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Posts Tagged ‘राजनीति’

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‘खादी का मतलब है देश के सभी लोगों की आर्थिक स्वतंत्रता और समानता का आरंभ। लेकिन कोई चीज कैसी है , यह तो उसको बरतने से जाना जा सकता है – पेड की पहचान उसके फल से होती है। इसलिए मैं जो कुछ कहता हूं उसमें कितनी सचाई है, यह हर एक स्त्री-पुरुष खुद अमल करके जान ले। साथ ही खादी में जो चीजें समाई हुई हैं,उन सबके साथ खादी को अपनाना चाहिए। खादी का एक मतलब यह है कि हम में से हर एक को संपूर्ण स्वदेशी की भावना बढ़ानी चाहिए और टिकानी चाहिए;यानी हमें इस बात का दृढ़ संकल्प करना चाहिए कि हम अपने जीवन की सभी जरूरतों को हिन्दुस्तान की बनी चीजों से,और उनमें भी हमारे गांव में रहने वाली आम जनता की मेहनत और अक्ल से बनी चीजों के जरिए पूरा करेंगे।इस बारें में आज कल हमारा जो रवैया है,उसे बिल्कुल बदल डालने की यह बात है।मतलब यह कि आज हिन्दुस्तान के सात लाख गांवों को चूस कर और बरबाद कर के हिंदुस्तान और ग्रेट ब्रिटेन के जो दस-पांच शहर मालामाल हो रहे हैं,उनके बदले हमारे सात लाख गांव स्वावलंबी और स्वयंपूर्ण बने,और अपनी राजी खुशी से हिंदुस्तान के शहरों और बाहर की दुनिया के लिए इस तरह उपयोगी बनें कि दोनों पक्षों को फायदा पहुंचे।‘ महात्मा गांधी ने खादी के अपने बुनियादी दर्शन को इन शब्दों में अपनी प्रसिद्ध पुस्तिका ‘रचनात्मक कार्यक्रमः उसका रहस्य और स्थान’ में प्रस्तुत किया है। अब हमें गांधीजी के ‘पेड के फल की पहचान’ करनी है। यह रचनात्मक कार्यक्रम सत्याग्रह के लिए आवश्यक अहिंसक शक्ति के निर्माण हेतु बनाये गये थे।इन कार्यक्रमों का प्रतीक था-चरखा।लोहिया ने कई बरस बाद कहा कि हम रचनात्मक कार्यक्रम का प्रतीक ‘फावडा’ को भी चुन सकते हैं।

दावोस में शुरु हो रहे विश्व आर्थिक सम्मेलन के मौके पर इंग्लैण्ड की एक स्वयंसेवी संस्था ने एक रपट जारी की है जिसके मुताबिक भारत के सबसे दौलतमन्द एक फीसदी लोग देश की कुल दौलत के अट्ठावन फीसदी के मालिक हैं।यह आंकड़ा देश में भीषण आर्थिक विषमता का द्योतक है। यानी गांधीजी ने खादी के जिस कार्यक्रम को 1946 में ‘आर्थिक समानता का आरंभ’ माना था उसकी यात्रा उलटी दिशा में हुई है। इस देश में खेती के बाद सबसे बडा रोजगार हथकरघे से मिलता था ।उन हथकरघों तथा उन पर बैठने वाले बुनकरों की तथा खादी के उत्पादन के लिए आवश्यक ‘हाथ-कते सूत’ और उसे कांतने वाली कत्तिनों की हालत की पड़ताल जरूरी है। इसके साथ जुड़ा है ग्रामोद्योग तथा कुटीर व लघु उद्योग का संकट।

