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श्री नवीन पटनायक,

मुख्यमंत्री, ओडिशा,

भुवनेश्वर, ओडिशा

 

प्रिय मुख्यमंत्री श्री नवीन पटनायक जी,

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बहरहाल, नियमगिरी में अनिल अग्रवाल की इंग्लैण्ड की कम्पनी वेदान्त द्वारा खनन कराने अथवा न कराने के सन्दर्भ में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश से तथा न्यायपालिका की देखरेख में जनमत-संग्रह हुआ था जिसमें एक भी वोट वेदान्त द्वारा बॉक्साइट खनन के पक्ष में नहीं पड़ा था। आपकी सरकार से जुड़े माइनिंग कॉर्पोरेशन के अदालत में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को बदलवाने के प्रयास को न्यायपालिका ने अस्वीकार कर दिया है। आपके गृह विभाग को यह भलीभांति पता है कि प्रतिबन्धित भाकपा (माओवादी) ने जनमत संग्रह के बहिष्कार की अपील की थी। जनता ने जैसे वेदान्त द्वारा खनन को पूरी तरह से नकार दिया था, उसी प्रकार माओवादियों द्वारा जनमत-संग्रह बहिष्कार की अपील को भी पूरी तरह नकार दिया था।

इस परिस्थिति में ओडिशा पुलिस द्वारा नियमगिरी सुरक्षा समिति से जुडे कार्यकर्ताओं पर फर्जी मामले लादने और उन्हें ‘आत्मसमर्पणकारी माओवादी’ बताने की कार्रवाई नाटकीय, घृणित और जनमत की अनदेखी करते हुए वेदान्त कम्पनी के निहित स्वार्थ में है।

पुलिस द्वारा कुनी सिकाका की गिरफ्तारी, उसके ससुर तथा नियमगिरी सुरक्षा समिति के नेता श्री दधि पुसिका, दधि के पुत्र श्री जागिली तथा उसके कुछ पड़ोसियों को मीडिया के समक्ष ‘आत्मसमर्पणकारी माओवादी’ बताना ड्रामेबाजी है तथा इसे रोकने के लिए तत्काल आपके हस्तक्षेप की मैं मांग कर रहा हूं। कुनी, उसके ससुर और पड़ोसियों पर से तत्काल सभी मुकदमे हटा लीजिए जो आपकी पुलिस ने फर्जी तरीके से बेशर्मी से लगाए हैं।

इस पत्र के साथ मैं कुनी सिकाका के दो चित्र संलग्न कर रहा हूं। पहला चित्र सितम्बर 2014 में हमारे दल द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में का है जिसमें सर्वोदय नेता स्व. नारायण देसाई द्वारा कुनी को शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया जा रहा है। दूसरे चित्र में कुनी इस संगोष्ठी को माइक पर संबोधित कर रही है और हमारे दल समाजवादी जन परिषद का बिल्ला लगाये हुए है।

तीसरा चित्र गत वर्ष 5 जून पृथ्‍वी दिवस के अवसर पर नियमगिरी सुरक्षा समिति द्वारा आयोजित खुले अधिवेशन का है। इस कार्यक्रम के मंच पर सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ पर्यावरण-अधिवक्ता के सामने कुनी बैठी है, मंच पर सुश्री मेधा पाटकर व प्रफुल्ल सामंतराय भी बैठे हैं। मैं भी इस कार्यक्रम में नियमगिरी सुरक्षा समिति द्वारा आमंत्रित था तथा वह चित्र मैंने खींचा है। कार्यक्रम में पूरा पुलिस बन्दोबस्त था तथा आपके खुफिया विभाग के कर्मी भी मौजूद थे।

संसदीय लोकतंत्र, न्यायपालिका और संविधान सम्मत अहिंसक प्रतिकार करने वाली नियमगिरी सुरक्षा समिति को माओवादी करार देने की कुचेष्टा से आपकी सरकार को बचना चाहिए। राज्य की जनता,सर्वोच्च न्यायपालिका और पर्यावरण के हित का सम्मान कीजिए तथा एक अहिंसक आन्दोलन को माओवादी करार देने की आपकी पुलिस की कार्रवाई से बाज आइए।

चूंकि हमारी साथी कुनी सिकाका को गैर कानूनी तरीके से घर से ले जाने में अर्धसैनिक बल भी शामिल था इसलिए इस पत्र की प्रतिलिपि केन्द्रीय गृहमंत्री श्री राजनाथ सिंह को भी भेज रहा हूं। इस पत्र को सार्वजनिक भी कर रहा हूं।

