति के अधिकार का मतलब – लगभग पूर्ण स्वराज के है।’

( यंग इंडिया , १२-१-’२२,पृष्ट २९ )

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हम क अरसे से इस बात को मानने के आदी बन गये हैं कि आम जनता को सत्ता या हुकूमत सिर्फ़ धारासभाओं के (विधायिका) जरिये मिलती है । इस खयाल को मैं अपने लोगों की एक गंभीर भूल मानता रहा हूँ । इस भ्रम या भूल की वजह या तो हमारी जड़ता है या वह मोहिनी है , जो अंग्रेजों के रीति – रिवाजों ने हम पर डाल रखी है । अंग्रेज जाति के इतिहास के छिछले या ऊपर – ऊपर के अध्ययन से हमने यह समझ लिया है कि सत्ता शासन – तंत्र की सबसे बड़ी संस्था पार्लमेण्ट से छनकर जनता तक पहुंचती है । सच बात यह है कि हुकूमत या सत्ता जनता की बीच रहती है , जनता की होती है और जनता समय – समय पर अपने प्रतिनिधियों की हैसियत से जिनको पसंद करती है , उनको उतने समय के लिए सौंप देती है । यही क्यों , जनता से भिन्न या स्वतंत्र पर्लमेण्टों की सत्ता तो ठीक , हस्ती तक नहीं होती । पिछले इक्कीस बरसों से भी ज्यादा अरसे से मैं यह इतनी सीधी – सादी बात लोगों के गले उतारने की कोशिश करता रहा हूँ । सत्ता का असली भण्डार या खजाना तो सत्याग्रह की या सविनय कानून-भंग की शक्ति में है । एक समूचा रा्ष्ट्र अपनी धारासभा के कानूनों के अनुसार चलने से इनकार कर दे , और इस सिविल नाफ़रमानी के के नतीजों को बरदाश्त करने के लिए तैयार हो जाए तो सोचिए कि क्या होगा ! ऐसी जनता सरकार की धारासभा को और उसके शासन – प्रबन्ध को जहाँ का तहाँ  , पूरी तरह , रोक देगी । सरकार की , पुलिस की या फौज की ताकत , फिर वह कितनी ही जबरदस्त क्यों न हो , थोड़े लोगों को  ही दबाने में कारगर होती है । लेकिन जब समूचा राष्ट्र सब कुछ सहने को तैयार हो जाता है , तो उसके दृढ़ संकल्प को डिगाने में किसी पुलिस की या फौज की कोई जबरदस्ती काम नहीं देती ।

फिर पार्लमेण्ट के ढंग की शासन – व्यवस्था तभी उपयोगी होती है , जब पार्लमेण्ट के सब सदस्य बहुमत के फैसलों को मानने के लिए तैयार हों । दूसरे शब्दों में , इसे यों कहिए कि पार्लमेण्टरी शासन – पद्धति का प्रबन्ध परस्पर अनुकूल समूहों में ही ठीक – ठीक काम देता है ।

यहाँ हिन्दुस्तान में तो ब्रिटिश सरकार ने कौमी तरीके पर मतदाताओं के अलग – अलग गिरोह खड़े कर दिए हैं , जिसकी वजह से हमारे बीच ऐसी बनावटी दीवारें खड़ी हो गयी हैं , जो आपस में मेल नहीं खातीं ; और ऐसी व्यवस्था के अंदर हम पार्लमेण्ट के ढंग की शासन – पद्धति का दिखावा करते आये हैं । ऐसी अलग – अलग और बनावटी इकाइयों को , जिनमें आपसी मेल नहीं है , एक ही मंच पर एक से काम के लिए इकट्ठा करने से जीतती – जागती एकता कभी पैदा नहीं हो सकती ।  सच है कि इस तरह की धारासभाओं के जरिए राजकाज का काम ज्यों-त्यों चलता रहता है ; लेकिन इन धारासभाओं के मंच पर इकट्ठा हो कर हम तो आपस में लड़ते ही रहेंगे , और जो भी कोई हम पर हुकूमत करता होगा , उसकी तरफ़ से समय – समय पर मिलने वाले हुकूमत के टुकड़ों को बाँट खाने के लिए हम तरसते रहेंगे । हमारे ये हाकिम कड़ाई के साथ हमें काबू में रखते हैं ,और परस्पर विरोधी तत्वों को आपस में झगड़ने से रोकते हैं । ऐसी शर्मनाक हालत में से पूर्ण स्वराज्य प्रकट होना मैं बिलकुल असंभव मानता हूँ ।

धारासभाओं के और उनके काम के बारे में मेरे खयाल इतने कड़े हैं ; फिर भी मैं इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि जब तक चुनावों के जरिए बनने वाली प्रातिधिक संस्थाओं के लिए गलत उम्मेदवार खड़े रहते हैं , तब तक उन संस्थाओं में प्रगतिविरोधी लोगों को घुसने से रोकने के लिए हमें अपने उम्मीदवार खड़े करने चाहिए ।

– ( गांधी जी , अनुवादक – काशीनाथ त्रिवेदी , रचनात्मक कार्यक्रम,१३-११-१९४५, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर,पृष्ट- १० से १२ )

