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Posts Tagged ‘lohia’

मार्क्स हों ,गांधी हों या लोहिया उनके बताये रस्ते पर चलते रहने के बजाए नई पगडंडिया बनाने वाला ही योग्य अनुगामी होता है। वह लकीर का फकीर नहीं होता , नए उसूल बताता है और उन पर चल कर दिखाता है। सुनील ने इन महापुरुषों के विचार ,सिद्धान्त और काम में नया जोड़ा। सुनील की बनाई पगडंडियों की आज चर्चा का दिन है। सुनील इन पगडंडियों पर चला भी इसलिए यह चर्चा आगे भी प्रासंगिक रहेगी।

केसला इलाके में पीने के पानी और सिंचाई के लिए छोटे बन्धों के लिए भौंरा बेतूल पैदल मार्च इलाके को रचनात्मक उर्जा देने वाला कार्यक्रम सिद्ध हुआ। इन बन्धों का प्रस्ताव मोतीलाल वोरा को किसान आदिवासी संगठन ने दिया।

आदिवासी गांव में नियुक्त मास्टर की मौजूदगी के लिए भी इस व्यवस्था में महीनों जेल जाना पड़ता है यह राजनारायण और सुनील ने बताया।

सुनील ने लम्बे चौड़े विधान सभा ,लोक सभा क्षेत्रों के बजाए व्यावाहारिक विकेन्द्रीकरण का मॉडल बताया जिनमें पंचायती व्यवस्था के वित्तीय-आर्थिक अधिकार का प्रावधान होता। पूंजीपतियों के भरोसे चलने वाले मुख्यधारा के दल ही इन बड़े चुनाव क्षेत्रों में सफल होते हैं।

जल,जंगल,जमीन के हक को स्थापित करने के लिए आदिवासी में स्वाभिमान जगाने के बाद और लगातार अस्तित्व के लिए संघर्ष करते करते सहकारिता की मिल्कियत का एक अनूठा मॉडल चला कर दिखाया।

संसदीय लोकतंत्र ,रचनात्मक काम और संघर्ष इनके प्रतीक ‘वोट,फावड़ा ,जेल’ का सूत्र लोहिया ने दिया।’वोट , फावड़ा,जेल’ के इन नये प्रयोगों के साथ-साथ सुनील ने इस सूत्र में दो नये तत्व जोड़े- संगठन और विचार । जीवन के हर क्षेत्र को प्रतिकूल दिशा में ले जाने वाली ‘प्रतिक्रांति’ वैश्वीकरण के षड़्यन्त्र को कदम-कदम पर बेनकाब करने का काम सुनील ने किया। ‘पूंजी के आदिम संचय’ के दौरान होने वाला प्रकृति का दोहन सिर्फ आदिम प्रक्रिया नहीं थी,सतत प्रक्रिया है। १९४३ में लिखे लोहिया के निबन्ध ‘अर्थशास्त्र , मार्क्स से आगे’। मार्क्स की शिष्या रोजा लक्सेमबर्ग की तरह लोहिया ने बताया कि पूंजीवाद को टिकाये रखने के लिए साम्राज्यवादी शोषण जरूरी है। समाजवादी मनीषी सच्चिदानन्द ने आन्तरिक उपनिवेशवाद का सिद्धान्त प्रतिपादित किया। सुनील ने इस सिद्धान्त को परिमार्जित करते हुए कहा कि  सिर्फ देश के अन्दर के पिछाड़े गये भौगोलिक इलाके ही नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था के खेती,छोटे उद्योग जैसे क्षेत्र भी आन्तरिक उपनिवेश हैं। खेती के शोषण से भी पूंजीवाद को ताकत मिलती है।

्सुनील

सुनील

भ्रष्टाचार और घोटालों से उदारीकरण की नीतियों का संबध है यह सुनील हर्षद मेहता के जमाने से सरल ढंग से समझाते आए थे। इस संबंध को पिछले दिनों चले ‘भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन’ ने पूरी तरह नजरअन्दाज किया था। बल्कि इस आन्दोलन के तमाम प्रणेता इसे सिर्फ नैतिकतावादी मुहिम के रूप में चला कर घोटालों से जुड़े कॉर्पोरेट घरानों और फिक्की जैसे उद्योगपतियों के समूहों को इस बात द्वारा आश्वस्त करते रहे कि आपको लाभ देने वाली नीतियों की चर्चा को हम अपनी मुहिम का हिस्सा नहीं बना रहे हैं ।

सुनील की बताई राह यथास्थितिवाद की राह नहीं है , बुनियादी बदलाव की राह है। सुनील के क्रांति के लिए समर्पित जीवन से हम ताकत और प्रेरणा पाते रहेंगे।

सुनील की स्मृति में कुछ चित्र

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लोक सभा और विधान सभा में औरतों के लिए ३३ फीसदी सीटें  आरक्षित किए जाने का कानून बनाने का विरोध सामाजिक न्याय के तथाकथित पुरोधा मुलायम सिंह , मायावती , शरद यादव करते आये हैं । वे आरक्षण में आरक्षण की माँग कर रहे हैं । यानी इन आरक्षित सीटों में पिछड़ी जाति की औरतों के लिए आरक्षण । शरद यादव काफ़ी पहले इस बाबत अपनी विकृत सोच प्रकट कर चुके हैं – ’आरक्षण में आरक्षण न दिया जाना परकटी औरतों के हक में होगा’!

पिछड़े तबकों में आई जागृति के कारण विधायिकाओं में पिछड़े वर्गों के सांसद -विधायक जनता द्वारा बिना आरक्षण चुन कर आने लगे हैं । आबादी की जातिगत बनावट के कारण यह सहज है। शुरुआती चुनावों में ऐसा नहीं होता था । औरतों के लिए सीटें आरक्षित हो जाने के बाद  पिछड़ी औरतों के सफल होने की कल्पना ये पिछड़े नेता नहीं कर पा रहे हैं ,यह अचरज की बात है अथवा स्त्री-विरोधी? आरक्षित सीटों में स्वाभाविक परिणाम पिछड़ी जाति की  औरतों के पक्ष में होंगे।

डॉ. लोहिया स्त्री-पुरुष गैर-बराबरी को आदि- विषमता का दरजा देते थे । वे ’पिछड़ों’ में सभी जाति की औरतों को जोड़ते थे । दल में शूद्र , अछूत और स्त्रियों का नेतृत्व कैसे उभरे इसकी चिन्ता वे बिना लाग-लपेट के व्यक्त करते थे । वे कहते थे ,’ जाति और योनि के ये दो कटघरे परस्पर सम्बन्धित हैं और एक दूसरे को पालते पोसते हैं ”। उनके द्वारा दिया गया यह उदाहरण सोशलिस्ट पार्टी में ओहदों और कमीटियों में महिला नेतृत्व पैदा करने के प्रति उनकी चिन्ता को दरसाता है :

” एक बार ग़ाजीपुर जिले के एक गाँव में सुखदेव चमार की पत्नी सभा में कुछ देर से आयीं , लेकिन सजधज कर और गाँव के द्विजों की गरदनें उस ओर कुछ मुसकुराहट के साथ मुड़ीं । सुखदेव गाँव के खाते पीते किसान हैं , लेकिन आख़िर चमार , इसलिए उन पर और उनके सम्बन्धियों पर तरह तरह के छोटे छोटे जुल्म हुआ ही करते हैं । बाद में मुझे मालूम हुआ कि उकता कर और कांग्रेस वालों की लालच में आ कर सुखदेव जी का दिमाग पार्टी बदलने के लिए  थोड़ा बहुत डाँवाडोल हो रहा था । लेकिन उनकी पत्नी ने कहा कि जिस पार्टी का हाथ एक बार पकड़ चुके हो ,उसे कभी मत छोड़ना जब तक वह तुमसे साफ़ धोखा न करे । इस घटना को हुए २ – ३ वर्ष तो हो ही गये हैं , लेकिन आज तक मैंने यह नहीं सुना कि सुखदेव जी की पत्नी को गाजीपुर की महिला पंचायत या किसान पंचायत या प्रजा सोशलिस्ट पार्टी में कोई कार्यकारिणी की जगह मिली है , और उससे भी ज्यादा कि धीरज के साथ उनको नेतृत्व के लायक बनाने की कोई कोशिश की गयी है । …. जब तक शूद्रों , हरिजनों और औरतों की सोयी हुई आत्मा का जगना देख कर उसी तरह खुशी न होगी जिस तरह किसान को बीज का अंकुर फूटते देख कर होती है , और उसी तरह जतन तथा मेहनत से उसे फूलने फलने और बढ़ाने की कोशिश न होगी तब तक हिन्दुस्तान में कोई भी वाद , किसी भी तरह की नई जान , लायी न जा सकेगी । द्विज अपने संस्कार में मुर्दा रहेगा , क्योंकि शूद्र की जान पशु बना दी गई है। द्विज के संस्कार और शूद्रों की जान का मिश्रण तो करना ही होगा । इसमें ख़तरे भी बहुत हैं और असाधारण मेहनत करनी पड़ेगी । लेकिन इसके सिवाय दूसरा कोई चारा नहीं । “

बम्बई के एक साथी नन्दकिशोर द्वारा लिखे एक पत्र के जवाब में डॉ. लोहिया उन्हें लिखते हैं :

डॉ. लोहिया

” शूद्र और अछूत जब कुछ तरक्की करते हैं तो द्विजों की खराब बातों की नक़ल करने लगते हैं । जहाँ कहीं कोई अहीर अमीर हो जाता है , अपनी अहीरिन को घर के अन्दर बन्द करना शुरु करता है । मैंने हजार बार कहा है कि वे चमारिनें और धोबिनें कहीं अच्छी हैं जो खुले मुँह काम करती हैं , न कि बनियाइनें और ठकुराइनें जो कि घर के अन्दर बन्द रहती हैं । शूद्रों को इस ओर विशेष ध्यान देना होगा । “

चाहे वे अलग – अलग पार्टियों में बंटे हों , और आपसी संघर्ष काफ़ी बड़ा हो , इनका एक तरह का अचेतन संयुक्त मोर्चा चलता रहता है । इस अचेतन संयुक्त मोर्चे से अलग नीतीश कुमार ने महिला आरक्षण बिल का समर्थन कर  साहस और सूझबूझ का परिचय दिया है ।

