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Posts Tagged ‘सुनील’

प्रिय सुनील,
आने की इच्छा थी लेकिन संभव नहीं हुआ। कारण देना व्यर्थ है।अबकी बार आप लोगों से ही नहीं जन-आंदोलन समन्वय समिति के सदस्यों से भी भेंट हो जाती।लिखने की जरूरत नहीं है कि किशनजी से मिलना एक बड़े संतोष का विषय है।समाजवादी आंदोलन से जुड़े जो जाने पहिचाने चेहरे हैं उनमें से शायद किशन पटनायक ही ऐसे हस्ताक्षर हैं जो नई पीढ़ी को प्रेरणा देने की योग्यता रखते हैं। लोहिया का नाम लेने वाले केवल मठ बना सकते हैं,यद्यपि वे इसे भी भी नहीं बना पाये हैं लेकिन जो लोग लोहिया को वर्त्तमान सन्दर्भों में परिभाषित कर रहे हैं या लोहिया के सोच के तरीके से वर्त्तमान को समझ रहे हैं वे ही समाजवादी विचारधारा को ज़िंदा रख रहे हैं।जाने पहिचाने लोगों में मेरी दृष्टि में ऐसे एक ही व्यक्ति हैं और वह हैं ,- किशन पटनायक।
आप लोग उनके सानिध्य में काम कर रहे हैं यह बड़ी अच्छी बात है।अलग अलग ग्रुपों को जोड़ने की आपकी कोशिश सफल हो ऐसी मेरी शुभ कामना है।
  आप यदि मेरी बात को उपदेश के रूप में न लें जोकि या तो बिना सोचे स्वीकार की जाती है या नजरअंदाज कर दी जाती है, तो मैं यह कहना चाहूंगा कि वर्तमान राजनैतिक दलों की निरर्थकता के कारण छोटे छोटे दायरों में काम करने वाले समूहों का महत्व और भी बढ़ गया है।केंद्रीकृत व्यवस्था का विकल्प देने के काम को ये समूह ही करेंगे।दलों का केंद्रीकृत ढांचा केंद्रीकृत व्यवस्था को कैसे तोड़ सकता है? हांलाकि लोकशक्ति तो खड़ी करनी होगी।विकेंद्रीकृत ढांचों में किस तरह लोकशक्ति प्रगट हो सके यह आज की बड़ी समस्या है।
  मेरे मन में उन लोगों के प्रति अपार श्रद्धा है जो सम्पूर्ण आदर्श लेकर काम कर रहे हैं चाहे उनका दायरा छोटा ही रह जाए लेकिन शक्ति के फैलाने की जरूरत है।देश बहुत बड़ा है। लोगों के अलग अलग अनुभव होते हैं और इस कारण लिखित या मौखिक शब्द अपर्याप्त हैं।शक्ति बनाना है तो सम्पूर्ण विचारधारा पर जोर कम और सामान कार्यक्रमों में अधिक से अधिक समूहों के साथ मिलकर काम करना श्रेयस्कर है- ऐसा मेरा विचार है।
   शुभ कामनाओं के साथ
ओमप्रकाश रावल
सितम्बर 15,’92
प्रति,श्री सुनील, c/o श्री किशन बल्दुआ, अध्यक्ष समता संगठन,अजंता टेलर्स,सीमेंट रोड,पिपरिया,
जि होशंगाबाद

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‘’ शिक्षा का बाजार एक विकृति है । किसी भी आधुनिक समाज में शिक्षा के बाजार का मतलब क्या है ? हमारे शिक्षण संस्थानों को पहले हम शिक्षा का मंदिर कहते थे । अब वे शिक्षा की दुकानें बन गई हैं । वहां मुनाफाखोरी चल रही है , घोटाले हो रहे हैं । इसमें यही होगा। भोपाल में व्यापमं (व्यावसायिक परीक्षा मंडल , मध्य प्रदेश ) घोटाला हुआ। मेडिकल की सीटों के लिए आज दस से बीस लाख रुपए लिए जा रहे हैं , चारों तरफ यह हो रहा है । होशंगाबाद में ५ – ६ बी.एड. कॉलेज खुल गए हैं और वहां चालीस हजार फीस है और एक लाख दे दीजिए तो बिना एटैण्डेंस (उपस्थिति) आपको सब मिल जाएगा और आप पास भी हो जाएंगे । यह शिक्षा के बाजार का परिणाम है । बाजार में उसी के लिए जगह है जिसके पास पैसा है । बाज़ार जो टुकड़े व जूठन फेंकेगा , आप उसे उठा सकते हैं ।‘’
‘’ बाजारीकरण क्यों बढ़ रहा है ? निजीकरण की मांग जनता की ओर से नहीं आई । यह विश्व बैंक द्वारा भारत की शिक्षा नीति और व्यवस्था को प्रभावित करके शिक्षा का बाजारीकरण किया गया है । इसमें नेताओं के अपने स्वार्थ हैं । वे सब शिक्षा के इस धंधे में कूद पड़े हैं । जितने भी स्कूल – कॉलेज – मेडिकल ,इंजीनियरिंग , बी.एड हैं – सब नेताओं ने खोल लिए हैं। यह आज उनका निहित स्वार्थ बन गया है। सभी सरकारें शिक्षा के निजीकरण को अंधाधुंध तरीके से बढ़ावा दे रही हैं। इस देश में शिक्षा का धंधा सबसे ज्यादा मुनाफेवाला , सबसे ज्यादा अनियंत्रित और सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ने वाला धंधा बन गया है। बड़े – बड़े नेताओं से लेकर छुटभैया नेताओं तक सब इसमें टूट पड़े हैं । इसमें अनाप – शनाप लूट और शोषण है और देश का नुकसान है ।‘’
‘’……… निजी स्कूल का मतलब ही भेदभाव है । जिसके पास पैसा है , उसका बच्चा ऊंचे स्कूल में पढ़ेगा । जिसके पास और पैसा है , उसका बच्चा विदेश में पढ़ने जाएगा । जिसके पास पैसा नहीं है और जो सबसे ज्यादा उपेक्षित , गरीब व मजदूर का बच्चा है , वह सरकारी स्कूल में जाएगा। शिक्षा में भेदभाव, स्वास्थ्य में भेदभाव। बच्चे तो भगवान की देन हैं फिर आप उन बच्चों में भेदभाव क्यों कर रहे हैं ? आपकी समान अवसर की बात सिर्फ एक ढकोसला है । शिक्षा में भेदभाव नहीं होना चाहिए।…‘’
( लोकसभा चुनाव , २०१४ के दौरान राजनीतिक दलों के साथ शिक्षा नीति पर ०७ अप्रैल २०१४ को भोपाल में आयोजित संवाद में सुनील ,राष्ट्रीय महामंत्री ,समाजवादी जनपरिषद के विडियो रेकार्डिंग से लिप्यांतरित ।)
– ‘भारत शिक्षित कैसे बने?’,ले. सुनील,प्रकाशक – किशोर भारती ,अप्रैल २०१४, पृ. ४६ – ४७ से उद्धरित ।

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‘‘हमने ‘गार’ के भूत का दफना दिया है। अब पूंजी निवेशकों को डरने की जरुरत नहीं है। हमने खुदरा व्यापार मंे विदेशी पूंजी को इजाजत देने और ईंधन कीमतों मंे बढ़ोत्तरी के फैसले लिए हैं, जिनसे हमारी रेटिंग घटने का खतरा नहीं रहा। इन कदमों से अब निवेशक भारत में फिर से दिलचस्पी ले रहे हैं।’’
– वित्तमंत्री पी. चिदंबरम, 22 जनवरी 2013, हांगकांग