 

विनीत,

अफलातून

महामंत्री, समाजवादी जन परिषद

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विश्व फुटबाल कप की धूमधाम खतम होने बाद दक्षिण अफ्रीका में गर्व और संतोष के बजाय मायूसी और चिंता छाई है तथा कई सवाल खड़े हो रहे हैं। मायूसी महज इस बात की नहीं है कि अफ्रीका की कोई टीम सेमी-फाईनल तक भी नहीं पहुंच पाई। चिंता यह भी है कि इस आयोजन के लिए बने विशाल महंगे स्टेडियमों का अब क्या होगा और उनका रखरखाव कैसे होगा ? खबरों से लगता है कि ये स्टेडियम सफेद हाथी साबित होने वाले हैं, जिन्हें पालना और खिलाना इस गरीब देश की मुसीबत बन जाएगा।
इस आयोजन के लिए दक्षिण अफ्रीका ने नौ शहरों में दस ‘विश्व स्तरीय’ स्टेडियम बनाने पर करीब 150 करोड़ डॉलर (7,000 करोड़ रु) खर्च किए। किन्तु अब विश्वकप की प्रतियोगिता खतम होने पर उनका कोई उपयोग नहीं बचा। इन स्टेडियमों की क्षमता 40 हजार से लेकर 95 हजार दर्शकों तक हैं। आने वाले कई बरसों तक वहां इतने बड़े मैच इक्का-दुक्का ही होंगे, जिनमें इन स्टेडियमों का आधा या चैथाई उपयोग भी हो सके। पोलोकवान नामक शहर में 16.8 करोड़ डॉलर (756 करोड़ रु.) से बना 40 हजार दर्शकों का विशाल स्टेडियम है, किन्तु उस पूरे इलाके में फुटबाल या रगबी की एक भी पेशेवर टीम नहीं है। इस स्टेडियम की देखभाल पर प्रतिवर्ष 2.16 करोड़ डॉलर (100 करोड़ रु.) खर्च होंगे। यह सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ाएगा।
बड़े शहरों के स्टेडियमों को फुटबाल या रगबी मैचों या सांस्कृतिक आयोजनों के लिए देने का विचार किया जा रहा है, किन्तु उससे समस्या हल नहीं होगी। जाहिर है कि विश्वकप के जोश में दक्षिण अफ्रीका सरकार ने पहले इस समस्या पर गौर नहीं किया। पूरे आयोजन पर करीब 420 करोड़ डॉलर (20,000 करोड़ रु.) खर्च हो चुका है। इस मौके पर आए पर्यटकों या टिकिट बिक्री से इसकी आधी कमाई भी नहीं हो पाई होगी।
थोड़ी पड़ताल करने पर पता चलता है कि लगभग खेलों के हर महा-आयोजन के बाद यही समस्या पैदा होती है। बीजिंग के 2008 ओलंपिक के बाद चीन भी इसी समस्या से जूझ रहा है। 50 करोड़ डॉलर (2250 करोड़ रु.) की लागत से बने मशहूर  विशाल ‘बर्ड्स नेस्ट’ नामक स्टेडियम के रखरखाव और कर्ज-किश्त भुगतान के लिए 2 करोड़ डॉलर (90 करोड़ रु.) जुटाने में पसीना आ रहा है। चीन ने कुल मिलाकर 31 स्टेडियम बनाए थे। इनके अलावा ओलंपिक के लिए चीन ने 680 हेक्टेयर में फैला एक विशाल वन पार्क भी 112 करोड़ डॉलर (5000 करोड़ रु.) की लागत से बनाया था। उसके रखरखाव के लिए डेढ़ करोड़ डॉलर (67 करोड़ रु.) की सालाना जरुरत है। चीन सरकार इन स्टेडियमों को मनोरंजन, संगीत कार्यक्रमों, प्रदर्शनियों आदि के लिए किराए पर देने की कोशिश कर रही है और अमरीकी कंपनियों को ठेका दे रही है। यह साफ है कि इन स्टेडियमों का उपयोग खेलों में बिरले तौर पर ही होगा,जिनके लिए इनका निर्माण हुआ है।
बीजिंग ओलंपिक दुनिया का अभी तक का सबसे महंगा खेल आयोजन था, जिस पर 4400 करोड़ रु. (करीब 2,00,000 करोड़ रु.) खर्च हुआ। किन्तु इसके पहले के ओलंपिक भी आयोजक देशों के लिए मुसीबत बने थे। यूनान के मौजूदा आर्थिक संकट की शुरुआत एक तरह से 2004 के एथेन्स ओलंपिक से ही मानी जा सकती है, जिसे बाद में वैश्विक मंदी ने गंभीर रुप दे दिया। इसके स्टेडियमों के रखरखाव पर 7 करोड़ डॉलर (200 करोड़ रु.) प्रतिवर्ष का खर्च आ रहा है और वे बेकार पड़े हैं। 2004 के सिडनी ओलंपिक के बाद उस शहर के नागरिकों पर सालाना 3.2 करोड़ डॉलर (144 करोड़ रु.) का कर बोझ बढ़ गया। 1992 के बार्सीलोना ओलंपिक के बाद स्पेन पर 2 करोड़ डॉलर (90 करोड़ रु.) का कर्ज चढ़ा था। इन आयोजनों के पहले इनसे स्थानीय अर्थव्यवस्था में तेजी आने की दलील दी जाती है, किन्तु होता ठीक उल्टा है।