हम जिस समाज का सपना देखते हैं और उसे हासिल करने के लिए जिस औजार (दल) को गढ़ते हैं उसमें उस समाज का अक्स दीखना चाहिए । सोशलिस्ट पार्टी द्वारा बुनियादी इकाई से ऊपर की समितियों में तथा टिकट के बँटवारे में इन मूल्यों का ख्याल रखा जाता था जिसके फलस्वरूप कर्पूरी , पासवान , लालू , नीतीश , मुलायम,बेनी प्रसाद नेता बन सके । हमारे दल समाजवादी जनपरिषद की हर स्तर की कमीटियों में दस फीसदी महिलाएं यदि चुन कर नहीं आती तब उस संख्या को हासिल करने के लिए अनुमेलन किया जाता है। हमें इस बात का फक्र है कि दल में वैधानिक तौर पर यह प्रावधान किया गया है । इस प्रावधान को हासिल करने में हुई जद्दोजहद भी गौरतलब थी । भाजपा से भाकपा (माले) तक किसी भी दल में वैधानिक तौर पर महिलाओं के लिए स्थान आरक्षित नहीं है एवं  टिकट के बँटवारे में भी महिलाओं के लिए स्थान निर्धारित नहीं हैं ।

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पूंजीवाद एक बार फिर संकट में है। पिछले दिनों आई जबरदस्त मंदी ने इसकी चूलें हिला दी है और दुनिया अभी इससे पूरी तरह उबरी नहीं है। पूंजीवाद का संकट सिर्फ बैंकों, कंपनियों व शेयर बाजार तक सीमित नहीं है। दुनिया में भूखे, कुपोषित, बेघर और बेरोजगार लोगों की संख्या तेजी से बढ़ी है। आज दुनिया में एक अरब से ज्यादा लोग भूखे रहते हैं, यानी हर छठा आदमी भरपेट नहीं खा पाता है। इंसान की सबसे बुनियादी जरुरत भोजन को भी पूरा नहीं कर पाना पूंजीवादी सभ्यता की सबसे बड़ी विफलता है। पर्यावरण का संकट भी गहराता जा रहा है, जिसे कोपनहेगन सम्मेलन की विफलता ने और उजागर कर दिया है।

इन संकटो ने पूंजीवादी सभ्यता के चमत्कारिक दावों पर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। इसके विकल्पों की तलाश तेज हो गई है। लेकिन इसके लिए जरुरी है कि पहले इसकी बुनियादी गड़बड़ियों को समझा जाए और उनका सम्यक रुप से विश्लेषण किया जा सके।

कार्ल मार्क्स पूंजीजीवाद के सबसे बड़े और सशक्त व्याख्याकार व टीकाकार रहे हैं। किन्तु डेढ़ सौ सालों बाद उनके विश्लेषण और सिद्धांतों में कई कमियां दिखाई देती है। पूंजीवाद के विकास ,विनाश और क्रांति के बारे में उनकी भविष्यवाणियां सही साबित नहीं हुई हैं। पूरी दुनिया पूंजीपतियों और मजदूरों में नहीं बंटी। कारखानों का संगठित मजदूर वर्ग क्रांति का अगुआ अब नहीं रहा। रुस, पूर्वी यूरोप, चीन, वियतनाम आदि में जो कम्युनिस्ट क्रांतियां हुई, वे धराशायी हो गई हैं, और ये देश वापस पूंजीवाद के आगोश में चले गए हैं। इधर लातीनी अमरीका में जो समाजवाद की बयार चली है, वह शास्त्रीय मार्क्सवादी धारा से काफी अलग है।

दुनिया में आंदोलन और संघर्ष तो बहुत हो रहे हैं। किन्तु मजदूर-मालिक संघर्ष अब खबरों में नहीं है। किसानों, आदिवासियों और असंगठित मजदूरों के आंदोलन, जल-जंगल-जमीन के आंदोलन, धार्मिक-सामुदायिक-राष्ट्रीय पहचान आधारित आंदोलन तो हैं , किन्तु वे मार्क्स के विचारों से काफी अलग हैं। तब हम इन्हें कैसे समझे ?

इस मामले में डॉ० राममनोहर लोहिया से हमें मदद मिल सकती है। उन्होंनें 1943 में ‘अर्थशास्त्र मार्क्स के आगे’ नामक निबंध लिखा। उन्होंने बताया कि पूंजीवादी शोषण का मुख्य आधार एक कारखाने या एक देश के अंदर मालिक द्वारा मजदूर का शोषण नहीं, बल्कि उपनिवेशों का शोषण है। उपनिवेशों के किसान, कारीगर व मजदूर ही असली सर्वहारा है। लेनिन का यह कथन गलत है कि साम्राज्यवाद पूंजीवाद की अंतिम अवस्था है। बल्कि, यह पूंजीवाद की पहली और अनिवार्य अवस्था है। यदि पश्चिम यूरोप के देशों ने अमरीका, अफ्रीका, एशिया और आस्ट्रेलिया के विशाल भूभागों पर कब्जा करने और लूटने का काम न किया होता, तो वहां औद्योगिक क्रांति नहीं हो सकती थी।

उपनिवेशों के आजाद होने के बाद भी नव-औपनिवेशिक और नव-साम्राज्यवादी तरीकों से यह लूट व शोषण चालू है और इसीलिए पूंजीवाद फल-फूल रहा है। यह शोषण सिर्फ औपनिवेशिक श्रम का ही नहीं है। इसमें पूरी दुनिया के प्राकृतिक संसाधनों का बढ़ता हुआ दोहन, लूट और विनाश भी अनिवार्य रुप से छिपा है। इसीलिए आज दुनिया में सबसे ज्यादा झगड़े प्राकृतिक संसाधनों को लेकर हो रहे हैं। इसीलिए पर्यावरण के संकट भी पैदा हो रहे हैं।

औपनिवेशिक शोषण की जरुरत पूंजीवादी विकास के लिए इतनी जरुरी है, कि तीसरी दुनिया के जिन देशों ने इस तरह का विकास करने की कोशिश की, बाहरी उपनिवेश न होने पर उन्होंनें आंतरिक उपनिवेश विकसित किए। आंतरिक उपनिवेश सिर्फ क्षेत्रीय व भौगोलिक ही नहीं होते हैं। अर्थव्यवस्था के कुछ हिस्से भी (जैसे गांव या खेती) आंतरिक उपनिवेश बन जाते हैं। भारतीय खेती के अभूतपूर्व संकट और किसानों की आत्महत्याओं के पीछे आंतरिक उपनिवेश की व्यवस्था ही है।

सोवियत संघ का सबसे बड़ा अंतर्विरोध यही था कि उसने उसी तरह का औद्योगीकरण और विकास करने की कोशिश की, जैसा पूंजीवादी यूरोप-अमरीका में हुआ था। किन्तु बाहरी और आंतरिक उपनिवेशों की वैसी सुविधा उसके पास नहीं थी।

इसलिए, पूंजीवाद का एक बुनियादी नियम हम इस तरह बयान कर सकते हैं :

पूंजीवादी विकास के लिए औपनिवेशिक, नव-औपनिवेशिक या आंतरिक – औपनिवेशिक

शोषण जरुरी है। यह शोषण दोनों का होता है – श्रम का भी और प्राकृतिक संसाधनों का भी।

दुनिया के स्तर पर इस नियम का अभी तक कोई महत्वपूर्ण अपवाद नहीं है।

लोहिया के पहले गांधी ने आधुनिक पूंजीवादी सभ्यता के इस शोषणकारी-विनाशकारी चरित्र के बारे में चेतावनी दी थी। मार्क्स के अनुयायियों में रोजा लक्ज़मबर्ग ने इस विषय में मार्क्स की खामियों को उजागर किया था और उसे सुधारने की कोशिश की। लोहिया के बाद लातीनी अमरीका के आन्द्रे गुन्दर फ्रेंक और मिस्त्र के समीर अमीन नामक मार्क्सवादी अर्थशास्त्रियों ने लोहिया से मिलती-जुलती बातें कही है।

यदि ऊपर कही गई बातें सही हैं, तो इनसे कई निष्कर्ष निकलते हैं :

’ तीसरी दुनिया के गरीब देशों में यूरोप-अमरीका जैसा औद्योगीकरण एवं विकास संभव नहीं है, चाहे वह पूंजीवादी तरीके से किया जाए या साम्यवादी (राज्य पूंजीवादी) तरीके से किया जाए।

’ चूंकि अमरीका-यूरोप की समृद्धि व जीवन-शैली पूरी दुनिया के श्रम व प्राकृतिक संसाधनों की लूट पर टिकी है, वह दुनिया के सारे लोगों के लिए हासिल करना संभव नहीं है। इसलिए समाजवादियों को उसका सपना छोड़ देना होगा। सबकी न्यूनतम बुनियादी जरुरतें तो पूरी हो सकती हैं, किन्तु विलासितापूर्ण जीवन सबका नहीं हो सकता है। दूसरे शब्दों में ‘स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व’ के साथ ‘सादगी’ और ‘स्वावलंबन’ भी समाजवादी समाज के निर्माण के महत्वपूर्ण एवं जरुरी सूत्र होंगे।

’ इस अर्थ में दुनिया का आर्थिक-राजनैतिक संकट और पर्यावरणीय संकट आपस में जुड़े हैं। एक वैकल्पिक समाजवादी व्यवस्था में ही दोनों संकटों से मुक्ति मिल सकेगी। दूसरे शब्दों में, समाजवाद निर्माण के किसी भी प्रयास में दोनों तरह के आंदोलनों – आर्थिक-सामाजिक बराबरी के आंदोलन एवं पर्यावरण के आंदोलन – को मिलकर ताकत लगाना होगा।

’ विकल्प सिर्फ पूंजीवाद (उत्पादन संबंधों के संकुचित अर्थ में) का नहीं हो सकता। निजी संपत्ति को खतम करना काफी नहीं है। पूंजीवादी उत्पादन संबंधों के साथ पूंजीवादी तकनालॉजी, जीवन-शैली और जीवन-मूल्यों का भी विकल्प खोजना होगा। दूसरे शब्दों में हमें ‘पूंजीवादी सभ्यता’ का विकल्प खोजना होगा। एक नयी सभ्यता का निर्माण करना होगा।

इक्कीसवीं सदी में समाजवाद की किसी भी संकल्पना, तलाश और कोशिश में ये महत्वपूर्ण सूत्र होंगे। इनके लिए हम लोहिया के आभारी हैं।

————–’’’…………………………

(साहित्य अकादमी द्वारा डॉ० राममनोहर लोहिया पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी (18-20फरवरी 2010) में पेश आलेख – हिन्दी सारांश)

– सुनील

ग्रा/पो केसला,

जि. होशंगाबाद, मध्य प्रदेश

461111

ईमेल – sjpsunil@gmail.com

कार्य :- समाजवादी विचारों का प्रचार-प्रसार। आदिवासियों, किसानों,

मछुआरों एवं विस्थापितों के संघर्ष एवं संगठन में पिछले 25 वर्ष से सक्रिय। अखबारों, पत्रिकाओं में लेखन। कई पुस्तिकाएं भी प्रकाशित।