भारत के वित्तमंत्री का यह बयान कई मायनों मंे महत्वपूर्ण हैे और बहुत कुछ कहता है। हांगकांग में सिटी बैंक और बीएनपी नामक दो बहुराष्ट्रीय बैंकों द्वारा ‘निवेश के लिए भारत सम्मेलन’ का आयोजन किया गया था जिसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों के 200 प्रतिनिधि शामिल हुए। इस मौके पर चिदंबरम के मुंह से यह उद्गार निकले। अगले दिन वे सिंगापुर मंे इसी मिशन पर गए। उसके बाद यूरोप में इसी तरह अंतरराष्ट्रीय पूंजीपतियों की चिरौरी करने गए। इसी समय 23 से 27 जनवरी तक स्विट्जरलैण्ड के दावोस नगर मंे विश्व आर्थिक मंच की सालाना बैठक मंे भारत के वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा और शहरी विकास मंत्री कमलनाथ निवेशकों को लुभाने गए। उसके बाद विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने यूरोप के दो देशों की यात्रा की तो उनके एजेण्डे मंे भी भारत-यूरोप आर्थिक सहयोग प्रमुख रुप से शामिल था।
यह साफ है कि इसके पहले भारत सरकार ने जो कई बड़े-बड़े फैसले लिए, उनका मकसद विदेशी निवेशकों को खुश करना था। ये अंतरराष्ट्रीय पूंजीपति निवेश का फैसला करने के लिए अंतरराष्ट्रीय साख निर्धारण (रेटिंग) एजेंसियों की तरफ देखते हैं। स्टेण्डर्ड एण्ड पुअर, मूडीज, फिच जैसी ये एजेंसियां पूरी तरह नवउदारवादी-पूंजीवादी सोच पर चलती है और उनका एकमात्र मकसद बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितों को बढ़ावा देना है। जिस फार्मूले से वे रेटिंग तय करती हैं, वह ब्याज दरों, शेयर बाजार, भुगतान संतुलन के ंचालू खाते के घाटे, सरकारी खर्च, विदेशी निवेशकों को रियायतों आदि पर आधारित होता है। अर्थव्यवस्थाओं के बारे मंे इनके अनुमान कई बार गलत निकले हैं। लेकिन भारत सरकार के लिए वही रेटिंग, शेयर सूचकांक, राष्ट्रीय आय वृद्धि दर जैसे ही मानक सर्वोपरि हो गए हैं।
यह ‘गार’ का भूत क्या है ? भारत सरकार की आमदनी और घाटे से चिंतित पिछले वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने पिछले साल के बजट मंे ‘गार’ का प्रावधान किया था। यह अंगरेजी के ‘जनरल एन्टी अवाॅयडेन्स रुल्स’ का संक्षेप है जिसका मतलब है कर-वंचन रोकने के सामान्य नियम। आय कर कानून के तहत बनाए जा रहे इन नियमों का मकसद देशी-विदेशी कंपनियों द्वारा करों की चोरी या कर से बचने की कोशिशों पर लगाम लगाना था। यह भी प्रावधान किया जा रहा था कि यदि कोई कंपनी कोई भी कर नहीं दे रही है तो उस पर एक न्यूनतम कर लगेगा। इसी बीच नीदरलैण्ड की वोडाफोन कंपनी ने भारत में टेलीफोन व्यवसाय के अधिग्रहण का देश के बाहर सौदा करके टैक्स से बचने की कोशिश की थी। उसको रोकने के लिए प्रणव मुखर्जी ने ऐसे सौदों को भी कर-जाल के दायरे मंे लाने और उसे पिछली अवधि से लागू करने की घोषण की थी। वोडाफोन कंपनी पर करीब 11,218 करोड़ रु. के टैक्स का दावा बनता था।
लेकिन प्रणव मुखर्जी का इन मंशाओं के जाहिर होते ही विदेशी कंपनियों मंेे खलबली मच गई। उन्होंने हल्ला मचाना शुरु कर दिया और भारत से अपनी पूंजी वापस ले जाने की धमकियां देनी शुरु कर दी। मनमोहन सिंह दुविधा मंे फंस गए। इस बीच भारत के राष्ट्रपति के चुनाव का एक अच्छा मौका मनमोहन सिंह के हाथ मंे आया। प्रणव मुखर्जी को राष्ट्रपति बनाकर राह का रोड़ा हटाया गया। वित्तमंत्री का प्रभार लेते ही मनमोहन सिंह ने आश्वासन दिया कि ‘गार’ की समीक्षा की जाएगी। फिर मंत्रालय में चिदंबरम को लाया गया जिसकी कंपनी-भक्ति में कोई संदेह नहीं था। रंगराजन, कौशिक बसु, रघुराम राजन जैसे आर्थिक सलाहकार भी एक स्वर में अनुदानों को कम करने के साथ-साथ निवेशकों की आशंकाएं दूर करने का राग अलापने लगे। ऐसे ही एक अर्थशास्त्री पार्थसारथी शोम की अध्यक्षता में एक समिति बनाई गई। उसने फटाफट अपनी रपट पेश कर दी। 14 जनवरी को सरकार ने घोषणा कर दी कि गार नियमों को तीन साल के लिए स्थगित किया जाता है और 1 अप्रैल 2016 से उन्हें लागू किया जाएगा। इस बीच वित्तमंत्री यह भी घोषणा कर चुके थे कि किसी भी कंपनी को पिछली तारीख से कर के दायरे मंे नहीं लाया जाएगा। इससे वोडाफोन कंपनी को एक खरब रुपए से ज्यादा का फायदा हो गया।
गार स्थगन की घोषणा के साथ ही विदेशी पंूजीपतियों मंे खुशी की लहर दौड़ गई और दो दिन मंे ही सेन्सेक्स 20,000 के ऊपर पहुंच गया, जो कि दो साल का सबसे ऊंचा स्तर था। इसी समय भारत सरकार ने डीजल की कीमतें क्रमिक रुप से बढ़ाने, बड़े उपभोक्ताओं को बाजार दर पर डीजल देने, धीरे-धीरे डीजल कीमतों को पूरी तरह नियंत्रणमुक्त करने और डीजल पर अनुदान समाप्त करने का फैसला कर दिया। इससे भारतीय जनता पर चाहे बोझ पड़ा हो और महंगाई का नया दौर शुरु होने की संभावना बनी हो, लेकिन रिलायन्स तथा एस्सार कंपनियों को काफी फायदा पहुंचने वाला है। इन कंपनियों के पास तेलशोधन की क्षमता है, लेकिन डीजल-पेट्रोल सस्ता होने के कारण वे अपने पेट्रोल पम्प नहीं चला पा रही थी। अब बाजार दरें लागू होने पर उनका धंधा चल निकलेगा। इसी तरह दुनिया की सबसे बड़ी और बदनाम तेल कंपनी शेल ने भी भारत मंे पेट्रोल पम्पों के लाइसेन्स ले रखे हैं। उसकी भी कमाई के दरवाजे खुल जाएंगे। खुदरा व्यापार के दरवाजे भी प्रबल विरोध के बावजूद वालमार्ट जैसी विशाल कंपनियों के लिए खोले गए हैं। पिछले कुछ सालों मंे दरअसल सरकार के ज्यादातर फैसले कंपनियों को खुश करने और फायदा पहुंचाने के लिए ही किए गए हैं।
यह एक विचित्र बात है कि जो सरकार बजट घाटे का रोना रोती रहती है और खर्च कम करने के लिए आम जनता को मिलने वाले अनुदानों व मदद को कम करने पर तुली हुई है, वही सरकार दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियों से करों को वसूलने और कर-चोरी रोकने के उपायों को आसानी से छोड़ देती है। मारीशस मार्ग जैसी कर-चोरी को उसने पूरी तरह इजाजत दे रखी है। कंपनियों को दी जाने वाली कर-रियायतें तथा उनको अनुदान हर बजट मंे विशाल मात्रा में बढ़ते जा रहे हैं। कारण यही है कि सरकार मंे बैठे लोग किसी भी किसी भी कीमत पर विदेशी पूंजी को रिझाने, लुभाने, खुश करने और बुलाने के लिए बैचेन है। इसके लिए वे देशहित, जनहित, सरकारहित, नैतिकता, संप्रभुता सबको तिलांजलि देने के लिए तैयार है। विदेशी पंूजी की यह गुलामी अभूतपूर्व है। आधुनिक भारत के इतिहास का यह एक शर्मनाक अध्याय है।
दरअसल भूत ‘गार’ का नहीं है, विदेशी पूंजी का महाभूत है जो भारत सरकार पर पूरी तरह सवार हो गया है। सरकार होश खो बैठी है और यह भूत उसको चाहे जैसा नचा रहा है। लातों के भूत बातों से नहीं मानते। इस भूत को उतारने के लिए एक बड़ा जन-विद्रोह करने करने का वक्त आ गया है।

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विदेशी कंपनियों को खुदरा व्यापार में इजाजत देने के बारे में उठे विवाद पर सफाई में प्रधानमंत्री ने कहा है कि यह फैसला बहुत सोच-समझकर किया गया है। प्रधानमंत्री की इस बात में सचाई है। इसकी तैयारी बहुत दिनों से चल रही थी। कैबिनेट सचिवों की समिति ने दो महीने पहले ही इसकी सिफारिश कर दी थी। महंगाई पर जब हल्ला हो रहा था, तभी मोंटेक सिंह अहलूवालिया, रंगराजन और कौशिक बसु ने कह दिया था कि इसका इलाज खुदरा व्यापार में बड़ी कंपनियों को बढ़ावा देने में ही निहित है। भारत के प्रधानमंत्री और वाणिज्य मंत्री काफी पहले से दावोस, न्यूयॉर्क और वाशिंगटन में वायदा करते आ रहे थे कि वॉलमार्ट के लिए भारत के दरवाजे खोले जाएंगे। जिस दूसरी पीढ़ी के आर्थिक सुधारों की बात वे करते आए हैं, यह उसका एक प्रमुख हिस्सा है।

वैश्वीकरण-उदारीकरण-कंपनीकरण के जिस रास्ते पर हमारी सरकारें चल रही हैं, यह उसका अगला पड़ाव है। इसलिए इस बारे में विपक्ष का विरोध अधूरा एवं खोखला है। जहां और जब वे सत्ता में रहे, उन्होंने भी विदेशी पूंजी को दावत दी। हर मुख्यमंत्री उन्हें न्योता देने विदेश यात्राओं पर गया। नीतीश कुमार जब देश के कृषि मंत्री थे, तो उन्होंने राष्ट्रीय कृषि नीति की घोषणा की, जिसमें खुलकर खेती में विदेशी कंपनियों को आगे बढ़ाने का नुसखा पेश किया गया। इसके खिलाफ हुंकार भरने वाले मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने देशी-विदेशी कंपनियों की मिजाजपुर्सी करने के लिए छह-सात ग्लोबल इंवेस्टर्स मीट आयोजित की। जीवन के दूसरे क्षेत्रों में विदेशी कंपनियां प्यारी और खुदरा व्यापार में बुरी, खुदरा व्यापार में भी रिलायंस-भारती-आईटीसी अच्छी और वॉलमार्ट बुरी-ऐसा मानने वालों के अंतर्विरोधों से ही उनका विरोध कमजोर हो जाता है।

भारतीय बाजारों में विदेशी घुसपैठ की शुरुआत तभी हो गई थी, जब भारत विश्व व्यापार संगठन का सदस्य बना और कुछ वर्षों बाद एक झटके में 1,423 वस्तुओं का बाजार विदेशी वस्तुओं के लिए खोला गया। भारत के थोक व्यापार, एक ब्रांड के व्यापार और कृषि व्यापार को विदेशी कंपनियों के लिए खोला गया था, तभी स्पष्ट हो गया था कि अगला नंबर खुदरा व्यापार का है। विडंबना यह है कि इस अवधि में गैर-कांग्रेसी सरकारें भी रहीं।

दृष्टिदोष से ग्रस्त हमारे शासकों एवं विशेषज्ञों को इतना भी दिखाई नहीं देता कि पश्चिमी देशों और भारत की परिस्थितियों में भारी फर्क है। वहां भी वॉलमार्ट ने छोटे दुकानदारों को बेदखल किया, किंतु उनकी संख्या बहुत कम थी और वे खप गए। भारत में तो विशाल श्रमशक्ति है। खेती और उद्योग के बाद व्यापार ही इस देश में सबसे ज्यादा रोजगार प्रदान करता है। एक तरह से घोर बेरोजगारी के इस युग में जब कहीं नौकरी नहीं मिलती, तो एक किराना दुकान, चाय या पान की दुकान ही रोजी-रोटी का जरिया बनती है। अब इसी पर हमला हो रहा है।

अमेरिका का अनुभव है कि वॉलमार्ट का एक मॉल खुलता है, तो उसकी 84 फीसदी आय स्थानीय छोटे व्यापारियों का धंधा हड़पकर ही होती है। यह भी तय है कि बाजार के वॉलमार्टीकरण से स्थानीय छोटे-छोटे उत्पादकों का धंधा मारा जाएगा। सरकार ने महज इतनी ही शर्त लगाई है कि 30 प्रतिशत आपूर्ति छोटे उद्योगों से ली जाएगी, किंतु ये छोटे उद्योग देश या दुनिया में कहीं के भी हो सकते हैं। अब यह भी साफ हो रहा है कि पूरे देश में अतिक्रमण हटाने या नगरों को सुंदर बनाने के नाम पर फुटपाथ विक्रेताओं, गुमटी-हाथठेला विक्रेताओं आदि को हटाने की जो मुहिम चलती रही है, वह शायद मॉलों के लिए ही रास्ता साफ करने की कार्रवाई थी।

प्रधानमंत्री का दूसरा झूठा दावा किसानों को फायदा पहुंचाने का है। खुदरा व्यापार में रिलायंस फ्रेश, चौपालसागर, हरियाली आदि के रूप में बड़ी देशी कंपनियों की शृंखला तो पहले ही काम कर रही है। क्या इससे भारत के किसानों को बेहतर दाम मिले? क्या खेती का संकट दूर हुआ? यदि कुछ बेहतर दाम मिलें भी, तो लागतें भी बढ़ जाती हैं और कांट्रेक्ट खेती के जरिये किसान कंपनियों पर बुरी तरह निर्भर हो जाता है। इस बात की भी पूरी आशंका है कि किसानों की उपज खरीदने के लिए कंपनियां आ चुकी हैं, यह बहाना बनाकर सरकार समर्थन-मूल्य पर कृषि उपज की खरीद बंद कर दे। इसके लिए इन विदेशी कंपनियों का दबाव भी होगा। भारतीय खेती के ताबूत पर यह आखिरी कील होगी।

प्रधानमंत्री का तीसरा झूठ यह है कि इससे व्यापार में बिचौलिये खत्म होंगे और महंगाई कम होगी। यह जरूर है कि छोटे-छोटे लाखों बिचौलियों की जगह चंद बहुराष्ट्रीय बिचौलिये ले लेंगे, जिनकी बाजार को नियंत्रित करने व उस पर कब्जा करने की अपार ताकत होगी। क्या अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री को अर्थशास्त्र के इस सामान्य नियम को याद दिलाना होगा कि एकाधिकारी प्रवृत्तियां बढ़ने से कीमतें बढ़ती हैं, कम नहीं होतीं? सच तो यह है कि ये बड़े बहुराष्ट्रीय व्यापारी किसानों, उत्पादकों, उपभोक्ताओं सबका शोषण करेंगे तथा लूट का मुनाफा अपने देश में ले जाएंगे।

यह घोर पतन का युग है। यह ज्यादा खतरनाक भ्रष्टाचार है। इसके खिलाफ कोई जेपी आंदोलन, कोई अरब वसंत या कोई वॉलस्ट्रीट कब्जा आंदोलन चलाने का वक्त आ गया है। किंतु ऐसे किसी भी आंदोलन को नवउदारवाद और विकास के मॉडल पर भी प्रहार करना होगा, तभी उसकी विश्वसनीयता और गहराई बन पाएगी।

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‘‘तुम हमें रोक नहीं सकते। मुझे उठा लो, मेरे साथियों को उठा लों! हमें जेल में डाल दो! मार दो! जो भी तुम करना चाहते हो, करो! हम अपना देश वापस ले रहे है। तुम लोगो ने 30 सालों से इस देश को बर्बाद किया है। बस, बहुत हो चुका है। बहुत हो गया! बहुत हो गया!’’