हाथ से कते सूत को हथकरघे पर बुनने से गांधी-विनोबा की खादी बनती है। दुनिया के प्रारंभिक बड़े अर्थशास्त्री मार्शल के छात्र और गांधीजी के सहकर्मी अर्थशास्त्री जे.सी. कुमारप्पा के अनुसार ,’दूध का वास्तविक मूल्य उससे मिलने वाला पोषक तत्व है।‘ इस लिहाज से खादी का वास्तविक मूल्य वह है जो कत्तिनों ,बुनकरों और पहनने वालों को मिलता है।खादी के अर्थशास्त्र में गांधीजी के समय नियम था कि उसकी कीमत में से व्यवस्था पर 6.15 फीसदी से अधिक खर्च नहीं किया जाना चाहिए ताकि कत्तिनों और बुनकरों की आमदनी में कटौती न हो।कीमत निर्धारण की तिकड़मों के अलावा अब ‘व्यवस्था खर्च’ पर 25 फीसदी तक की इजाजत है। मुंबई के हुतात्मा चौक के निकट स्थित खादी भण्डार में ‘जया भादुड़ी कलेक्शन’ और दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित खादी भंडार में विख्यात डिजाइनरों के डिजाइन किए गए वस्त्र जिस कीमत पर बिकते हैं उसका कितना हिस्सा कत्तिनों और बुनकरों के पास पहुंचता है इसका अनुमान लगाया जा सकता है। इसके अलावा खादी उत्पादन करने वाली संस्थाओं को फैशन-शो जैसे आयोजनों के लिए खादी कमीशन से अधिक आर्थिक मदद मिलती है किन्तु कताई केन्द्रों में अम्बर चरखों के रख-रखाव के लिए आर्थिक मदद नहीं मिलती। सूती-मिलों के बने सूत को हथकरघे पर बुने कपडे तथा पावरलूम पर बने कपड़ों के अलावा मोटर से चलने वाले अम्बर-चरखों पर काते गये सूत के कपडों को खादी भण्डारों से बेचने के लिए अनिवार्य प्रमाणपत्र खादी कमीशन द्वारा दिया जा रहा है। इन्हें ‘लोक वस्त्र’ कह कर खादी भंडार में बेचा जा रहा है।पूर्वोत्तर भारत के हथकरघों पर मिलों के धागे से बुने गये कपडों को भी खादी में सम्मिलित करने की नीति वर्तमान सरकार ने बनाई है। ताने में मिल का सूत और बाने में हाथ-कता सूत भी खादी भंडारों से अधिकृत रूप से बेचा जा रहा है।

केन्द्र सरकार की वर्तमान खादी-नीति की समीक्षा करते वक्त हमें यह तथ्य भी नजरअन्दाज नहीं करना चाहिए कि आठ घन्टे खादी का कपड़ा बुनने वाले को 100 रुपये तथा आठ घन्टे सूत कांतने वाली कत्तिन को मात्र 25 रुपए मजदूरी मिलती है।यह सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से बहुत कम है। आजादी के पहले खादी और ग्रामोद्योग की गतिविधियां चलाने वाली संस्था अखिल भारत चरखा संघ की सालाना रपट से कुछ आंकड़ों पर ध्यान दीजिए,इन्हें गांधीजी ने उद्धृत किया है- ‘सन 1940 में 13,451 से भी अधिक गांवों में फैले हुए 2,75,146 देहातियों को कताई ,पिंजाई,बुनाई वगैरा मिला कर कुल 34,85,609 रुपये बतौर मजदूरी के मिले थे। इनमें 19,645 हरिजन और 57,378 मुसलमान थे ,और कातनेवालों में ज्यादा तादाद औरतों की थी।’ जब आंकडे खादी की बाबत हों तब उसके मापदन्ड ऐसे होते हैं। चरखा संघ किस्म के रोजगार और आमदनी वाले आंकडे खादी कमीशन ने देने बन्द कर दिए हैं। खादी का मौलिक विचार त्याग देने के कारण अब ऐसे आंकड़ों की आवश्यकता नहीं रह गयी है।

