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प्रश्न : क्या भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए जनान्दोलन एक कारगर उपाय हो सकता है ?
उत्तर : नहीं । सिर्फ भ्रष्टाचार की विशेष घटनाओं के प्रति जन आक्रोश को संगठित किया जा सकता है , किसी एक घटना को मुद्दा बनाकर एक राजनैतिक कार्यक्रम चलाया जा सकता है , जैसे बोफोर्स , बैंक घोटाला इत्यादि । भ्रष्टाचार करनेवाले व्यक्ति के विरुद्ध प्रचार अभियान चलाकर उसे थोड़े समय के लिए बदनाम भी किया जा सकता है ।लेकिन इन कार्यक्रमों से भ्रष्टाचार का उन्मूलन नहीं होता । समाज , राजनीति ,और प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार इस तरह के आन्दोलनों के द्वारा प्रभावित नहीं होता है , ज्यों का त्यों बना रहता है ।
प्रश्न : तो क्या भ्रष्टाचार बना रहेगा और मान लेना पड़ेगा कि यह एक अनिवार्यता है , इससे छुटकारा संभव ही नहीं ?
उत्तर : कुछ मात्रा में भ्रष्टाचार रहेगा ही , वह अनिवार्य है । इसीलिए तो राज्य व्यवस्था बनी हुई है – हिंसा और भ्रष्टाचार को नियंत्रित रखने के लिए । सवाल वहाँ उठता है , जहाँ भ्रष्टाचार पर नियंत्रण नहीं हो रहा है। एक निम्नतम स्तर तक भ्रष्टाचार रहेगा , तो राज्य व्यवस्था उसे संभाल लेगी , उससे जनजीवन अस्तव्यस्त नहीं हो जाएगा ।भ्रष्टाचार तब एक केन्द्रीय समस्या बनता है जब उसके कारण एक औसत नागरिक के लिए सामान्य ढंग से ईमानदारी का जीवन जीना मुश्किल हो जाता है । जब भ्रष्टाचार का शिकार हुए बगैर रोजमर्रा का काम नहीं चल पाता है , तब भ्रष्टाचार से मुक्त होने के लिए तपस्या करनी पड़ती है । तब तो और भी , जब यह आशंका होने लगती है कि मंत्री, विधायक , अफ़सर या सेनापति अपने स्वार्थ के लिए देश हित और समाज हित के विरुद्ध जानबूझकर काम कर सकते हैं। इस प्रकार का भ्रष्टाचार न स्वाभाविक है और न ही अनिवार्य । यह मनुष्य-कृत और समाज-कृत है । यह इस बात की चेतावनी है कि समाज के सचेत लोग सामूहिक जीवन को संचालित करने में विफल हो रहे हैं । मानो न्यायचक्र का घूमना बन्द हो गया है । इस अवस्था में नेक आदमी भी भ्रष्टाचार करने लगता है और कोई आदमी ईमानदारी से अपना काम करता है , तो उसकी हालत दयनीय हो जाती है । पूरा तंत्र उसके खिलाफ हो जाता है । इसके विपरीत सामान्य अवस्था में भ्रष्टाचार सिर्फ लोभी और बेशर्म आदमियों तक सीमित रहता है और अधिकांश घटनाओं में लोग आश्वस्त रहते हैं कि दोषी दण्डित होगा ।

जब भ्रष्टाचार इस दूसरी , खतरनाक अवस्था में पहुँच जाता है , तब ’भ्रष्टाचार – भ्रष्टाचार ’ चिल्लाने से उसमें कोई कमी नहीं आती । इसका मतलब है कि भ्रष्टाचार को नियंत्रण में रखनेवाली स्थितियाँ बिगड़ चुकी हैं और नियंत्रण करनेवाली व्यवस्था में बहुत खोट आ गई है । कभी – कभी भ्रष्टाचार की कुछ सनसनीखेज घटनाओं को लेकर जो भ्रष्टाचार विरोधी वातावरण बनता है या ’ लहर’ देश में पैदा होती है । उसका खोखलापन यह है कि उसमें सामाजिक स्थिति और नियंत्रण व्यवस्था की बुनियादी खामियों पर ध्यान नहीं जाता है । यहाँ तक कि मुख्य अपराधी को दंडित करने के बारे में गंभीरता नहीं रहती । वह सिर्फ एक व्यक्ति-विरोधी या घटना-विरोधी प्रचार होकर रह जाता है । कभी-कभी तो लगता है कि इस प्रकार के विरोधी प्रचार को चलाने के पीछे कुछ निहित स्वार्थ सक्रिय हैं ।

भ्रष्टाचार को जड़ से समझने के लिए निम्नलिखित आधारभूत विकृतियों की ओर ध्यान देना होगा – (१) प्रशासन के ढाँचे की गलतियाँ । जवाबदेही की स्पष्ट और समयबद्ध प्रक्रिया का न होना , भारतीय शासन प्रणाली का मुख्य दोष है । (२) समाज में आय-व्यय तथा जीवन-स्तरों की गैर-बराबरियाँ अत्यधिक हैं । जहाँ ज्यादा गैर-बराबरियाँ रहेंगी , वहाँ भ्रष्टाचार अवश्य व्याप्त होगा । (३) राष्ट्रीय चरित्र का पतनशील होना ।