ये शब्द थे मिस्त्र के ताजा जन-विद्रोह के एक युवा नेता वेल घोनिम के, जो उसने उपराष्ट्रपति द्वारा आंदोलन के खिलाफ फौज के इस्तेमाल की धमकी देने पर एक टीवी साक्षात्कार में कहे। गूगल इंटरनेट कंपनी का यह अधिकारी एक दिन पहले ही जेल से बाहर आया था। मिस्त्र में उत्तेजना, जोश, युवाशक्ति और देशभक्ति का यह अभूतपूर्व ज्वार आखिरकार रंग लाया और 30 सालों से मिस्त्र पर एकछत्र राज कर रहे तानाशाह होस्नी मुबारक को गद्दी छोड़कर एक टापू में शरण लेना पड़ा। इसके पहले ट्यूनीशिया के तानाशाह बेन अली को जनशक्ति के आगे देश छोड़कर भागना पड़ा।
हालांकि अभी भी दोनों देशों की सत्ता अमरीका-परस्त फौज के हाथ में है और भविष्य अनिश्चित है, फिर भी वहां की जनशक्ति की यह बड़ी जीत है। यह तय हो गया है कि वहां लोकतंत्र कायम होगा और सरकार कोई भी बने, वह जनभावनाओं की उपेक्षा नहीं कर सकती । सबसे बड़ी बात यह हुई है कि आम जनता निडर बन गई है और उसे अपनी शक्ति का अहसास हो गया है। जनता की इन दो जीतों का पूरे अरब विश्व में बिजली की माफिक जबरदस्त असर हुआ है। वहां भी तानाशाह सरकारों के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे है। अरब देशों की मुस्लिम जनता सिर्फ इस्लामी कट्टरपंथ के आह्वान पर ही कुछ करती है, यह भ्रान्ति भी दूर हुई है।

पूंजीवाद पर संकट की छाया
अखबारों, टीवी और इंटरनेट के इस जमाने में इन घटनाओं का पूरी दुनिया पर असर हुआ है। दुनिया की जनता ध्यान से इन्हें देख रही है। अमरीका की पूरी कोशिश है कि सत्ता परिवर्तन के बाद नई सरकारें उसी के प्रभाव से रहे। किंतु यह तय है कि अमरीका की इजरायल नीति को इन देशों में अब वह समर्थन नहीं मिल सकेगा, जिसकी सौदबाजी वह तानाशाहों से फौजी तथा वित्तीय मदद के बदले कर लेता था। यदि इन देशों में अमरीका विरोध की बयार बहने लगती है तो यह पूरे अमरीकी वर्चस्व और साम्राज्यवाद के लिए बुरा संकेत होगा, क्योंकि तेल और स्वेज नहर ये दोनों उसके लिए बहुत महत्वपूर्ण है। तेल के अंतरराष्ट्रीय भाव 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाने लगे है और दुनिया भर के शेयर बाजार लुड़कने लगे है। अंदाज है कि तेल के भाव में 10 डॉलर की वृद्धि से संयुक्त राज्य अमरीका की राष्ट्रीय आय में 0.25 फीसदी की गिरावट आ जाती है और 2,70,000 रोजगार खतम होते है। तीन साल पहले ही जबरदस्त मंदी और वित्तीय संकट झेलने वाले तथा अभी तक उसके असर से पूरी तरह न उबर पाने वाले पूंजीवाद के लिए यह एक और झटका हो सकता है।
दूसरे शब्दों में, पूंजीवाद के एक और गहरे संकट की शुरूआत हो सकती है। किंतु बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि लोकतांत्रिक क्रांति वाले ये देश अमरीका-यूरोप पर आर्थिक, व्यापारिक, तकनीकी, फौजी व हथियारी निर्भरता से स्वयं को कितना मुक्त कर पाते हैं। नहीं तो उनकी कहानी भी फिलीप्पीन और दक्षिण अफ्रीका जैसी हो जाएगी जहां जबरदस्त जन-उभार या शानदार रंगभेद विरोधी लंबे संघर्ष से सत्ता परिवर्तन तो हुए, किन्तु एक वैकल्पिक अर्थनीति एवं विकास की वैकल्पिक सोच के अभाव में व्यवस्था नहीं बदली और अमरीका-यूरोप प्रणित पूंजीवाद का वर्चस्व भी कायम रहा। वहां की जनता के कष्टों का भी अंत नहीं हुआ। एक तरह से भारत में भी 1974-77 के जेपी के नेतृत्व वाले जनांदोलन व तानाशाही-विरोधी संघर्ष का यही हश्र हुआ। किसी भी लोकतांत्रिक क्रांति को पूर्णता और स्थायित्व तभी मिलता है जब उसकी अगली कड़ी आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक क्रांति बनती है, नही तो महान फ्रांसीसी क्रांति की तरह उसकी परिणिति किसी नेपोलियन की तानाशाही में भी हो सकती है।

भारत: समानताएं व फर्क
ट्यूनीशिया और मिस्त्र की घटनाओं के बाद भारत में भी लोग पूछने लगे है कि इस देश में ऐसी क्रांति क्यों नहीं आ सकती ? भारत के भी हालात तो ऐसे ही है, जिनमें एक बड़ी उथल-पुथल की जरूरत है। बेरोजगारी, गरीबी, महंगाई, भ्रष्टाचार, दमन तथा राष्ट्रीय स्वाभिमान के समर्पण की जिन पीड़ाओं ने वहां की जनता को उद्वेलित किया, उनसे भारत के लोग भी कम त्रस्त नहीं है। पिछले दिनों भीषण महंगाई, भयंकर बेकारी, किसानों की निरंतर आत्महत्याओं और घोटालों के एक से एक बढ़चढ़कर उजागर होते कारनामों ने पूरे देश के जनमानस को बुरी तरह बेचैन किया। किंतु क्या करें – ऐसी एक बेबसी व दिशाहीनता लोगों के मन में छाई है।
अरब देशों और भारत की हालातों में काफी समानताएं होते हुए भी एक बड़ा फर्क है। वहां तानाशाही हैं, किंतु भारत में एक लोकतंत्र चल रहा है। चुनाव का पांच साला त्यौहार बीच-बीच में यहां आता रहता है। सरकारें बदलती भी हैं, किंतु हालातें नहीं बदलती है। बेन अली या होस्नी मुबारक के रूप में एक तानाशाह को हटाने का लक्ष्य यहां नहीं है जो आम जनता को एकजुट कर दें। लोकसभा से लेकर पंचायतों तक होने वाले चुनाव एक तरह से सेफ्टी वॉल्व है जो लोगों को बदलाव की झूठी दिलासा देते रहते हैं और उनके बीच के तेज-तर्रार नेतृत्व को लूट के टुकड़ों का भागीदार बनाकर समाहित करते रहते हैं। हालांकि आम लोग इसको भी समझने लगे है, किंतु इस चक्रव्यूह से बाहर निकलने का कोई रास्ता उन्हें समझ में नहीं आ रहा है।

भारतीय लोकतंत्र की कमियां
यह करीब-करीब साफ हो चला है कि भारतीय लोकतंत्र टिकाऊ तो रहा है किंतु भारतीय जनता की तकलीफों और आकांक्षाओं की कसौटी पर खरा नहीं उतरा है। जनपक्षी बदलावों के बजाय यह यथास्थिति को बनाए रखने का एक जरिया बन गया है। इसके चुनाव धन, बल, जातिवाद, सांप्रदायिकता व मौकापरस्ती के खेल बन गए है। बूथ कब्जा अब पुरानी चीज हो गई है। ज्यादातर पार्टियों व पेशेवर नेताओं ने पांच साल तक जनता की मुसीबतों को नजरअंदाज करके चुनाव के मौके पर धन, प्रलोभन, शराब, गुण्डों, जाति, सांप्रदायिकता, दलबदल, मीडिया जैसी चीजों का सहारा लेकर वोटों को कबाड़ने की जुगाड़ में महारत हासिल कर ली है। भारत में सत्ता के केन्द्रीकरण तथा चुनाव के पैमाने से भी इस में मदद मिलती है। लोकसभा तथा विधानसभा के एक चुनाव क्षेत्र में लाखों मतदाता होते है जिन्हें प्रभावित करने का काम बड़े धनपति और बड़े दलों के संगठित गिरोह ही कर पाते है। इतने बड़े चुनाव क्षेत्र दुनिया के किसी लोकतंत्र में नहीं होते।
फिर लोकतंत्र का मतलब महज चुनाव नहीं होता। विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका व खबरपालिका – इसके ये चारों पाये आम जनता के सेवक और अनुचर होना चाहिए, किंतु मामला उल्टा है। प्रशासनिक ढांचे का कायापलट, पुलिस-कचहरी के ढांचे में बुनियादी बदलाव, सरकारी हिंसा व दमनकारी कानूनों का खात्मा, लोगों का सशक्तिकरण और इसके लिए घोर गरीबी तथा अशिक्षा का खात्मा, सामाजिक-आर्थिक विषमताओं में कमी, लोक भाषाओं की स्थापना व प्रतिष्ठा, लोकोन्मुखी व निष्पक्ष मीडिया, सत्याग्रह व सिविल नाफरमानी की गुंजाईश व इज्जत – इन जरूरी बातों को सुनिश्चित करके ही लोकतंत्र को सार्थक बनाया जा सकता है। किंतु यह काम पिछले साठ सालों में नहीं हुआ, क्योंकि उसमें ऊपर बैठे लोगों का नीहित स्वार्थ था। अंग्रेजी राज से विरासत में मिले एवं साम्राज्य की जरूरत के हिसाब से बने घोर केन्द्रीकृत ढ़ांचे को पूरी तरह पलटकर राजनैतिक, प्रशासनिक, आर्थिक विकेन्द्रीकरण का काम भी जरूरी था, किन्तु उल्टे इस अवधि में केन्द्रीकरण बढ़ा है।
यह कहा जा सकता है कि भारत की जनता को सरकारें बदलने का मौका तो मिलता है। फिर भी हालातें नहीं बदलती तो समस्या जनता में जागरूकता की कमी, भारतीय राजनीति की गिरावट या विकल्पहीनता में है। लोकतंत्र के ढ़ांचे का दोष नहीं है। यानी नाच न जानने के लिए आंगन को टेड़ा कहकर दोष नहीं दिया जा सकता। किंतु अभी तक के अनुभव से निकला सच यह है कि चुनाव एवं सत्ता का ढ़ांचा भी ऐसा है कि यह परिवर्तनकामी, ईमानदार व जनपक्षी नेताओं एवं दलों को पनपने और टिकने नहीं देता। जो चुने जाते हैं, उन पर पांच साल तक मतदाताओं का कोई नियंत्रण नहीं होता। सत्ता के केन्द्रों व जनता के बीच दूरी भी काफी है। हमारे लोकतंत्र में ‘लोक’ तो कहीं दबा रहता है, एक विकृत व भ्रष्ट ‘तंत्र’ ही हावी रहता है।
कहने का मतलब यह है कि सिर्फ नाचने वालों का ही दोष देखने से काम नहीं चलेगा। आंगन भी टेड़ा और उबड़-खाबड़ है जो न तो सही नाच होने देता है और न ही नए तरह के नाच की किसी संभावना को सामने आने देता है। छः दशक बाद भारतीय लोकतंत्र की समीक्षा करने और इसके अच्छे तत्वों को संजोते हुए भी इसके ढ़ांचे में बुनियादी बदलाव करने का वक्त आ गया है। यह काम यदाकदा चुनाव सुधारों के नाम पर चलने वाली कवायदों से नहीं होगा। इस ढ़ांचे के बुनियादी बदलाव की कोई पहल ऊपर से नहीं होगी, बल्कि नीहित स्वार्थो का प्रतिरोध भी होगा। इसके लिए भी जनक्रांति की जरूरत होगी।