विकेंद्रीकरण से कम पूंजी लगा कर अधिक लोगों को रोजगार मिलेगा, इस सिद्धांत को अमली रूप देने वाले कानून को दस अप्रैल को पूरी तरह लाचार बना दिया गया है। सिर्फ लघु उद्योगों द्वारा उत्पादन की नीति के तहत बीस वस्तुएं आरक्षित रह गई थीं। जो वस्तुएं लघु और कुटीर उद्योग में बनाई जा सकती हैं उन्हें बड़े उद्योगों द्वारा उत्पादित न करने देने की स्पष्ट नीति के तहत 1977 की जनता पार्टी की सरकार ने 807 वस्तुओं को लघु और कुटीर उद्योगों के लिए संरक्षित किया था। 1991 के बाद लगातार यह सूची संकुचित की जाती रही। 1 अप्रैल, 2000 को संरक्षित सूची से 643 वस्तुएं हटा दी गर्इं। 10 दस अप्रैल 2015 को उन बीस वस्तुओं को हटा कर संरक्षण के लिए बनाई गई सूची को पूरी तरह खत्म कर दिया गया। विकेन्द्रीकृत छोटे तथा कुटीर उद्योगों के उत्पादों के बजाए देश के कुछ खादी भण्डारों में एक ऐसी उभरती हुई दानवाकार कम्पनी के उत्पाद बेचे जा रहे हैं।इस कम्पनी के 97 फीसदी पूंजी के मालिक की मिल्कीयत फोर्ब्स पत्रिका ने ढाई अरब डॉलर आंकी है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का वास्तविक स्वदेशी विकल्प लघु एवं कुटीर उद्योग होने चाहिए कोई दानवाकार कम्पनी नहीं।

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खादी ग्रामोद्योग आयोग के इस वर्ष के कैलेण्डर और डायरी पर गांधीजी के स्थान पर प्रधान मंत्री का चरखा जैसी आकृति के यंत्र के साथ चित्र प्रकाशित होने के बाद देश में जो बहस चली है उसे मौजूदा सरकार की खादी,हथकरघा और कुटीर उद्योग संबंधी नीति के आलोक में देखने का प्रयास इस लेख में किया गया है।प्रधान मंत्री ने स्वयं उस नीति की बाबत एक नारा दिया है-‘आजादी से पहले थी खादी ‘नेशन’ के लिए,आजादी के बाद हो खादी ‘फैशन’ के लिए’।खादी संस्थाएं विनोबा के सुझाव के अनुरूप खादी कमीशन की जगह ‘खादी मिशन’ बनाएंगी तब वह ‘अ-सरकारी खादी’ ही असरकारी खादी होगी।

(अफलातून)

राष्ट्रीय संगठन सचिव ,समाजवादी जनपरिषद।

816 रुद्र टावर्स,सुन्दरपुर,वाराणसी-221005.