पद :- राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, समाजवादी जन परिषद।

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देश के सारे बच्चों को मुफ्त, समतापूर्ण, गुणवत्तापू्र्ण शिक्षा के संघर्ष के लिए आगे आएं

लोकसभा चुनाव में दुबारा जीतकर आने के बाद संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के नए मानव संसाधन विकास मंत्री श्री कपिल सिब्बल ने कई घोषणाएं की हैं। अपने मंत्रालय का 100 दिन का कार्यक्रम जारी करते हुए उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में अनेक प्रकार के सुधारों व बदलावों की मंशा जाहिर की है। उनकी घोषणाओं में प्रमुख हैं :-
शिक्षा में निजी-सार्वजनिक भागीदारी को बढ़ावा देना, देश में विदेशी विश्वविद्यालयों को इजाजत देना, कक्षा 10वीं की बोर्ड परीक्षा समाप्त करना, अंकों के स्थान पर ग्रेड देना, देश भर के कॉलेजों में दाखिला के लिए एक अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा लेना, व्यावसायिक शिक्षा के लिए बैंक ऋण में गरीब छात्रों को ब्याज अनुदान देना आदि। यशपाल समिति की सिफारिश को भी स्वीकार किया जा सकता है, जिसमें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद्, भारतीय चिकित्सा परिषद् आदि को समाप्त कर चुनाव आयोग की तर्ज पर ‘राष्ट्रीय उच्च शिक्षा एवं शोध आयोग’ बनाने का सुझाव दिया गया है। अचरज की बात है कि शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची में है, किन्तु श्री सिब्बल ने इन घोषणाओं के पहले राज्य सरकारों से परामर्श की जरुरत भी नहीं समझी।

शिक्षा अधिकार सम्मेलन , भोपाल

शिक्षा अधिकार सम्मेलन , भोपाल

इनमें से कुछ प्रावधान अच्छे हो सकते हैं, किन्तु कई कदम खतरनाक हैं और उन पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस की जरुरत है। इन घोषणाओं से प्रतीत होता है कि भारत सरकार और श्री कपिल सिब्बल भारत की शिक्षा की दुरावस्था से चिंतित हैं और उसको सुधारना चाहते हैं। लेकिन वास्तव में वे शिक्षा का निजीकरण एवं व्यवसायीकरण, शिक्षा में मुनाफाखोरी के नए अवसर खोलने, विदेशी शिक्षण संस्थाओं की घुसपैठ कराने, सरकारी शिक्षा व्यवस्था को और ज्यादा बिगाड़ने, साधारण बच्चों को शिक्षा से वंचित करने और देश के सारे बच्चों को शिक्षति करने की सरकार की जिम्मेदारी से भागने की तैयारी कर रहे हैं। इन कदमों का पूरी ताकत से विरोध होना चाहिए। साथ ही अब समय आ गया है कि देश के सारे बच्चों को अच्छी शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए सरकारी संसाधनों से समान स्कूल प्रणाली पर आधारित मुफ्त, अनिवार्य व समतापू्र्ण शिक्षा के लिए सघर्ष को तेज किया जाए।

शिक्षा अधिकार विधेयक का पाखंड

‘बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा अधिकार विधेयक’ संसद में काफी समय से लंबित है और इसका काफी विरोध हुआ है। वर्तमान स्वरुप में यह देश के बच्चों को शिक्षा का
अधिकार देने के बजाय छीनने का काम करता है। इस विधेयक में शिक्षा के बढ़ते निजीकरण, व्यवसायीकरण और बाजारीकरण पर रोक लगाने की कोई बात नहीं है। आज देश में शिक्षा की कई परतें बन गई हैं। जिसकी जैसी आर्थिक हैसियत है, उसके हिसाब से वह अपने बच्चों को उस स्तर के स्कूलों मे पढ़ा रहा है। सरकारी स्कूलों की हालत जानबूझकर इतनी खराब बना दी गई है कि उनमें सबसे गरीब साधनहीन परिवारों के बच्चे ही जा रहे हैं। ऐसी हालत में उनकी उपेक्षा और बदहाली और ज्यादा बढ़ गई है। इस दुष्चक्र और भेदभाव को तोड़ने के बजाय यह विधेयक और मजबूत करता है।
विश्वबैंक के निर्देशों के तहत, शिक्षा के बाजार को बढ़ावा देने के मकसद से, पिछले कुछ वर्षों से केन्द्र सरकार व राज्य सरकारों ने जानबूझकर सरकारी शिक्षा व्यवस्था बिगाड़ने का काम किया है। पहले तो देश के सारे बच्चों को स्कूली शिक्षा प्रदान करने के संवैधानिक निर्देश को पूरा करने के बजाय साक्षरता अभियान, औपचारिकेतर शिक्षा व शिक्षा गारंटी शालाओं के नाम पर सरकार ने अपनी जिम्मेदारी टालने की कोशिश की। फिर स्कूलों व कॉलेजों में स्थायी-प्रशिक्षति शिक्षकों के  स्थान पर पैरा-शिक्षकों की नियुक्तियां शुरु कर दी,जो अस्थायी व अप्रशिक्षति होते हैं और जिन्हें बहुत कम वेतन दिया जाता है। इसी के साथ प्राथमिक शालाओं में दो या तीन शिक्षकों की कामचलाऊ नियुक्ति को भी वैधानिक स्वीकृति दे दी गई, जिसका मतलब है कि एक शिक्षक दो, तीन, चार या पांच कक्षाएं एक साथ पढ़ाएगा। देश के साधारण गरीब बच्चों को इस लायक भी सरकार ने नहीं समझा कि एक कक्षा के लिए कम से कम एक शिक्षक मुहैया कराया जाए। सरकारी शिक्षकों को तमाम तरह के गैर-शैक्षणिक कामों में लगाने पर भी रोक इस विधेयक में नहीं लगाई गई है, जिसका मतलब है सरकारी स्कूलों में शिक्षकों का और ज्यादा अभाव एवं ज्यादा गैरहाजिरी। चूंकि निजी स्कूलों के शिक्षकों को इस तरह की कोई ड्यूटी नहीं करनी पड़ती है, सरकारी स्कूलों में जाने वाले साधारण गरीब बच्चों के प्रति भेदभाव इससे और मजबूत होता है। निजी स्कूलों के साधन-संपन्न बच्चों के साथ प्रतिस्पर्धा में इससे वे और कमजोर पड़ते जाते हैं।

भोपाल सम्मेलन

भोपाल सम्मेलन

निजी स्कूल कभी भी देश के सारे बच्चों को शिक्षा देने का काम नहीं कर सकते हैं,क्योंकि उनकी फीस चुकाने की क्षमता सारे लोगों में नहीं होती है। शिक्षा का निजीकरण देश में पहले से मौजूद अमीर-गरीब की खाई को और ज्यादा मजबूत करेगा तथा करोड़ों बच्चों को शिक्षा से वंचित करने का काम करेगा। देश के सारे बच्चों को शिक्षति करने के लिए सरकार को ही आगे आना पड़ेगा व जिम्मेदारी लेनी होगी। लेकिन सरकार ने अपनी शिक्षा व्यवस्था को इस चुनौती के अनुरुप फैलाने, मजबूत करने और बेहतर बनाने के बजाय लगातार उल्टे बिगाड़ा है व उपेक्षति-वंचित किया है। सरकारी स्कूलों की संख्या में जरुर वृद्धि हुई है, स्कूलों में नाम दर्ज बच्चों की संख्या भी 90-95 प्रतिशत तक पहुंचने का दावा किया जा रहा है, किन्तु इस कुव्यवस्था, घटिया शिक्षा, अनुपयुक्त व अरुचिपूर्ण शिक्षा पद्धति, खराब व्यवहार एवं गरीबी की परिस्थितियों के कारण आधे से भी कम बच्चे 8 वीं कक्षा तक पहुंच पाते हैं। इसलिए शिक्षा के अधिकार की कोई भी बात करने के पहले देश की सरकारी शिक्षा व्यवस्था को सार्थक, संपू्र्ण, सुव्यवस्थित व सर्वसुविधायुक्त बनाना जरुरी है। जो सरकार उल्टी दिशा में काम कर रही है, और जानबूझकर सरकारी स्कूल व्यवस्था को नष्ट करने का काम कर रही हैं, उसके द्वारा शिक्षा अधिकार विधेयक संसद में पास कराने की बात करना एक पाखंड है और आंखों में धूल झोंकने के समान है।

