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Posts Tagged ‘लोकतंत्र’

‘‘तुम हमें रोक नहीं सकते। मुझे उठा लो, मेरे साथियों को उठा लों! हमें जेल में डाल दो! मार दो! जो भी तुम करना चाहते हो, करो! हम अपना देश वापस ले रहे है। तुम लोगो ने 30 सालों से इस देश को बर्बाद किया है। बस, बहुत हो चुका है। बहुत हो गया! बहुत हो गया!’’

ये शब्द थे मिस्त्र के ताजा जन-विद्रोह के एक युवा नेता वेल घोनिम के, जो उसने उपराष्ट्रपति द्वारा आंदोलन के खिलाफ फौज के इस्तेमाल की धमकी देने पर एक टीवी साक्षात्कार में कहे। गूगल इंटरनेट कंपनी का यह अधिकारी एक दिन पहले ही जेल से बाहर आया था। मिस्त्र में उत्तेजना, जोश, युवाशक्ति और देशभक्ति का यह अभूतपूर्व ज्वार आखिरकार रंग लाया और 30 सालों से मिस्त्र पर एकछत्र राज कर रहे तानाशाह होस्नी मुबारक को गद्दी छोड़कर एक टापू में शरण लेना पड़ा। इसके पहले ट्यूनीशिया के तानाशाह बेन अली को जनशक्ति के आगे देश छोड़कर भागना पड़ा।
हालांकि अभी भी दोनों देशों की सत्ता अमरीका-परस्त फौज के हाथ में है और भविष्य अनिश्चित है, फिर भी वहां की जनशक्ति की यह बड़ी जीत है। यह तय हो गया है कि वहां लोकतंत्र कायम होगा और सरकार कोई भी बने, वह जनभावनाओं की उपेक्षा नहीं कर सकती । सबसे बड़ी बात यह हुई है कि आम जनता निडर बन गई है और उसे अपनी शक्ति का अहसास हो गया है। जनता की इन दो जीतों का पूरे अरब विश्व में बिजली की माफिक जबरदस्त असर हुआ है। वहां भी तानाशाह सरकारों के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे है। अरब देशों की मुस्लिम जनता सिर्फ इस्लामी कट्टरपंथ के आह्वान पर ही कुछ करती है, यह भ्रान्ति भी दूर हुई है।

पूंजीवाद पर संकट की छाया
अखबारों, टीवी और इंटरनेट के इस जमाने में इन घटनाओं का पूरी दुनिया पर असर हुआ है। दुनिया की जनता ध्यान से इन्हें देख रही है। अमरीका की पूरी कोशिश है कि सत्ता परिवर्तन के बाद नई सरकारें उसी के प्रभाव से रहे। किंतु यह तय है कि अमरीका की इजरायल नीति को इन देशों में अब वह समर्थन नहीं मिल सकेगा, जिसकी सौदबाजी वह तानाशाहों से फौजी तथा वित्तीय मदद के बदले कर लेता था। यदि इन देशों में अमरीका विरोध की बयार बहने लगती है तो यह पूरे अमरीकी वर्चस्व और साम्राज्यवाद के लिए बुरा संकेत होगा, क्योंकि तेल और स्वेज नहर ये दोनों उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण है। तेल के अंतरराष्ट्रीय भाव 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाने लगे है और दुनिया भर के शेयर बाजार लुड़कने लगे है। अंदाज है कि तेल के भाव में 10 डॉलर की वृद्धि से संयुक्त राज्य अमरीका की राष्ट्रीय आय में 0.25 फीसदी की गिरावट आ जाती है और 2,70,000 रोजगार खतम होते है। तीन साल पहले ही जबरदस्त मंदी और वित्तीय संकट झेलने वाले तथा अभी तक उसके असर से पूरी तरह न उबर पाने वाले पूंजीवाद के लिए यह एक और झटका हो सकता है।
दूसरे शब्दों में, पूंजीवाद के एक और गहरे संकट की शुरूआत हो सकती है। किंतु बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि लोकतांत्रिक क्रांति वाले ये देश अमरीका-यूरोप पर आर्थिक, व्यापारिक, तकनीकी, फौजी व हथियारी निर्भरता से स्वयं को कितना मुक्त कर पाते हैं। नहीं तो उनकी कहानी भी फिलीप्पीन और दक्षिण अफ्रीका जैसी हो जाएगी जहां जबरदस्त जन-उभार या शानदार रंगभेद विरोधी लंबे संघर्ष से सत्ता परिवर्तन तो हुए, किन्तु एक वैकल्पिक अर्थनीति एवं विकास की वैकल्पिक सोच के अभाव में व्यवस्था नहीं बदली और अमरीका-यूरोप प्रणित पूंजीवाद का वर्चस्व भी कायम रहा। वहां की जनता के कष्टों का भी अंत नहीं हुआ। एक तरह से भारत में भी 1974-77 के जेपी के नेतृत्व वाले जनांदोलन व तानाशाही-विरोधी संघर्ष का यही हश्र हुआ। किसी भी लोकतांत्रिक क्रांति को पूर्णता और स्थायित्व तभी मिलता है जब उसकी अगली कड़ी आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक क्रांति बनती है, नही तो महान फ्रांसीसी क्रांति की तरह उसकी परिणिति किसी नेपोलियन की तानाशाही में भी हो सकती है।

