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Posts Tagged ‘समाजवाद’

डॉ डाभोलकर सिर्फ अंध विश्वास के खिलाफ ही सक्रिय नहीं थे हांलाकि उनके मिशन का यह प्रमुख हिस्सा था। सत्तर के दशक के शुरुआती वर्षों में एक तरुण समाजवादी के रूप में वे समाजवादी युवजन सभा से जुड़े और कई सामाजिक आन्दोलनों से उनका सरोकार बना। म्रुट्यु पर्यन्त यह सरोकार बना रहा । सामाजिक कामों में रुझान रखने वाले रंगकर्मियों के एक समूह में उत्साह भरने का काम उन्होंने किया।इन रंगकर्मियों में डॉ श्रीराम लागू,नीलू फुळे,रोहिणी हटंगड़ी प्रमुख थे। डॉ डाभोलकर ने इस टोली के महाराष्ट्र में सौ स्थानों पर नाटक आयोजित किए। टिकट और चन्दे से एक कोष बना- ‘सामाजिक कृतज्ञता निधि’ । कोष से पूर्णकालिक सामाजिक कार्यकर्ताओं को छोटी-सी राशि मानदेय के रूप में दी जाती है । शुरुआत में पच्चीस लाख रुपए एकत्रित हुए।अब यह कोष एक करोड़ से ऊपर का हो गया है तथा इससे महाराष्ट्र ४५ प्रगतिशील कार्यकर्ताओं को सहयोग दिया जाता है । अमेरिका में रहने वाले प्रगतिशील भारतीयों द्वारा निर्मित कोष से दिए जाने वाले ‘महाराष्ट्र फाउन्डेशन पुरस्कार’ को चलाने में भी उनकी अहम भूमिका रही है।
साने गुरुजी द्वारा स्थापित समाजवादी पत्रिका ‘साधना’ के वे संपादक थे। वे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के कबड्डी खिलाड़ी रह चुके थे तथा उन्हें अनेक स्वर्ण पदक तथा ‘छत्रपति क्रीड़ा पुरस्कार’ से नवाजा गया था।
उनके द्वारा स्थापित ‘अंध श्रद्धा निर्मूलन समिति महाराष्ट्र की सर्वोत्तम प्रगतिशील सक्रिय संस्थाओं में से एक है। महाराष्ट्र भर में इसकी २०० शाखाएं हैं । अब्रहाम कोवूर को जिन को जिन अर्थो में तर्कवादी माना जाता है वैसे वे नहीं थे। अन्य बुद्धिवादियों की तरह वे नास्तिकता का उपदेश नहीं देते थे तथा हिन्दू देवी देवताओं का उपहास नहीं करते थे हांलाकि वे धर्म की आलोचना करते थे। अंध विश्वास की समाजिक-आर्थिक जड़ों की बाबत उनकी एक स्पष्ट समझ थी। वे हमेशा व्यापक सामाजिक बदलाव के लिए सक्रिय रहे। ‘अंध श्रद्धा निर्मूलन समिति’ ने भी जाति प्रथा के नाश पर ध्यान केन्द्रित करना शुरु कर दिया था। अन्तर्जातीय विवाह करने की वजह से एक पिता द्वारा अपनी बेटी की जघन्य हत्या के बाद उनके संगठन ने इस मुद्दे को शिद्दत के साथ उठाया।
गत १४ वर्षों से डाभोलकर अंध विश्वास विरोधी कानून लाने के लिए अभियान छेड़े हुए थे।धर्म के नाम पर धोखाधड़ी,फर्जीवाड़ा और बर्बर कृत्यों को रोकने के लिए इस कानून में प्रावधान का प्रस्ताव है। सत्ताधारी दल का यह दिवालियापन है कि कई बार वादा करने के बावजूद भगवा ब्रिगेड के थोड़े से दबाव के आगे वे झुक जाते रहे हैं और मामला टलता आया है । इन पार्टियों के भीतर भी जो नई पौध आई है उनमें से कई खुद बाबाओं की शरन में रहते हैं।इनमें पार्टी को चन्दा देने वाले धन पशु भी शामिल हैं। डाभोलकर इन बाबाओं को भी निशाने पर नहीं ले रहे थे सिवाए इसके कि उनके द्वारा किए जा रहे फर्जीवाड़े,धोखे और बर्बर कृत्यों पर चोट करते थे। सामाजिक-राजनैतिक संस्कृति में आई गिरावट तथा भगवा ब्रिगेड दिन पर दिन बढ़ती असहिष्णुता के कारण किसी पागल ने फासिस्ट ताकतों के समर्थन से इस जघन्य कृत्य को अंजाम दिया होगा। मुझे पता नहीं कि इसका मोदी की लोकप्रियता से कोई सम्बन्ध है अथवा नहीं।
