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Posts Tagged ‘सच्चिदानन्द सिन्हा’

हमारे देश में भ्रष्टाचार एक अन्तहीन रुदन का विषय बन गया है – इस हद तक कि इसकी चर्चा सिर्फ रस्मी रह जाए और इसके मिटने की संभावना असंभव लगने लगे । यह बढ़ता हुआ विश्वास कि सभी भ्रष्ट हैं लोगों के मन में यह भाव भी पैदा करता है कि चूँकि सभी भ्रष्ट ही हैं ईमानदार रहना , जो कठिनाइयों से भरा है जरूरी नहीं है और भ्रष्ट आचरण ही व्यावहारिक आचरण है । इस तरह जो भ्रष्ट आचरण से घबड़ाते हैं वे अव्यावहारिक या इससे भी बढ़कर निरे मूर्ख समझे जाते हैं । जब भ्रष्टाचार इतना व्यापक बन गया हो तो इससे लड़ने के लिए न सिर्फ मजबूत संकल्प की जरूरत है बल्कि भ्रष्ट आचरण के व्यापक बनने के कारणों की जानकारी के भी । अगर हम अपने देश के भ्रष्टाचार की सामाजिक जड़ों को पहचानने लगेंगे तो शायद यह विश्वास भी पैदा हो कि यह पुराण विहित कलिकाल की करामात नहीं , जिसके अनुसार हम भ्रष्ट युग या ’ मठ युग ’ में प्रवेश कर गये हैं और इससे उबरने के लिए हमें किसी नये अवतार की प्रतीक्षा या तलाश करनी चाहिए । अगर हममें यह जानकारी बढ़ी कि भ्रष्टाचार के विशेष सामाजिक कारण हैं तो हम इसके निराकरण के भी सामाजिक उपाय ढूँढेंगे । वी.पी. सिंह या किसी अन्य त्राता की ओर इस आशा भरी निगाह से देखना कि वे हमें इस राक्षस से मुक्त कर देंगे अपने यहाँ के भ्रष्टाचार की सामाजिक सन्दर्भों को नहीं समझने का ही परिणाम है ।

इस संदर्भ में सबसे बुनियादी बात यह है कि किसी आचरण को भ्रष्ट मानना काफी हद तक इस पर निर्भर करता है कि संबद्ध व्यक्ति कैसे समाज में रहता है । कोई भी समाज कुछ केन्द्रीय मूल्यों के इर्दगिर्द गठित होता है । उन्हीं मूल्यों से यह निर्धारित होता है कि कोई आचरण भ्रष्ट है या नहीं । मैक्सवेबर के बाद के अधिकांश समाजशास्त्री मोटा मोटी तौर से यह मानने लगे हैं कि किसी समाज के मूल्यों के आधार होते हैं परंपरा , करिश्मा वाला व्यक्तित्व या विवेक पर आधारित कानून नियम की व्यवस्था । इस विभाजन के अनुसार आधुनिक औद्योगिक समाज के मूल्यों के आधार होते हैं भौतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए बनाए गए नियम कानून । यह माना जाता है कि ऐसे आधुनिक समाज में व्यवस्था वैयक्तिक या कौटुंबिक संबंधों या प्रभावों से असंपृक्त होती है । कानून नियम को लागू करने की जवाबदेही एक वेतनभोगी समुदाय या नौकरशाही पर होती है जो शुद्ध रूप से नियमों पर चलते हैं । आदर्श रूप में आधुनिक औद्योगिक समाज और चुनाव पद्धति पर आधारित राजनैतिक व्यवस्थाओं के काम इसी पद्धति से चलते हैं । अगर व्यवहार में आचरण इससे अलग होता है तो इसे विकृति माना जाता है । इसके विपरीत परंपरा पर आधारित समाज में ,और कुछ हद तक करिश्मा वाले व्यक्तित्व के प्रभाव में चलने वाली व्यवस्थाओं में  भी वैयक्तिक वफादारी और निष्ठा नियम कानून से ऊपर हो जाती है । आधुनिक राजनीति में भ्रष्टाचार कुछ आरोपों के कारण आचरण और इसके मूल्यांकन का दो भिन्न मूल्यों पर आधारित समाज व्यवस्थाओं से प्रभावित होना होता है । इसलिए आज का कोई भी समाज जिसने अपने आर्थिक और राजनैतिक ढाँचे में आधुनिक औद्योगिक समाज के मूल्यों को अपना लिया है लेकिन जिसके आपसी मानवीय संबंध परंपरागत समाज के मूल्यों पर चलते हैं एक खास तरह के भ्रष्टाचार के दबाव में रहता है । जैसा ऊपर कहा गया है परंपरागत समाज में व्यक्ति या परिवार के प्रति वफादारी सर्वोपरि महत्व की होती है । इस कारण समाज में किसी ऊँचे ओहदे पर पहुँचे हुए व्यक्ति से अपेक्षा होती है कि रिश्तेदारों को अपने पद से लाभ पहुँचाए । ठीक इसके विपरीत आधुनिक औद्योगिक समाज की यह अपेक्षा है कि इसके अधिकारी अपने पद का उपयोग कानूनी दायरे के बाहर किसी संबंधी को लाभ पहुंचाने में न करें । इस तरह का व्यवहार समाज के मूल्यों के अनुसार भ्रष्ट आचरण है ।