भारत: समानताएं व फर्क
ट्यूनीशिया और मिस्त्र की घटनाओं के बाद भारत में भी लोग पूछने लगे है कि इस देश में ऐसी क्रांति क्यों नहीं आ सकती ? भारत के भी हालात तो ऐसे ही है, जिनमें एक बड़ी उथल-पुथल की जरूरत है। बेरोजगारी, गरीबी, महंगाई, भ्रष्टाचार, दमन तथा राष्ट्रीय स्वाभिमान के समर्पण की जिन पीड़ाओं ने वहां की जनता को उद्वेलित किया, उनसे भारत के लोग भी कम त्रस्त नहीं है। पिछले दिनों भीषण महंगाई, भयंकर बेकारी, किसानों की निरंतर आत्महत्याओं और घोटालों के एक से एक बढ़चढ़कर उजागर होते कारनामों ने पूरे देश के जनमानस को बुरी तरह बेचैन किया। किंतु क्या करें – ऐसी एक बेबसी व दिशाहीनता लोगों के मन में छाई है।
अरब देशों और भारत की हालातों में काफी समानताएं होते हुए भी एक बड़ा फर्क है। वहां तानाशाही हैं, किंतु भारत में एक लोकतंत्र चल रहा है। चुनाव का पांच साला त्यौहार बीच-बीच में यहां आता रहता है। सरकारें बदलती भी हैं, किंतु हालातें नहीं बदलती है। बेन अली या होस्नी मुबारक के रूप में एक तानाशाह को हटाने का लक्ष्य यहां नहीं है जो आम जनता को एकजुट कर दें। लोकसभा से लेकर पंचायतों तक होने वाले चुनाव एक तरह से सेफ्टी वॉल्व है जो लोगों को बदलाव की झूठी दिलासा देते रहते हैं और उनके बीच के तेज-तर्रार नेतृत्व को लूट के टुकड़ों का भागीदार बनाकर समाहित करते रहते हैं। हालांकि आम लोग इसको भी समझने लगे है, किंतु इस चक्रव्यूह से बाहर निकलने का कोई रास्ता उन्हें समझ में नहीं आ रहा है।