जो लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ बहुत ज्यादा आक्रोश दिखाते हैं और भ्रष्टाचार को ही देश की अधोगति का केन्द्रीय मुद्दा मानते हैं , वे इस समस्या की जटिलताओं को बिलकुल अनदेखा कर देते हैं , मानो भ्रष्टाचार सिर्फ व्यक्ति-चरित्र का सवाल है । मानो प्रशासन और अर्थनीति जैसे हैं वैसे ही रहें , लेकिन भ्रष्टाचार खत्म हो जाना चाहिए । वे , दरअसल , जटिल और कठिन प्रश्नों से दूर भागने की अन्दरूनी इच्छा से प्रेरित हैं , जबकि जटिल प्रश्नों के साथ जोड़कर ही भ्रष्टाचार के सवाल का कोई कारगर समाधान निकल पाएगा ।

भ्रष्टाचार भारत में व्यवस्था का एक अंग है । ऐसे नियम-काएदे बने हुए हैं कि भ्रष्टाचार पनपेगा ही । प्रशासन के नियमों के बारे में कुछ उदाहरण दिए जा सकते हैं । प्रशासन में सुधार करना राजनीति का कोई मुद्दा नहीं है , भ्रष्टाचार-विरोधियों का भी मुद्दा नहीं है । अगर होता , तो इस तरह के गलत नियम अब तक नहीं रह पाते । उदाहरण के लिए , कुछ राज्यों में , जहाँ गैर-सरकारी स्कूलों के के शिक्षकों को वेतन सरकार देती है , ऐसे नियम बने हुए हैं कि प्रत्येक स्कूल का अध्यक्ष जिले के एक शिक्षा अधिकारी के दफ्तर में जाकर अपने स्कूल के लिए वेतन की रकम ले आयेगा और वितरित करेगा । अधिकारी बहाना बनाकर कई हफ़्तों तक टाल भी सकता है या घूस लेकर समूची राशि सही समय पर दे सकता है । प्रत्येक शिक्षक जानता है कि उसके मासिक वेतन का कुछ अंश घूस में जा रहा है । इस विकृति को सुधारना मामूली बात है – चेक द्वारा वेतन सीधे शिक्षकों के खाते में ही जमा होना चाहिए । इस प्रकार के हजारों गलत नियम बने हुए हैं , जिन्हें बदलने की जरूरत है । लेकिन प्रशासन में सुधार किसी राजनैतिक दल का महत्वपूर्ण कार्यक्रम नहीं है । भ्रष्टाचार विरोध को एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम के रूप में चलानेवाले लोग भी इस पर कोई ध्यान नहीं देते ।

( जारी )

किशन पटनायक द्वारा लिखे गये इस विषय पर अन्य लेख :

राजनीति में मूल्य

भ्रष्टाचार की एक पड़ताल (१)

”               ”     ”    ” (२) राजनैतिक दल और भ्रष्टाचार

”           ”        ”    ” (३) फिजूलखर्ची और विलास

”          ”         ”    (४) प्रशासनिक सुधार

”           ”       ”    (५) विकास और मूल्य वृद्धि

 

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किशन पटनायक

किशन पटनायक

 

परसों ( २७ सितम्बर ) मेरे दल के नेता साथी किशन पटनायक की मृत्यु तिथि थी । देश में जो कुहासा और कड़ुवाहट फैलाने की कोशिश हो रही है उससे व्यापक स्तर पर अवसाद फैले यह मुमकिन है । राजनीति करने वालों का एक बुनियादी दायित्व है कि वह लोगों में लोकतंत्र के प्रति बुनियादी यक़ीन को मजबूत करें – किशनजी ने यह सिखाया । देश को हिला देने वाली गत दिनों हुई घटनाओं के बारे में स्पष्टता बहुत जरूरी है ।

    यहाँ प्रस्तुत किशन पटनायक के दो छोटे बयान इस कोहरें , कड़ुवाहट और घुटन को काटने में मददगार होंगे , उम्मीद है । राँची में २९ अगस्त , २००४ को दिए गए व्याख्यान और दिसम्बर १९९२ में लिखा गया सामयिक वार्ता का सम्पादकीय- ‘राष्ट्र के हत्यारों के खिलाफ एक कार्यक्रम’ । राँची के कार्यक्रम में किशनजी ने मेरी किताब ‘कोक-पेप्सी की लूट और पानी की जंग’ का विमोचन भी किया था और ५ दिसम्बर , १९९२ को भी हम झारखण्ड के किसी कार्यक्रम से साथ में रेल से लौट रहे थे। राँची के कार्यक्रम की रपट उनकी मृत्यु के अगले दिन (२८ सितम्बर, २००४, पृष्ट ९ ) के ‘प्रभात खबर’ में भी छपी थी ।

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