aflatoon@gmail.com

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एक अत्यन्त मेधावी, सुन्दर , और सं
वेदनशील युवा राजनैतिक तरुण की मौत ने भारतीय समाज को हिला दिया है। इस युवा में जोखिम उठाने का साहस था और अपने से ऊपर की पीढ़ी के उसूलों को आंख मूंद कर न मानने की फितरत थी। वह एक राजनैतिक कार्यकर्ता था,उसका संघर्ष राजनैतिक था । वह आतंक के आरोप में दी गई फांसी के विरुद्ध था तो साथ-साथ आतंक फैलाने के लिए सीमा पार से आये घुसपैठियों से मुकाबला करते हुए मारे गए जवानों की शहादत के प्रति श्रद्धावनत होकर उसने कहा था, ‘अम्बेडकरवादी होने के नाते मैं जिन्दगी का पक्षधर हूं । इसलिए उन जवानों की शहादत के प्रति नमन करता हूं।‘ उसकी मेधा से टक्कर लेने की औकात उसकी विरोधी विचारधारा से जुड़े उस शिक्षण संस्था के छात्रों में नहीं थी और न ही उस शैक्षणिक संस्था के बौने कर्णधारों में थी इसलिए सत्ता के शीर्ष पर बैठे आकाओं की मदद से एक चक्रव्यूह रचा गया था । सत्ताधारी ताकतें रोहित द्वारा फांसी की सजा के विरोध की चर्चा करती हैं लेकिन रोहित के समूह (अम्बेडकर स्टुडेन्ट्स एसोशियेशन) द्वारा मनु-स्मृति दहन तथा गत नौ वर्षों में 9 दलित छात्रों द्वारा शैक्षणिक उत्पीडन के कारण की गई आत्महत्याओं के विरोध की चर्चा करने का साहस नहीं जुटा पातीं।
  लखनऊ में अम्बेडकर विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में छात्रों के प्रत्यक्ष विरोध के बाद प्रधानमंत्री जिस भाषण में ‘मां भारती के लाल की मृत्यु’ के प्रति अपनी संवेदना प्रकट करते हैं वहीं यह कहने से हिचकिचाते नहीं हैं कि बाबासाहब अपने जीवन में आने वाले कष्ट चुपचाप सहन कर जाते थे , किसी से शिकवा तक नहीं करते थे। बाबासाहब के बारे में प्रधानमंत्री का दावा निराधार है। बाबासाहब द्वारा महाड सत्याग्रह (अस्पृश्यों के वर्जित तालाब से घोषणा करके ,समर्थकों के साथ पानी पीना) तथा मनुस्मृति दहन चुपचाप सहन करते जाने का विलोम थे। पुणे करार के दौरान हुई बातचीत में गांधीजी ने उनकी वकालत के बारे में पूछा था। बाबासाहब ने उन्हें बताया था कि अपने राजनैतिक-सांगठनिक काम के कारण वे वकालत में कम समय दे पा रहे हैं। उसी मौके पर शैशव से तब तक उनके साथ हुए सामाजिक भेदभाव और उत्पीड़न की उनके द्वारा बताई गई कथा गांधी के विचार पत्रों -हरिजनबंधु (गुजराती), हरिजनसेवक (हिन्दी) तथा हरिजन (अंग्रेजी) में छपे थे।
भारतीय समाज और राजनीति में सकारात्मक बदलाव आ रहे हैं। पिछड़े और दलित खुली स्पर्धा में अनारक्षित सीटों पर दाखिला पाते हैं,वजीफा हासिल करते हैं और लोक सेवा आयोग की अनारक्षित सीटों पर चुन जाते हैं । यह समाज की सकारात्मक दिशा में गतिशीलता का मानदण्ड बनता है। ऐसे युवाओं की तादाद उत्तरोत्तर बढ़ रही है और बढ़ती रहेगी। गैर आरक्षित खुली सीटों पर चुने जाने वाले ऐसे अभ्यर्थियों के कारण आरक्षित वर्गों के उतने अन्य अभ्यर्थियों को आरक्षण के अन्तर्गत अवसर मिल जाता है। यहां यह स्पष्ट रहे कि यदि अनारक्षित खुली स्पर्धा की सीटों पार आरक्षित वर्गों के अभ्यर्थियों को जाने से रोका जाए तब उसका मतलब गैर-आरक्षित तबकों के लिए पचास फीसदी आरक्षण देना हो जाएगा। सामाजिक यथास्थिति की ताकतें इस सकारात्मक परिवर्तन से खार खाती हैं। इस प्रकार पढ़ाई-लिखाई में कमजोर ही नहीं मेधावी छात्र-छात्राओं को भी विद्वेष का सामना करना पड़्ता है। यानी उत्पीडन का आधार छात्र का पढ़ाई में कमजोर या मजबूत होना नहीं अपितु उसकी जाति होती है।