समान स्कूल प्रणाली एकमात्र विकल्प

देश के सारे बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल सके, इसके लिए यह भी जरुरी है कि देश में कानून बनाकर पड़ोसी स्कूल पर आधारित समान स्कूल प्रणाली लागू की जाए। इसका मतलब यह है कि एक गांव या एक मोहल्ले के सारे बच्चे (अमीर या गरीब, लड़के या लड़की, किसी भी जाति या धर्म के) एक ही स्कूल में पढ़ेंगे। इस स्कूल में कोई फीस नहीं ली जाएगी और सारी सुविधाएं मुहैया कराई जाएगी। यह जिम्मेदारी सरकार की होगी और शिक्षा के सारे खर्च सरकार द्वारा वहन किए जाएंगे। सामान्यत: स्कूल सरकारी होगें, किन्तु फीस न लेने वाले परोपकारी उद्देश्य से (न कि मुनाफा कमाने के उद्देश्य से) चलने वाले कुछ निजी स्कूल भी इसका हिस्सा हो सकते हैं। जब बिना भेदभाव के बड़े-छोटे, अमीर-गरीब परिवारों के बच्चे एक ही स्कूल में पढ़ेगें तो अपने आप उन स्कूलों की उपेक्षा दूर होगी, उन पर सबका ध्यान होगा और उनका स्तर ऊपर उठेगा। भारत के सारे बच्चों को शिक्षति करने का कोई दूसरा उपाय नहीं है। दुनिया के मौजूदा विकसित देशों में कमोबेश इसी तरह की स्कूल व्यवस्था रही है और इसी तरह से वे सबको शिक्षति बनाने का लक्ष्य हासिल कर पाए हैं। समान स्कूल प्रणाली का प्रावधान किए बगैर शिक्षा अधिकार विधेयक महज एक छलावा है।
इस विधेयक में और कई कमियां हैं। यह सिर्फ 6 से 14 वर्ष की उम्र तक (कक्षा 1 से 8 तक) की शिक्षा का अधिकार देने की बात करता है। इसका मतलब है कि बहुसंख्यक बच्चे कक्षा 8 के बाद शिक्षा से वंचित रह जाएंगे। कक्षा 1 से पहले पू्र्व प्राथमिक शिक्षा भी महत्वपू्र्ण है। उसे
अधिकार के दायरे से बाहर रखने का मतलब है सिर्फ साधन संपन्न बच्चों को ही केजी-1, केजी-2  आदि की शिक्षा पाने का अधिकार रहेगा। शुरुआत से ही भेदभाव की नींव इस विधेयक द्वारा डाली जा रही है।
शिक्षा अधिकार विधेयक में निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटों का आरक्षण गरीब बच्चों के लिए करने का प्रावधान किया गया है और उनकी ट्यूशन फीस का भुगतान सरकार करेगी। किन्तु महंगे निजी स्कूलों में ट्यूशन फीस के अलावा कई तरह के अन्य शुल्क लिए जाते हैं, क्या उनका भुगतान गरीब परिवार कर सकेगें ? क्या ड्रेस, कापी-किताबों  आदि का भारी खर्च वे उठा पाएंगे ? क्या यह एक ढकोसला नहीं होगा ? फिर क्या इस प्रावधान से गरीब बच्चों की शिक्षा का सवाल हल हो जाएगा ? वर्तमान में देश में स्कूल आयु वर्ग के 19 करोड़ बच्चे हैं। इनमें से लगभग 4 करोड़ निजी स्कूलों में पढ़ते हैं। मान लिया जाए कि इस विधेयक के पास होने के बाद निजी स्कूलों में और 25 प्रतिशत यानि 1 करोड़ गरीब बच्चों का दाखिला हो जाएगा, तो भी बाकी 14 करोड़ बच्चों का क्या होगा ? इसी प्रकार जब सरकार गरीब प्रतिभाशाली बच्चों के लिए नवोदय विद्यालय, कस्तूरबा कन्या विद्यालय, उत्कृष्ट विद्यालय और अब प्रस्तावित मॉडल स्कूल खोलती है, तो बाकी विशाल संख्या में बच्चे और ज्यादा उपेक्षति हो जाते है। ऐसी हालत में, देश के हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार देने की बात महज एक लफ्फाजी बनकर रह जाती है।

शिक्षा का मुक्त बाजार ?

वास्तव में नवउदारवादी रास्ते पर चल रही भारत सरकार देश में शिक्षा का मुक्त बाजार बनाने को प्रतिबद्ध है और उसी दिशा में आगे बढ़ रही है। शिक्षा में सरकारी-निजी भागीदारी का मतलब व्यवहार में यह होगा कि या तो नगरों व महानगरों की पुरानी सरकारी शिक्षण संस्थाओं के पास उपलब्ध कीमती जमीन निजी हाथों के कब्जे में चली जाएगी या फिर प्रस्तावित मॉडल स्कूलों में पैसा सरकार का होगा, मुनाफा निजी हाथों में जाएगा। निजीकरण के इस माहौल में छात्रों और अभिभावकों का शोषण बढ़ता जा रहा है। बहुत सारी घटिया, गैरमान्यताप्राप्त और फर्जी शिक्षण संस्थाओं की बाढ़ आ गई है। दो-तीन कमरों में चलने वाले कई निजी विश्वविद्यालय आ गए हैं और कई निजी संस्थानों को डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा दे दिया गया है। कोचिंग और ट्यूशन का भी बहुत बड़ा बाजार बन गया है। बड़े कोचिंग संस्थान तो करोड़ों की कमाई कर रहे है। अभिभावकों के लिए अपने बच्चों को पढ़ाना व प्रतिस्पर्धा में उतारना दिन-प्रतिदिन महंगा व मुश्किल होता जा रहा है। गरीब और साधारण हैसियत के बच्चों के लिए दरवाजे बंद हो रहे है।
यदि कपिल सिब्बल की चलेगी तो अब कॉलेज में दाखिले के लिए भी अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा होगी। इससे कोचिंग का बाजार और बढ़ेगा तथा साधारण हैसियत के युवाओं के लिए कॉलेज शिक्षा के दरवाजे भी बंद होने लगेगें। आत्महत्याओं व कुंठा में और बढ़ोत्तरी होगी। विडंबना यह है कि बच्चों का परीक्षा का तनाव कम करने की बात करने वाले सिब्बल साहब को गलाकाट प्रतिस्पर्धाओं और कोचिंग कारोबार के दोष नहीं दिखाई देते। महंगी निजी शिक्षा के लिए उनका फार्मूला है शिक्षा ऋण तथा गरीब विद्यार्थियों के लिए इस ऋण में ब्याज अनुदान। लेकिन बहुसंख्यक युवाओं की कुंठा, वंचना और हताशा बढ़ती जाएगी।
यदि देश के दरवाजे विदेशी शिक्षण संस्थाओं और विदेशी विश्वविद्यालय के लिए खोल दिए गए, तो बाजार की यह लूट व धोखाधड़ी और बढ़ जाएगी। यह उम्मीद करना बहुत गलत एवं भ्रामक है कि दुनिया के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय भारत में आने को तत्पर है और इससे देशमें  शिक्षा का स्तर बढ़ेगा। वास्तव में घटिया, चालू और मुनाफे व कमाई की खोज में बैचेन विश्वविद्यालय व शिक्षण संस्थान ही आएंगे। देश के जनजीवन के लगभग हर क्षेत्र को विदेशी कंपनियों के मुनाफे के लिए खोलने के बाद अब शिक्षा, स्वास्थ्य, मीडिया आदि के बाकी क्षेत्रों को भी विदेशी कंपनियों के लूट व मुनाफाखोरी के हवाले करने की यह साजिश है। यह सिर्फ आर्थिक लूट ही नहीं होगी। इससे देश के ज्ञान-विज्ञान, शोध, चिन्तन, मूल्यों और संस्कृति पर भी गहरा विपरीत असर पड़ेगा। इसका पूरी ताकत से प्रतिरोध करना जरुरी है।

स्वतंत्र आयोग या निजीकरण का वैधानीकरण ?

यशपाल समिति की पूरी रिपोर्ट का ब्यौरा सामने नहीं आया है। उच्च शिक्षा की बिगड़ती दशा के बारे में उसकी चिंता जायज है। डीम्ड विश्वविद्यालयों की बाढ़ के बारे में भी उसने सही चेतावनी दी है। किन्तु यू.जी.सी., अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद्, भारतीय चिकित्सा परिषद् आदि समाप्त करके उनके स्थान पर चुनाव आयोग जैसा स्वतंत्र एवं स्वायत्त ‘उच्च शिक्षा एवं शोध आयोग’ बनाने के सुझाव पर सावधानी की जरुरत है। पिछले कुछ समय में, विश्व बैंक के सुझाव पर अनेक प्रांतो में विद्युत नियामक आयोग एवं जल नियामक आयोग बनाए गए हैं। राष्ट्रीय स्तर पर दूरसंचार व बीमा के लिए भी इस तरह के आयोग बने हैं। दरअसल ये सारे आयोग निजीकरण के साथ आए हैं। जब तक सब कुछ सरकार के हाथ में था, आयोग की जरुरत नहीं थी। यह कहा जाता है कि ये आयोग सरकार से स्वतंत्र एवं स्वायत्त होते हैं और राजनीतिक प्रभाव से मुक्त होते हैं। लेकिन विश्वबैंक और देशी-विदेशी कंपनियों का प्रभाव उन पर काम करता रहता है। कम से कम बिजली और पानी के बारे में इन आयोगों की भूमिका निजीकरण की राह प्रशस्त करना, उसे वैधता देने और बिजली-पानी की दरों को बढ़ाने की रही है। उन्हें राजनीति से अलग रखने के पीछे मंशा यह भी है कि जन असंतोष और जनमत का दबाब उन पर न पड़ जाए। उच्च शिक्षा और स्कूली शिक्षा के बारे में इस तरह के आयोगों की भूमिका भी निजीकरण को वैधता प्रदान करने की हो सकती है, जबकि जरुरत शिक्षा के निजीकरण को रोकने व समाप्त करने की है। अफसोस की बात है कि यशपाल समिति ने उच्च शिक्षा के निजीकरण और विदेशी संस्थानों के घुसपैठ का स्पष्ट विरोध नहीं किया है।