भारतीय लोकतंत्र की कमियां
यह करीब-करीब साफ हो चला है कि भारतीय लोकतंत्र टिकाऊ तो रहा है किंतु भारतीय जनता की तकलीफों और आकांक्षाओं की कसौटी पर खरा नहीं उतरा है। जनपक्षी बदलावों के बजाय यह यथास्थिति को बनाए रखने का एक जरिया बन गया है। इसके चुनाव धन, बल, जातिवाद, सांप्रदायिकता व मौकापरस्ती के खेल बन गए है। बूथ कब्जा अब पुरानी चीज हो गई है। ज्यादातर पार्टियों व पेशेवर नेताओं ने पांच साल तक जनता की मुसीबतों को नजरअंदाज करके चुनाव के मौके पर धन, प्रलोभन, शराब, गुण्डों, जाति, सांप्रदायिकता, दलबदल, मीडिया जैसी चीजों का सहारा लेकर वोटों को कबाड़ने की जुगाड़ में महारत हासिल कर ली है। भारत में सत्ता के केन्द्रीकरण तथा चुनाव के पैमाने से भी इस में मदद मिलती है। लोकसभा तथा विधानसभा के एक चुनाव क्षेत्र में लाखों मतदाता होते है जिन्हें प्रभावित करने का काम बड़े धनपति और बड़े दलों के संगठित गिरोह ही कर पाते है। इतने बड़े चुनाव क्षेत्र दुनिया के किसी लोकतंत्र में नहीं होते।
फिर लोकतंत्र का मतलब महज चुनाव नहीं होता। विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका व खबरपालिका – इसके ये चारों पाये आम जनता के सेवक और अनुचर होना चाहिए, किंतु मामला उल्टा है। प्रशासनिक ढांचे का कायापलट, पुलिस-कचहरी के ढांचे में बुनियादी बदलाव, सरकारी हिंसा व दमनकारी कानूनों का खात्मा, लोगों का सशक्तिकरण और इसके लिए घोर गरीबी तथा अशिक्षा का खात्मा, सामाजिक-आर्थिक विषमताओं में कमी, लोक भाषाओं की स्थापना व प्रतिष्ठा, लोकोन्मुखी व निष्पक्ष मीडिया, सत्याग्रह व सिविल नाफरमानी की गुंजाईश व इज्जत – इन जरूरी बातों को सुनिश्चित करके ही लोकतंत्र को सार्थक बनाया जा सकता है। किंतु यह काम पिछले साठ सालों में नहीं हुआ, क्योंकि उसमें ऊपर बैठे लोगों का नीहित स्वार्थ था। अंग्रेजी राज से विरासत में मिले एवं साम्राज्य की जरूरत के हिसाब से बने घोर केन्द्रीकृत ढ़ांचे को पूरी तरह पलटकर राजनैतिक, प्रशासनिक, आर्थिक विकेन्द्रीकरण का काम भी जरूरी था, किन्तु उल्टे इस अवधि में केन्द्रीकरण बढ़ा है।
यह कहा जा सकता है कि भारत की जनता को सरकारें बदलने का मौका तो मिलता है। फिर भी हालातें नहीं बदलती तो समस्या जनता में जागरूकता की कमी, भारतीय राजनीति की गिरावट या विकल्पहीनता में है। लोकतंत्र के ढ़ांचे का दोष नहीं है। यानी नाच न जानने के लिए आंगन को टेड़ा कहकर दोष नहीं दिया जा सकता। किंतु अभी तक के अनुभव से निकला सच यह है कि चुनाव एवं सत्ता का ढ़ांचा भी ऐसा है कि यह परिवर्तनकामी, ईमानदार व जनपक्षी नेताओं एवं दलों को पनपने और टिकने नहीं देता। जो चुने जाते हैं, उन पर पांच साल तक मतदाताओं का कोई नियंत्रण नहीं होता। सत्ता के केन्द्रों व जनता के बीच दूरी भी काफी है। हमारे लोकतंत्र में ‘लोक’ तो कहीं दबा रहता है, एक विकृत व भ्रष्ट ‘तंत्र’ ही हावी रहता है।
कहने का मतलब यह है कि सिर्फ नाचने वालों का ही दोष देखने से काम नहीं चलेगा। आंगन भी टेड़ा और उबड़-खाबड़ है जो न तो सही नाच होने देता है और न ही नए तरह के नाच की किसी संभावना को सामने आने देता है। छः दशक बाद भारतीय लोकतंत्र की समीक्षा करने और इसके अच्छे तत्वों को संजोते हुए भी इसके ढ़ांचे में बुनियादी बदलाव करने का वक्त आ गया है। यह काम यदाकदा चुनाव सुधारों के नाम पर चलने वाली कवायदों से नहीं होगा। इस ढ़ांचे के बुनियादी बदलाव की कोई पहल ऊपर से नहीं होगी, बल्कि नीहित स्वार्थो का प्रतिरोध भी होगा। इसके लिए भी जनक्रांति की जरूरत होगी।