पदों के दुरुपयोग के अधिकांश मामले इसीलिए उठते हैं क्योंकि आधुनिक मानदंडों पर आधारित संसदीय लोकतंत्र और प्रशासन के ऊँचे पदों पर वे ही लोग हैं जिनके वैयक्तिक आचरण में  परंपरागत वफादारी  घुटघुट कर समाई हुई है । विडंबना तो यह है कि जो लोग आधुनिकता की सबसे अधिक दुहाई देते हैं वे ही लोग अपने सगे-संबंधियों को आगे बढ़ाने में सबसे अधिक रुचि भी दिखलाते हैं । महात्मा गांधी जिन्हें आम तौर से पीछे देखू , परंपरावादी और घोर प्रतिक्रियावादी कहा जाता है शायद देश के बड़े नेताओं में अकेले थे जिन्होंने अपने पुत्रों को वैसे ही जीवन के लिए प्रशिक्षित किया जो देश के श्रमिक वर्ग के बच्चों को उपलब्ध है । अपनी संतान के प्रति पक्षपात रहित व्यवहार का एक दु:खद परिणाम यह हुआ कि उनके बड़े पुत्र हरिलाल गांधी विद्रोही बन गये और वह सब किया जिनका विरोध गांधीजी करते थे । इसके विपरीत जवाहरलाल नेहरू जिन्हें भारतीय आधुनिकता का प्रतीक माना जाता है हर मौके पर अपने परिवार के लोगों को आगे बढ़ाने की कोशिश करते रहे जिसके परिणामस्वरूप देश पर तीन पीढ़ी से एक परिवार का शासन चल रहा है । इसी तरह कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं संतान प्रेम भी आधुनिकता की मर्यादाओं को नहीं मानता । अगर भारतीय व्यवस्था में उनके लिए समुचित स्थान नहीं बन पाता तो उनके लिए रूस या अन्य कम्युनिस्ट देशों के नामी प्रतिष्ठानों में पैठ मिल जाती थी जहाँ से वे पुन: अपने लिए एक विशिष्ट स्थान बना लेते थे ।

इस अंतर्विरोध को समझना जरूरी है ।

( जारी )

