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Posts Tagged ‘नेहरू’

२ अक्टूबर ,१९५०,इंदौर,अपनी मृत्यु से तीन माह पूर्व सरदार पटेलने कहा – ‘हमारे नेता पंडित जवाहरलाल नेहरू हैं। बापूने अपने जीवन-कालमें उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया और उसकी घोषणा कर दी। बापूके तमाम सिपाहियोंका धर्म है कि वे बापूके आदेशका पालन करें।जो उस आदेशको हृदयपूर्वक उसी भावनासे स्वीकार नहीं करता , वह ईश्वरके सामने पापी सिद्ध होगा। मैं बेवफा सिपाही नहीं हूं। मैं जिस स्थान पर हूं उसका मुझे कोई ख्याल नहीं है। मैं इतना ही जानता हूं कि जहां बापूने मुझे रखा था वहीं अब भी मैं हूं ।”
(पूर्णाहुति,चतुर्थ खण्ड,पृष्ट४६५,ले. प्यारेलाल,नवजीवन प्रकाशन,अहमदाबाद)

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[ मित्रों, जो मित्र इसे व्यापक प्रसार लायक मानते हैं वे इसे जरूर साझा करें।]

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना १९२५ में हो गई थी।देश की आजादी की लड़ाई में उनकी क्या भूमिका थी,विभाजन के बाद वे किन करतूतों में लगे थे यह सब संघ के प्रचारक नरेन्द्र मोदी और लालकृष्ण अडवाणी नहीं बताते। बताते क्या हैं? यह कि आजाद भारत के मंत्रीमण्डल में हैदराबाद को भारत में शामिल करवाने की सरदार पटेल की कुशल रणनीति की बाबत – नेहरू पटेल को ‘साम्प्रदायिक’ मानते थे ! नेहरू ने पटेल को इस मसले पर ‘साम्प्रदायिक’ मानते हुए उन्हें मृत्यु पर्यन्त अपने मंत्रीमण्डल में कैसे झेला यह अडवाणी नहीं बताते।

भारत छोड़ो के आवाहन और आन्दोलन (१९४२) का विरोध करने के बाद से वाइसरॉय की कार्यकारिणी में श्यामाप्रसाद मुखर्जी सदस्य थे। यहां मैं सरदार पटेल की सेक्युलर-निष्ठा और प्रतिबद्धता से जुड़े दो महत्वपूर्ण प्रसंगों की चर्चा करूंगा । मोदी और अडवाणी के ‘राष्ट्रतोड़क राष्ट्रवाद’ की शब्दावली में इनमें पहला प्रसंग ‘मुस्लिम तुष्टीकरण’ का तथा दोनों ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’ के नमूने होंगे।

पश्चिम पाकिस्तान के अधिकारी काफी संख्या में पूर्व पाकिस्तान में प्रमुख पदों पर नियुक्त किए गए। इसके फलस्वरूप बड़े पैमाने पर हिन्दू अल्पसंख्यकों को सताया जाने लगा।नतीजा यह हुआ कि वहां से काफी बड़ी संख्या में हिन्दू भारत में चले आये।इससे पश्चिम बंगाल के सीमित साधनों पर बड़ा भार पड़ गया । भारत और पाकिस्तान के प्रधामंत्रियों – जवाहरलाल नेहरू और लियाकतअली खान के बीच एक समझौता हुआ,जो जनता में लोकप्रिय न हो सका। जवाहरलाल नेहरू के प्रति रही अपनी वफादारी के कारण खराब स्वास्थ्य होते हुए भी सरदार ने कलकत्ता जाना और वहाम इस समझौते के बचाव में सार्वजनिक भाषण करना स्वीकार किया । इसका बंगाल की जनता पर भारी प्रभाव पड़ा।