डॉ डाभोलकर अत्यन्त कुशल और सक्रिय संगठनकर्ता के रूप में जाने जाते थे। वे बहुत स्पष्टता के साथ अपने तर्क रखते थे जिससे उनकी बात ग्राह्य हो जाती थी। किसी भी बहस के दौरान वे अपना मिजाज स्थिर रखते थे। उन्होंने अपनी पत्नी डॉ प्रभा के साथ मिलकर दस वर्षों तक डॉक्टरी की। १९८२ से वे पूर्ण कालिक कार्यकर्ता बन गए। गत बत्तीस वर्षों से हफ्ते में दो दिन वे अपने गृह नगर सतारा में रहते थे,दो दिन ‘साधना’ के संपादन के लिए पुणे में रहते थी तथा बाकी के दिन महाराष्त्र भर में व्यापक दौरे के लिए लगाते थे।
युवा डोक्टरों और प्रगतिशील सामाजिक कार्यकर्ताओम के लिए डाभोलकर एक आदर्श बन गए थे। मुझे अचरज नहीं हुआ जब उनकी हत्या की निन्दा के लिए आयोजित रैली में  २०० युवा जुटे ।इनमें करीब ५० छात्र सरकारी मेडिकल कॉलेज के थे। इसके लिए एस एफ आई तथा कुछ अन्य छात्र संगठन धन्यवाद के पात्र हैं जो उनके बीच सक्रिय हैं । किसी बड़े सामाजिक मुद्दे पर मेडिकल छात्रों का जुटना मैंने इसके पूर्व नहीं देखा है। कॉलेज में पढ़ने वाले इन तरुणों में आई जागृति आशा का लक्षण है।इनमें से कई उच्च अथवा मध्य वर्ग व जातियों के हैं।
स्वास्थ्य के प्रश्न पर वे अधिक सक्रिय न थे।फिर भी वे हमारे सम्पर्क में रहते थे।तीन साल पहले हमने जब मरीजों के हक पर सम्मेलन आयोजित किया था तो उन्होंने उसकी तारीफ की थी। पिछले कुछ महीनों से उन्होंने ‘अंध श्रद्धा निर्मूलन समिति’ की पत्रिका फिर से छापनी शुरु की है।स्वास्थ्य नीति पर मेरे कुछ मराठी लेख उन्होंने उसमें छापे हैं।
पिम्परी और चिंचवड पुणे के औद्योगिक उपनगर हैं। अंध श्रद्धा निर्मूलन समिति की इनकी शाखा के २० वर्ष पूरे होने के मौके पर उन्होंने मुझे अतिथि वक्ता के रूप में बुलाया था। सभा स्थल तक पहुंचने के लिए हमने आधा घण्टे साथ-साथ यात्रा की थी। हमारी बातचीत में उन्होंने इस बात पर बल दिया कि ‘अंध श्रद्धा निर्मूलन समिति’ को अपने काम का दाएरा व्यापक करना चाहिए। एक फर्जी डॉक्टर का पर्दाफाश उनके आखिरी योगदान में से होगा।इस मामले को वे मन्त्रालय तक ले गए थे। उनका बेटा हामिद तर्कवादी ,सामाजिक रुझान वाला मनोचिकित्सक है तथा अपने सहमना साथियों के साथ नशा उन्मूलन के मुद्दों पर काम करता है। डॉ डाभोलकर ने अपने समूह के नेताओं की जो दूसरी पीढ़ी तैयार की है उसने संकल्प लिया है ‘अंध विश्वास विरोधी कानून’ के लिए अभियान को वे जारी रखेंगे।
निश्चित तौर पर हमने महाराष्ट्र के उत्कृष्टम प्रगतिशील नेता-कार्यकर्ता में से एक को खो दिया है।यह अपूरणीय नुकसान है।
– अनन्त फड़के