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पिछले भाग से आगे : जाहिर है लोहिया का यह निष्कर्ष गलत साबित हुआ । पूंजीवाद ज्यादा दीर्घायु और ज्यादा स्थायी साबित हुआ तथा कई संकटों को पार कर गया । मार्क्स की ही तरह लोहिया की भविष्यवाणी भी गलत साबित हुई । दरअसल , इस निबन्ध को वे पचीस तीस साल बाद लिखते तो आसानी से देख लेते कि उपनिवेशों के आजाद होने के साथ औपनिवेशिक शोषण तथा साम्राज्यवाद खतम नहीं हुआ , बल्कि उसने नव-औपनिवेशिक रूप धारण कर लिया । अंतरराष्ट्रीय व्यापार , अंतरराष्ट्रीय कर्ज , विदेशी निवेश और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विस्तार के जरिए यह शोषण चलता ही नहीं रहा बल्कि बढ़ता गया । सुदूर क्षेत्रों तक घुसपैठ व कमाई के जरिए पूंजीवाद को मिले । नतीजतन पूंजीवाद फलता फूलता गया । भूमंडलीकरण का नया दौर इसी नव औपनिवेशिक शोषण को और ज्यादा बढ़ाने के लिए लाया गया है ।
औपनिवेशिक प्रक्रिया का एक और रूप सामने आया है । वह है आंतरिक उपनिवेशों का निर्माण । सच्चिदानन्द सिन्हा जैसे समाजवादी विचारकों ने हमारा ध्यान इस ओर आकर्षित किया है । दुनिया के गरीब देशों में जो सीमित औद्योगीकरण हुआ है , वह इसी प्रक्रिया के साथ हुआ है । जब बाहरी उपनिवेश बनाना संभव नहीं होता , तो पूंजीवादी विकास देश के अंदर ही उपनिवेश बनाता है । जैसे भारत के पिछड़े एवं आदिवासी इलाके एक तरह के आंतरिक उपनिवेश हैं । पूर्व सोवियत संघ के एशियाई हिस्से भी आंतरिक उपनिवेश ही थे । आंतरिक उपनिवेश सिर्फ भौगोलिक रूप में होना जरूरी नहीं है । अर्थव्यवस्था एवं समाज के विभिन्न हिस्से भी आंतरिक उपनिवेश की भूमिका अदा कर सकते हैं । जैसे गांवों और खेती को पूंजीवादी व्यवस्था में एक प्रकार का आंतरिक उपनिवेश बना कर रखा गया है , जिन्हें वंचित ,शोषित और कंगाल रख कर हे उद्योगों और शहरो का विकास होता है । भारत जैसे देशों का विशाल असंगठित क्षेत्र भी एक प्रकार का आंतरिक उपनिवेश है जिसके बारे में सेनगुप्ता आयोग ने हाल ही में बताया कि वह २० रुपये रोज से कम पर गुजारा करता है । लेकिन यह भी नोट करना चाहिए कि पूंजीवादी विकास की औपनिवेशिक शोषण की जरूरत इतनी ज्यादा है कि सिर्फ आंतरिक उपनिवेशों से एक सीमा तक , अधकचरा औद्योगीकरण ही हो सकता है । भारत इसका सबसे बढ़िया उदाहरण है , जहाँ औद्योगीकरण की एक सदी के बावजूद देश का बहुत बड़ा हिस्सा बहिष्कृत और हाशिए पर है तथा देश की श्रम शक्ति का ८ फीसदी भी संगठित क्षेत्र में नहीं लग पाया है ।
इस प्रकार नव औपनिवेशिक शोषण एवं आतंरिक उपनिवेश की इन प्रक्रियाओं से पूंजीवाद ने न केवल अपने को जिन्दा रखा है , बलिक बढ़ाया व फैलाया है । लेकिन इससे लोहिया की मूल स्थापना खारिज नहीं होती हैं , बल्कि और पुष्ट होती हैं । वह यह कि पूंजीवाद के लिए देश के अंदर कारखानों खदानों के मजदूरों का शोषण पर्याप्त नहीं है । इसके लिए शोषण के बाहरी स्रोत जरूरी हैं । उपनिवेश हों , नव उपनिवेश हों या आंतरिक उपनिवेश हों उनके शोषण पर ही पूंजीवाद टिका है । साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद पूंजीवाद के अनन्य सखा सहोदर हैं । इसीसे यह निष्कर्ष भी निकलता है आधुनिक औद्योगिक पूंजीवादी विकास कभी भी सब के लिए खुशहाली नहीं ला सकता है । बड़े हिस्से की कीमत पर कुछ लोगों का ही विकास हो सकता है । यदि दुनिया के सारे इलाकों और सारे लोगों को विकास चाहिए तो पूंजीवाद का विकल्प खोजना होगा ।