  शैक्षणिक संस्थाएं व्यापक समाज का हिस्सा भी हैं और वहीं इनकी अपनी एक दुनिया भी है। हर जमाने के सत्ता संतुलन को बनाये रखने के लिए जिन लोगों की आवश्यकता होती है उनका निर्माण इन संस्थाओं में किया जाता है। रोहित को यथास्थितिवाद का पुर्जा बनाना शिक्षा व्यवस्था के बस की बात न थी। व्यापक समाज और विश्वविद्यालय परिसर को देखने की उसकी दृष्टि सृजनात्मक थी,दकियानुसी नहीं थी। हैदराबाद शहर के बाहर बसाये गये इस परिसर के पेड़-पौधे ,जीव-जंतुओं से लगायत अंतरिक्ष तक उसकी नजर थी। अपनी राजनीतिक पढ़ाई के अलावा कुदरत से मानव समाज की बढ़ रही दूरी को वह शिद्दत से महसूस करता था। उसके फेसबुक चित्रों का एक अल्बम हैदराबाद विश्वविद्यालय की वानस्पतिक और जैविक संपदा के सूक्ष्म निरीक्षण से खींचे गए फोटोग्राफ्स को समर्पित है।
  रोहित जैसा होनहार तरुण की प्रतिभा उच्च शिक्षा के प्रतिष्ठानों में पुष्पित-पल्लवित हो सके यह अत्यन्त दुरूह है। इस दुर्गम पथ पर चलते वक्त उसे कदम-कदम पर लड़ना पड़ा होगा। राजनीति और शिक्षा के संचालकों को उसने चुनौती दी होगी। किसी देश का लोकतंत्र उसकी संस्थाओं के अलोकतांत्रीकरण से कमजोर होता है। उन संस्थाओं में लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी है कि प्रशासनिक तंत्र के हर स्तर पर छात्र-अध्यापक-कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व हो। उच्च शिक्षण संस्थाओं की स्वायत्तता की पोल खुलनी अब शेष नहीं है। दिल्ली विश्वविद्यालय में केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री की शैक्षणिक ‘उपलब्धियों’ की सूचनाओं को देने के जिम्मेदार बाबुओं के खिलाफ कार्रवाई के वक्त ही विश्वविद्यालयी आजादी के बाद केन्द्र सरकार द्वारा उच्च शिक्षा की बाबत पहली समिति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में बनी थी स्वायत्तता की हकीकत सामने आ गई थी। राष्ट्रीय महत्व की संस्थायें आई.आई.टी. से लगायत इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट जैसे तमाम शिक्षण संस्थानों में दिल्ली में बैठे शैक्षणिक तंत्र के नौकरशाहों द्वारा बेहयाई से दखलंदाजियां की गई हैं।
     उच्च शिक्षा केन्द्रों में यौन उत्पीडन की रोकथाम के लिए सर्वोच्च न्यायालय के विशाखा फैसले की सिफारिशों की मूल भावना के अनुरूप समितियां बनी हैं। जातिगत विद्वेष की रोकथाम के लिए भी इस प्रकार की समितियां गठित होनी चाहिए। फिलहाल विश्वविद्यालयों में अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ बने हुए हैं परन्तु वे नख-दन्त विहीन हैं। लाजमी तौर पर इन समितियों में  पिछड़े और दलित समूहों की नुमाइन्दगी भी होनी चाहिए। यह गौरतलब है कि गैर-शिक्षक कर्मचारी चयन,शिक्षक व गैर-शिक्षक आवास आवण्टन समिति में अनुसूचित जाति/जनजाति का प्रतिनिधित्व होता है। इनमें पिछड़ी जातियों तथा महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
  केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के विजिटर पदेन राष्ट्रपति होते हैं तथा इन्हें विश्वविद्यालयों की प्रशासनिक-शैक्षणिक जांच के अधिकार का प्रावधान हर केन्द्रीय विश्वविद्यालय के कानून में होता है। इस प्रावधान के तहत सिर्फ काशी विश्वविद्यालय में दो बार विजिटोरियल जांच हुई है न्यायमूर्ति मुदालियर की अध्यक्षता में तथा न्यायमूर्ति गजेन्द्र गडकर की अध्यक्षता में। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की अध्यक्ष रही माधुरी शाह की अध्यक्षता में सभी केन्द्रीय विश्वविद्यालयों की जांच समिति गठित हुई थी। रोहित की मृत्यु के पश्चात एक व्यापक सन्दर्भ की जांच आवश्यक है। निर्भया कान्ड के बाद बने न्यायमूर्ति वर्मा की समयबद्ध कार्यवाही तथा बुनियादी सुधार के सुझावों से हमें सीख लेनी चाहिए तथा उच्च शिक्षा की बाबत उस प्रकार की जांच की जानी चाहिए। केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा घोषित जांच इस व्यापक उद्देश्य की दृष्टि से नाकाफी प्रतीत होती है।
अफलातून