विकास की वैकल्पिक राह
समीक्षा तो वैश्वीकरण-उदारीकरण-निजीकरण की उन नीतियों की भी करनी होगी, जिनको भारत में लागू किए हुए 20 वर्ष हो चले है। इनकी चकाचैंध अब फीकी पड़ चुकी है और घोर गैरबराबरी, बेकारी, बढ़ते शोषण, किसान-आत्महत्याओं, विस्थापन, पर्यावरण नाश व संप्रभुता नाश की तबाही का धुंआ चारों ओर छा चुका है। घोटालों व लूट के जो नए आयाम भारत, पाकिस्तान, ट्यूनीशिया या मिस्त्र जैसे देशों में सामने आए हैं, उनका भी गहरा रिश्ता विश्व बैंक-मुद्रा कोष प्रवर्तित इन नीतियों से है। लोकतंत्र हो या तानाशाही, इन नीतियों के जाल में दुनिया के कई देश फंसे है।
किंतु इसके साथ पूंजीवादी औद्योगिक सभ्यता की नकल वाले अधकचरे विकास की उस राह पर भी पुनर्विचार करना होगा, जिसे हमारे हुक्मरानों ने आजादी मिलने के बाद चुना था। दरअसल 1991 की बाट कोई नई नहीं थी। यह उसी राह का एक नया मोड़ था और शायद उसकी एक तार्किक परिणिति भी थी।
लातीनी अमरीका में जब बदलावों का दौर शुरू हुआ था तो भारतीय समाजवादी चिंतक किशन पटनायक ने टिप्पणी की थी कि इन बदलावों का भविष्य इस पर निर्भर करेगा कि वे विकास की कोई वैकल्पिक राह खोज पाते है या नहीं। शावेज, लूला, मोरालेस या किर्खनर को इसमें अभी तक आंशिक सफलता ही मिली है। यही चुनौती नेपाल की राजशाही को खत्म करने वाली जनक्रांति के सामने है और यदि भारत में कोई जनक्रांति होती है तो उसके सामने भी होगी।
यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि भारत जैसे तमाम देशों में आम जनता का मतलब करोड़ो की तादाद में किसान, मजदूर, पशुपालक, मछुआरे, कारीगर, घरेलू नौकर, फेरी-खोमचे-पटरी वाले, बेरोजगार नौजवान, विद्यार्थी, पैरा-शिक्षक, दलित व आदिवासी है जिनकी समस्याओं का कोई समाधान औद्योगिक-वित्तीय पूंजीवाद के मौजूदा ढ़ांचे में संभव ही नहीं है। पर्यावरण के बढ़ते संकट और जल-जंगल- जमीन पर बढ़ते हमलों से उपजे भारतीय जनता के संघर्षों का समाधान भी इस विकास पद्धति के अंदर नहीं है। अरब दुनिया की इस हलचल की शुरूआत ट्यूनीशिया के छोटे से कस्बे में एक शिक्षित बेरोजगार के आत्मदाह से हुई, जिसकी सब्जी-फल की दुकान को पुलिस ने उजाड़ दिया था। भारत में आज करोडों लोग इस तरह के हमलों को झेल रहे है। यहां भी जरूरत एक चिनगारी की है, बारूद का ढ़ेर तो तैयार है। किंतु इस चिनगारी को लोगो की गंभीर समस्याओं के हल का एक विश्वसनीय विकल्प भी दिखाना होगा।