आइए, आठ सूत्री देशव्यापी मुहिम छेड़ें

शिक्षा का बाजार एक विकृति है। बच्चों में शिक्षा, स्वास्थ्य व पोषण में भेदभाव करना
आधुनिक सभ्य समाज पर कलंक के समान है। देश के सारे बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना हमारा संवैधानिक दायित्व है। भारतीय संविधान में इस काम को 10 वर्ष में पूरा करने के निर्देश दिए गए थे। लेकिन छ: दशक में भी इसे पूरा न करके भारत की सरकारों ने भारत की जनता, देश और संविधान के प्रति अक्षम्य अपराध किया है। अब सरकार जो कदम उठा रही हैं,उससे यह लक्ष्य और दूर हो जाएगा। समय आ गया है कि इस मामले में देश भर में मुहिम चलाकर भारत सरकार पर दबाब बनाया जाए कि –
1.    शिक्षा के निजीकरण, व्यवसायीकरण और मुनाफाखोरी को तत्काल रोका जाए और इस दिशा में उठाए गए सारे कदम वापस लिए जाएं।
2.    शिक्षा में विदेशी शिक्षण संस्थानों के प्रवेश पर रोक लगे।
3.    शिक्षा में सभी तरह के भेदभाव और गैरबराबरी खतम की जाए। समान स्कूल प्रणाली पर आधारित मुफ्त, अनिवार्य एवं समतामूलक शिक्षा की व्यवस्था देश के सारे बच्चों के लिए अविलंब की जाए।
4.    सरकारी स्कूलों में पर्याप्त संख्या में स्थायी व प्रशिक्षति शिक्षक नियुक्त किए जाएं और उन्हें सम्मानजनक वेतन दिए जाएं। स्कूलों में भवन, पाठ्य-पुस्तकों, पाठ्य सामग्री, खेल सामग्री, खेल मैदान, प्रयोगशाला, पुस्तकालय, शिल्प-शिक्षण, छात्रवृत्तियों, छात्रावास आदि की पर्याप्त एवं समुचित व्यवस्था हो। सुविधाओं व स्तर की दृष्टि से प्रत्येक स्कूल को केन्द्रीय विद्यालय या नवोदय विद्यालय के समकक्ष लाया जाए।
5.    ‘शिक्षा का अधिकार विधेयक’ के मौजूदा प्रारुप को तत्काल वापस लेकर उक्त शर्तों को पूरा करने वाला नया विधेयक लाया जाए। विधेयक के मसौदे पर पूरे देश में जनसुनवाई की जाए एवं चर्चा-बहस चलाई जाए।
6.    शिक्षा की जिम्मेदारी से भागना बंद करके सरकार शिक्षा के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए। कोठारी आयोग एवं तपस सेनगुप्ता समिति की सिफारिश के मुताबिक कम से कम राष्ट्रीय आय के छ: प्रतिशत के बराबर व्यय सरकार द्वारा शिक्षा पर किया जाए।
7.    शिक्षा का माध्यम मातृभाषा हो। शिक्षा, प्रशासन एवं सार्वजनिक जीवन में अंग्रेजी का वर्चस्व गुलामी की विरासत है। इसे तत्काल समाप्त किया जाए।
8.    मैकाले द्वारा बनाया शिक्षा का मौजूदा किताबी, तोतारटन्त, श्रम के तिरस्कार वाला, जीवन से कटा, विदेशी प्रभाव एवं अंग्रेजी के वर्चस्व वाला स्वरुप बदला जाए। इसे आम लोगों की जरुरतों के अनुसार ढाला जाए एवं संविधान के लक्ष्यों के मुताबिक समाजवादी,धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रकि एवं प्रगतिशील भारत के निर्माण के हिसाब से बनाया जाए। हर बच्चे के अंदर छुपी क्षमताओं व प्रतिभाओं के विकास का मौका इससे मिले।
लगभग इसी तरह के मुद्दों व मांगो को लेकर 21-22 जून को एक राष्ट्रीय सेमिनार में अखिल भारतीय शिक्षा अधिकार मंच का गठन हुआ है, जिसकी ओर से जुलाई में संसद पर प्रदर्शन की तैयारी की जा रही है। अखिल भारतीय समाजवादी अध्यापक सभा द्वारा भी काफी समय से इन मुद्दों पर मुहिम चलाई जा रही है जिसका समापन  25 अक्टूबर 2009 को दिल्ली मे राजघाट पर होगा।
कृपया आप भी अपने क्षेत्र मेंव अपनी इकाइयों में इन मुद्दों व मांगो पर तत्काल कार्यक्रम लें। आप गोष्ठी, धरने, प्रदर्शन, ज्ञापन, परचे वितरण, पोस्टर प्रदर्शनी आदि का आयोजन कर सकते हैं। स्थानीय स्तर पर शिक्षकों, अभिभावकों, विद्यार्थियों, जागरुक नागरिकों व अन्य जनसंगठनों के साथ मिलकर ‘शिक्षा अधिकार मंच’ का गठन भी कर सकते हैं।
उल्लेखनीय है कि यह वर्ष प्रखर समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया का जन्मशताब्दी वर्ष है। उनके नेतृत्व में पचास साल पहले ही समाजवादी आंदोलन ने मुफ्त और समान शिक्षा का आंदोलन छेड़ा था तथा अंग्रेजी के वर्चस्व का विरोध किया था। ‘चपरासी हो या अफसर की संतान, सबकी शिक्षा एक समान’ तथा ‘चले देश में देशी भाषा, गांधी-लोहिया की यह अभिलाषा’ के नारे देते हुए शिक्षा में भेदभाव समाप्त करने का आह्वान किया था। डॉ. लोहिया की जन्मशताब्दी पर उनके प्रति सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यही होगी कि इस आवाज को हम फिर से पूरी ताकत से बुलंद करें।

सुनील
राष्ट्रीय अध्यक्ष
समाजवादी जन परिषद्
ग्राम- पोस्ट – केसला
जिला होशंगाबाद
फोन 09425040452

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एक आह्वान

शिक्षा अधिकार विधेयक एक छलावा है,

शिक्षा का बाजारीकरण एक विकृति है,

देश के सारे बच्चों को मुफ्त, समतापूर्ण, गुणवत्तापू्र्ण शिक्षा के संघर्ष

के लिए आगे आएं

लोकसभा चुनाव में दुबारा जीतकर आने के बाद संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के नए मानव संसाधन विकास मंत्री श्री कपिल सिब्बल ने कई घोषणाएं की हैं। अपने मंत्रालय का 100 दिन का कार्यक्रम जारी करते हुए उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में अनेक प्रकार के सुधारों व बदलावों की मंशा जाहिर की है। उनकी घोषणाओं में प्रमुख हैं :-
शिक्षा में निजी-सार्वजनिक भागीदारी को बढ़ावा देना, देश में विदेशी विश्वविद्यालयों को इजाजत देना, कक्षा 10वीं की बोर्ड परीक्षा समाप्त करना, अंकों के स्थान पर ग्रेड देना, देश भर के कॉलेजों में दाखिला के लिए एक अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा लेना, व्यावसायिक शिक्षा के लिए बैंक ऋण में गरीब छात्रों को ब्याज अनुदान देना आदि। यशपाल समिति की सिफारिश को भी स्वीकार किया जा सकता है, जिसमें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद्, भारतीय चिकित्सा परिषद् आदि को समाप्त कर चुनाव आयोग की तर्ज पर ‘राष्ट्रीय उच्च शिक्षा एवं शोध आयोग’ बनाने का सुझाव दिया गया है। अचरज की बात है कि शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची में है, किन्तु श्री सिब्बल ने इन घोषणाओं के पहले राज्य सरकारों से परामर्श की जरुरत भी नहीं समझी।
इनमें से कुछ प्रावधान अच्छे हो सकते हैं, किन्तु कई कदम खतरनाक हैं और उन पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस की जरुरत है। इन घोषणाओं से प्रतीत होता है कि भारत सरकार और श्री कपिल सिब्बल भारत की शिक्षा की दुरावस्था से चिंतित हैं और उसको सुधारना चाहते हैं। लेकिन वास्तव में वे शिक्षा का निजीकरण एवं व्यवसायीकरण, शिक्षा में मुनाफाखोरी के नए अवसर खोलने, विदेशी शिक्षण संस्थाओं की घुसपैठ कराने, सरकारी शिक्षा व्यवस्था को और ज्यादा बिगाड़ने, साधारण बच्चों को शिक्षा से वंचित करने और देश के सारे बच्चों को शिक्षति करने की सरकार की जिम्मेदारी से भागने की तैयारी कर रहे हैं। इन कदमों का पूरी ताकत से विरोध होना चाहिए। साथ ही अब समय आ गया है कि देश के सारे बच्चों को अच्छी शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए सरकारी संसाधनों से समान स्कूल प्रणाली पर आधारित मुफ्त, अनिवार्य व समता्पूर्ण शिक्षा के लिएश संघर्षको तेज किया जाए।

शिक्षा अधिकार विधेयक का पाखंड

‘बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा अधिकार विधेयक’ संसद में काफी समय से लंबित है और इसका काफी विरोध हुआ है। वर्तमान स्वरुप में यह देश के बच्चों को शिक्षा का अधिकार देने के बजाय छीनने का काम करता है। इस विधेयक में शिक्षा के बढ़ते निजीकरण, व्यवसायीकरण और बाजारीकरण पर रोक लगाने की कोई बात नहीं है। आज देश में शिक्षा की कई परतें बन गई हैं। जिसकी जैसी आर्थिक हैसियत है, उसके हिसाब से वह अपने बच्चों को उस स्तर के स्कूलों मे पढ़ा रहा है। सरकारी स्कूलों की हालत जानबूझकर इतनी खराब बना दी गई है कि उनमें सबसे गरीब साधनहीन परिवारों के बच्चे ही जा रहे हैं। ऐसी हालत में उनकी उपेक्षा और बदहाली और ज्यादा बढ़ गई है। इस दुष्चक्र और भेदभाव को तोड़ने के बजाय यह विधेयक और मजबूत करता है।
विश्वबैंक के निर्देशों के तहत, शिक्षा के बाजार को बढ़ावा देने के मकसद से, पिछले कुछ वर्षों से केन्द्र सरकार व राज्य सरकारों ने जानबूझकर सरकारी शिक्षा व्यवस्था बिगाड़ने का काम किया है। पहले तो देश के सारे बच्चों को स्कूली शिक्षा प्रदान करने के संवैधानिक निर्देश को पूरा करने के बजाय साक्षरता अभियान, औपचारिकेतर शिक्षा व शिक्षा गारंटी शालाओं के नाम पर सरकार ने अपनी जिम्मेदारी टालने की कोशिश की। फिर स्कूलों व कॉलेजों में स्थायी-प्रशिक्षित शिक्षकों के  स्थान पर पैरा-शिक्षकों की नियुक्तियां शुरु कर दी,जो अस्थायी व अप्रशिक्षित होते हैं और जिन्हें बहुत कम वेतन दिया जाता है। इसी के साथ प्राथमिक शालाओं में दो या तीन शिक्षकों की कामचलाऊ नियुक्ति को भी वैधानिक स्वीकृति दे दी गई, जिसका मतलब है कि एक शिक्षक दो, तीन, चार या पांच कक्षाएं एक साथ पढ़ाएगा। देश के साधारण गरीब बच्चों को इस लायक भी सरकार ने नहीं समझा कि एक कक्षा के लिए कम से कम एक शिक्षक मुहैया कराया जाए। सरकारी शिक्षकों को तमाम तरह के गैर-शैक्षणिक कामों में लगाने पर भी रोक इस विधेयक में नहीं लगाई गई है, जिसका मतलब है सरकारी स्कूलों में शिक्षकों का और ज्यादा अभाव एवं ज्यादा गैरहाजिरी। चूंकि निजी स्कूलों के शिक्षकों को इस तरह की कोई ड्यूटी नहीं करनी पड़ती है, सरकारी स्कूलों में जाने वाले साधारण गरीब बच्चों के प्रति भेदभाव इससे और मजबूत होता है। निजी स्कूलों के साधन-संपन्न बच्चों के साथ प्रतिस्पर्धा में इससे वे और कमजोर पड़ते जाते हैं।
निजी स्कूल कभी भी देश के सारे बच्चों को शिक्षा देने का काम नहीं कर सकते हैं, क्योंकि उनकी फीस चुकाने की क्षमता सारे लोगों में नहीं होती है। शिक्षा का निजीकरण देश में पहले से मौजूद अमीर-गरीब की खाई को और ज्यादा मजबूत करेगा तथा करोड़ों बच्चों को शिक्षा से वंचित करने का काम करेगा। देश के सारे बच्चों को शिक्षति करने के लिए सरकार को ही आगे आना पड़ेगा व जिम्मेदारी लेनी होगी। लेकिन सरकार ने अपनी शिक्षा व्यवस्था को इस चुनौती के अनुरुप फैलाने, मजबूत करने और बेहतर बनाने के बजाय लगातार उल्टे बिगाड़ा है व उपेक्षति-वंचित किया है। सरकारी स्कूलों की संख्या में जरुर वृद्धि हुई है, स्कूलों में नाम दर्ज बच्चों की संख्या भी 90-95 प्रतिशत तक पहुंचने का दावा किया जा रहा है, किन्तु इस कुव्यवस्था, घटिया शिक्षा, अनुपयुक्त व अरुचिपू्र्ण शिक्षा पद्धति, खराब व्यवहार एवं गरीबी की परिस्थितियों के कारण आधे से भी कम बच्चे 8 वीं कक्षा तक पहुंच पाते हैं। इसलिए शिक्षा के अधिकार की कोई भी बात करने के पहले देश की सरकारी शिक्षा व्यवस्था को सार्थक, संपूर्ण, सुव्यवस्थित व सर्वसुविधायुक्त बनाना जरुरी है। जो सरकार उल्टी दिशा में काम कर रही है, और जानबूझकर सरकारी स्कूल व्यवस्था को नष्ट करने का काम कर रही हैं, उसके द्वारा शिक्षा अधिकार विधेयक संसद में पास कराने की बात करना एक पाखंड है और आंखों में धूल झोंकने के समान है।