दिल्ली के राष्ट्रमंडल खेलों के लिए भी भारत को आर्थिक महाशक्ति बनने की दलील दी जा रही है। किन्तु 4100 करोड़ रु. की विशाल राशि से जिन 11 स्टेडियमों व स्पर्धा-स्थलों और 1038 करोड़ रु. से जिस आलीशान खेलगांव को तैयार किया जा रहा है, क्या वे भी इस 12 दिवसीय आयोजन के बाद बेकार व बोझ नहीं हो जाएंगे ? फिर दिल्ली में तो इस आयोजन के बहाने कई चीजों पर पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है, जिनका खेलों से कोई लेना-देना नहीं है। इंदिरा  गांधी हवाई अड्डे का 9,000 करोड़ रु. का नया टर्मिनल, हजारों करोड़ों के नए फ्लाईओवर-पुल-पार्किंग स्थल-एक्सप्रेसवे, मेट्रो रेल का ताबड़तोड़ विस्तार, एक-एक करोड़ रु. की हजारों नयी आधुनिक बसें, दिल्ली का सौन्दर्यीकरण, आदि की लंबी सूची है। क्या पूरे भारत में दिल्ली ही सरकार को नजर आती है ? पूरा हिसाब लगाएं तो इस गरीब देश का एक से डेढ़ लाख करोड़ रुपया इस महायज्ञ में स्वाहा हो रहा है। जो सरकार खाद्य-अनुदानों की वृद्धि पर चिन्तित है, शिक्षा और शिक्षकों पर कंजूसी कर रही है, पेट्रोल-डीजल-रसोई गैस में जनता को कोई राहत नहीं देना चाहती है, उसने राष्ट्रमंडल खेलों के नाम पर अपना खजाना खोल दिया है और उसकी दरियादिली का कोई हिसाब नहीं है।
हमारा 1982 के एशियाई खेलों के आयोजन का क्या अनुभव है ? उस वक्त भी विशाल पैसा खर्च करके बनाए गए स्टेडियम और खेलगांव बाद में बेकार पड़े रहे।  हमें फिर से भारी पैसा फूंक कर नए स्टेडियम व नया खेलगांव  बनाना पड़ रहे हैं। इससे भी खेलों को बढ़ावा मिलने का दावा था, किन्तु एशियाड के बाद न तो अंतरराष्ट्रीय पदक तालिकाओं में 100 करोड़ आबादी के इस देश की दयनीय हालत में कोई सुधार हुआ और न देश के अंदर खेलों की कोई स्वस्थ संस्कृति व परंपरा बनी। यह भी सवाल है कि जिस बेतहाशा तेजी से ये खेल खर्चीले व महंगे होते जा रहे हैं, उनमें गरीब देशों के साधारण लोगों की कोई जगह और भागीदारी कभी बन सकेगी या नहीं ? वे दर्शक और उपभोक्ता जरुर बनते जा रहे हैं। आखिर इस विश्वकप में यूरोप के दबदबे, लातीनी अमरीका के पिछड़ने और अफ्रीका के बाहर होने का एक कारण पैसा भी है। कोच, प्रशिक्षण, विशेष सुविधाएं सबके लिए पैसा चाहिए। कुल मिलाकर आधुनिक खेल व उनके आयोजन अब तेजी से पैसे के खेल बनते जा रहे हैं। उन पर झूठी शान और सतही राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का मुलम्मा जरुर चढ़ा दिया जाता है। ऐसा ही एक पैसे का बड़ा खेल दिल्ली में इस वर्ष होने वाला है। इस महाखर्चीले आयोजन से देश खेलों व खिलाड़ियों का भला हो या न हो,आयोजको की पीढ़ियां जरुर तर जाएंगी। उनके व्यक्तिगत हितों के साथ ठेकेदारों, व्यापारियों, विज्ञापनदाताओं और मीडिया कंपनियों के हित भी जुड़ गए हैं, जिन्हें मोटी कमाई नजर आ रही है।
यदि भारत या दक्षिण अफ्रीका की सरकारों को वास्तव में खेलों को बढ़ावा देना तथा विश्व स्तरीय खिलाड़ी तैयार करना होता तो वे ऐसे महाखर्चीले यज्ञों और सफेद हाथियों पर पैसा फूंकने के बजाय गांवो-कस्बों में खेल मैदान, स्टेडियम,प्रशिक्षण और स्थानीय खेल स्पर्धाओं पर खर्च करती। किन्तु उनका इरादा तो कुछ और ही दिखाई देता है। विश्वकप फाईनल के पहले ही दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जेकब जुमा ने पूंजीपतियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की एक बैठक ली। उन्होंने कहा – ‘हमने दिखा दिया है कि हम सफल आयोजन और आतिथ्य कर सकते हैं, अब आप आइए, हमारे देश में पूंजी लगाइए और कमाइए।’
इसी तरह की भाषा में दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेल आयोजन का एक मकसद बताया गया है कि इससे दिल्ली व भारत को ‘दुनिया की मंजिल’ (ग्लोबल डेस्टिनेशन) बनाने में मदद मिलेगी। यानी विदेशी पूंजी को लुभाने के लिए यह पूरा तमाशा है। यही असली एजेण्डा है, चाहे इसके लिए गरीब देश का खजाना ही क्यों न लुटाना पड़े। बारह दिन के आयोजन व तामझाम से जो वाहवाही व मदहोशी पैदा होगी, उसमें आम जनता थोड़े समय के लिए अपने कष्ट भूल जाएगी। महंगाई, बेकारी, आतंकवाद-माओवाद आदि पर सरकार की घोर असफलता के मुद्दे भी नैपथ्य में चले जाएंगे। यह दूसरा एजेण्डा है। सफेद हाथी, फिजूलखर्च, कर्ज व दिवालियापन की जहां  तक बात है, उन्हें बाद में देखा जाएगा।   
(ईमेल –  sjpsunil@gmail.com )