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Kishanji aur Lohia
यह पत्र मुझसे बड़ी उम्र के व्यक्तियों को सम्बोधित नहीं है । हांलाकि जानकारी के तौर पर वे इस पत्र को पढ़ सकते हैं ।
विगत ३० जून २००० को मेरी आयु जन्म तारीख के हिसाब से सत्तर साल की हो गई । यह मेरे लिए एक विशेष बात थी। बचपन में मैं कई तरह की व्याधियों से ग्रस्त था। कुछ बीमारियां हमेशा के लिए रह गई हैं । अपनी किशोरावस्था में कभी सोचा नहीं कि साठ साल से अधिक उम्र तक जीवित रहूंगा । उस औपनिवेशिक काल में एक भारतीय की औसत आयु भी बहुत कम हुआ करती थी । अतः सत्तर साल की आयु तक जीवन में सक्रीय रहना मेरे लिए विशेष बात थी । शायद राजनीति में सक्रीय जीवन अपेक्षाकृत अधिक आयु तक होता है । जो भी हो , पिछले दस साल से निश्चय ही मेरी कार्यक्षमता घटती जा रही है । अस्वस्थता की वजह से नहीं , बल्कि शारीरिक क्षमता के शिथिल हो जाने के कारण। मांसपेशियों की कमजोरी हमेशा थी,लेकिन कुछ साल पहले एक सत्याग्रह स्थल पर एक पुलिस वाले ने धक्का दिया तो मैं बिल्कुल गिर जाता , पास बैठे एक साथी ने मुझे पकड़ लिया । मेरी स्मरण शक्ति का कुछ अंश कमजोर हो चुका है और सुनने की क्षमता भी घटी है। कुल उर्जा का परिमाण इतना कम हुआ है कि एक दिन का काम एक हफ्ते में करता हूं । अधिकांश चिट्ठियों का जवाब नहीं देता हूं । १९९० में ही मैंने बरगढ़ – सम्बलपुर जिले के अपने क्षेत्र के देहातों में जाना बंद कर दिया । अब केवल रेलगाड़ियों की लम्बी यात्रा करके सभाओं में योगदान करता हूं । महीने में एक-दो लेख लिखता हूं। मेरा सार्वजनिक – राजनैतिक काम इतने में सीमित हो गया है ।
आगे दस साल से अधिक जीवित रहने की मेरी इच्छा नहीं है। क्योंकि तब शारीरिक तौर पर मैं एक दयनीय अवस्थामें पहुंच जाऊंगा। । मृत्यु के बारे में मैं बार बार सचेत होता हूं, लेकिन उसके इंतजार में नहीं रहना चाहता हूं। मृत्यु का साक्षात्कार चाहता हूं । इस वाक्य का क्या अर्थ है,कोई पूछे तो मैं स्पष्ट नहीं बता पाऊंगा, क्योंकि मैं खुद इस वक्त इसे नहीं जानता हूं। शायद सारे बंधनों से मुक्त होने पर कोई मृत्यु से से साक्षात्कार कर पाएगा। सारे बंधनों से मुक्त होना भी अपरिभाषित है।
१९५१-५२ से अब तक मैं निरंतर समाजवादी राजनीतिमें सांगठनिक दायित्व लेकर काम कर रहा हूं । पचास साल का समय अत्यधिक होता है। इसके बाद मैं सांगठनिक दायित्व लेकर , सांगठनिक अनुशासन के प्रति जवाबदेह रहकर काम नहीं कर सकूंगा।
राजनीति से या संगठनों से हटने की बात मैं अभी नहीं सोच पाता हूं । वैसे तो मेरे बहुत सारे परिचित लोग भी नहीं जानते हैं कि मैं राजनीति कर रहा हूं । सिर्फ संगठन के लोग जानते हैं कि हम राजनीति कर रहे हैं । हमारी राजनीतिमें तीव्रता नहीं है । कुछ लोग कर्तव्य पालन के लिए राजनीति कर रहे हैं। एक राजनीति होती है तामझाम की , वह हमारा उद्देश्य नहीं है। दूसरी राजनीति होती है तीव्रता की ।मैं आशा करता हूं कि मेरे वर्तमान और भविष्य के सहयोगी हमारी राजनीति में तीव्रता लाएंगे । इस आशा के साथ मै समाजवादी जनपरिषद और जनांदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय जैसे संगठनों की राजनीति से जुड़ा रहूंगा ।
राजनीति से जुड़ा रहने का प्रधान कारण यह है कि आज की हालत में राजनैतिक चुप्पी का मतलब है मानव समाज के पतन और तबाही के प्रति उदासीनता । ग्लोबीकरण की व्यवस्था से राष्ट्र की और मानव समाज की जो तबाही होने जा रही है उसके विरुद्ध एक राजनीति बनाने का काम बहुत धीमा चल रहा है। उसको तेज,विश्वसनीय और संघर्षमय करना , उसके विचारों और दिशा को स्पष्ट करना आज की असली राजनीति होगी । इस कार्य में मेरा योगदान कितना भी आंशिक और सीमित हो, उसको जारी रखने की मेरी प्रबल इच्छा है।क्योंकि यह राजनीति मानव समाज के भविष्य के सोच से संबंधित है,इसके वैचारिक विस्तार में मनुष्य जी वन के कुछ मौलिक सत्यों के संपर्क में आना पड़ेगा। मृत्यु से साक्षात्कार की एक संभावना उसीमें है – जीवन संबंधी गहरे सत्यों के संपर्क में आने में ।
ऊपर जो भी लिखा गया है वह सूचना के तौर पर है; चर्चा का विषय नहीं है ।
आपसे अनुरोध है कि मेरे किसी मित्र या साथी को अगर यह पत्र नहीं मिला है तो एक प्रति बनाकर आप उसे दे दें ।आप जिसको भी मेरा साथी या मित्र समझते हैं वे मेरे साथी और मित्र हैं ।
शुभकामनाओं सहित
किशन पटनायक
15.3.2001/15.5.2001