विकास की वैकल्पिक राह
समीक्षा तो वैश्वीकरण-उदारीकरण-निजीकरण की उन नीतियों की भी करनी होगी, जिनको भारत में लागू किए हुए 20 वर्ष हो चले है। इनकी चकाचैंध अब फीकी पड़ चुकी है और घोर गैरबराबरी, बेकारी, बढ़ते शोषण, किसान-आत्महत्याओं, विस्थापन, पर्यावरण नाश व संप्रभुता नाश की तबाही का धुंआ चारों ओर छा चुका है। घोटालों व लूट के जो नए आयाम भारत, पाकिस्तान, ट्यूनीशिया या मिस्त्र जैसे देशों में सामने आए हैं, उनका भी गहरा रिश्ता विश्व बैंक-मुद्रा कोष प्रवर्तित इन नीतियों से है। लोकतंत्र हो या तानाशाही, इन नीतियों के जाल में दुनिया के कई देश फंसे है।
किंतु इसके साथ पूंजीवादी औद्योगिक सभ्यता की नकल वाले अधकचरे विकास की उस राह पर भी पुनर्विचार करना होगा, जिसे हमारे हुक्मरानों ने आजादी मिलने के बाद चुना था। दरअसल 1991 की बाट कोई नई नहीं थी। यह उसी राह का एक नया मोड़ था और शायद उसकी एक तार्किक परिणिति भी थी।
लातीनी अमरीका में जब बदलावों का दौर शुरू हुआ था तो भारतीय समाजवादी चिंतक किशन पटनायक ने टिप्पणी की थी कि इन बदलावों का भविष्य इस पर निर्भर करेगा कि वे विकास की कोई वैकल्पिक राह खोज पाते है या नहीं। शावेज, लूला, मोरालेस या किर्खनर को इसमें अभी तक आंशिक सफलता ही मिली है। यही चुनौती नेपाल की राजशाही को खत्म करने वाली जनक्रांति के सामने है और यदि भारत में कोई जनक्रांति होती है तो उसके सामने भी होगी।
यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि भारत जैसे तमाम देशों में आम जनता का मतलब करोड़ो की तादाद में किसान, मजदूर, पशुपालक, मछुआरे, कारीगर, घरेलू नौकर, फेरी-खोमचे-पटरी वाले, बेरोजगार नौजवान, विद्यार्थी, पैरा-शिक्षक, दलित व आदिवासी है जिनकी समस्याओं का कोई समाधान औद्योगिक-वित्तीय पूंजीवाद के मौजूदा ढ़ांचे में संभव ही नहीं है। पर्यावरण के बढ़ते संकट और जल-जंगल- जमीन पर बढ़ते हमलों से उपजे भारतीय जनता के संघर्षों का समाधान भी इस विकास पद्धति के अंदर नहीं है। अरब दुनिया की इस हलचल की शुरूआत ट्यूनीशिया के छोटे से कस्बे में एक शिक्षित बेरोजगार के आत्मदाह से हुई, जिसकी सब्जी-फल की दुकान को पुलिस ने उजाड़ दिया था। भारत में आज करोडों लोग इस तरह के हमलों को झेल रहे है। यहां भी जरूरत एक चिनगारी की है, बारूद का ढ़ेर तो तैयार है। किंतु इस चिनगारी को लोगो की गंभीर समस्याओं के हल का एक विश्वसनीय विकल्प भी दिखाना होगा।

विविधता व न्याय पर आधारित समाज
काहिरा के तहरीर चैक पर, सिकन्दरिया में या ट्यूनिस में तानाशाही को शिकस्त देने के लिए लोग धर्म, संप्रदाय, लिंग या वर्ग का भेद भूलकर जमा हुए थे। मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे संगठित इस्लामी दलों को भी अपने आग्रह छोड़कर बाकी लोगों के साथ आंदोलन में शामिल होना पड़ा। भारत जैसे विशाल देश में यह और बड़ी चुनौती है। यहां धर्म, संप्रदाय, जाति, कबीले, भाषा, प्रांतीयता के हजारों विभाजन हैं, जिनका बखूबी इस्तेमाल पहले गोरे अंग्रेजों ने और अब काले अंग्रेजों ने ‘फूट डालो और राज करो’ के लिए किया है। किंतु इसका इलाज सबको एक सांचे में ढ़ालने या बहुसंख्यकों की तानाशाही थोपने में नहीं है। इसके लिए तो विविधता की इज्जत व रक्षा करने वाले एक ऐसे बहुलतावादी भारत की कल्पना करनी होगी, जिसमें छोटे से छोटा समूह अपनी पहचान और अस्तित्व के प्रति आश्वस्त होकर बराबरी के साथ भाग ले सके तथा जिसमें जाति, भाषा, धर्म, लिंग, क्षेत्र या गांव-शहर के आधार पर भेद न हो। भारतीय आजादी आंदोलन के नेताओं की एक हद तक यही कल्पना थी। कई मायनों में आजादी के आंदोलन के अधूरे काम को पूरा करना नई जनक्रांति का काम होगा।
इसलिए मिस्त्र या ट्यूनीशिया (या नेपाल, वेनेजुएला, बोलीविया) को भारत में दुहराना है तो यह एक ज्यादा कठिन, ज्यादा बड़ा और ज्यादा चुनौतीपूर्ण काम है। किसी एक तानाशाह के बजाय यहां पूरी व्यवस्था को हटाने-बदलने का लक्ष्य लेकर चलना होगा और इसके लिए नया लोकतांत्रिक ढ़ांचा, वैकल्पिक विकास तथा विविधतापूर्ण-न्यायपूर्ण समाजरचना, इन तीन सूत्रों को सामने रखना होगा। इसमें टकराव सिर्फ राजा, तानाशाही या सेना से नहीं होगा, आधुनिक पूंजीवादी सभ्यता, साम्राज्यवाद व कट्टरपंथ से होगा। इसमें पश्चिमी उदारवादी किस्म के लोकतंत्र की स्थापना से आगे बढ़कर गांधी के स्वराज, लोहिया की सप्तक्रांति और जेपी की संपूर्ण क्रांति के लक्ष्य को सामने रखना होगा। उसमें अंबेडकर, फूले, कबीर, गिजुभाई आदि का भी मेल करना होगा।

मौका युग बदलने का
परिस्थितियां यहां भी परिपक्व है। जनता के सब्र का घड़ा यहां भी भर चुका है। मिस्त्र के उस युवा संग्रामी की तरह ‘बहुत हो गया, बहुत हो गया’ यहां भी सबके मन में है। उसकी तरह यहां भी हमें अपना खोया हुआ, छीना हुआ, देश वापस चाहिए, जिसे 30 नहीं, 60 सालों से बर्बाद किया गया है। भारत में आज 65 करोड़ आबादी 35 बरस से नीचे की उम्र की है, जिसकी आंखो में सपने हैं किंतु मन में कुंठाएं है। यह जरूर है कि यहां महज इंटरनेट, फेसबुक या ट्विटर से काम नहीं चलेगा। उनका सहारा लेते हुए भी भारत के गांवों, कस्बों और महानगरी झोपड़पट्टियों में रहने वाले करोड़ों स्त्री-पुरूषों को जगाने के लिए तथा उनके मन में उम्मीद का संचार करने के लिए उनके बीच में जाना होगा। मध्यम वर्ग की भूमिका होगी, किंतु असली परिवर्तनकारी ताकत नीचे होगी। देश के कई हिस्सों में चल रहे छोटे-छोटे आंदोलन यदि अपने संकीर्ण दायरे से बाहर निकलकर देश बदलने के लक्ष्य से जुड़ते है तो एक ताकत मिलेगी, फिर भी नाकाफी होगी। वैचारिक स्पष्टता और संकल्प के साथ कोई समूह आज आगे आता है और अगले दो बरस में भारत के कोने-कोने में पदयात्राओं, साईकिल यात्राओं आदि के जरिये कोई हलचल पैदा करता है तो शायद भारत का इतिहास बदल सकता है।
भारत, चीन और मिस्त्र दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। दुनिया की आबादी का करीब 40 फीसदी हिस्सा इन देशों में रहता है। पूंजीवाद के संकट के इस दौर में यदि इन की जनशक्ति ने अंगड़ाई ली, तो दुनिया में एक नए युग का पदार्पण हो सकता है। क्या आप इसकी आहट सुन पा रहे है ?



(ई-मेल: sjpsunil@gmail.com )

( लेख ,साभार : जनसत्ता :19फरवरी,2011)

लेखक समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और आर्थिक-राजनैतिक विषयों पर टिप्पणीकार है।

सुनील,
समाजवादी जन परिषद
ग्राम/पो. केसला, वाया इटारसी, जिला होशंगाबाद, (म.प्र.) पिन 461111
फोन: 09425040452

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‘महंगाई पर बैठक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंची’ (द हिन्दू, इकॉनॉमिक टाईम्स 12 जनवरी 2011), दो दिन तक मैराथन मंथन, नतीजा सिफर’ (पत्रिका, 14 जनवरी 2011)

