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Posts Tagged ‘राजेन्द्र राजन’

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भोपाल गैस काण्ड के २५ वर्ष पूरे होने जा रहे हैं | दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी से जुड़े  सवाल ज्यों के त्यों खड़े हैं | हाल ही में इस बाबत मनमोहन सिंह से जब प्रश्न किए गए तो उन्होंने इन सवालों को भूल जाने की हिदायत दी | राजेन्द्र राजन की ये कविताएं भी पिछले  २५ वर्षों से आस्तीन के इन साँपों को बेनकाब करने की कोशिश में हैं |

 

मुनाफ़ा उनका है

श्मशान अपना है

जहर उनका है

जहरीला आसमान अपना है

अन्धे यमदूत उनके हैं

यमदूतों को नेत्रदान अपना है

हमारी आँखों में जिस विकास का अँधेरा है

उनकी आँखों में उसी विकास का सपना है

जितना जहर है मिथाइल आइसो साइनेट में

हाइड्रोजन साइनाइड में

फास्जीन में

उससे ज्यादा जहर है

सरकार की आस्तीन में

जिसमें हजार- हजार देशी

हजार – हजार विदेशी सांप पलते हैं ।

यह कैसा विकास है जहरीला आकाश है

सांप की फुफकार सी चल रही बतास है

आदमी की बात क्या पेड़ तक उदास है

आह सुन , कराह सुन , राह उनकी छोड़ तू

विकास की मत भीख ले

भोपाल से तू सीख ले

भोपाल एक सवाल है

सवाल का जवाब दो .

आलाकमान का ऐलान है

कि हमें पूरे देश को नए सिरे से बनाना है

और इसके लिए हमने जो योजनायें

विदेशों से मँगवाकर मैदानों में लागू की हैं

उन्हें हमें पहाड़ों पर भी लागू करना है

क्योंकि हमें मैदानों की तरह

पहाड़ों को भी ऊँचा उठाना है

अब मुल्क की हर दीवार पर लिखो

कोई बाजार नहीं है हमारा देश

कोई कारागार नहीं है हमारा देश

हमारे जवान दिलों की पुकार है हमारा देश

मुक्ति का ऊँचा गान है हमारा देश

जो गूँजता है जमीन से आसमान तक

सारे बन्धन तोड़ .

– राजेन्द्र राजन

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श्रेय

पत्थर अगर तेरहवें प्रहार में टूटा

तो इसलिए टूटा

कि उस पर बारह प्रहार हो चुके थे

 

तेरहवां प्रहार करने वाले को मिला

पत्थर तोड़ने का सारा श्रेय

 

कौन जानता है

बाकी बारह प्रहार किसने किए थे ।

 

चिड़िया की आंख

शुरु से कहा जाता है

सिर्फ चिड़िया की आंख देखो

उसके अलावा कुछ भी नहीं

तभी तुम भेद सकोगे अपना लक्ष्य

 

सबके सब लक्ष्य भेदना चाहते हैं

इसलिए वे चिड़िया की आंख के सिवा

बाकी हर चीज के प्रति

अंधे होना सीख रहे हैं

 

इस लक्ष्यवादिता से मुझे डर लगता है

मैं चाहता हूं

लोगों को ज्यादा से ज्यादा चीजें दिखाई दें ।

– राजेन्द्र राजन

कवि राजेन्द्र राजन की कुछ अन्य ताजा प्रकाशित कवितायें :

पेड़   ,  जहां चुक जाते हैं शब्द  ,  शब्द बदल जाएं तो भी  , पश्चातापछूटा हुआ रास्ता बामियान में बुद्ध  ,

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जैसे बीज पुकारता है बीज को

जैसे खोज पुकारती है खोज को

जैसे राह पुकारती है राह को

 शब्द, शब्द को पुकारते हैं

मैं न शब्दों को ढूंढ़ता हूं

न उन्हें गढ़ता हूं

न उन्हें चुनता हूं

न उन्हें सजाता हूं

मैं सिर्फ सुनता हूं

जब शब्द , शब्द को पुकारते हैं

और देखता हूं

शब्द आते हैं

हाथ से हाथ मिलाते

खड़े हो जाते हैं जैसे कोई दीवार हो

शत्रुओं के खिलाफ़

इस तरह मैं बचता हूं

उधार के शब्दों से .

– राजेन्द्र राजन .

   १९९५.

 

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वे हर वक्त पिले रहते हैं

इतिहास में अपनी जगह बनाने में

 

सिर्फ उन्हें मालूम है

कितनी जगह है इतिहास में

शायद इसीलिए वे एक दूसरे को

धकियाते रहते हैं हर वक्त

 

उनकी धक्कामुक्की

मुक्कामुक्की से बनता है

उनका इतिहास

 

इस तरह

इतिहास में अपनी जगह बना

लेने के बाद

वे तय करते हैं

इतिहास में दूसरों की जगह

 

जो इतिहास में उनकी बतायी

हुई जगह पर

रहने को राजी नहीं होते

उन्हें वे रह रहकर

इतिहास से बाहर कर देने की धमकियाँ देते हैं

 

उनकी धमकियों का असर होता है

तभी तो इतिहास में

उचित स्थान पाने के इच्छुक

बहुत-से लोग

जहां कह दिया जाता है

वहीं बैठे रहते हैं

कभी उठकर खड़े नहीं होते ।

– राजेन्द्र राजन

स्रोत : सामयिक वार्ता/जनवरी २००८

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