विविधता व न्याय पर आधारित समाज
काहिरा के तहरीर चैक पर, सिकन्दरिया में या ट्यूनिस में तानाशाही को शिकस्त देने के लिए लोग धर्म, संप्रदाय, लिंग या वर्ग का भेद भूलकर जमा हुए थे। मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे संगठित इस्लामी दलों को भी अपने आग्रह छोड़कर बाकी लोगों के साथ आंदोलन में शामिल होना पड़ा। भारत जैसे विशाल देश में यह और बड़ी चुनौती है। यहां धर्म, संप्रदाय, जाति, कबीले, भाषा, प्रांतीयता के हजारों विभाजन हैं, जिनका बखूबी इस्तेमाल पहले गोरे अंग्रेजों ने और अब काले अंग्रेजों ने ‘फूट डालो और राज करो’ के लिए किया है। किंतु इसका इलाज सबको एक सांचे में ढ़ालने या बहुसंख्यकों की तानाशाही थोपने में नहीं है। इसके लिए तो विविधता की इज्जत व रक्षा करने वाले एक ऐसे बहुलतावादी भारत की कल्पना करनी होगी, जिसमें छोटे से छोटा समूह अपनी पहचान और अस्तित्व के प्रति आश्वस्त होकर बराबरी के साथ भाग ले सके तथा जिसमें जाति, भाषा, धर्म, लिंग, क्षेत्र या गांव-शहर के आधार पर भेद न हो। भारतीय आजादी आंदोलन के नेताओं की एक हद तक यही कल्पना थी। कई मायनों में आजादी के आंदोलन के अधूरे काम को पूरा करना नई जनक्रांति का काम होगा।
इसलिए मिस्त्र या ट्यूनीशिया (या नेपाल, वेनेजुएला, बोलीविया) को भारत में दुहराना है तो यह एक ज्यादा कठिन, ज्यादा बड़ा और ज्यादा चुनौतीपूर्ण काम है। किसी एक तानाशाह के बजाय यहां पूरी व्यवस्था को हटाने-बदलने का लक्ष्य लेकर चलना होगा और इसके लिए नया लोकतांत्रिक ढ़ांचा, वैकल्पिक विकास तथा विविधतापूर्ण-न्यायपूर्ण समाजरचना, इन तीन सूत्रों को सामने रखना होगा। इसमें टकराव सिर्फ राजा, तानाशाही या सेना से नहीं होगा, आधुनिक पूंजीवादी सभ्यता, साम्राज्यवाद व कट्टरपंथ से होगा। इसमें पश्चिमी उदारवादी किस्म के लोकतंत्र की स्थापना से आगे बढ़कर गांधी के स्वराज, लोहिया की सप्तक्रांति और जेपी की संपूर्ण क्रांति के लक्ष्य को सामने रखना होगा। उसमें अंबेडकर, फूले, कबीर, गिजुभाई आदि का भी मेल करना होगा।