जनवरी 2011 के दूसरे सप्ताह में अखबारों में इस तरह की खबरें थी। पहले 11 जनवरी को प्रधानमंत्री की वरिष्ठ मंत्रियों के साथ महंगाई पर काबू पाने के लिए बैठक हुई। डेढ घंटे चली इस बैठक में प्रधानमंत्री के अलावा कृषि एवं खाद्य मंत्री शरद पवार, वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी, गृहमंत्री पी.चिदंबरम, योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया, सरकार के आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु आदि मौजूद थे। किंतु यह बैठक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाई। इसके बाद अगले दो दिनों तक प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री की कई मंत्रियों, विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों के साथ चर्चा चली। अंत में एक कार्य-योजना घोषित की गई, किंतु उसमें भी कुछ विशेष नहीं था। मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु की अध्यक्षता में महंगाई की समीक्षा के लिए एक मंत्रिमंडलीय समूह और बना दिया गया।
आखिर बात क्या है ? देश की जनता जिस महंगाई की मार से त्राहि-त्राहि कर रही है, उस पर सरकार इतनी लाचार, निष्क्रिय और दिशाहीन क्यों दिखाई दे रही है? जबकि यह महंगाई कोई नयी तात्कालिक मुसीबत नहीं है। पिछले दो-तीन सालों से इसकी मार पड़ रही है। प्रधान मंत्री, वित्तमंत्री, कृषि एवं खाद्य मंत्री और सरकार में बैठे विशेषज्ञ बार-बार दिलासा देते रहे कि यह कुछ महीनों में काबू में आ जाएगी। (देखे ब~क्स में उनके बयान) लेकिन ये सारी दिलासाएं झूठी निकली। जिस सरकार का प्रधानमंत्री एक चोटी का अर्थशास्त्री हो, वित्तमंत्री बहुत अनुभवी और पुराना मंत्री हो, जिसको लगातार कई अर्थशास्त्रियों और विशेषज्ञों की उच्च कोटि की सलाहें मिल रही हो, वैश्विक वित्ती संकट के दौरान अर्थव्यवस्था के कुशल प्रबंधन तथा ऊंची वृद्धि दर हासिल करने के कारण जिस सरकार की पूरी दुनिया में सराहना हो रही हो, वह महंगाई के मुद्दे पर अंधे की तरह रास्ता टटोलती, ‘धूल में लठ मारती’ या साफ बात करने से मुंह चुराती क्यों नजर आ रही है ?
जब से मनमोहन सिंह भारत के प्रधानमंत्री बने है, कई भोले लोगों को भरोसा हो गया था कि अब देश की कमान एक काबिल, ईमानदार और आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ व्यक्ति के हाथ में पहुंच गई है। (कुछ लोग अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में ऐसा ही भ्रम पाले थे)। लेकिन फिर भी देश की जनता की मुश्किलें क्यों बढ़ती जा रही है ? एक लातीनी अमरीकी देश के बारे में पिछली सदी के पचास के दशक में जो टिप्पणी की गई थी, वह आज के भारत पर सटीक बैठती है – ‘देश की अर्थव्यवस्था तो बहुत अच्छी है, किंतु जनता की हालत अच्छी नहीं है।’ आखिर क्यों ? आइए, इन सवालों का जवाब महंगाई के संदर्भ में खोजने की कुछ कोशिश करते हैं।
सरकारी सफाई और अर्ध सत्य
पिछले साल तक महंगाई की समस्या को तात्कालिक बताने और समस्या ही मानने से इंकार करने के बाद, अब सरकारी प्रवक्ताओं ने महंगाई के जो कारण गिनाने शुरू किए है, वे इस प्रकार है –
1. विकास के कारण लोगों की आमदनी और क्रयशक्ति बढी है, जिससे मांग व महंगाई बढ़ रही है। जब अर्थव्यवस्था में विकास होगा, तो कुछ महंगाई स्वाभाविक है।
2. मौसम की मार से व प्राकृतिक प्रकोप से फसलों का नुकसान हुआ है और अभाव पैदा हुआ है। इस पर सरकार का कोई बस नहीं है।
3. किसानों को बेहतर समर्थन-मूल्य देने के कारण महंगाई बढ़ी है।
4. जमाखोरों और बिचैलियों के कारण कीमतें बढ़ी है। राज्य सरकारें उन पर समुचित कार्यवाही नहीं कर रही है।
5. पूरी दुनिया में कीमते बढ़ रही है। उसका असर भारत पर भी पड़ना लाजमी और स्वाभाविक है।
इन सारी बातों में कुछ सत्य का अंश हो सकता है। किंतु वह आंशिक सत्य या अर्ध सत्य है, जिसका उपयोग चालाकी से लोगो को गुमराह करने के लिए किया जा रहा है। जिस तरह के द्वन्द्व बताए जा रहे है जैसे ‘विकास बनाम कीमत-नियंत्रण’ या ‘किसान बनाम उपभोक्ता’, वे नकली द्वन्द्व है। यह कहा जा सकता है कि जिस विकास के साथ इतनी भीषण महंगाई आए और आम लोगो का जीना मुश्किल कर दे, वह सही मायने में विकास ही नही है। लोगो की वास्तविक आमदनी व क्रयशक्ति बढने की बात भी विश्वसनीय नहीं है, क्योंकि अभी पांच साल पहले तो अर्जुन सेनगुप्ता की अध्यक्षता वाले एक सरकारी आयोग ने बताया था कि देश के 77 प्रतिशत लोग 20 रू. रोज से नीचे गुजारा कर रहे है। दूसरी सरकारी (तेंदूलकर) कमेटी ने माना है कि देश के 42 प्रतिशत लोग घोर गरीबी में जीवन यापन कर रहे है। फिर भी यदि मान लिया जाए कि आम जनता की क्रयशक्ति व मांग कुछ बढी है तो उस मांग को पूरा करने की तैयारी एवं व्यवस्था क्यों नही है ? यह बढ़ी हुई मांग पूरी होने के बजाय कीमतों में बढ़ोत्तरी को क्यों जन्म दे रही है ?
असली झगडा
दसअसल क्रयशक्ति बढ़ी है, किंतु ऊपर के लोगों की। देश में गैरबराबरी तेजी से बढ़ रही है और ऊपर के थो्ड़े से भारतीयों की आमदनी में तेजी से इजाफा हुआ है। यदि ‘भारत बनाम इंडिया’ की भाषा में बात करें तो ‘इंडिया’ की बढ़ती हुई क्रयशक्ति ने देश के संसाधनों को अपनी ओर खींचा है, जिससे ‘भारत’ की बुनियादी जरूरत की वस्तुओं का उत्पादन पर्याप्त मात्रा में नहीं बढ़ रहा है। इसीलिए देश में दालों, अनाज, खाद्य तेल, सब्जियों, दूध आदि का उत्पादन जरूरत के मुताबिक नहीं बढ़ रहा है किंतु दूसरी ओर विलासिता की वस्तुओं का उत्पादन तेजी से छलांगें लगा रहा है। वर्ष 2010 में कारों की बिक्री 25 से 30 फीसदी बढी है और कारों के नित नए मॉडल निकल रहे है। किंतु देश में साईकिलों का उत्पादन कम हो रहा है। पूरी दुनिया की बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत की ओर लपक रही है और अच्छे मुनाफे कमा रही है। मिसाल के लिए जनवरी में सौन्दर्य प्रसाधन सामग्री की दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी ‘लॉरियल’ का फ्रांसीसी मालिक भारत आया तो उसने एक साक्षात्कार में बताया कि भारत में उनकी बिक्री 1000 करोड़ रू. तक पहुंच चुकी है और सालाना 30 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। भारत उनकी प्राथमिकताओं में है। बहुत जल्दी भारत उनके दस बडे बाजारों में होगा तथा 10-15 सालों में पांच सर्वोच्च बिक्री क्षेत्रों में एक हो जाएगा। (टाईम्स ऑफ इंडिया 17 जनवरी 2011) यह है ‘इंडिया’ की बढती हुई ताकत जो ‘भारत’ के मुंह का निवाला भी छीन रही है। आखिर किसी भी देश के संसाधन तो सीमित होते हैं। उन्हें चाहें विलासिता सामग्री के उत्पादन में झोंक दे, चाहें आम जरूरत की वस्तुओं के उत्पादन में लगा दें। यह है असली द्वन्द्व, जिसकी चर्चा प्रणब मुखर्जी, मनमोहन सिंह या मोंटेक सिंह नही करते है। महंगाई एक तरह के पुनर्वितरण का काम भी करती है। इससे साधारण लोग ज्यादा प्रभावित होते है। यदि उनकी मौद्रिक आय बढती भी है, तो उसे दूसरी जेब से निकालने का काम महंगाई करती है। यह शायद मनमोहन-मोंटेक छाप विकास के लिए जरूरी है।
भारतीय खेती का संकट
इसी तरह जब महंगाई का दोष प्राकृतिक प्रकोप या मौसम की मार पर मढ़ा जाता है, तो क्या यह आजादी के बाद हुए पूरे कृषि विकास पर सवाल नहीं खड़ा करता है ? यह कैसा विकास है कि आज भी खेती किसान और देश के लिए ‘मानसून का जुआ’ बनी हुई है या चाहे जब कीटों के प्रकोप का शिकार बन जाती हैं महंगाई के मौजूदा दौर में सबसे ज्यादा खाद्य पदार्थो की कीमतें बढ़ी है और इसका सीधा संबंध भारतीय खेती के मौजूदा संकट से है। यह संकट पिछले पंद्रह वर्षो से किसानों की निरंतर आत्महत्याओं और अन्य रूपों में प्रकट हो रहा है। सरकार ने न केवल इस संकट के बुनियादी कारणों को दूर करने की कोई कोशिश नहीं की, बल्कि अपनी नीतियों और अपने कामों से इस संकट को और घना किया है। इस संदर्भ में निम्न तथ्य और प्रवृतियां नोट की जानी चाहिए –
1. पिछले 20 वर्षो में देश में कृषि भूमि में काफी कमी आई है, जिसका मुख्य कारण बांधों, कारखानों, एसईजेड, टाउनशिप, शहरी विस्तार, राजमार्गों आदि में बडे पैमाने पर खेती की जमीन का हस्तांतरण है। वर्ष 1990-91 और 2007-08 के बीच खेती के रकबे में 21.4 लाख हेक्टेयर की कमी हुई है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भूमि एक ऐसी चीज है, जिसकी आपूर्ति नहीं बढाई जा सकती। जंगलों व चरागाहों को साफ करके खेत बनाने की प्रक्रिया पिछली दो शताब्दियों से चल रही थी, उसकी भी सीमा आ चुकी है।
2. जमीन को सिंचित करके और उस पर साल में एक की जगह दो या तीन फसलें लेकर भी कृषि उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। किंतु उसकी भी सीमाएं व समस्याएं दिखाई दे रही है। सरकार सिंचाई क्षमता निर्माण (इरिगेशन पोटेन्शियल) की प्रगति के आंकडे देती है किंतु वास्तविक सिंचाई उससे काफी कम होती है। उदाहरण के लिए, यह बताया गया कि कुल सिंचाई क्षमता दसवीं पंचवर्षीय योजना के अंत में मार्च 2007 तक 10.28 करोड हेक्टेयर हो गई, किंतु वास्तव में केवल 8.72 करोड हेक्टेयर की ही सिंचाई हो रही थी। सिंचाई में वृद्धि की दर भी कम हो गई है। दरअसल बडे व माध्यम बांधो की परियोजनाओं पर काफी खर्च के बावजूद नहरों से सिंचित क्षेत्र में कमी आ रही है। कुंओं-ट्यूबवेलों से सिंचाई बढ रही है किंतु इनके अति-दोहन के कारण भू-जल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है। इससे भी सिंचाई महंगी और अनिश्चित हो रही है।
3. भारत की विभिन्न फसलों की उत्पादकता, यानी प्रति एकड उपज में हरित क्रांति के दौर में जो वृद्धि हो रही थी, पिछले डेढ- दो दशकों से वह रूक गई है और उसमें ठहराव आ गया है। आर्थिक समीक्षा 2007-08 के मुताबिक धान, गेहूं, सरसों-रायडा, मूंगफली और मक्का की नयी किस्मों से प्रति एकड पैदावार में 1995-96 के पहले तो हर साल वृद्धि हो रही थी, किंतु उसके बाद यह शून्य रह गई है। कई मायनों में हरित क्रांति की हवा निकल गई है और उसके दुष्परिणाम नजर आ रहे हैं। जमीन की उर्वरकता कम हो रही है तथा उतनी ही पैदावार लेने के लिए किसानों को ज्यादा रासायनिक खाद का इस्तेमाल करना पड रहा है। कीट-प्रकोप भी बढ रहा है तथा कीटनाशकों का इस्तेमाल व खर्च बढता जा रहा है। सरकार की उदारीकरण-विनियंत्रण की नीति के कारण बिजली, डीजल, खाद, पानी की लागतों में भी बढोत्तरी हो रही है।
4. भारत में प्रति व्यक्ति खाद्यान्न (अनाज-दालें) उपलब्धता 1991 तक तो बढ रही थी किंतु उसके बाद में लगातार कम हो रही है। दालों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता तो 1959 से ही कम होना शुरू हो गई थी, क्योंकि दालों की जगह दूसरी फसलों ने लेना शुरू कर दिया था। उसके बाद 1991 से प्रति व्यक्ति अनाज उपलब्धता भी गिरना शुरू हो गई। 1991 में देश में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 468.5 ग्राम अनाज उपलब्ध था जो 2008 में 374.6 ग्राम रह गया।
मुक्त व्यापार की मार
5. दरअसल वैश्वीकरण के ताजे दौर में सरकार ने खाद्य-स्वावलंबन का लक्ष्य छोड दिया है। कृषि के विविधीकरण के नाम पर खाद्यान्न फसलों की जगह व्यापारिक फसलों की खेती पर जोर दिया गया। इनमें भी जिनका निर्यात हो सकता था, उनको ज्यादा बढावा दिया गया। सरकार का कहना था कि खाद्यान्न की कमी होगी तो बाहर से सस्ती दरों पर आयात कर लेंगे, क्योंकि तब अंतरराष्ट्रीय बाजार में उनकी कीमतें कम चल रही थी। किंतु पिछले चार-पांच सालों से दुनिया के बाजार में कीमतें बढ़ जाने से पासा उलट पड गया। इतना ही नही, हमारे ‘विद्वान-विशेषज्ञ’ नीति निर्धारक एक सीधी सी बात भूल गए कि भारत एक विशाल देश है और आयातों द्वारा इसकी जरूरतें पूरा करना आसान नहीं है। अक्सर हमारे आयातों की मांग से ही दुनिया के बाजार में कीमतें चढ जाती है। तीन साल पहले गेंहूं के मामले में ऐसा ही हुआ। स्वावलंबन के अलावा हमारे पास कोई विकल्प नहीं है, किंतु सरकारें उल्टी राह पर चल रही है। भारत 1993 के करीब खाद्य तेलों में करीब-करीब आत्मनिर्भर हो गया था और अपनी जरूरत का केवल 3 प्रतिशत आयात कर रहा था। किंतु इसी नीति के कारण आज वह आधे के करीब खाद्य तेल आयात करता है। दूसरी ओर, पिछले सालों में भारत से कृषि उपज का निर्यात भी काफी बढा है (देखे तालिका 1)। बासमती चावल, चीनी, काजू, तंबाकू, मांस, मछली, फल, सब्जियों आदि कई वस्तुओं के निर्यात में भारी बढोत्तरी हुई है। इससे भी देश के अंदर अभाव की स्थिति पैदा हुई है। अमीर विदेशियों की क्रयशक्ति ज्यादा होने के कारण वे भारत की वस्तुओं और भारत के संसाधनों को गरीब भारतवासियों से छीन लेते है। ‘मुक्त व्यापार’ का यही मतलब है। पिछले दिनों प्याज संकट के पीछे प्रमुख कारण फसल खराब होने के बावजूद प्याज का भारी निर्यात करने की प्रवृत्ति रही है। (देखे तालिका 2) ऐसा ही पहले चीनी के मामले में भी हुआ था। कई बार तो पहले सस्ता निर्यात करके बाद में महंगा आयात किया गया है। यह एक आत्मघाती नीति है। किंतु विश्व व्यापार संगठन के चक्कर में, मुक्त व्यापार तथा ‘निर्यातोन्मुखी विकास’ की विचारधारा के तहत, एक ओर देश का खाद्य-स्वावलंबन नष्ट किया जा रहा है, दूसरी तरफ सीमित भूमि व देश के संसाधनों को देश की जनता की जरूरतों को पूरा करने के बजाय विदेशियों की विलासिता पूर्ति में लगाया जा रहा है।