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इस सैद्धान्तिक अन्तर्विरोध का हल खोजने की कोशिश में हम एक नये सत्य पर पहुचते हैं । दरअसल पूंजीवाद का तीन – चार सौ सालों का पूरा इतिहास देखें, तो वह लगातार प्राकृतिक संसाधनों पर बलात कब्जा करने और उससे लोगों को बेदखल करने का इतिहास है । एशिया व अफ्रीका के देशों को उपनिवेश बनाने के पीछे वहाँ के श्रम के साथ साथ वहाँ के प्राकृतिक संसाधनों की लूट का आकर्षण प्रमुख रहा है । दोनों अमरीकी महाद्वीपों और ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप के मूल निवासियों को नष्ट करके वहाँ के प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जे की लालसा ही यूरोपीय गोरे लोगों को वहाँ खींच लाई । जिसे मार्क्स ने ‘पूंजी का आदिम संचय’ कहा है वह दरअसल पूंजीवाद की निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है । इसके बगैर भी पूंजीवाद चल नहीं सकता । मजदूरों के शोषण की तरह प्राकृतिक संसाधनों की लूट भी पूंजी के संचय का अनिवार्य हिस्सा है ।
पूंजीवादी औद्योगीकरण एवं विकास के लिए प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष तरीके से कितने बड़े पैमाने पर जंगल नष्ट किया गया , कितने बड़े पैमाने पर जमीन की जरूरत है , कितने बड़े पैमाने पर पानी की जरूरत है , कितने बड़े पैमाने पर खनिज निकालना होगा , कितने बड़े पैमाने पर उर्जा चाहिए – ये बातें अब धीरे धीरे साफ़ हो रही हैं और उनका अहसास बढ़ रहा है । यदि यह पूंजीवाद की अनिवार्यता है तो पूंजीवाद के विश्लेषण में इन्हें शामिल करना होगा । जो मूल्य का श्रम सिद्धान्त मार्क्स ने अपनाया वह इसमें बाधक होता है । श्रम के शोशण को समझने और उत्पादन की प्रक्रिया में श्रम के महत्व को बताने के लिए तो यह सिद्धान्त ठीक है , किन्तु प्राकृतिक संसाधनों का इसमें कोई स्थान नहीं है । ऐसा शायद इसलिए भी है कि प्राकृतिक संसाधनों को प्रकृति का मुफ्त उपहार मान लिया जाता है । लेकिन सच्चाई यह है कि प्रकृति को बड़े पैमाने पर लूटे बगैर तथा उस पर निर्भर समुदायों को उजाड़े-मिटाये बगैर पूंजीवादी व्यवस्था के मूल्य का सृजन हो ही नहीं सकता । ‘अतिरिक्त मूल्य’ का एक स्रोत श्रम के शोषण में है, तो एक प्रकृति की लूट में भी । जिसे पूंजीवादी मुनाफा कहा जाता है उसमें प्राकृतिक संसाधनों पर बलात कब्जे , एकाधिकार और लूट से उत्पन्न ‘लगान’ का भी बड़ा हिस्सा छिपा है ।
प्राकृतिक संसाधनों की यह लूट को नवौपनिवेशिक शोषण या आन्तरिक उपनिवेश की लूट से स्वतंत्र नहीं है , बल्कि उसीका हिसा है । शोषण व लूट के इस आयाम को पूंजीवाद के विश्लेषण के अंदर शामिल करना जरूरी हो गया है। मार्क्स और लोहिया के समय यह उभर कर नहीं आया था । इसलिए अब पूंजीवाद के समझने के अर्थशास्त्र को मार्क्स और लोहिया से आगे ले जाना होगा । गांधीजी जो शायद ज्यादा दूरदर्शी व युगदृश्टा थे इसमें हमारे मददगार हो सकते हैं ।
पूंजीवाद एक बार फिर गहरे संकट में है । वित्तीय संकट , विश्वव्यापी मन्दी और बेरोजगारी आदि इसका एक आयाम है । यह भी गरीब दुनिया के मेहनतकश लोगों के फल को हड़पने के लिए शेयर बाजार , सट्टा , बीमा , कर्ज का व्यापार जैसी चालों का नतीजा है जिसमें कृत्रिम समृद्धि का एक गुब्बारा फुलाया गया था । वह गुब्बारा फूट चुका है । लेकिन इस संकट का दूसरा महत्वपूर्ण आयाम पर्यावरण का संकट , भोजन का संकत और प्राकृतिक संसाधनों का संघर्ष है । दुनिया के अनेक संघर्ष जल, जंगल , जमीन , तेल और खनिजों को ले कर हो रहे हैं । इन संकटों से पूंजीवादी विकास की सीमाओं का पता चलता है । इन सीमाओं को समझकर , पूंजीवाद की प्रक्रियाओं का सम्यक विश्लेषण करके , उस पर निर्णायक प्रहार करने का यह सही मौका है । यदि हम ऐसा कर सकें तो जिसे ‘इतिहास का अंत’ बताया जा रहा है , वह एक नये इतिहास को गढ़ने की शुरुआत हो सकता है ।
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कृपया आलेख प्रकाशित होने पर कतरन एवं पारिश्रमिक निम्न पते पर भेजें –
सुनील ,समाजवादी जनपरिषद ,ग्रा?पो. केसला,वाया इटारसी,जि होशंगाबाद,(म.प्र.) ४६११११
सुनील का ई-पता sjpsunilATgmailDOTcom

इस लेख का प्रथम भाग , दूसरा भाग

सुनील की अन्य लेखमाला : औद्योगीकरण का अन्धविश्वास : ले. सुनील

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