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Posts Tagged ‘मृत्यु’

Kishanji aur Lohia
यह पत्र मुझसे बड़ी उम्र के व्यक्तियों को सम्बोधित नहीं है । हांलाकि जानकारी के तौर पर वे इस पत्र को पढ़ सकते हैं ।
विगत ३० जून २००० को मेरी आयु जन्म तारीख के हिसाब से सत्तर साल की हो गई । यह मेरे लिए एक विशेष बात थी। बचपन में मैं कई तरह की व्याधियों से ग्रस्त था। कुछ बीमारियां हमेशा के लिए रह गई हैं । अपनी किशोरावस्था में कभी सोचा नहीं कि साठ साल से अधिक उम्र तक जीवित रहूंगा । उस औपनिवेशिक काल में एक भारतीय की औसत आयु भी बहुत कम हुआ करती थी । अतः सत्तर साल की आयु तक जीवन में सक्रीय रहना मेरे लिए विशेष बात थी । शायद राजनीति में सक्रीय जीवन अपेक्षाकृत अधिक आयु तक होता है । जो भी हो , पिछले दस साल से निश्चय ही मेरी कार्यक्षमता घटती जा रही है । अस्वस्थता की वजह से नहीं , बल्कि शारीरिक क्षमता के शिथिल हो जाने के कारण। मांसपेशियों की कमजोरी हमेशा थी,लेकिन कुछ साल पहले एक सत्याग्रह स्थल पर एक पुलिस वाले ने धक्का दिया तो मैं बिल्कुल गिर जाता , पास बैठे एक साथी ने मुझे पकड़ लिया । मेरी स्मरण शक्ति का कुछ अंश कमजोर हो चुका है और सुनने की क्षमता भी घटी है। कुल उर्जा का परिमाण इतना कम हुआ है कि एक दिन का काम एक हफ्ते में करता हूं । अधिकांश चिट्ठियों का जवाब नहीं देता हूं । १९९० में ही मैंने बरगढ़ – सम्बलपुर जिले के अपने क्षेत्र के देहातों में जाना बंद कर दिया । अब केवल रेलगाड़ियों की लम्बी यात्रा करके सभाओं में योगदान करता हूं । महीने में एक-दो लेख लिखता हूं। मेरा सार्वजनिक – राजनैतिक काम इतने में सीमित हो गया है ।
आगे दस साल से अधिक जीवित रहने की मेरी इच्छा नहीं है। क्योंकि तब शारीरिक तौर पर मैं एक दयनीय अवस्थामें पहुंच जाऊंगा। । मृत्यु के बारे में मैं बार बार सचेत होता हूं, लेकिन उसके इंतजार में नहीं रहना चाहता हूं। मृत्यु का साक्षात्कार चाहता हूं । इस वाक्य का क्या अर्थ है,कोई पूछे तो मैं स्पष्ट नहीं बता पाऊंगा, क्योंकि मैं खुद इस वक्त इसे नहीं जानता हूं। शायद सारे बंधनों से मुक्त होने पर कोई मृत्यु से से साक्षात्कार कर पाएगा। सारे बंधनों से मुक्त होना भी अपरिभाषित है।
१९५१-५२ से अब तक मैं निरंतर समाजवादी राजनीतिमें सांगठनिक दायित्व लेकर काम कर रहा हूं । पचास साल का समय अत्यधिक होता है। इसके बाद मैं सांगठनिक दायित्व लेकर , सांगठनिक अनुशासन के प्रति जवाबदेह रहकर काम नहीं कर सकूंगा।
राजनीति से या संगठनों से हटने की बात मैं अभी नहीं सोच पाता हूं । वैसे तो मेरे बहुत सारे परिचित लोग भी नहीं जानते हैं कि मैं राजनीति कर रहा हूं । सिर्फ संगठन के लोग जानते हैं कि हम राजनीति कर रहे हैं । हमारी राजनीतिमें तीव्रता नहीं है । कुछ लोग कर्तव्य पालन के लिए राजनीति कर रहे हैं। एक राजनीति होती है तामझाम की , वह हमारा उद्देश्य नहीं है। दूसरी राजनीति होती है तीव्रता की ।मैं आशा करता हूं कि मेरे वर्तमान और भविष्य के सहयोगी हमारी राजनीति में तीव्रता लाएंगे । इस आशा के साथ मै समाजवादी जनपरिषद और जनांदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय जैसे संगठनों की राजनीति से जुड़ा रहूंगा ।
राजनीति से जुड़ा रहने का प्रधान कारण यह है कि आज की हालत में राजनैतिक चुप्पी का मतलब है मानव समाज के पतन और तबाही के प्रति उदासीनता । ग्लोबीकरण की व्यवस्था से राष्ट्र की और मानव समाज की जो तबाही होने जा रही है उसके विरुद्ध एक राजनीति बनाने का काम बहुत धीमा चल रहा है। उसको तेज,विश्वसनीय और संघर्षमय करना , उसके विचारों और दिशा को स्पष्ट करना आज की असली राजनीति होगी । इस कार्य में मेरा योगदान कितना भी आंशिक और सीमित हो, उसको जारी रखने की मेरी प्रबल इच्छा है।क्योंकि यह राजनीति मानव समाज के भविष्य के सोच से संबंधित है,इसके वैचारिक विस्तार में मनुष्य जी वन के कुछ मौलिक सत्यों के संपर्क में आना पड़ेगा। मृत्यु से साक्षात्कार की एक संभावना उसीमें है – जीवन संबंधी गहरे सत्यों के संपर्क में आने में ।
ऊपर जो भी लिखा गया है वह सूचना के तौर पर है; चर्चा का विषय नहीं है ।
आपसे अनुरोध है कि मेरे किसी मित्र या साथी को अगर यह पत्र नहीं मिला है तो एक प्रति बनाकर आप उसे दे दें ।आप जिसको भी मेरा साथी या मित्र समझते हैं वे मेरे साथी और मित्र हैं ।
शुभकामनाओं सहित
किशन पटनायक
15.3.2001/15.5.2001