कुल मिलाकर, महंगाई महज मौसम की गडबडी का नतीजा नहीं है। महंगाई के ताजा दौर का सीधा रिश्ता भारतीय खेती के गंभीर संकट से है जो सरकार द्वारा खेती की उपेक्षा कृषि विरोधी व किसान-विरोधी नीतियों दोषपूर्ण टेक्नोलॉजी, वैश्वीकरण की नीतियों आदि का नतीजा है। इस नजरियें से, भारत के किसान की बेहतरी और उपभोक्ताओं को सस्ती चीजे मिलने में कोई विरोध नहीं है। बल्कि खेती के संकट को बुनियादी रूप से हल करने पर ही महंगाई का संकट स्थायी रूप से दूर हो सकेगा।
इस बुनियादी संकट और अपनी नीतियों के गुनाह को छिपाने के लिए ही सरकार महंगाई का दोष जमाखोरों, बिचैलियों और सटोरियों पर मढ देती है। कीमतें बढ़ने में उनकी भूमिका निश्चित ही रहती है किंतु वे भी अपना खेल तभी ज्यादा कर पाते है जब अभाव की हालातें बनती है। इसलिए अभाव पैदा होने के दीर्घकालीन कारणों को दूर किए बगैर महज उनको दोष देना असली अपराधियों को बचाने जैसा ही है।
फिर स्वयं केन्द्र सरकार की नीतियां जमाखोरी, सट्टा और बिचैलियों को बढाने की रही है। उदारीकरण के दौर में सरकार ने लगातार उनके उपर नियंत्रण के नियमों व कानूनों (जैसे स्टॉक की सीमा, अनिवार्य वस्तु कानून, चीनी पर नियंत्रण आदि) को शिथिल करने का प्रयास किया है और अभी भी कर रही है। जब महंगाई को लेकर ज्यादा हाय-तौबा मचती है तो स्टाक सीमा कम करके व कुछ छापे मारकर रस्म-अदायगी कर ली जाती है। बाद में वही ढर्रा शुरू हो जाता है।
कृषि उपज का कानूनी सट्टा
इतना ही नही सरकार तमाम कृषि उपजों के ‘वायदा बाजार’ को बहुत तेजी से बढावा दे रही है। सोने-चांदी का वायदा कारोबार तो ठीक है लेकिन गेहूं, चना, दालों, सोया-तेल, चीनी, मसालों, आलू आदि अनेक खाद्य-वस्तुओं को वायदा बाजार के दायरे में लाया जा चुका है। कृषि उपज के वायदे सौदों का कुल मूल्य 2008 के मुकाबले 48 प्रतिशत बढकर 2009 में 10.88 लाख करोड रू. हो चुका था। वायदा बाजार मुंबई व अहमदाबाद में स्थित वे इलेक्ट्रानिक विनिमय केन्द्र हैं जहां रोज करोड़ों-अरबों के सौदे कीमतों में उतार-चढाव से फायदा उठाने के मकसद से होते हैं। यह एक तरह का कानूनी सट्टा है और इसमें बडे-बडे सट्टेबाज बिना कुछ किए करोडो का वारा-न्यारा कर लेते है। इन्हीं के कारण कीमते एकाएक बढ जाती है। सरकार में बैठे इनके समर्थक दलील देते है कि वायदा बाजार से कीमतें नहीं बढ़ती, बल्कि उनमें स्थिरता आती है। यदि ऐसा है तो जब गेहूं, चना, चीनी, आलू आदि की कीमतें बहुत बढने लगती है तो सरकार इनके वायदा कारोबार को क्यों रोक देती है ? सवाल यह भी है कि वायदा कारोबार में कमाए जा रहे अरबों-खरबों रूपए आखिर कहां से आ रहे है ? क्या यह राशि किसानों और उपभोक्ताओं के बीच का मार्जिन नहीं बढ़ाएगी और  सुपर-बिचैलियों के इस धंधे को बढावा देने वाली सरकार किस मुंह से दूसरे छोटे बिचैलियों पर अंकुश लगाएगी ?
छोटे नहीं, बडे बहुराष्ट्रीय बिचैलिये चाहिए
इसी तरह, पिछले काफी समय से सरकार कृषि मंडियों को और कृषि उपज मंडी कानून को समाप्त करने पर तुली है। महंगाई के संदर्भ में भी फिर से उसी चर्चा को आगे बढाया जा रहा है। दलील यह दी जा रही है कि भारत में किसान से लेकर उपभोक्ता तक के बीच कीमतों में काफी फर्क है। भारत की कृषि मंडिया भी स्थानीय व्यापारियों के एकाधिकार का अड्डा बन गई है। सब्जियां, फल, मछली, मांस आदि के बीच में सड़ने व खराब होने से काफी, नुकसान भी होता है। उनके पर्याप्त भंडारण, प्रशीतन और प्रसंस्करण की समुचित व्यवस्था नहीं है। इसलिए इस क्षेत्र में बडी-बडी निजी कंपनियों के पूंजी निवेश को बढावा देना चाहिए और कृषि उपज मंडी कानून जैसे कानून उसमें बाधक है, क्योंकि इस कानून में मण्डी के बाहर किसानों से खरीदी करने पर रोक है। इसी दलील को आगे बढाते हुए अचानक भारत में खुदरा व्यापार में विदेशी कंपनियों को छूट देने की बात फिर से चल पडी है। कहा जा रहा है कि इससे बिचैलियों की संख्या में कमी आएगी। एक ब्रान्ड की खुदरा दुकानें खोलन, थोक व्यापार और कोल्ड स्टोर्स खोलने की इजाजत विदेशी कंपनियों को पहले ही दी जा चुकी है। अब अपने ब्रान्ड के अलावा हर तरह की वस्तुओं के खुदरा व्यापार में विदेशी पूंजी को इजाजत देने की मुहिम शुरू हो गई है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पिछले वर्ष ही इस की चर्चा चलाई थी। हाल ही में फिर से महंगाई का हवाला देते हुए इसके लिए एक कैबिनेट नोट तैयार किया जा रहा है। मजे की बात तो यह है कि विश्व बैंक, कंपनियां, योजना आयोग, केन्द्रीय मंत्री सभी ने एक ही भाषा और एक ही स्वर में एक ही राग अलापना शुरू कर दिया है। विश्व बैंक के अध्यक्ष इस बीच भारत दौरे पर आए तो उन्होने भी खुदरा क्षेत्र को विदेशी पूंजी के लिए खोलने और वायदा बाजार के पक्ष में दलीलें दी। (द टाईम्स ऑफ इंडिया, द क्रेस्ट एडिशन, 22 जनवरी 2011)। भारतीय पूंजीपतियों के संगठनों – फिक्की और सीआईआई – ने भी इसी तरह के बयान जारी किए है। योजना आयोग के एक सदस्य सौमित्र चैधरी ने मंडी कानून पर हमला करते हुए एक अंग्रेजी अखबार में लेख लिखा कि महंगाई का एक ही ईलाज है कि खुदरा व्यापार में कंपनियों को आगे लाया जाए। (इकानॉमिक टाईम्स, 20 जनवरी 2011)। कैसे वैश्वीकरण की नवउदारवादी नीतियों से उपजे संकटों को भी उन्हीं नीतियों के एजेण्डे को और आगे बढाने के लिए चालाकी से इस्तेमाल किया जाता है, उसका यह बढिया उदाहरण है।
इसमें शक नही है कि भारत में मौजूदा हालत में किसानों और उपभोक्ताओं के बीच में कीमतों में भारी खाई है, बिचैलियों की काफी कमाई है तथा कृषि उपज मंडियों में किसानों का शोषण होता है। किंतु सवाल यह है कि सुझाए जा रहे कदमों से यह हालत सुधरेगी या बिगडेगी ? कुल मिलाकर, इन कदमों से इतना ही होगा कि भारत के कृषि उपज व्यापार, खाद्य- व्यापार और खुदरा व्यापार में चंद बड़ी देशी-विदेशी कंपनियों का वर्चस्व कायम होगा। यानी सरकार लाखों छोटे बिचैलियों की जगह चंद बड़े देशी कार्पोरेट एवं बहुराष्ट्रीय बिचैलियों को स्थापित करना चाहती है। खेत से लेकर गोदाम, प्रसंस्करण, थोक और खुदरा व्यापार तक चंद ताकतवर कंपनियों का वर्चस्व क्या ज्यादा नुकसानदेह व खतरनाक नहीं होगा ? किसानों और उपभोक्ताओं दोनो का शोषण करने की ताकत क्या उनकी ज्यादा नहीं होगी ? ज्यादा प्रशीतन, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, वातानुकूलन, महंगे ‘माॅल’ और उससे जुडे विज्ञापन आदि पर खर्च बढेगा, तो उससे वस्तुएं सस्ती होगी या और महंगी होगी ? इस बात का भी जवाब देना होगा कि पहले से देश में ‘माल’ संस्कृति आने और सब्जियों-फलों-अनाज आदि में रिलायन्स, आईटीसी, भारती मित्तल जैसी बडी कंपनियों के कूदने से महंगाई या बीच के मार्जिन पर नियंत्रण में क्या मदद मिली ?
दसअसल बिचैलियों की समाप्ति या नियंत्रण के लिए उल्टी दिशा में जाना होगा। एक तरफ विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था बनाकर, स्थानीय जरूरत के लिए आसपास के इलाके में उत्पादन को बढ़ावा देकर, किसान व उपभोक्ता के बीच की दूरी कम करना होगा। दूसरी तरफ, किसानों व उपभोक्ताओं की सहकारिता को बढावा देना होगा। साथ ही समाजवादी नेता डा.राममनोहर लोहिया की ‘दाम बांधो’ नीति के अनुरूप खेत या कारखाने से लेकर अंतिम उपभोक्ता तक के बीच के मार्जिन की सीमा तय करनी होगी। इसे पूरी तरह बाजार के हवाले छोड़ना खतरनाक है।
सरकार की यह दलील भी विचित्र है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने से उनका असर भारत पर पड रहा है। यदि ऐसा है तो फिर भारतीय अर्थव्यवस्था को विदेश व्यापार एवं विदेशी पूंजी के लिए खोलने, अंतरराष्ट्रीय बाजार के साथ एकाकार करने और स्वावलंबन को समाप्त करने की हड़बड़ी क्यों की गई ? और इस बारे में पहले से दी जा रही चेतावनियों को नजर अंदाज क्यों किया गया ? क्या कम से कम अब इससे सबक लेंगे ?
इलाज-पढाई की महंगाई
आमतौर पर महंगाई की चर्चा वस्तुओं के दामों के संदर्भ में ही होती है। किंतु इधर सेवाओं की महंगाई भी तेजी से बढी है। खासतौर पर शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकारी व्यवस्थाओं को जानबूझकर बिगाडने तथा निजी स्कूलों – अस्पतालों के बाजार को बढ़ावा देने का काम बाजारवादी सोच के तहत सुनियोजित तरीके से हो रहा है। इससे शिक्षा और इलाज दोनो काफी महंगे हुए है। यदि इनमें महंगाई की दर निकाली जाएगी तो वह सालाना 30 – 40 फीसदी से कम नही होगी। दवाओं की कीमतें भी तेजी से बढी है जिसका प्रमुख कारण दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण कम करना और विश्व व्यापार संगठन के तहत नए पेटेन्ट कानून को लागू करना है।
सरकार का नवउदारवादी एजेण्डा पेट्रोल की कीमतो में भी दिखाई देता है। पेट्रोल के विनियंत्रण के 9 महीने में सात बार इसकी कीमतें बढाई गई है। हर बार इससे पूरी अर्थव्यवस्था में  कीमतों में बढोत्तरी का नया चक्र शुरू होता है। यह सही है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में खनिज तेल की कीमते काफी बढी है किंतु क्या तेल के अंतरराष्ट्रीय सट्टे बाजार में हर उतार-चढाव का असर भारत के करोडो उत्पादकों, उपभोक्ताओं व सेवा-प्रदाताओं को भोगना पडेगा ? तब उनकी रोजी-रोटी, उनकी जिन्दगियों और भारतीय अर्थव्यवस्था को कितने झटके बार-बार झेलने पडेंगे ? इन झटकों से बचाने की व्यवस्था क्यों नही हो सकती है ? दरअसल सवाल इंडियन आईल, हिन्दुस्तान पेट्रोलियम या ‘तेल व प्राकृतिक गैस आयोग’ जैसी सरकारी कंपनियों के घाटे या मुनाफे का नही है। असली बात तो यह है कि सरकार ने इन कंपनियों के शेयर बेचने और उससे कमाई करने का लक्ष्य पिछले बजट में रखा था। कंपनियो को घाटा दिखाई देने पर उनके शेयर ठीक से नहीं बिकेंगे। यह सरकार की असली चिंता है।
इसीसे महंगाई के इस संकट और भारतीय जनजीवन के अन्य संकटों को समझने का सूत्र मिलता है। भारत सरकार और उससे जुडे लोगो की चिंता और ध्यान शेयर बाजार के सूचकांक पर केन्द्रित है, खुदरा कीमतों के सूचकांक में वृद्धि की परवाह उन्हें नहीं है। वैसे भी अनाज, दाल, प्याज या तेल की कीमते चाहे 100 – 200 प्रतिशत बढ जाए, उनको कोई फर्क नहीं पडता। उनका पूरा प्रयास राष्ट्रीय आय की वृद्धि दर को ऊंचा बनाए रखने पर भी है जिसके लिए देशी-विदेशी पूंजी व अमीरों की मिजाजपुर्सी एवं हितचिंता आम जनता से ज्यादा महत्वपूर्ण है। वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी ने पिछले वर्ष यह कहकर इस बात को उजागर भी कर दिया था कि वे ‘विकास’ की कीमत पर महंगाई रोकने के पक्ष में नहीं हैं। इस विकास के साथ मंहगाई, बेरोजगारी, गरीबी, कुपोषण, भ्रष्टाचार और आम जनता के कष्टों का बढना शायद एक ही सिक्कें के दो पहलू है। यह भी कह सकते है कि यह पुराने बंटवारें का ही एक नया निर्दयी दौर है, जिसमें इंडिया के हिस्से में विकास आता है और भारत के हिस्से में महंगाई, वंचना, अभाव और कष्ट आ रहा है और इसी सच में महंगाई समस्या के प्रति भारत सरकार की निष्क्रियता उदासीनता, लाचारी और किंकर्तव्यविमूढता का राज छिपा है।
(ई-मेल:  sjpsunil@gmail.com