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शहीद शंकर गुहानियोगी

उनकी हत्या के सप्ताह भर पहले मैं उनके साथ कुछ समय था । होशंगाबाद जिले में गिरफ़्तार हमारे साथी के समर्थन में वे आए थे। होशंगाबाद स्टेशन पर अपना सीधा-सादा एयर बैग पलिटफार्म पर छोड़कर उन्होंने कहा ,’चलो चाय पीते हैं’।मैंने बैग का ध्यान दिलाया तो बोले कि देश भर में इतना भय फैला रखा है कि कोई उसे नहीं छूएगा। हम चाय पीकर आए, बैग ज्यों का त्यों था। वैसे भी उसमें किताबें और एक जोड़ा कपड़ा था। उन्हें मुख्यमन्त्री सुन्दरलाल पटवा से मिलना था। मुख्यमन्त्री के सचिव ने नाम लिख लेने के बाद कहा,’पद-वद बताइए’। नियोगी ने तत्काल अत्यन्त सहजता से कहा,’बता देना गुहा और नियोगी’। पूंजीपतियों द्वारा कराई गई हत्या के दिन भी इस शेर के कमरे की खि्ड़की खुली थी । दल्ली राजहरा के असंगठित मजदूरों को जब भिलाई स्टील प्लान्ट के मजदूर के बराबर मजदूरी दिलाई तब हड़ताल को मुख्य ताकत किसान संगठन द्वारा दिए गए राशन से मिलती ्थी। वेतन बढ़ा तब दो अक्टूबर के दिन २०-२५ हजार मजदूरों ्की रै्ली में नियोगी ने कहा कि शराब पीने के पक्ष में आकर लोग बोलें। फिर अन्त में समझाया कि बढ़ा वेतन दारू कीमत अदा करने में फिर उन्हीं उद्योगपतियों के पास न चला जाए। उनक यूनियन ने शानदार ’शहीद अस्पताल ’ बनाया । विनायक सेन उसके पहले डाक्टरों में थे। विधायक बनाने वाली पहली यूनियन। शहीद नियोगी- लाल जोहार ।

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