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Posts Tagged ‘dalit’

“उत्तराधिकारी प्रायः अनुयायी नहीं होता । चाहे वह अपने को विनीत भाव से शिष्य कहलाये । उत्तराधिकारी लकीर का फ़कीर नहीं होता। पूर्वानुवर्ती लोकनेताओं के द्वारा निर्दिष्ट दिशा में वह नए मार्ग प्रशस्त करता है और पगडंडियां खोजता है । “- नारायण देसाई.

इस उद्धरण के पूरी तरह चरितार्थ करने वाला उदाहरण बाबा साहब अम्बेडकर और कांशीराम का है । कांशीराम की उत्तराधिकारी कही जाने वाली सुश्री मायावती इस परिभाषा पर पूरी तरह खरी उतरती नहीं दीखतीं ।

हाल ही में एक बौद्धिक-दलित-युवा से चर्चा हो रही थी । मैंने उससे पूछा कि ‘पृथक निर्वाचन’ की व्यवस्था में पिछड़ी जाति के लोगों को सवर्णों के साथ रखा गया था अथवा अनुसूचित जाति के साथ ? उसने तपाक से जवाब दिया, ‘ पिछड़े ही सब समस्याओं की जड़ में हैं ।’ मैंने उससे कहा कि कांशीराम के सही अनुयायी को ऐसा नहीं कहना चाहिए ।

कांशीराम

कांशीराम

कांशीराम द्वारा प्रतिपादित पचासी फ़ीसदी में अन्दरूनी एकता के लिए जैसे सामाजिक कार्यक्रम लिए जाने चाहिए उससे उलट दिशा में काम हो रहा है । यह काम यदि बसपा-सपा की सरकार के समय शुरु हो जाता तो शायद देश की राजनीति का भी नक्शा सुधर जाता।उस दौर में भी इलाहाबाद जिले में शिवपति नामक दलित महिला को दबंग कुर्मियों ने नग्न कर घुमाया था।जिन जातियों की तादाद ज्यादा है उनकी राजनैतिक सत्ता ज्यादा है । इन ज्यादा तादाद वाली जातियों में ब्राह्मण ,चमार और अहिर के उदाहरण स्पष्टरूप से देखे जा सकते हैं । हजारों शूद्र ( सछूत व अछूत ) जातियां अपनी-अपनी जाति के आधार पर राजनैतिक दल बनाकर सामाजिक न्याय हासिल नहीं कर सकतीं । अपने वोट-आधार की कीमत टिकट देने में वसूलने की बसपाई शैली इन जाति-दलों ने भी अपना ली है ।

कांशीराम के जीवनकाल का एक प्रसंग उल्लेखनीय है । कर्नाटक की दलित संघर्ष समिति का एक धड़े ने बसपा में सशर्त विलय करने का निर्णय लिया था । उस धड़े ने कहा था कि हम मानते हैं कि विकेन्द्रीकरण की अर्थनीति में दलित हित निहित है इसलिए आप से अनुरोध है कि आप गांधी-निन्दा नहीं करेंगे । कांशीराम ने यह शर्त सार्वजनिक तौर (TOI में खबर छपी थी,खंदन नहीं किया गया) पर कबूली थी।

कर्नाटक दलित संघर्ष समिति की भांति ‘उत्तर बंग आदिवासी ओ तपशिली जाति संगठन’ ने भी अम्बेडकर की सामाजिक नीति और विकेन्द्रीकरण की अर्थनीति मानने के कारण समाजवादी जनपरिषद बनाने में अहम भूमिका अदा की। यह गौरतलब है कि इस समूह को भी बसपा के स्थापना के समय कांशीराम ने निमंत्रित किया था।

कांशीराम के सक्रिय रहते हुए उत्तर प्रदेश के बाहर जिन राज्यों में बसपा का आधार बढ़ा था और बसपा ने राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त दल का दरजा हासिल किया था वह अब बहुत तेजी के साथ सिकुड़ रहा है । पंजाब , मध्य प्रदेश , राजस्थान और कर्नाटक में बसपा वास्तविक तीसरी शक्ति के रूप में उभर सकती थी लेकिन उनकी मृत्यु के बाद उत्तर प्रदेश के अलावा अन्य राज्यों में बसपा का आधार छीजता गया है ।