लेखक समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और आर्थिक-राजनैतिक विषयों पर टिप्पणीकार है।

सुनील, ग्राम/पो. केसला, वाया इटारसी, जिला होशंगाबाद, (म.प्र.) पिन 461111
फोन: 09425040452
बाॅक्स
मंहगाई पर सरकारी बयान

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह

जुलाई 2009: भारत की महंगाई दर दिसंबर 2009 तक नीचे 6 प्रतिशत तक आ जाएगी, क्योंकि सामान्य मानसून से खाद्य कीमतें कम हो जाएगी।
फरवरी 2010: मैं समझता हूं कि खाद्य-महंगाई में बुरे दिन अब बीत चले है। हाले के सप्राहों में खाद्य कीमतें नरम पड गई है और उम्मीद करता हूं कि यह प्रक्रिया जारी रहेगी। (महंगाई पर विचार करने के लिए बुलाई गई मुख्यमंत्रियों की बैठक में)
जुलाई 2010:    महंगाई की वर्तमान ऊंची दर मुख्य रूप से खाद्य कीमतों में वृद्धि के कारण है। सरकार ने महंगाई को काबू करने के लिए कई कदम उठाए है। हम उम्मीद करते हैं कि दिसंबर तक थोक कीमतों में महंगाई की दर 6 प्रतिशत तक नीचे आ जाएगी।
20 जनवरी 2011: मैं कोई ज्योतिषी नहीं हूं। लेकिन मुझे भरोसा है कि कीमतों की स्थिति काबू में आ जाएगी। ………मार्च तक हम कीमतों में स्थिरता ला पाएंगे।

वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी

सितंबर 2009: हमें खाद्यान्नों की उपलब्धता के बारे में ज्यादा चिंतित होने की जरूरत नही है।
मई 2010: महंगाई के बारे में हम जागरूक है, किंतु मैं इस विषय में भगदड या डर नहीं पैदा करना चाहता (आई एम नाॅट प्रेसिंग द पेनिक बटन)।
अगस्त 2010: यदि ब्याज दरों को बहुत बढा दिया तो कोई पूंजी निवेश नहीं होगा कोई विकास नही होगा। ………. यदि मैं मेरे आर्थिक विकास में समझौता कर लूं, तब तो मैं निश्चित ही महंगाई पर काबू पा सकूंगा।
13 जनवरी 2011: महंगाई को लेकर घबराने की जरूरत नही है। सरकार के लिए खासी परेशानी पैदा कर रही खाद्य पदार्थो की महंगाई दर नीचे आ गई है।

योजना आयोग उपाध्यक्ष, मोंटेक सिंह अहलूवालिया

अप्रैल 2010: भारत की महंगाई दर दो या तीन महीनों में गिर सकती है।
जुलाई 2010: वर्ष के अंत तक भारत की महंगाई दर ‘आरामदेह स्तर’ पर लौट सकती है।
अगस्त 2010: महंगाई की दर में कमी हो रही है और दिसंबर तक यह आरामदेह हो जाएगी। ……… हम जो कह रहे थे वैसा ही हो रहा है।

भारतीय रिजर्व बैंक डिप्टी गवर्नर, सुबीर गोकर्ण

जून 2010: जो खाद्य महंगाई दर पिछले नवंबर से 15 प्रतिशत से ऊपर बनी हुई है, वह इस साल की सामान्य वर्षा से कम हो जाएगी।
अगस्त 2010: हमारा ख्याल है कि हमने महंगाई का प्रबंध करने के लिए काफी कुछ किया है और हम इस वर्ष के दूसरे हिस्से में इसका असर देखेंगे, क्योंकि किसी भी कार्रवाई का असर होने में कुछ समय लगता है।

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[ स्कूल के दौरान ही सुनील को गाँधीजी की आत्मकथा मिली थी और वे उससे प्रभावित हुए थे। मध्य प्रदेश बोर्ड की परीक्षा में मेरिट सूची में स्थान पाने के बाद एक छोटे कस्बे से ही उन्होंने स्नातक की उपाधि ली। देश के अभिजात विश्वविद्यालय माने जाने वाले – जनेवि में दाखिला पाया । विद्यार्थी जीवन में ही लोकतांत्रिक समाजवाद में निष्ठा रखने वाले युवजनों की जमात से जुड़ गये । जलते असम और पंजाब के प्रति देश में चेतना जागृत करने के लिए साइकिल यात्रा और पदयात्रा आयोजित कीं । समता एरा और सामयिक वार्ता के सम्पादन से जुड़े रहे तथा दर्जनों पुस्तकें लिखीं और सम्पादित की। जनेवि में हरित क्रांति के प्रभावों पर पीएच.डी का काम छोड़ मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के केसला प्रखण्ड के किसान-आदिवासियों को संगठित करने में जुट गये ।गत पचीस वर्षों से उस क्षेत्र को वैकल्पिक राजनीति का सघन क्षेत्र बनाया है। दर्जनों बार जेल यात्राएं हुईं -सरकार द्वारा थोपे गये फर्जी मुकदमों के तहत । प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय आबादी के हक को लेकर सफल नये प्रयोग किए । देश में नई राजनैतिक ताकत की स्थापना के लिए समाजवादी जनपरिषद नामक दल की स्थापना करने वालों में प्रमुख रहे। माओवादी राजनीति की बाबत गंभीर अंतर्दृष्टि के साथ लिखा गया यह लम्बा लेख एक नई दिशा देगा। आज के ’जनसत्ता’ से साभार ।- अफ़लातून ]

सुनील

दंतेवाड़ा ने देश को दहला दिया है। यह साफ है कि दंतेवाड़ा,लालगढ़, मलकानगिरि जैसे कुछ आदिवासी इलाकों में माओवादियों ने अपने आजाद क्षेत्र बना लिये हैं, आदिवासियों का ठोस समर्थन और आदिवासी युवा उनके साथ हैं तथा वे पूरी तैयारी और सुविचारित रणनीति के साथ अपना युद्ध लड़ रहे हैं।

6 अप्रैल को दंतेवाड़ा में अभी तक की पुलिस व अर्धफौजी बलों की सबसे बड़ी क्षति हुई है। इस घटना की प्रतिक्रिया में रस्मी तौर पर बयान आ रहे हैं और तलाशी अभियान चल रहे हैं। कई बेगुनाहों को इस चक्कर में पकड़ा, मारा या सताया जाएगा। हिंसा और अत्याचारों का दौर दोनों तरफ चलता रहेगा। लेकिन इससे कुछ नहीं निकलेगा। हालात और बिगडे़गी। वक्त आ गया है कि जब देश गंभीरता से विचार करे कि ये हालातें क्यों पैदा हुई, माओवादियों का इतना जनाधार कैसे बढ़ा, सरल और शांतिप्रिय आदिवासी मरने व मारने पर क्यों उतारु हुए ? इस हिंसा की जड़ में क्या है ?