पूर्व बंगाल पर सरदार के भाषण का अंश

पूर्व बंगाल की समस्या कठिन है । वहां लगभग डेढ़ करोड़ हिन्दू हैं । वे निर्बल हैं और सौम्य हैं। पंजाब के लोग उनसे भिन्न थे।वे बलवान थे, अपनी बात को दृढ़तापूर्वक रख सकते थे और लड़ भी सकते थे। पूर्व बंगाल के हिन्दू दुखद स्थिति में हैं। कोई व्यक्ति किसी कारण के बिना अपना घरबार नहीं छोड़ना चाहता। अंत में तो भारत में उन्हें भूखों ही मरना होगा। वे अपना वतन छोड़कर भारत में इसलिए आते हैं कि वहां वे जिन परिस्थितियों में रहते हैं,वे बुरी हैं -दुःखदायी हैं । यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न था, जिसमें हाल में हुई आन्तर-औपनिवेशिक परिषद में चर्चा हुई थी और हम आशा करें कि दोनों सरकारों के बीच कोई संतोषप्रद समझौता इस बारे में हो जाएगा। बेशक ,यह एक गंभीर प्रश्न है और इसकी गंभीरता पाकिस्तान के सामने स्पष्ट कर दी गई है। जिन हिन्दुओं ने पूर्व बंगाल छोड़ दिया है और अब भारत में निराश्रित के रूप में रहते हैं,उन्हें वहां लौटना होगा।भारत उसका बोझ नहीं उठा सकता और यदि वे यहीं रहे और दूसरे आते जायें,तो भारत के सामने गंभीर समस्याएं खड़ी हो जायेंगी।पाकिस्तान सरकार को ऐसी परिस्थितियां पैदा करनी चाहिए ,जिससे ये लोग वहां जाकर अपने घरों में शान्ति से रह सकें। पाकिस्तान सरकार को त्रास या अत्याचार से उनकी रक्षा करनी चाहिए।उन्हें यह विश्वास दिलाया जाना चाहिए कि पाकिस्तान में उनके प्राणों को कोई खतरा नहीं रहेगा। मैंने कुछ समय पहले सुझाया था कि अगर हिंदू पैदा की गई असंतोषप्रद स्थिति स्थिति के कारण बड़ी संख्या में पूर्व बंगाल छोड़ने को मजबूर हो जायें,तो पाकिस्तान सरकार को उन्हें बसाने के लिए अतिरिक्त भूमि भारत को देनी चाहिए। यह सुझाव पारस्परिक चर्चा और समझौते द्वारा इस कठिन समस्या के एक हल के एक उपाय के रूप में ही दिया गया था। यह सुझाव न तो चुनौती के रूप में रखा गया था और न उसे बलपूर्वक लादने का कोई इरादा था। मेरे मन में पाकिस्तान के खिलाफ कोई आक्रामक इरादा नहीं है और मैं यह मानता हूं कि दोनों उपनिवेशों को पारस्परिक चर्चाओं द्वारा मैत्रीभाव से यह समस्या हल करनी चाहिए। अगर मेरे मन में ऐसा इरादा होता, तो मैं गांधीजी के साथ सारा जीवन नहीं बिता सकता था।

मुझे जो कुछ लगता है उसे कहने में मैं संकोच नहीं करता,फिर भले ही वह हिन्दुओं ,मुसलमानों या अन्य किसीको नाराज ही क्यों न करे। मैं स्वीकार करता हूं कि ऐसा मैं कठोर वाणी में करता हूं, परंतु उपयुक्त भाषा सीखने के लिए मुझे अगला जन्म भी गांधीजी के साथ बिताना पड़ेगा।
(सरदार पटेल ः चुना हुआ पत्र-व्यवहार,१९४५-१९५०,खण्ड२,पृ ३८६-३८७)

हैदराबाद को भारत में शामिल कराने की बाबत सरदार पटेल के कौशल की बाबत नेहरू के साथ हर कदम पर राय-मशविरा तो होता ही था । सरदार के इस पराक्रम के कायल बंगाल में मुस्लिम लीग के नेता और विभाजन के समय बंगाल के मुख्यमंत्री शहीद सुहरावर्दी भी किस हद तक थे उसकी झलक इस खत से मिलती है। गौरतलब है बंगाल में लीग की ‘सीधी कार्रवाई’ जिनके बाद दंगे हुए थे के जिम्मेवार इस नेता ने हैदराबाद को बाकी देश में मिलने के लिए मजबूर करने की कितनी प्रशंसा की।

सरदार को सम्बोधित २१-९-१९४८ के इस पत्र में शहीद सुहरावर्दी कहते हैं ः

‘ हैदराबाद के सम्बन्ध में आपकी नीति , पुलिस-कार्रवाई तथा उसके सफल परिणाम के विषय में आपको तथा आपके द्वारा स्वयं अपने को अभिनन्दन देने की स्वतंत्रता मैं लेता हूं;साथ ही मैं उस भाषण के लिए , जो हैदराबाद की पराजय से ठीक पहले आपने दिया था , भी आपको मेरे हार्दिक धन्यवाद और अभिनन्दन भेजने की इजाजत लेता हूं । आपके उस भाषण की भारत के मुसलमानों में व्यापक प्रशंसा हुई ; आपके भाषण में उन्हें अपनी भावी स्थिति के सम्बन्ध में तथा भारतीय संघ के नागरिकों के नाते अपनी वफादारी की मान्यता के सम्बन्ध में नया प्रोत्साहन मिला है। मेरे अनेक मुस्लिम मित्रों ने इतना गहरा हार्दिक सन्तोष तथा कृतज्ञता व्यक्त की है कि मुझे यह उचित प्रतीत होता है कि मैं उनकी भावनायें आप तक पहुंचा दूं ।