मौका युग बदलने का
परिस्थितियां यहां भी परिपक्व है। जनता के सब्र का घड़ा यहां भी भर चुका है। मिस्त्र के उस युवा संग्रामी की तरह ‘बहुत हो गया, बहुत हो गया’ यहां भी सबके मन में है। उसकी तरह यहां भी हमें अपना खोया हुआ, छीना हुआ, देश वापस चाहिए, जिसे 30 नहीं, 60 सालों से बर्बाद किया गया है। भारत में आज 65 करोड़ आबादी 35 बरस से नीचे की उम्र की है, जिसकी आंखो में सपने हैं किंतु मन में कुंठाएं है। यह जरूर है कि यहां महज इंटरनेट, फेसबुक या ट्विटर से काम नहीं चलेगा। उनका सहारा लेते हुए भी भारत के गांवों, कस्बों और महानगरी झोपड़पट्टियों में रहने वाले करोड़ों स्त्री-पुरूषों को जगाने के लिए तथा उनके मन में उम्मीद का संचार करने के लिए उनके बीच में जाना होगा। मध्यम वर्ग की भूमिका होगी, किंतु असली परिवर्तनकारी ताकत नीचे होगी। देश के कई हिस्सों में चल रहे छोटे-छोटे आंदोलन यदि अपने संकीर्ण दायरे से बाहर निकलकर देश बदलने के लक्ष्य से जुड़ते है तो एक ताकत मिलेगी, फिर भी नाकाफी होगी। वैचारिक स्पष्टता और संकल्प के साथ कोई समूह आज आगे आता है और अगले दो बरस में भारत के कोने-कोने में पदयात्राओं, साईकिल यात्राओं आदि के जरिये कोई हलचल पैदा करता है तो शायद भारत का इतिहास बदल सकता है।
भारत, चीन और मिस्त्र दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। दुनिया की आबादी का करीब 40 फीसदी हिस्सा इन देशों में रहता है। पूंजीवाद के संकट के इस दौर में यदि इन की जनशक्ति ने अंगड़ाई ली, तो दुनिया में एक नए युग का पदार्पण हो सकता है। क्या आप इसकी आहट सुन पा रहे है ?



(ई-मेल: sjpsunil@gmail.com )

( लेख ,साभार : जनसत्ता :19फरवरी,2011)

लेखक समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और आर्थिक-राजनैतिक विषयों पर टिप्पणीकार है।

सुनील,
समाजवादी जन परिषद
ग्राम/पो. केसला, वाया इटारसी, जिला होशंगाबाद, (म.प्र.) पिन 461111
फोन: 09425040452

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   ( जून , २००४ )। भारत में चुनाव आता है तो धनतंत्र की स्थिति देखकर मन में एक प्रकार की मायूसी आती है । क्या इस चक्रव्यूह का भेदन किया जा सकता है ? कभी भेद लेंगे तो सही सलामत लौट भी पायेंगे ? मूलभूत परिवर्तन के विचारों की उड़ान कुछ क्षण के लिए थम जाती है ।

    दूसरी भावना यह भी आती है कि पाकिस्तान में हमारी जैसी प्रजातांत्रिक व्यवस्था होती तो वहीं के लोगों को अच्छा लगता । प्रजातंत्र के न रहने से बेहतर है एक लूला – लँगड़ा प्रजातंत्र । प्रजातंत्र में विश्वास न रखनेवालों के लिए भी वहाँ जगह होगी ।

    इस भावना को हम ज्यादा नहीं खींच सकते हैं । कोई पूछ सकता है कि अगर क्यूबा में साम्यवादी व्यवस्था के स्थान पर भारत जैसी पूँजीवादी-प्रजातांत्रिक व्यवस्था आ जाएगी , तो क्या वह स्वागत योग्य है ? हमारा उत्तर सकारात्मक नहीं होगा । हम कहेंगे कि क्यूबा के लोग अपने आर्थिक समाज में विषमताओं को बढ़ाए बगैर प्रजातंत्र का नया ढाँचा सृजित करें।

    इस नए ढाँचे को तलाशने के लिए बीसवीं सदी के मध्य में काफ़ी गहमा – गहमी थी । न सिर्फ़ राजनीति में , बल्कि विश्वविद्यालयों के विद्वानों में भी अच्छी खासी चर्चा हो जाती थी । चालीस के दशक में ब्रिटेन का प्रो. हेराल्ड जे. लास्की राजनीतिशास्त्र का मूर्धन्य विद्वान था । व्यक्ति स्वातंत्र्य और आर्थिक समानता के बीच के द्वन्द्व  को लास्की ने ’ अपने समय का सबसे बड़ा विरोधाभास’ के रूप में देखा । इस विरोधाभास का विवेचन करने के लिए उसने एक ग्रंथ लिखा । लास्की खुद ब्रिटेन के श्रमिक दल का सक्रिय सदस्य था , तब श्रमिक दल का वैचारिक आधार समाजवाद था ।