पूंजीवाद का एक और आयाम है ,जो तेजी से उभर कर आ रहा है । धरती का गरम होना , बढ़ता प्रदूषण , नष्ट होती प्रजातियां , पर्यावरण का बढ़ता संकट, प्राकृतिक संसाधनों के बढ़ते संघर्ष आदि इस बात की ओर इंगित कर रहे हैं कि पूंजीवादी विकास में प्रकृति भी एक महत्वपूर्ण कारक है । जैसे श्रम का अप्रत्यक्ष (औपनिवेशिक) शोषण पूंजीवाद में अनिवार्य रूप से निहित है , वैसे ही प्रकृति के लगातार बढ़ते दोहन और शोषण के बिना पूंजीवादी विकास नहीं हो सकता । जैसे जैसे पूंजीवाद का विकास और विस्तार हो रहा है प्रकृति के साथ छेड़छाड़ और एक तरह का अघोषित युद्ध बढ़ता जा रहा है । जिन पारंपरिक समाजों और समुदायों की जिन्दगियां प्रकृति के साथ ज्यादा जुड़ी हैं जैसे आदिवासी , पशुपालक , मछुआरे , किसान आदि उनके ऊपर भी हमला बढ़ता जा रहा है । पूंजीवाद के महल का निर्माण उनकी बलि देकर किया जा रहा है ।
पिछले दिनों भारत में नन्दीग्राम , सिंगूर , कलिंगनगर आदि के संघर्षों ने औद्योगीकरण की प्रकृति व जरूरत पर एक बहस खड़ी की , तो कई लोगों को इंग्लैंड में पूंजीवाद की शुरुआती घटनाओं की याद आईं जिसे कार्ल मार्क्स ने ‘पूंजी का आदिम संचय’ नाम दिया था । दोनों में काफ़ी समानतायें दिखाई दे रही थीं । इंग्लैंड में तब बड़े पैमाने पर किसानों को अपनी जमीन पर से बेदखल किया गया था , ताकि ऊनी वस्त्र उद्योग हेतु भेड़पालन हेतु चारागाह बनाये जा सकें और बेदखल किसानों से बेरोजगारों की सस्ती श्रम – फौज , नये उभर रहे कारखानों को मिल सके । कई लोगों ने कहा कि भारत में वही हो रहा है। लेकिन मार्क्स के मुताबिक तो वह पूंजीवाद की प्रारंभिक अवस्था थी । क्या यह माना जाए कि भारत में पूंजीवाद अभी भी प्रारंभिक अवस्था में है । यह कब परिपक्व होगा ?
[ जारी ]

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नीचे प्रस्तुत पुस्तिकाएँ मैंने अपने चिट्ठों समाजवादी जनपरिषद , तथा  यही है वह जगह पर समय-समय पर धारावाहिक तौर पर पेश की थीं। यहाँ इनमें से नौ पुस्तिकाओं को पी.डी.एफ़ फाइल के तौर पर प्रस्तुत करते हुए मुझे बहुत खुशी हो रही है । पुस्तिकाओं और प्रस्तुति पर सुझाव और प्रतिक्रिया का स्वागत है ।

विदेशी पूँजी से विकास का अन्धविश्वास : सुनील  ,

 भारत भूमि पर विदेशी टापू  ,

क्या वैश्वीकरण का मानवीय चेहरा संभव है ? – सुनील

औद्योगीकरण से विकास का अन्धविश्वास : सुनील

बातचीत के मुद्दे : किशन पटनायक

हिन्दू बनाम हिन्दू

राम , कृष्ण , शिव : राममनोहर लोहिया

कृष्ण : डॉ. राममनोहर लोहिया

उपभोक्तावादी संस्कृति : गुलाम मानसिकता की अफ़ीम

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