मुझे यह स्वीकार करना चाहिए कि हम अखबारों में लगातार दोहराई जाने वाली इन बातों से बड़े चिन्तित थे कि हैदराबाद का प्रश्न एक साम्प्रदायिक प्रश्न है, कि उसकी गंभीर सांप्रदायिक प्रतिक्रिया भारतीय संघ के भीतर हो सकती है,कि भारतीय संघ के सारे मुसलमान हैदराबाद के प्रति सहानुभूति रखते हैं , कि हैदराबाद पर भारतीय संघ का आक्रमण होने पर वे सब विद्रोह करके संघ के भीतर उपद्रव खड़े कर देंगे और इसलिए उन्हें पहले से ही दबा दिया जाना चाहिए,कि मुसलमानों,कि मुसलमान सामान्यतः राष्ट्रद्रोही है,कि मुसलमान गुप्त षड़्यंत्रों में,रजाकारों की भरती में,हैदराबाद के लिए फण्ड इकट्ठा करने में लगे हुए हैं – आदि आदि । ऐसा मालूम होता था कि कहीं इसका केन्द्रस्थान है,जहां से ये सब आक्षेप और अभियोग निरन्तर होते रहते हैं । शायद इसका कारण मुसलमानों के प्रति रहा घोर अविश्वास था अथवा भय और सन्देह की भावना थी , जो हमारे नये राष्ट्र के लिए बहुत स्वाभाविक थी; अथवा शायद यह मुख्यतः उन लोगों की योजना थी,जो इसे मुसलमानों को बदनाम करने का तथा उनके खिलाफ लोगों की भावनाओं को भड़काने का अच्छा मौका मानते थे – जिसका अंतिम परिणाम मुसलमानों के बहिष्कार में अथवा भारतीय संघ से उनके निकाले जाने में आये। पंडितजी का लखनऊ का भाषन ऐसा पहला भाषण था, जिसमें उन्होंने काश्मीर तथा हैदराबाद की घटनाओं के असाम्प्रदायिक पहलू पर जोर दिया;और उसके बाद तो पंडितजी के और आपके अनेक भाषणों और वक्तव्यों ने देश को सही नेतृत्व और मार्गदर्शन प्रदान किया तथा अविश्वास, भय और घृणा की इन भावनाओं पर अंतिम प्रहार किया,जिन्हें यदि बेरोकटोक फैलने दिया जाता तो उसका निश्चित परिणाम मुसलमानों के व्यापक संहार में आता। आपके दृढ़ निश्चय ने तथा आपके द्वारा दिल्ली में सम्पूर्ण साम्प्रदायिक हिंसा को दबाने के लिए उठाये गये प्रत्यक्ष कदमों ने भी आपके आशयों को बहुत स्पष्ट कर दिया होगा । ‘ (सरदार पटेल ः चुना हुआ पत्रव्यवहार,१९४५-१९५०,खण्ड२,पृ १२६-१२७)

सरदार और नेहरू के बीच के जो मतभेद थे वे छुपे हुए नहीं हैं । उनके बावजूद जिस प्रकार इन दोनों नेताओं ने एक साथ काम किया उसके पीछे एक सूत्र काम कर रहा था। यह सूत्र था महात्मा गांधी। ५-२-१९४८ को सरदार ने यह नेहरू को लिखे पत्र में साफ तौर पर बता दिया था ,’मुझे बापू के अवसान से पहले एक घंटे से अधिक समय तक उनके साथ अंतिम बातचीत करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।उस समय उन्होंने मुझे बताया था कि उनके और आपके बीच तथा लार्ड माउन्टबेटन के साथ उनकी क्या बातें हुई थीं। उन्होंने दूसरे दिन हम दोनों से मिलने का समय भी निश्चित कर दिया था। उनकी राय भी हम दोनों को एकसाथ बांधती है और मैं आपको यह विश्वास दिला सकता हूं कि इसी भावना से अपने कर्तव्य और जिम्मेदारियां पूरी करने का मैं दृढ़ निश्चय कर चुका हूं। (वही,पृ२१४)

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