समान स्कूल प्रणाली एकमात्र विकल्प

देश के सारे बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल सके, इसके लिए यह भी जरुरी है कि देश में कानून बनाकर पड़ोसी स्कूल पर आधारित समान स्कूल प्रणाली लागू की जाए। इसका मतलब यह है कि एक गांव या एक मोहल्ले के सारे बच्चे (अमीर या गरीब, लड़के या लड़की, किसी भी जाति या धर्म के) एक ही स्कूल में पढ़ेंगे। इस स्कूल में कोई फीस नहीं ली जाएगी और सारी सुविधाएं मुहैया कराई जाएगी। यह जिम्मेदारी सरकार की होगी और शिक्षा के सारे खर्च सरकार द्वारा वहन किए जाएंगे। सामान्यत: स्कूल सरकारी होगें, किन्तु फीस न लेने वाले परोपकारी उद्देश्य से (न कि मुनाफा कमाने के उद्देश्य से) चलने वाले कुछ निजी स्कूल भी इसका हिस्सा हो सकते हैं। जब बिना भेदभाव के बड़े-छोटे, अमीर-गरीब परिवारों के बच्चे एक ही स्कूल में पढ़ेगें तो अपने आप उन स्कूलों की उपेक्षा दूर होगी, उन पर सबका ध्यान होगा और उनका स्तर ऊपर उठेगा। भारत के सारे बच्चों को शिक्षित करने का कोई दूसरा उपाय नहीं है। दुनिया के मौजूदा विकसित देशों में कमोबेश इसी तरह की स्कूल व्यवस्था रही है और इसी तरह से वे सबको शिक्षति बनाने का लक्ष्य हासिल कर पाए हैं। समान स्कूल प्रणाली का प्रावधान किए बगैर शिक्षा अधिकार विधेयक महज एक छलावा है।
इस विधेयक में और कई कमियां हैं। यह सिर्फ 6 से 14 वर्ष की उम्र तक (कक्षा 1 से 8 तक) की शिक्षा का अधिकार देने की बात करता है। इसका मतलब है कि बहुसंख्यक बच्चे कक्षा 8 के बाद शिक्षा से वंचित रह जाएंगे। कक्षा 1 से पहले पू्र्व प्राथमिक शिक्षा भी महत्वपू्र्ण है। उसे अधिकार के दायरे से बाहर रखने का मतलब है सिर्फ साधन संपन्न बच्चों को ही केजी-1, केजी-2  आदि की शिक्षा पाने का अधिकार रहेगा। शुरुआत से ही भेदभाव की नींव इस विधेयक द्वारा डाली जा रही है।
शिक्षा अधिकार विधेयक में निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटों का आरक्षण गरीब बच्चों के लिए करने का प्रावधान किया गया है और उनकी ट्यूशन फीस का भुगतान सरकार करेगी। किन्तु महंगे निजी स्कूलों में ट्यूशन फीस के अलावा कई तरह के अन्य शुल्क लिए जाते हैं, क्या उनका भुगतान गरीब परिवार कर सकेगें ? क्या ड्रेस, कापी-किताबों  आदि का भारी खर्च वे उठा पाएंगे ? क्या यह एक ढकोसला नहीं होगा ? फिर क्या इस प्रावधान से गरीब बच्चों की शिक्षा का सवाल हल हो जाएगा ? वर्तमान में देश में स्कूल आयु वर्ग के 19 करोड़ बच्चे हैं। इनमें से लगभग 4 करोड़ निजी स्कूलों में पढ़ते हैं। मान लिया जाए कि इस विधेयक के पास होने के बाद निजी स्कूलों में और 25 प्रतिशत यानि 1 करोड़ गरीब बच्चों का दाखिला हो जाएगा, तो भी बाकी 14 करोड़ बच्चों का क्या होगा ? इसी प्रकार जब सरकार गरीब प्रतिभाशाली बच्चों के लिए नवोदय विद्यालय, कस्तूरबा कन्या विद्यालय, उत्कृष्ट विद्यालय और अब प्रस्तावित मॉडल स्कूल खोलती है, तो बाकी विशाल संख्या में बच्चे और ज्यादा उपेक्षति हो जाते है। ऐसी हालत में, देश के हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार देने की बात महज एक लफ्फाजी बनकर रह जाती है।

शिक्षा का मुक्त बाजार ?

वास्तव में नवउदारवादी रास्ते पर चल रही भारत सरकार देश में शिक्षा का मुक्त बाजार बनाने को प्रतिबद्ध है और उसी दिशा में आगे बढ़ रही है। शिक्षा में सरकारी-निजी भागीदारी का मतलब व्यवहार में यह होगा कि या तो नगरों व महानगरों की पुरानी सरकारी शिक्षण संस्थाओं के पास उपलब्ध कीमती जमीन निजी हाथों के कब्जे में चली जाएगी या फिर प्रस्तावित मॉडल स्कूलों में पैसा सरकार का होगा, मुनाफा निजी हाथों में जाएगा। निजीकरण के इस माहौल में छात्रों और अभिभावकों का शोषण बढ़ता जा रहा है। बहुत सारी घटिया, गैरमान्यताप्राप्त और फर्जी शिक्षण संस्थाओं की बाढ़ आ गई है। दो-तीन कमरों में चलने वाले कई निजी विश्वविद्यालय आ गए हैं और कई निजी संस्थानों को डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा दे दिया गया है। कोचिंग और ट्यूशन का भी बहुत बड़ा बाजार बन गया है। बड़े कोचिंग संस्थान तो करोड़ों की कमाई कर रहे है। अभिभावकों के लिए अपने बच्चों को पढ़ाना व प्रतिस्पर्धामें उतारना दिन-प्रतिदिन महंगा व मुश्किल होता जा रहा है। गरीब और साधारण हैसियत के बच्चों के लिए दरवाजे बंद हो रहे है।
यदि कपिल सिब्बल की चलेगी तो अब कॉलेज में दाखिले के लिए भी अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा होगी। इससे कोचिंग का बाजार और बढ़ेगा तथा साधारण हैसियत के युवाओं के लिए कॉलेज शिक्षा के दरवाजे भी बंद होने लगेगें। आत्महत्याओं व कुंठा में और बढ़ोत्तरी होगी। विडंबना यह है कि बच्चों का परीक्षा का तनाव कम करने की बात करने वाले सिब्बल साहब को गलाकाट प्रतिस्पर्धाओं और कोचिंग कारोबार के दोष नहीं दिखाई देते। महंगी निजी शिक्षा के लिए उनका फार्मूला है शिक्षा ऋण तथा गरीब विद्यार्थियों के लिए इस ऋणमें ब्याज अनुदान। लेकिन बहुसंख्यक युवाओं की कुंठा, वंचना और हताशा बढ़ती जाएगी।
यदि देश के दरवाजे विदेशी शिक्षण संस्थाओं और विदेशी विश्वविद्यालय के लिए खोल दिए गए, तो बाजार की यह लूट व धोखाधड़ी और बढ़ जाएगी। यह उम्मीद करना बहुत गलत एवं भ्रामक है कि दुनिया के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय भारत में आने को तत्पर है और इससे देश में शिक्षा का स्तर बढ़ेगा। वास्तव में घटिया, चालू और मुनाफे व कमाई की खोज में बैचेन विश्वविद्यालय व शिक्षण संस्थान ही आएंगे। देश के जनजीवन के लगभग हर क्षेत्र को विदेशी कंपनियों के मुनाफे के लिए खोलने के बाद अब शिक्षा, स्वास्थ्य, मीडिया आदि के बाकी क्षेत्रों को भी विदेशी कंपनियों के लूट व मुनाफाखोरी के हवाले करने की यह साजिश है। यह सिर्फ आर्थिक लूट ही नहीं होगी। इससे देश के ज्ञान-विज्ञान, शोध, चिन्तन, मूल्यों और संस्कृति पर भी गहरा विपरीत असर पड़ेगा। इसका पूरी ताकत से प्रतिरोध करना जरुरी है।

स्वतंत्र आयोग या निजीकरण का वैधानीकरण ?