    भारत के समाजवादी दल (सोशलिस्ट पार्टी) ने भी भारत के लिए एक समतामूलक प्रजातांत्रिक संविधान लिखने की कोशिश की थी । उन्हीं दिनों भारत की संविधान सभा की बहस में डॉ. अम्बेडकर ने ’ आर्थिक लोकतंत्र ’ की अवधारणा के बारे में एक महत्वपूर्ण वक्तव्य रखा था ।

    बाद के समय में यूरोप तथा भारत में धनतंत्र की मजबूती इतनी बढ़ी है कि उपरोक्त बहस को न राजनीति में , न विश्वविद्यालयों में कोई महत्व दिया जा रहा है । मानो इस विषय की प्रासंगिकता खत्म कर दी गई । यूरोप में लास्की के समकक्ष जो विद्वान हैं और समाज विज्ञान की महान हस्तियाँ माने जाते हैं , वे सब ’ विचारधारा की समाप्ति ’ के पक्षधर लगते हैं । उनके विचारों में इतनी उड़ान नहीं है कि अमरीकी आधिपत्यवाली विश्वव्यवस्था का कोई विकल्प तलाश करें । भारत के विद्वानों ने तो जैसे कसम खा ली है कि मूलभूत और व्यापक सिद्धान्तों को ईजाद करना उनका काम नहीं महाशक्तियों का है । जिसके पास आधुनिकतम हथियार होंगे और सबसे अधिक धन होगा , ज्ञान का वितरण वही करेगा । हमारे चिन्तन का एक औपनिवेशिक दायरा होगा ।

    यानी , प्रजातंत्र की संरचना और स्वरूप में बुनियादी बदलाव का सपना इस समय के राजनीतिक समूहों और समाज वैज्ञानिकों में नहीं है । भारतीय विद्वान ज्यादा से ज्यादा चुनाव सुधार की बात कर लेते हैं , या कभी – कभी राष्ट्रपति प्रणाली बनाम प्रधानमंत्री प्रणाली की बचकानी बहस करते हैं । संवैधानिक उपाय से धनतंत्र को नियंत्रित किए बगैर , राजनीतिक प्रणाली में परिवर्तन लाये बगैर चुनाव सुधार का भी कोई परिणाम नहीं निकलने वाला है । अन्यथा अपनी सामर्थ्य की भीतर चुनाव आयोग ने चुनाव सुधार की कई कोशिशें की हैं । भारत के संविधान में धनतंत्र को मर्यादित करने का जो भी हल्का प्रावधान था , ग्लोबीकरण और उदारीकरण के दर्शन को अपनाकर उसको अप्रभावी कर दिया गया है । इससे भारतीय प्रजातंत्र और राजनीति पर गहरा नकारात्मक असर हुआ है ।

( जारी )