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आदिवासी

    आजादी के बाद पिछले साठ साल में आदिवासी को क्या मिला ? न तो जंगल पर हक मिला न जमीन का पट्टा । आज कहने को आदिवासियों के इतने नेता , विधायक , मंत्री हैं लेकिन आदिवासी की कोई इज्जत नहीं है । सब आदिवासी को छोटा आदमी समझते हैं । आजादी की लड़ाई में आदिवासियों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया लेकिन उनका कहीं कोई नाम नहीं है । जो मध्य प्रदेश कभी आदिवासियों का प्रदेश कहलाता था वहां आज भी आदिवासी को रोजी – रोटी के लिए दर – दर भटकना पड़ता है । जो कानून आदिवासी के हित के खिलाफ़ थे उनमें कोई सुधार नहीं किया । आज भी आदिवासी अधिकारियों अधिकारियों के डंडे का शिकार होता रहता है ।

    पिछले साठ सालों में बड़े पैमाने पर बांध , फैक्ट्री , शेर पालने आदि के नाम पर आदिवासियों को उनके घर , जंगल और जमीन से भगाया गया । न तो आदिवासियों के खेतों को पानी मिला न खाद – बीज । जितनी योजना आदिवासी के विकास के नाम पर आईं उसका कोई फायदा आदिवासियों को नहीं मिला । इन योजनाओं से अधिकारियों और दलालों ने अपने घर भर लिये । कुपोषण और भूख से आदिवासियों की मौत होती रही ।

  1. जंगल पर अधिकार इतिहास गवाह है कि किस गलत तरीके से अंग्रेजों ने आदिवासियों से उनका जंगल छीन लिया । आजादी के बाद आज तक आदिवासी को अपना खोया हुआ अधिकार नहीं मिला । आदिवासियों को उसका जंगल पर अधिकार वापस मिलना चाहिए । जंगल में उसे अपने निस्तार की लकड़ी , फाटा , चराई आदि की छूट होनी चाहिए । जंगल में नाकेदार की दादागिरी बंद होना चाहिए । सरकार को कटाई की अनुमति आसपास के गांवों से लेनी चाहिए एवं उसका आधा पैसा उस ग्राम के विकास पर खर्च होना चाहिए ।
  2. जमीन का पट्टा    जंगल जमीन जोतने एवं उस पर फलदार पौधे लगाने का अधिकार आदिवासियों को मिलना चाहिए यह मांग समाजवादी जनपरिषद सालों से कर रही है। यह एकमात्र पार्टी है जो इस मुद्दे को लेकर वर्षों से आंदोलन कर रही है । जंगल जमीन के पट्टे देने के लिए एक नया कानून भी बन गया है । लेकिन उस कानून का कहीं कोई पालन नहीं हो रहा है । नाम करने के लिए जैसे तैसे लोगों के फार्म भर दिए । उस कानून का सही सही पालन होना चाहिए और उस कानून के अनुसार आदिवासियों से गलत तरीके से छुड़ाई गई सारी जंगल जमीन के पट्टे मिलने चाहिए। इसमें वनग्राम में लाइन सरकाकर छुड़ाई गई जमीन शामिल है ।
  3. तेन्दु पत्ता    हर बार चुनाव के समय आदिवासियों को तेंदुपत्ता के नाम पर करोड़ों रुपये दिये जाते हैं । इसका मतलब यह है कि चार साल तक तेन्दुपत्ते की कमाई का करोड़ों रुपये सरकार में बैठे अधिकारी और मंत्री खा जाते हैं । आज मंहगाई तीन गुना बढ़ गई और बीड़ी की कीमत भी लेकिन पिछले १५ सालों से तेन्दुपत्ता कड़ाई दर मात्र दस रुपये सैंकड़ा बढ़ी । इसके साथ ही समितियों में इस समय लाखों रुपये हैं उसका हिसाब किताब दिया जाना चाहिए और वो पैसा ग्राम विकास में खर्च किया जाना चाहिए ।
  4. आदिवासी विरोधी कानूनों में बदलाव  संविधान के अनुच्छेद ६ के अनुसार अगर कोई कानून आदिवासी के हितों के खिलाफ है तो प्रदेश का राज्यपाल अकेले ही उसमें जरूरी सुधार कर सकता है या उस पर रोक लगा सकता है । यह अधिकार सिर्फ आदिवासी क्षेत्र के लिए है । उदाहरण के लिए वन्य कानून १९२७ का वन्य प्राणी कानून १९७२ से आदिवासियों के जंगल पर हक खत्म होते हैं तो राज्यपाल एक आदेश से उस पर रोक लगा सकता है । लेकिन आज तक इस अधिकार का किसी राज्यपाल ने न तो उपयोग किया न किसी पार्टी ने इसकी मांग की ।   समाजवादी जनपरिषद इस बात के लिए लगातार अपना संघर्ष जारी रखेगी कि आदिवासी विरोधी सारे कानूनों में बदलाव किया जाये । इसके लिए राज्यपाल संविधान में दी गई शक्तियों का उपयोग कर यह काम करें और स्थाई हल के लिए संसद और विधानसभाओं के जरिए इन कानूनों में बदलाव किया जाये ।
  5. राष्ट्रीय उद्यान अभयारण्य  देश का पर्यावरण भोग विलास भरी जिस जीवन शैली से नष्ट हो रहा है उसे बदलने की बजाए सरकार पर्यावरण बचाने के नाम पर शेर पालने की योजना लाती रहती है । शेर पालने के नाम पर आदिवासियों के गांव के गांव उजाड़े जा रहे हैं । समाजवादी जनपरिषद मानती है कि शेर और आदिवासी जमाने से साथ रहते आ रहे हैं इसके गांव उजा्ड़ने की जरूरत नहीं है और इन योजनाओं से पर्यावरण नहीं बचेगा उसके लिए हमारी विकास नीति बदलना होगा ।