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सामाजिक न्याय के प्रखर प्रवक्ता , औरंगाबाद उच्च न्यायालय के वरिष्ट वकील , समाजवादी जनपरिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सक्रिय सदस्य साथी प्रवीण वाघ हमारे बीच नहीं रहे । युवक क्रांति दल (युक्रांद) से अपनी राजनीति की शुरुआत करने वाले समाजवादी जनपरिषद के संस्थापकों में प्रमुख थे। मराठवाडा विश्वविद्यालय का नाम बाबासाहब अम्बेडकर के नाम पर करने के आन्दोलन में उन्होंने सक्रिय भागीदारी की थी।  आपके पिता चन्द्रमोहन वाघ औरंगाबाद में रिपब्लिकन पार्टी में सक्रिय थे तथा डॉ. अम्बेडकर के निकट सहयोगी थे तथा अम्बेडकर साहब द्वारा शुरु पत्रिका का प्रकाशन करते थे।

प्रवीण वाघ

सामाजिक न्याय के प्रबल प्रवक्ता प्रवीण वाघ

असंगठित मजदूरों के सवाल को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर मजबूती से उठाते थे । वैश्वीकरण की आर्थिक नीतियों के बहुजन समाज पर पड़ने दुष्प्रभाव को वे बखूबी प्रस्तुत करते थे।  कुटुम्बीजन इस अपूरणीय क्षति को सहन करने की शक्ति पायें ।

साथी तेरे सपनों को हम मंजिल तक पहुंचायेंगे।

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फिर जाड़ा आया , फिर गर्मी आई

फिर आदमियों के पाले से लू से मरने की खबर आई :

न जाड़ा ज़्यादा था न लू ज़्यादा

तब कैसे मरे आदमी

वे खड़े रहते हैं तब नहीं दिखते ,

मर जाते हैं तब लोग जाड़े और लू की मौत बताते हैं ।

– रघुवीर सहाय

[ फरवरी , ’७२ ]

स्रोत: प्रतिनिधि कविताएँ : रघुवीर सहाय ,राजकमल पेपरबैक्स

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