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Posts Tagged ‘बुरा वक्त’

इस बुरे वक्त में
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राजेन्द्र राजन की कविता
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दुनिया-भर की दूरबीनों
खुफिया-कैमरों और रडारों
पाताल तक खंगाल डालनेवाली पनडुब्बियों
आसमान को कंपा देनेवाले लड़ाकू विमानों
अंतरिक्ष तक मार कर सकने वाली मिसाइलों
सुरक्षा के और भी तमाम इंतजामों
को मुंह चिढ़ाता हुआ
समंदरों और पहाड़ों को लांघता हुआ
सरहदों और संप्रभुताओं पर हंसता हुआ
आ गया है
सबका नया शत्रु
क्या यह अहसास कराने के लिए
कि हमारी सारी तैयारी किसी और मोर्चे पर है
जबकि सबसे ज्यादा खतरा कहीं और है?
नया शत्रु कितना ताकतवर है
कि देखते-देखते दुख के पहाड़ खड़े कर देता है
तरक्कियों को तबाह कर देता है
पल-भर में जगमग शहरों को वीरान कर देता है
वह इतना ताकतवर है फिर भी कितना छोटा
कि नजर नहीं आता
जैसे कोई अदृश्य बर्बरता हो जो सब जगह टूट पड़ी है
एक विषाणु विचार की तरह सूक्ष्म
फैल जाता है दुनिया के इस कोने से उस कोने तक
क्या कुछ विचार भी विषाणुओं की तरह नहीं होते
जो संक्रमण की तरह फैल जाते हैं
जो अपने शिकार को बीमार बना देते हैं
और उसे खौफ के वाहक में बदल देते हैं
क्या तुम ऐसे विचारों की शिनाख्त कर सकते हो?
यह नई लड़ाई बाकी लड़ाइयों से कितनी अलग है
सारी लड़ाइयां हम भीड़ के बूते लड़ने के आदी हैं
पर इस लड़ाई में भीड़ का कोई काम नहीं
उलटे भीड़ खतरा है
इसलिए भीड़ हरगिज न बनें
बिना भीड़ के भी एकजुटता हो सकती है
थोड़ी दूरी के साथ भी निकटता हो सकती है।
इस बुरे वक्त में
जब हम घरों में बंद हैं
तो यह लाचारी एक अवसर भी है
भीड़ से अलग रहकर कुछ गुनने-बुनने का
यह महसूस करने का कि हम भीड़ नहीं हैं
अपने-आप से यह पूछने का
कि क्यों हमारा जानना-सोचना-समझना
सब भीड़ पर आश्रित है
क्यों हमारे धर्म दर्शन अध्यात्म
संस्कृति सभ्यता आचार विचार
राजनीति जनतंत्र नियम कानून
सब भीड़ से बुरी तरह संक्रमित हैं?
हम भीड़ को खुश देखकर खुश होते हैं
भीड़ को क्रोधित देखकर क्रुद्ध
भीड़ ताली बजाती है तो ताली बजाते हैं
गाली देती है तो गाली देते हैं
भीड़ जिधर चलती है उधर चल देते हैं
जिधर मुड़ती है उधर मुड़ जाते हैं
भीड़ भाग खड़ी होती है तो भाग खड़े होते हैं
जैसे भीड़ से अलग हम कुछ न हों
ऐसे भीड़मय समय में
कुछ दिन थोड़ा निस्संग रहना एक अवसर है
स्वयं को खोजने का स्वयं को जांचने का
और यह सोचने का
कि क्या हम ऐसा समाज बना सकते हैं
जहां मिलना-जुलना हो और मानवीय एकजुटता हो
मगर जो भीड़तंत्र न हो?
यह बुरा वक्त इस बात का भी मौका है
कि हम प्रतिरोध-क्षमता के महत्त्व को पहचानें
बुरे दौर आएंगे
उनसे हम पार भी पाएंगे
बशर्ते प्रतिरोध की ताकत हो
शरीर में भी
मन में भी
समाज में भी।
______________________
@ राजेन्द्र राजन की कविता
Aflatoon Afloo
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