दलितों के सवाल

        दलितों के लिए सबसे बड़ा सवाल छुआछूत मुक्त समाज में बराबरी का स्थान पाना है। आज भी समाज में बड़े पैमाने पर छुआछूत फैली हुई है जो न सिर्फ़ गैर कानूनी है बल्कि मानवता के खिलाफ है । इसके साथ ही दलितों को अपने खोये हुए संसाधन , जमीन आदि पर हक पाना और बदलते समय में रोजगार के सही अवसर पाना है । दलितों के यह सवाल वर्तमान विकास की अंधी दौड़ और उदारीकरण की नीति से हल नहीं होंगे । आज कांग्रेस हो या भाजपा , सभी पर्टियों ने जो आर्थिक नीति अपनाई है उसमें अमीर और अमीर हो रहा है।हमारे जमीन आदि सारे संसाधन कंपनियों के हाथों सौंपे जा रहे हैं । बसपा की मायावती भी उत्तरप्रदेश में यही नीति अपनाये हुए हैं । अब आप दलितों की मुखिया होकर बड़ी पार्टियों जैसी नीतियाँ अपनायेंगी तो दलित सही अर्थों में मुक्त कैसे होगा ।

    समाजवादी जनपरिषद का मानना है कि बाबा साहेब अम्बे्डकर का अधूरा सपना असल रूप में पूरा करना है । इंसान में जात-पांत , धर्म , अमीर,गरीब का भेद समाप्त होना चाहिए। छुआछूत इंसानियत के नाम पर सबसे बड़ा कलंक है । इसे जड़ से मिटाने के लिए तथा कानूनी स्तर पर भी ठोस काम होना चाहिए । व्यापक दलित समाज की आर्थिक स्थिति सुधरे इस दिशा में ठोस नीतिगत बदलाव करने होंगे । वैश्वीकरण और उदारीकरण की नीति छो्ड़कर  गरीबों के हितों को साधने वाली नीति अपनाना होगी क्योंकि ज्यादातर दलित गरीब है । चूँकि दलितों के परम्परागत रोजगार नहीं रहे उन्हें जमीन दी जाना चाहिए । छोटे-छोटे उद्योगों को बढ़ावा दिया जाये जिससे दलित भी उद्यमी बन सकें । दलितों से छुड़ाई गई जमीन वापस की जाए । प्रशासनिक सुधार के जरिये दलितों पर अत्याचार के मामले में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर कड़ी कार्यवाही हो ।

[ जारी ]  अगले हिस्से – अल्पसंख्यक , साम्प्रदायिकता

पिछले भाग : एक , दो

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Kishan Pattanayak    ‘हरिजन’ शब्द शाश्वत रहे , यह गांधी जी नहीं चाहते थे । ‘अछूत’ शब्द के प्रति उनका विरोध था , इसीलिए वे यहाँ तक मानते थे कि ‘ स्वराज्य में दफ़ा १२४ राजद्रोह के लिए नहीं होगी , परन्तु हरिजनों को अछूत कहने वाले के विरुद्ध होगी।’ ( महादेवभाई की डायरी , खण्ड दो , पृ. १९४ )