यशपाल समिति की पूरी रिपोर्ट का ब्यौरा सामने नहीं आया है। उच्च शिक्षा की बिगड़ती दशा के बारे में उसकी चिंता जायज है। डीम्ड विश्वविद्यालयों की बाढ़ के बारे में भी उसने सही चेतावनी दी है। किन्तु यू.जी.सी., अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद्, भारतीय चिकित्सा परिषद् आदि समाप्त करके उनके स्थान पर चुनाव आयोग जैसा स्वतंत्र एवं स्वायत्त ‘उच्च शिक्षा एवं शोध आयोग’ बनाने के सुझाव पर सावधानी की जरुरत है। पिछले कुछ समय में, विश्व बैंक के सुझाव पर अनेक प्रांतो में विद्युत नियामक आयोग एवं जल नियामक आयोग बनाए गए हैं। राष्ट्रीय स्तर पर दूरसंचार व बीमा के लिए भी इस तरह के आयोग बने हैं। दरअसल ये सारे आयोग निजीकरण के साथ आए हैं। जब तक सब कुछ सरकार के हाथ में था, आयोग की जरुरत नहीं थी। यह कहा जाता है कि ये आयोग सरकार से स्वतंत्र एवं स्वायत्त होते हैं और राजनीतिक प्रभाव से मुक्त होते हैं। लेकिन विश्वबैंक और देशी-विदेशी कंपनियों का प्रभाव उन पर काम करता रहता है। कम से कम बिजली और पानी के बारे में इन आयोगों की भूमिका निजीकरण की राह प्रशस्त करना, उसे वैधता देने और बिजली-पानी की दरों को बढ़ाने की रही है। उन्हें राजनीति से अलग रखने के पीछे मंशा यह भी है कि जन असंतोष और जनमत का दबाब उन पर न पड़ जाए। उच्च शिक्षा और स्कूली शिक्षा के बारे में इस तरह के आयोगों की भूमिका भी निजीकरण को वैधता प्रदान करने की हो सकती है, जबकि जरुरत शिक्षा के निजीकरण को रोकने व समाप्त करने की है। अफसोस की बात है कि यशपाल समिति ने उच्च शिक्षा के निजीकरण और विदेशी संस्थानों के घुसपैठ का स्पष्ट विरोध नहीं किया है।

आइए, आठ सूत्री देशव्यापी मुहिम छेड़ें

शिक्षा का बाजार एक विकृति है। बच्चों में शिक्षा, स्वास्थ्य व पोषण में भेदभाव करना
आधुनिक सभ्य समाज पर कलंक के समान है। देश के सारे बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना हमारा संवैधानिक दायित्व है। भारतीय संविधान में इस काम को 10 वषZ में पूरा करने के निर्देश दिए गए थे। लेकिन छ: दशक में भी इसे पूरा न करके भारत की सरकारों ने भारत की जनता, देश और संविधान के प्रति अक्षम्य अपराध किया है। अब सरकार जो कदम उठा रही हैं,उससे यह लक्ष्य और दूर हो जाएगा। समय आ गया है कि इस मामले में देश भर में मुहिम चलाकर भारत सरकार पर दबाब बनाया जाए कि –
1.    शिक्षा के निजीकरण, व्यवसायीकरण और मुनाफाखोरी को तत्काल रोका जाए और इस दिशा में उठाए गए सारे कदम वापस लिए जाएं।
2.    शिक्षा में विदेशी शिक्षण संस्थानों के प्रवेश पर रोक लगे।
3.    शिक्षा में सभी तरह के भेदभाव और गैरबराबरी खतम की जाए। समान स्कूल प्रणाली पर आधारित मुफ्त, अनिवार्य एवं समतामूलक शिक्षा की व्यवस्था देश के सारे बच्चों के लिए अविलंब की जाए।
4.    सरकारी स्कूलों में पर्याप्त संख्या में स्थायी व प्रशिक्षति शिक्षक नियुक्त किए जाएं और उन्हें सम्मानजनक वेतन दिए जाएं। स्कूलों में भवन, पाठ्य-पुस्तकों, पाठ्य सामग्री, खेल सामग्री, खेल मैदान, प्रयोगशाला, पुस्तकालय, शिल्प-शिक्षण, छात्रवृत्तियों, छात्रावास आदि की पर्याप्त एवं समुचित व्यवस्था हो। सुविधाओं व स्तर की दृष्टि से प्रत्येक स्कूल को केन्द्रीय विद्यालय या नवोदय विद्यालय के समकक्ष लाया जाए।
5.    ‘शिक्षा का अधिकार विधेयक’ के मौजूदा प्रारुप को तत्काल वापस लेकर उक्त शर्तोंको पूरा करने वाला नया विधेयक लाया जाए। विधेयक के मसौदे पर पूरे देश में जनसुनवाई की जाए एवं चर्चा-बहस चलाई जाए।
6.    शिक्षा की जिम्मेदारी से भागना बंद करके सरकार शिक्षा के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए। कोठारी आयोग एवं तपस सेनगुप्ता समिति की सिफारिश के मुताबिक कम से कम राष्ट्रीय आय के छ: प्रतिशत के बराबर व्यय सरकार द्वारा शिक्षा पर किया जाए।
7.    शिक्षा का माध्यम मातृभाषा हो। शिक्षा, प्रशासन एवं सार्वजनिक जीवन में अंग्रेजी का वर्चस्व गुलामी की विरासत है। इसे तत्काल समाप्त किया जाए।
8.    मैकाले द्वारा बनाया शिक्षा का मौजूदा किताबी, तोतारटन्त, श्रम के तिरस्कार वाला, जीवन से कटा, विदेशी प्रभाव एवं अंग्रेजी के वर्चस्व वाला स्वरुप बदला जाए। इसे आम लोगों की जरुरतों के अनुसार ढाला जाए एवं संविधान के लक्ष्यों के मुताबिक समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रकि एवं प्रगतिशील भारत के निर्माण के हिसाब से बनाया जाए। हर बच्चे के अंदर छुपी क्षमताओं व प्रतिभाओं के विकास का मौका इससे मिले।
लगभग इसी तरह के मुद्दों व मांगो को लेकर 21-22 जून को एक राष्ट्रीय सेमिनार में अखिल भारतीय शिक्षा अधिकार मंच का गठन हुआ है, जिसकी ओर से जुलाई में संसद पर प्रदर्शन की तैयारी की जा रही है। अखिल भारतीय समाजवादी अध्यापक सभा द्वारा भी काफी समय से इन मुद्दों पर मुहिम चलाई जा रही है जिसका समापन  25 अक्टूबर 2009 को दिल्ली मे राजघाट पर होगा।
कृपया आप भी अपने क्षेत्र में व अपनी इकाइयों में इन मुद्दों व मांगो पर तत्काल कार्यक्रम लें। आप गोष्ठी, धरने, प्रदर्शन, ज्ञापन, परचे वितरण, पोस्टर प्रदर्शनी आदि का आयोजन कर सकते हैं। स्थानीय स्तर पर शिक्षकों, अभिभावकों, विद्या्र्थियों, जागरुक नागरिकों व अन्य जनसंगठनों के साथ मिलकर ‘शिक्षा अधिकार मंच’ का गठन भी कर सकते हैं।
उल्लेखनीय है कि यह वर्ष प्रखर समाजवादी नेता डॉ० राममनोहर लोहिया का जन्मशताब्दी वर्ष है। उनके नेतृत्व में पचास साल पहले ही समाजवादी आंदोलन ने मुफ्त और समान शिक्षा का आंदोलन छेड़ा था तथा अंग्रेजी के वर्चस्व का विरोध किया था। ‘चपरासी हो या अफसर की संतान, सबकी शिक्षा एक समान’ तथा ‘चले देश में देशी भाषा, गांधी-लोहिया की यह अभिलाषा’ के नारे देते हुए शिक्षा में भेदभाव समाप्त करने का आह्वान किया था। डॉ. लोहिया की जन्मशताब्दी पर उनके प्रति सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यही होगी कि इस आवाज को हम फिर से पूरी ताकत से बुलंद करें।

सुनील
राष्ट्रीय अध्यक्ष
समाजवादी जन परिषद्
ग्राम/पोस्ट – केसला
जिला होशंगाबाद
फोन 09425040452

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पिछले भाग से आगे : जाहिर है लोहिया का यह निष्कर्ष गलत साबित हुआ । पूंजीवाद ज्यादा दीर्घायु और ज्यादा स्थायी साबित हुआ तथा कई संकटों को पार कर गया । मार्क्स की ही तरह लोहिया की भविष्यवाणी भी गलत साबित हुई । दरअसल , इस निबन्ध को वे पचीस तीस साल बाद लिखते तो आसानी से देख लेते कि उपनिवेशों के आजाद होने के साथ औपनिवेशिक शोषण तथा साम्राज्यवाद खतम नहीं हुआ , बल्कि उसने नव-औपनिवेशिक रूप धारण कर लिया । अंतरराष्ट्रीय व्यापार , अंतरराष्ट्रीय कर्ज , विदेशी निवेश और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विस्तार के जरिए यह शोषण चलता ही नहीं रहा बल्कि बढ़ता गया । सुदूर क्षेत्रों तक घुसपैठ व कमाई के जरिए पूंजीवाद को मिले । नतीजतन पूंजीवाद फलता फूलता गया । भूमंडलीकरण का नया दौर इसी नव औपनिवेशिक शोषण को और ज्यादा बढ़ाने के लिए लाया गया है ।
औपनिवेशिक प्रक्रिया का एक और रूप सामने आया है । वह है आंतरिक उपनिवेशों का निर्माण । सच्चिदानन्द सिन्हा जैसे समाजवादी विचारकों ने हमारा ध्यान इस ओर आकर्षित किया है । दुनिया के गरीब देशों में जो सीमित औद्योगीकरण हुआ है , वह इसी प्रक्रिया के साथ हुआ है । जब बाहरी उपनिवेश बनाना संभव नहीं होता , तो पूंजीवादी विकास देश के अंदर ही उपनिवेश बनाता है । जैसे भारत के पिछड़े एवं आदिवासी इलाके एक तरह के आंतरिक उपनिवेश हैं । पूर्व सोवियत संघ के एशियाई हिस्से भी आंतरिक उपनिवेश ही थे । आंतरिक उपनिवेश सिर्फ भौगोलिक रूप में होना जरूरी नहीं है । अर्थव्यवस्था एवं समाज के विभिन्न हिस्से भी आंतरिक उपनिवेश की भूमिका अदा कर सकते हैं । जैसे गांवों और खेती को पूंजीवादी व्यवस्था में एक प्रकार का आंतरिक उपनिवेश बना कर रखा गया है , जिन्हें वंचित ,शोषित और कंगाल रख कर हे उद्योगों और शहरो का विकास होता है । भारत जैसे देशों का विशाल असंगठित क्षेत्र भी एक प्रकार का आंतरिक उपनिवेश है जिसके बारे में सेनगुप्ता आयोग ने हाल ही में बताया कि वह २० रुपये रोज से कम पर गुजारा करता है । लेकिन यह भी नोट करना चाहिए कि पूंजीवादी विकास की औपनिवेशिक शोषण की जरूरत इतनी ज्यादा है कि सिर्फ आंतरिक उपनिवेशों से एक सीमा तक , अधकचरा औद्योगीकरण ही हो सकता है । भारत इसका सबसे बढ़िया उदाहरण है , जहाँ औद्योगीकरण की एक सदी के बावजूद देश का बहुत बड़ा हिस्सा बहिष्कृत और हाशिए पर है तथा देश की श्रम शक्ति का ८ फीसदी भी संगठित क्षेत्र में नहीं लग पाया है ।
इस प्रकार नव औपनिवेशिक शोषण एवं आतंरिक उपनिवेश की इन प्रक्रियाओं से पूंजीवाद ने न केवल अपने को जिन्दा रखा है , बलिक बढ़ाया व फैलाया है । लेकिन इससे लोहिया की मूल स्थापना खारिज नहीं होती हैं , बल्कि और पुष्ट होती हैं । वह यह कि पूंजीवाद के लिए देश के अंदर कारखानों खदानों के मजदूरों का शोषण पर्याप्त नहीं है । इसके लिए शोषण के बाहरी स्रोत जरूरी हैं । उपनिवेश हों , नव उपनिवेश हों या आंतरिक उपनिवेश हों उनके शोषण पर ही पूंजीवाद टिका है । साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद पूंजीवाद के अनन्य सखा सहोदर हैं । इसीसे यह निष्कर्ष भी निकलता है आधुनिक औद्योगिक पूंजीवादी विकास कभी भी सब के लिए खुशहाली नहीं ला सकता है । बड़े हिस्से की कीमत पर कुछ लोगों का ही विकास हो सकता है । यदि दुनिया के सारे इलाकों और सारे लोगों को विकास चाहिए तो पूंजीवाद का विकल्प खोजना होगा ।
पूंजीवाद का एक और आयाम है ,जो तेजी से उभर कर आ रहा है । धरती का गरम होना , बढ़ता प्रदूषण , नष्ट होती प्रजातियां , पर्यावरण का बढ़ता संकट, प्राकृतिक संसाधनों के बढ़ते संघर्ष आदि इस बात की ओर इंगित कर रहे हैं कि पूंजीवादी विकास में प्रकृति भी एक महत्वपूर्ण कारक है । जैसे श्रम का अप्रत्यक्ष (औपनिवेशिक) शोषण पूंजीवाद में अनिवार्य रूप से निहित है , वैसे ही प्रकृति के लगातार बढ़ते दोहन और शोषण के बिना पूंजीवादी विकास नहीं हो सकता । जैसे जैसे पूंजीवाद का विकास और विस्तार हो रहा है प्रकृति के साथ छेड़छाड़ और एक तरह का अघोषित युद्ध बढ़ता जा रहा है । जिन पारंपरिक समाजों और समुदायों की जिन्दगियां प्रकृति के साथ ज्यादा जुड़ी हैं जैसे आदिवासी , पशुपालक , मछुआरे , किसान आदि उनके ऊपर भी हमला बढ़ता जा रहा है । पूंजीवाद के महल का निर्माण उनकी बलि देकर किया जा रहा है ।
पिछले दिनों भारत में नन्दीग्राम , सिंगूर , कलिंगनगर आदि के संघर्षों ने औद्योगीकरण की प्रकृति व जरूरत पर एक बहस खड़ी की , तो कई लोगों को इंग्लैंड में पूंजीवाद की शुरुआती घटनाओं की याद आईं जिसे कार्ल मार्क्स ने ‘पूंजी का आदिम संचय’ नाम दिया था । दोनों में काफ़ी समानतायें दिखाई दे रही थीं । इंग्लैंड में तब बड़े पैमाने पर किसानों को अपनी जमीन पर से बेदखल किया गया था , ताकि ऊनी वस्त्र उद्योग हेतु भेड़पालन हेतु चारागाह बनाये जा सकें और बेदखल किसानों से बेरोजगारों की सस्ती श्रम – फौज , नये उभर रहे कारखानों को मिल सके । कई लोगों ने कहा कि भारत में वही हो रहा है। लेकिन मार्क्स के मुताबिक तो वह पूंजीवाद की प्रारंभिक अवस्था थी । क्या यह माना जाए कि भारत में पूंजीवाद अभी भी प्रारंभिक अवस्था में है । यह कब परिपक्व होगा ?
[ जारी ]