माओवाद या नक्सलवाद के बारे में देश आम तौर पर तभी सोचता है, जब ऐसी कोई बड़ी घटना होती है। मीडिया के जरिये कभी-कभी जो अन्य कहानियां या खबरें मिलती हैं, वे सतही और पूर्वाग्रहग्रस्त रहती हैं। ऐसी हालत में देश की एक बड़ी अंग्रेजी लेखिका अरुंधती राय ने करीब एक सप्ताह दंतेवाड़ा के जंगलों में सशस्त्र माओवादियों के साथ बिता कर उसका वृत्तांत ‘आउटलुक’ (29 मार्च, 2010) पत्रिका में देकर हमारा एक उपकार किया है। ऐसा नहीं है कि वे पूरी तरह निष्पक्ष है। माओवादियों के प्रति उनकी सराहना, सहानुभूति और उनका रोमांच साफ है। किन्तु इससे दूसरी तरफ की, अंदर की, बहुत सारी बातें जानने एवं समझने को मिलती है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि पिछले काफी समय से सरकार ने इन इलाकों को सील कर रखा है और बाहर से किसी को जाने नहीं दे रही है। मेधा पाटेकर, संदीप पांडे या महिला दल की जनसुनवाई या पदयात्रा को भी सरकार और सरकारी गुर्गों ने होने नहीं दिया। उनकी घेरेबंदी को भेदकर, भारी जोखिम लेकर, काफी कष्ट सहकर, अरुंधती ने बड़ा काम किया है। भारत के बुद्धिजीवी जिस तरह से वातानुकूलित घेरों के अंदर बुद्धि-विलास तक सीमित होते जा रहे हैं, उसे देखते हुए भी यह काबिले तारीफ है।

तीन संकट:

इस वृतांत से एक बात तो यह पता चलती है कि वहां के आदिवासियों का एक प्रमुख मुद्दा जमीन और जंगल (तेदूंपत्ता या बांस कटाई) की मजदूरी का रहा है। बड़े स्तर पर वनभूमि पर आदिवासियों का कब्जा करवाकर और वन विभाग के उत्पीड़न से मुक्ति दिलाकर माओवादियों ने अपना ठोस जनाधार बनाया है। वास्तव में, देश के सारे जंगल वाले आदिवासी इलाकों में  तनाव, टकराव और जन-असंतोष का यह एक बड़ा कारण है। अब तो देश को यह अहसास होना चाहिए कि आदिवासियों के साथ ऐतिहासिक रुप से अन्याय हुआ है, भारत के वन कानून जन-विरोधी और आदिवासी – विरोधी हैं, आजादी के बाद हालातें नहीं बदली हैं, बल्कि राष्ट्रीय उद्यानों, अभ्यारण्यों एवं टाईगर रिजर्वों के रुप में उनकी जिंदगियों पर नए हमले हुए हैं। संसद में पारित आधे-अधूरे वन अधिकार कानून से यह समस्या हल नहीं हुई है। जैसे नरेगा से रोजगार की समस्या हल नहीं हो सकती, सूचना के अधिकार से प्रशासनिक सुधार का काम पूरा नहीं हो जाता, प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून से देश में भूख एवं कुपोषण खतम नहीं होने वाला हैं, उसी तरह वन-अधिकार कानून भी ज्यादातर एक दिखावा ही साबित हुआ है। भारत के जंगलों पर पहला अधिकार वहां रहने वाले लोगों का है, उनकी बुनियादी जरुरतें सुनिश्चित होनी चाहिए, तथा अंग्रेजों द्वारा कायम वन विभाग की नौकरशाही को तुरंत भंग करके स्थानीय भागीदारी से वनों की देखरेख का एक वैकल्पिक तंत्र बनाना चाहिए। भारत के जंगल क्षेत्रों में खदबदा रहे असंतोष का दूसरा कोई इलाज नहीं हैं। और यही जंगलों एवं वन्य प्राणियों के भी हित में होगा।

वैश्वीकरण के दौर में, निर्यातोन्मुखी विकास और राष्ट्रीय आय की ऊंची वृद्धि दर के चक्कर में, देशी विदेशी कंपनियों और सरकार के सहयोग से इन इलाकों के जल-जंगल-जमीन पर हमले का एक नया दौर शुरु हुआ है। खदानों व कारखानों के बेतहाशा करारनामे और समझौते हो रहे हैं। यदि सबका क्रियान्वयन हो गया, तो भारत के बड़े इलाकों से जंगल और आदिवासी दोनों साफ हो जाएंगे। सलवा जुडुम और ऑपरेशन ग्रीन हंट के पीछे सरकार के जोर लगाने का एक बड़ा कारण यही है कि इन इलाकों में खनिज के भंडार भरे हुए हैं। सलवा जुडुम के लिए टाटा और एस्सार कंपनी ने भी पैसा दिया है, इस तरह के तथ्य सामने लाने का भी काम अरुंधती राय ने किया है। भारत के मौजूदा गृहमंत्री चिदंबरम साहब भी वेदांत एवं अन्य कंपनियों से जुडे़ रहे हैं। यह हमला व यह सांठगांठ देश में लगभग हर जगह चल रहा है। कई जगह लोग गैर-हथियारबंद तरीकों से लड़ रहे हैं। यदि देश को बचाना है, तो इस कंपनी साम्राज्यवाद को तत्काल रोकना होगा। यह दूसरा निष्कर्ष सिर्फ अरुंधती राय के लेख से नहीं, देश के कोने-कोने से आने वाली सैकड़ों रपटों व खबरों से निकलता है।

माओवाद के नाम पर इन तमाम गैर-हथियारबंद आंदोलनों को भी कुचला जा रहा है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि भारतीय राजसत्ता और माओवादी दोनों के लिए यह स्थिति सुविधाजनक है और दोनों इसे बनाए रखना चाहते हैं। माओवाद प्रभावित इलाकों के आसपास के जिलों में भी अब कोई भी भ्रष्टाचार या पुलिस ज्यादतियों का मामला भी नहीं उठा सकता। उसे माओवादी कहकर जेल में सड़ा दिया जाएगा या फर्जी मुठभेड़ में मार दिया जाएगा। लोकतांत्रिक विरोध की गुंजाईश और जगह खतम होने से लोग मजबूर होकर माओवाद की शरण में जाएंगे, इसलिए यह माओवादियों के  हित में भी है। लालगढ़ में ‘‘पुलिस संत्रास बिरोधी जनसाधारणेर कमिटी’’, कलिंग नगर में टाटा कारखाने के विरोध में आंदोलन, नारायणपटना में अपनी जमीन वापसी की लड़ाई लड़ रहे आदिवासी — ये सब गैर-हथियारबंद लोकतांत्रिक आंदोलन थे। इनके नेताओं को जेल में डालकर, इन पर लाठी – गोली चलाकर सरकार इनको माओवादियों की झोली में डाल रही है।

अतएव हमें तीसरा अहसास भारतीय लोकतंत्र पर छाए गंभीर संकट का होना चाहिए। भारतीय राजसत्ता जहां चाहे, जब चाहे, लोकतांत्रिक नियमों और मान-मर्यादाओं को ताक में रख देती है। विशेषकर जो इलाके और समुदाय भारत की मुख्य धारा के हिस्से नहीं है, जैसे पूर्वोत्तर और कश्मीर, दलित, आदिवासी और मुसलमान, उनके साथ वह बर्बरता और क्रूरता की सारी सीमाएं लांघ जाती है। उसका बरताव वैसा ही होता है, जैसा एक तानाशाह का होता है। सशस्त्र संघर्ष तो अलग बात है, लोकतांत्रिक एवं अहिंसक तरीकों से होने वाले जनप्रतिरोध को भी उपेक्षित करने व कुचलने में उसे कोई संकोच नहीं होता। आखिर दस वर्षों से चल रहा इरोम शर्मिला का अनशन तो एक गांधीवादी प्रतिरोध ही है, जो इस राजसत्ता की संवेदनशून्यता का सबसे बड़ा प्रमाण है। अपने दमन और अत्याचारों से यह राजसत्ता लोगों को उल्टे हिंसा की और धकेलती एवं मजबूर करती है।

भारत में बढ़ता हुआ उग्रवाद, आतंकवाद और माओवाद कहीं न कहीं भारतीय लोकतंत्र की गहरी विफलता की ओर इशारा करता है, जिसमें लोगों को अपनी समस्याओं और अपने असंतोष को अभिव्यक्त करने तथा उनके निराकरण के जरिये नहीं मिल पा रहे हैं। भारत के लोकतांत्रिक ढांचे की इस विफलता को देश के मुख्य इलाकों के आम लोग भी महसूस कर रहे हैं। उनकी हताशा कम मतदान, आम बातचीत में नेताओं को गाली देने, तुरंत कानून अपने हाथ में लेने या हिंसा व आगजनी की घटनाओं में प्रकट होती है। देश की आजादी के बाद लोकतंत्र का जो ढांचा हमारे संविधान निर्माताओं ने अपनाया, वह शायद बहुत ज्यादा उपयुक्त नहीं था। अब पिछले छः दशकों के अनुभव के आधार पर इसकी समीक्षा करने का समय आ गया है। माओवादियों की तो इसमें कोई रुचि नहीं होगी कि इस ‘बुर्जुआ’ लोकतंत्र को बचाया जाए। लेकिन बाकी देशप्रेमी लोगों को इस लोकतंत्र की अच्छी बातों जैसे वयस्क मताधिकार, मौलिक अधिकार, कमजोर तबकों के लिए आरक्षण, आदि को संजोते हुए इसके ज्यादा विक्रेन्द्रित, जनता के ज्यादा नजदीक, नए वैकल्पिक ढांचे के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए।

इस लेख में अरुंधती राय ने विरोध के गांधीवादी, अहिंसक एवं लोकतांत्रिक तरीकों का कुछ हद तक मजाक उड़ाया है और बताया है कि वे सब असफल हो गए है। यह भी पूछा है कि आखिर नर्मदा बचाओ आंदोलन ने कौन-कौन सा दरवाजा नहीं खटखटाया ? वे बताना चाहती हैं कि हथियार उठाने, युद्ध लड़ने, सत्ता के मुखबिरों को मारने-काटने का जो रास्ता माओवादियों ने चुना है, उसके अलावा कोई विकल्प नहीं है। किन्तु क्या सचमुच ऐसा है ? पता नहीं, अरुंधती राय को मालूम है या नहीं, देश के कई हिस्सों में इस वक्त सैकड़ों की संख्या में छोटे-छोटे आंदोलन चल रहे हैं जो सब लोकतांत्रिक और गैर-हथियारबंद है। वास्तव में माओवादियों के मुकाबले उनका दायरा काफी बड़ा है। सफलता-असफलता की उनकी स्थिति भी मिश्रित है, एकतरफा नहीं। बल्कि सूची बनाएं, तो ऐसे कई छोटे-छोटे जनांदोलन पिछले दो-ढाई दशक में हुए हैं जो विनाशकारी परियोजनाओं को रोकने के अपने सीमिति मकसद में सफल रहे हैं। झारखंड में कोयलकारो, उड़ीसा में गंधमार्दन, चिलिका, गोपालपुर, बलियापाल एवं कलिंगनगर, गोआ में डूपों और सेज विरोधी आंदोलन, महाराष्ट्र में नवी मुंबई और गोराई के सेज -विरोधी आंदोलन  आदि। बंगाल में सिंगुर और नन्दीग्राम में भी हिंसा जरुर हुई, लेकिन वे मूलतः लोकतांत्रिक ढांचे के अंदर के आंदोलन थे। नर्मदा बचाओ आंदोलन भले ही नर्मदा के बड़े बांधों को रोक नहीं पाया, लेकिन उसने बड़े बांधों और उससे जुड़े विकास के मॉडल पर एक बहस देश में खड़े करने में जरुर सफलता पाई। विस्थापितों की दुर्दशा के सवाल को भी वह एक बड़ा सवाल बना सका, नहीं तो पहले इसकी कोई चर्चा ही नहीं होती थी। लेकिन यह भी सही है कि नवउदारवादी दौर में राजसत्ता का जो दमनकारी चरित्र बनता जा रहा है, उसमें आंदोलन एवं प्रतिरोध करना दिन-ब-दिन मुश्किल होता जा रहा है। गांधी के देश में गांधी के रास्ते पर चलना कठिनतर होता जा रहा है। (जारी)

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