    हरिजन शब्द के प्रति अपने लगाव के बावजूद दलितों की इस शब्द के प्रति आपत्ति को वे तरजीह देते थे । मद्रास के शंकर नामक एक कार्यकर्ता ने वहाँ के दलितों के लिए हरिजन शब्द के बारे में आपत्ति की बाबत गांधी जी को लिखा कि वे हरिजन कैसे कहलाए ? हम तो हरजन हैं हरिजन नहीं । शंकर ने लिखा था ,इन लोगों को यदि हिन्दू कहें , तो इन्हें अच्छा लगेगा । आप इजाजत दीजिए ।’ उसे गांधी जी ने लिखा ,’ हरिजन नाम पर आपत्ति होने पर के लिए मुझ अफ़सोस होता है । तुम्हारे मित्रों को जो नाम पसन्द हो , वह इस्तेमाल कर सकते हो । मगर उन्हें यह समझाना कि मेरे मन में विष्णु य शिव का जरा भी ख्याल न था । मेरे लिए तो इसका अर्थ ‘भगवान का आदमी’ ही होता है । विष्णु , शिव या ब्रह्मा में मैं कोई भेद नहीं मानता । सभी ईश्वर के नाम हैं ।मगर इस मामले में उनके निर्णय पर अमल करना चाहिए ।’ ( वही , पृ. १३७ )

    २९ अक्टूबर , १९३२ को एक बंगाली सज्जन का पत्र गांधी जी को मिला, ‘आप ‘हरिजन’ नाम देकर अछूतों का दूसरा नाम कायम करना चाहते हैं । इन्हें नाम देने की बात ही क्यों न छोड़ दी जाए ? उसके जवाब में गांधी जी ने लिखा- ‘हरिजन’ शब्द अछूत भाइयों को ध्यान में रखकर हमेशा के लिए इस्तेमाल करना हो , तो आपका ऐतराज ठीक है ।मगर अभी तो उन्हें अलग करके दिखलाए बिना काम नहीं चल सकता ।साथ ही मुझे यह लगता है कि ‘अछूत’ या उससे मिलते-जुलते देशी भाषाओं में काम में लिए जाने वाले दूसरे शब्द उनके लिए इस्तेमाल करना अब उचित नहीं है।’ ( वही, पृ. १५५ )

    गांधी जी ने सवर्णों के लिए भी एक नाम दिया था । अहमदाबाद में सवर्णों की एक सभा में उनके भाषण में यह नाम आया है । ‘ मेरे लिए अछूत , यदि हम अपने से (सवर्णों से ) तुलना करें , तो हरिजन है – भगवान का आदमी और हम दुर्जन हैं ।अछूतों ने सारे श्रम करके , शोणित सुखाकर तथा अपने हाथ गंदे करके हमें आराम और सफाई से रहने की सुविधा दी है । —– यदि हम चाहें तो अब से भी खुद हरिजन बन सकते हैं , लेकिन इसके लिए हमें उनके प्रति किये गये पापों का प्रायश्चित करना पड़ेगा ।’ (महात्मा गांधी ,अहमदाबाद के सवर्णों को , यंग इण्डिया ,६ अगस्त ,१९३१,पृ. २०३ )

    समतावादी नेता किशन पटनायक का ‘हरिजन बनाम दलित’ , नाम की इस बहस के सन्दर्भ में ठोश सुझाव है कि ‘हरिजन’ शब्द अछूतों के लिए था । जिस हद तक अछूत नहीं रह गये हैं  उस हद तक हरिजन शब्द भी हटाना चाहिए और अगर प्रत्यक्ष या परोक्ष ढंग से सवर्ण जातियाँ अस्पृश्यता को चलाए रखना चाहती हैं तो गांधी के द्वारा प्रयुक्त दूसरे शब्द का इतेमाल व्यापक होना चाहिए और सभी उच्च जातियों को दुर्जन जातियाँ कह कर पुकारना चाहिए ।—-‘दलित’ शब्द की विशेषता यह है कि स्वत: स्फूर्त ढंग से शिक्षित , सचेत हरिजन समूह इस शब्द के साथ जुड़ रहे हैं ।’ ( हरिजन बनाम दलित,सं राजकिशोर ) यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि इस वर्ग के बड़ी संख्या में साधारण ग्रामीण आज भी अपनी जाति का नाम न बता कर खुद को हरिजन कहते हैं । क्या इसका यह कारण है कि ग्रामीण समाज में अस्पृश्यता समाप्त नहीं हुई है और इस कारण गांधी जी द्वारा दिया गया नाम सवर्णों से बताने में एक तरह की सुरक्षा का भाव छिपा होता है ?

[ जारी ]

भाग १

भाग २

भाग ३

 भाग ४

 भाग ५

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