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हम क अरसे से इस बात को मानने के आदी बन गये हैं कि आम जनता को सत्ता या हुकूमत सिर्फ़ धारासभाओं के (विधायिका) जरिये मिलती है । इस खयाल को मैं अपने लोगों की एक गंभीर भूल मानता रहा हूँ । इस भ्रम या भूल की वजह या तो हमारी जड़ता है या वह मोहिनी है , जो अंग्रेजों के रीति – रिवाजों ने हम पर डाल रखी है । अंग्रेज जाति के इतिहास के छिछले या ऊपर – ऊपर के अध्ययन से हमने यह समझ लिया है कि सत्ता शासन – तंत्र की सबसे बड़ी संस्था पार्लमेण्ट से छनकर जनता तक पहुंचती है । सच बात यह है कि हुकूमत या सत्ता जनता की बीच रहती है , जनता की होती है और जनता समय – समय पर अपने प्रतिनिधियों की हैसियत से जिनको पसंद करती है , उनको उतने समय के लिए सौंप देती है । यही क्यों , जनता से भिन्न या स्वतंत्र पर्लमेण्टों की सत्ता तो ठीक , हस्ती तक नहीं होती । पिछले इक्कीस बरसों से भी ज्यादा अरसे से मैं यह इतनी सीधी – सादी बात लोगों के गले उतारने की कोशिश करता रहा हूँ । सत्ता का असली भण्डार या खजाना तो सत्याग्रह की या सविनय कानून-भंग की शक्ति में है । एक समूचा रा्ष्ट्र अपनी धारासभा के कानूनों के अनुसार चलने से इनकार कर दे , और इस सिविल नाफ़रमानी के के नतीजों को बरदाश्त करने के लिए तैयार हो जाए तो सोचिए कि क्या होगा ! ऐसी जनता सरकार की धारासभा को और उसके शासन – प्रबन्ध को जहाँ का तहाँ  , पूरी तरह , रोक देगी । सरकार की , पुलिस की या फौज की ताकत , फिर वह कितनी ही जबरदस्त क्यों न हो , थोड़े लोगों को  ही दबाने में कारगर होती है । लेकिन जब समूचा राष्ट्र सब कुछ सहने को तैयार हो जाता है , तो उसके दृढ़ संकल्प को डिगाने में किसी पुलिस की या फौज की कोई जबरदस्ती काम नहीं देती ।

फिर पार्लमेण्ट के ढंग की शासन – व्यवस्था तभी उपयोगी होती है , जब पार्लमेण्ट के सब सदस्य बहुमत के फैसलों को मानने के लिए तैयार हों । दूसरे शब्दों में , इसे यों कहिए कि पार्लमेण्टरी शासन – पद्धति का प्रबन्ध परस्पर अनुकूल समूहों में ही ठीक – ठीक काम देता है ।

यहाँ हिन्दुस्तान में तो ब्रिटिश सरकार ने कौमी तरीके पर मतदाताओं के अलग – अलग गिरोह खड़े कर दिए हैं , जिसकी वजह से हमारे बीच ऐसी बनावटी दीवारें खड़ी हो गयी हैं , जो आपस में मेल नहीं खातीं ; और ऐसी व्यवस्था के अंदर हम पार्लमेण्ट के ढंग की शासन – पद्धति का दिखावा करते आये हैं । ऐसी अलग – अलग और बनावटी इकाइयों को , जिनमें आपसी मेल नहीं है , एक ही मंच पर एक से काम के लिए इकट्ठा करने से जीतती – जागती एकता कभी पैदा नहीं हो सकती ।  सच है कि इस तरह की धारासभाओं के जरिए राजकाज का काम ज्यों-त्यों चलता रहता है ; लेकिन इन धारासभाओं के मंच पर इकट्ठा हो कर हम तो आपस में लड़ते ही रहेंगे , और जो भी कोई हम पर हुकूमत करता होगा , उसकी तरफ़ से समय – समय पर मिलने वाले हुकूमत के टुकड़ों को बाँट खाने के लिए हम तरसते रहेंगे । हमारे ये हाकिम कड़ाई के साथ हमें काबू में रखते हैं ,और परस्पर विरोधी तत्वों को आपस में झगड़ने से रोकते हैं । ऐसी शर्मनाक हालत में से पूर्ण स्वराज्य प्रकट होना मैं बिलकुल असंभव मानता हूँ ।

धारासभाओं के और उनके काम के बारे में मेरे खयाल इतने कड़े हैं ; फिर भी मैं इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि जब तक चुनावों के जरिए बनने वाली प्रातिधिक संस्थाओं के लिए गलत उम्मेदवार खड़े रहते हैं , तब तक उन संस्थाओं में प्रगतिविरोधी लोगों को घुसने से रोकने के लिए हमें अपने उम्मीदवार खड़े करने चाहिए ।

– ( गांधी जी , अनुवादक – काशीनाथ त्रिवेदी , रचनात्मक कार्यक्रम,१३-११-१९४५, नवजीवन प्रकाशन मन्दिर,पृष्ट- १० से १२ )

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