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[ लेखक समाजवादी जनपरिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा अर्थशास्त्री हैं | डा. राममनोहर लोहिया की प्रसिद्ध पुस्तक Marx , Gandhi and Socialism का एक अध्याय है-Economics after Marx |प्रस्तुत आलेख उसके आगे का कथन है | ]

मानव इतिहास के हर दौर में दुनिया को बदलने और बेहतर बनाने की कोशिशें हुई हैं। ऐसी हर कोशिश के पीछे दुनिया की मौजूदा व्यवस्था और विकास की एक समझ रहती है। मार्क्स और गांधी आधुनिक युग के दो प्रमुख विचारक रहे हैं जिनकी सोच व समझ परिवर्तनकर्मियों के लिए प्रेरणा और शक्ति का स्रोत रही है । डॉ. राममनोहर लोहिया जिनकी जन्म शताब्दी इस वर्ष मनायी जाने वाली है , को मार्क्स और गांधी के बीच एक वैचारिक पुल बनाने वाला माना ज सकता है ।

कार्ल मार्क्स ने हमे बताया कि किस प्रकार पूंजीवाद का पूरा ढाँचा मजदूरों के शोषण पर टिका है । मजदूर की मेहनत से जो पैदा होता है , उसका एक हिस्सा ही उसको मजदूरी के रूप में दिया जाता है । शेष हिस्सा ‘अतिरिक्त मूल्य’ होता है , जो पूँजीपति के मुनाफे का आधार होता है । यही मुनाफा पूँजीवादी विकास का आधार होता है । मार्क्स ने कल्पना की थी कि औद्योगीकरण के साथ बड़े बड़े कारखानों में बहुत सारे मजदूर एक साथ काम करेंगे । वर्ग चेतना के विकास के साथ वे संगठित होंगे , ज्यादा मजदूरी पाने के लिए आन्दोलन करेंगे । लेकिन मुनाफा और मजदूरी एक साथ नहीं बढ़ सकते । यही वर्ग संघर्ष बढ़ते बढ़ते क्रांति का रूप ले लेगा और तब समाजवाद आएगा । मार्क्स ने भविष्यवाणी की थी कि पश्चिम यूरोप जहाँ पूँजीवादी औद्योगीकरण सबसे पहले व ज्यादा हुआ है , वहीं क्रांति सबसे पहले होगी ।

किन्तु मार्क्स की भविष्यवाणी सही साबित नहीं हुई । क्रांति हुई भी तो रूस में , जो अपेक्षाकृत पिछड़ा , सामंती और कम औद्योगीकृत देश था । इसके बाद चीन में क्रांति हुई , वहाँ तो औद्योगीकरण नहीं के बराबर हुआ था । चीन की क्रांति तो पूरी की पूरी किसानों की क्रांति थी , जबकि मार्क्स की कल्पना थी कि सर्वहारा मजदूर वर्ग क्रांति का अगुआ होगा । पश्चिमी यूरोप में पूँजीवादी औद्योगीकरण के दो सौ वर्ष बाद भी क्रांति नहीं हुई । पूँजीवाद भी इस दौर में नष्ट होने के बजाए , संकटों को पार करते हुए , फलता फूलता गया ।

मार्क्सवाद की इस उलझन को सुलझाने का एक सूत्र तब मिला जब १९४३ में डॉ. राममनोहर लोहिया का निबन्ध ‘अर्थशास्त्र मार्क्स के आगे’ प्रकाशित हुआ । इसे दुनिया के गरीब पिछड़े मुल्कों के नजरिए से मार्क्सवाद की मीमांसा भी कहा जा सकता है । लोहिया ने बताया की पूंजीवाद का मूल आधार पूंजीवादी देशों में पूंजीपतियों द्वारा मजदूरों का शोषण नहीं बल्कि उपनिवेशों के किसानों ,कारीगरों और मजदूरों का शोषण है । यही ‘अतिरिक्त मूल्य’ का मुख्य स्रोत है । इसीके कारण पूंजीवादी देशों में मुनाफा मजदूरी का द्वन्द्व टलता गया , क्योंकि दुनिया के विशाल औपनिवेशिक देशों की लूट का एक हिस्सा पूंजीवादी देशों के मजदूरों को भी मिल गया । यह संभव हुआ कि मजदूरी और मुनाफा दोनों साथ साथ बढ़ें। इसीलिए पश्चिमी यूरोप में क्रांति नहीं हुई । इसी के साथ लोहिया ने लेनिन की इस बात को भी काटा कि साम्राज्यवाद पूंजीवाद की अन्तिम अवस्था है । लोहिया ने कहा कि पूंजीवाद और साम्राज्यवाद का प्रारंभ और विकास एक साथ हुआ । बिना साम्राज्यवाद के पूंजीवाद का विकास हो ही नहीं सकता । मार्क्स की ही एक शिष्या रोजा लक्समबर्ग की तरह लोहिया ने बताया कि पूंजीवाद के विकास के लिए एक बाहरी उपनिवेश जरूरी है , जहाँ के बाजारों में माल बेचा जा सके और जहाँ से सस्ता कच्चा माल और सस्ता श्रम मिल सके । इसी विश्लेषण के आधार पर लोहिया ने कहा कि असली सर्वहारा तो तीसरी दुनिया के किसान मजदूर हैं । वे ही पूंजीवाद की कब्र खोदेंगे ।

जब लोहिया ने यह निबंध लिख तब दूसरा विश्वयुद्ध चल रहा था और उसके पहले जबरदस्त मंदी का दौर आ चुका था । पूंजीवाद के संकटों को समझने के लिए भी लोहिया ने एक नई दृष्टि दी । कीन्स और मार्क्सवादी अर्थशास्त्रियों के मुताबिक पूंजीवादी देशों की उत्पादन क्षमता और मांग या क्रय शक्ति के अंतर से ये संकट आते हैं । लोहिया के मुताबिक सिर्फ इतना कहना अर्ध सत्य है । इन संकटों का असली स्रोत साम्राज्यवादी प्रक्रिया में है । लोहिया के शब्दों में , ‘ उत्पादन के पुराने तरीके से किसी साम्राज्यवादी क्षेत्र की शोषण – सीमा के समाप्त होने पर आर्थिक संकट उत्पन्न होता है , जो किसी नये क्षेत्र की खोज के उपरान्त समाप्त होता है , जहाँ नये आविष्कारों का उपयोग किया जा सके ।’

इसी विश्लेषण के आधार पर लोहिया ने उस निबंध में कहा कि चूंकि पूरी दुनिया को उपनिवेश बनाया जा चुका है , अब कोई नया भूभाग उपनिवेश बनाने के लिए बचा नहीं है, पूंजीवाद स्थाई संकट की अवस्था में पहुंच गया है । इसकी वृद्धि का मार्ग बन्द हो चुका है , इसकी सीमा आ चुकी है । या तो यह टूट जायेगा या धन के निम्न स्तर पर स्थायित्व प्राप्त कर लेगा । पूंजीवाद के सिरमौर के रूप में संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के उदय और पश्चिमी यूरोप की जगह लेने को लोहिया नो्ट करते हैं लेकिन उसके नेतृत्व में पूंजीवाद के संकट का हल हो सकेगा ,इसमें वे गहरी शंका जाहिर करते हैं ।

[ जारी ]

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