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इस सैद्धान्तिक अन्तर्विरोध का हल खोजने की कोशिश में हम एक नये सत्य पर पहुचते हैं । दरअसल पूंजीवाद का तीन – चार सौ सालों का पूरा इतिहास देखें, तो वह लगातार प्राकृतिक संसाधनों पर बलात कब्जा करने और उससे लोगों को बेदखल करने का इतिहास है । एशिया व अफ्रीका के देशों को उपनिवेश बनाने के पीछे वहाँ के श्रम के साथ साथ वहाँ के प्राकृतिक संसाधनों की लूट का आकर्षण प्रमुख रहा है । दोनों अमरीकी महाद्वीपों और ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप के मूल निवासियों को नष्ट करके वहाँ के प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जे की लालसा ही यूरोपीय गोरे लोगों को वहाँ खींच लाई । जिसे मार्क्स ने ‘पूंजी का आदिम संचय’ कहा है वह दरअसल पूंजीवाद की निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है । इसके बगैर भी पूंजीवाद चल नहीं सकता । मजदूरों के शोषण की तरह प्राकृतिक संसाधनों की लूट भी पूंजी के संचय का अनिवार्य हिस्सा है ।
पूंजीवादी औद्योगीकरण एवं विकास के लिए प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष तरीके से कितने बड़े पैमाने पर जंगल नष्ट किया गया , कितने बड़े पैमाने पर जमीन की जरूरत है , कितने बड़े पैमाने पर पानी की जरूरत है , कितने बड़े पैमाने पर खनिज निकालना होगा , कितने बड़े पैमाने पर उर्जा चाहिए – ये बातें अब धीरे धीरे साफ़ हो रही हैं और उनका अहसास बढ़ रहा है । यदि यह पूंजीवाद की अनिवार्यता है तो पूंजीवाद के विश्लेषण में इन्हें शामिल करना होगा । जो मूल्य का श्रम सिद्धान्त मार्क्स ने अपनाया वह इसमें बाधक होता है । श्रम के शोशण को समझने और उत्पादन की प्रक्रिया में श्रम के महत्व को बताने के लिए तो यह सिद्धान्त ठीक है , किन्तु प्राकृतिक संसाधनों का इसमें कोई स्थान नहीं है । ऐसा शायद इसलिए भी है कि प्राकृतिक संसाधनों को प्रकृति का मुफ्त उपहार मान लिया जाता है । लेकिन सच्चाई यह है कि प्रकृति को बड़े पैमाने पर लूटे बगैर तथा उस पर निर्भर समुदायों को उजाड़े-मिटाये बगैर पूंजीवादी व्यवस्था के मूल्य का सृजन हो ही नहीं सकता । ‘अतिरिक्त मूल्य’ का एक स्रोत श्रम के शोषण में है, तो एक प्रकृति की लूट में भी । जिसे पूंजीवादी मुनाफा कहा जाता है उसमें प्राकृतिक संसाधनों पर बलात कब्जे , एकाधिकार और लूट से उत्पन्न ‘लगान’ का भी बड़ा हिस्सा छिपा है ।
प्राकृतिक संसाधनों की यह लूट को नवौपनिवेशिक शोषण या आन्तरिक उपनिवेश की लूट से स्वतंत्र नहीं है , बल्कि उसीका हिसा है । शोषण व लूट के इस आयाम को पूंजीवाद के विश्लेषण के अंदर शामिल करना जरूरी हो गया है। मार्क्स और लोहिया के समय यह उभर कर नहीं आया था । इसलिए अब पूंजीवाद के समझने के अर्थशास्त्र को मार्क्स और लोहिया से आगे ले जाना होगा । गांधीजी जो शायद ज्यादा दूरदर्शी व युगदृश्टा थे इसमें हमारे मददगार हो सकते हैं ।
पूंजीवाद एक बार फिर गहरे संकट में है । वित्तीय संकट , विश्वव्यापी मन्दी और बेरोजगारी आदि इसका एक आयाम है । यह भी गरीब दुनिया के मेहनतकश लोगों के फल को हड़पने के लिए शेयर बाजार , सट्टा , बीमा , कर्ज का व्यापार जैसी चालों का नतीजा है जिसमें कृत्रिम समृद्धि का एक गुब्बारा फुलाया गया था । वह गुब्बारा फूट चुका है । लेकिन इस संकट का दूसरा महत्वपूर्ण आयाम पर्यावरण का संकट , भोजन का संकत और प्राकृतिक संसाधनों का संघर्ष है । दुनिया के अनेक संघर्ष जल, जंगल , जमीन , तेल और खनिजों को ले कर हो रहे हैं । इन संकटों से पूंजीवादी विकास की सीमाओं का पता चलता है । इन सीमाओं को समझकर , पूंजीवाद की प्रक्रियाओं का सम्यक विश्लेषण करके , उस पर निर्णायक प्रहार करने का यह सही मौका है । यदि हम ऐसा कर सकें तो जिसे ‘इतिहास का अंत’ बताया जा रहा है , वह एक नये इतिहास को गढ़ने की शुरुआत हो सकता है ।
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कृपया आलेख प्रकाशित होने पर कतरन एवं पारिश्रमिक निम्न पते पर भेजें –
सुनील ,समाजवादी जनपरिषद ,ग्रा?पो. केसला,वाया इटारसी,जि होशंगाबाद,(म.प्र.) ४६११११
सुनील का ई-पता sjpsunilATgmailDOTcom

इस लेख का प्रथम भाग , दूसरा भाग

सुनील की अन्य लेखमाला : औद्योगीकरण का अन्धविश्वास : ले. सुनील

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