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लेखक समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है।
– सुनील
ग्राम – केसला, तहसील इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.)
पिन कोड: 461 111
मोबाईल 09425040452 

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आदिवासी

    आजादी के बाद पिछले साठ साल में आदिवासी को क्या मिला ? न तो जंगल पर हक मिला न जमीन का पट्टा । आज कहने को आदिवासियों के इतने नेता , विधायक , मंत्री हैं लेकिन आदिवासी की कोई इज्जत नहीं है । सब आदिवासी को छोटा आदमी समझते हैं । आजादी की लड़ाई में आदिवासियों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया लेकिन उनका कहीं कोई नाम नहीं है । जो मध्य प्रदेश कभी आदिवासियों का प्रदेश कहलाता था वहां आज भी आदिवासी को रोजी – रोटी के लिए दर – दर भटकना पड़ता है । जो कानून आदिवासी के हित के खिलाफ़ थे उनमें कोई सुधार नहीं किया । आज भी आदिवासी अधिकारियों अधिकारियों के डंडे का शिकार होता रहता है ।

    पिछले साठ सालों में बड़े पैमाने पर बांध , फैक्ट्री , शेर पालने आदि के नाम पर आदिवासियों को उनके घर , जंगल और जमीन से भगाया गया । न तो आदिवासियों के खेतों को पानी मिला न खाद – बीज । जितनी योजना आदिवासी के विकास के नाम पर आईं उसका कोई फायदा आदिवासियों को नहीं मिला । इन योजनाओं से अधिकारियों और दलालों ने अपने घर भर लिये । कुपोषण और भूख से आदिवासियों की मौत होती रही ।

  1. जंगल पर अधिकार इतिहास गवाह है कि किस गलत तरीके से अंग्रेजों ने आदिवासियों से उनका जंगल छीन लिया । आजादी के बाद आज तक आदिवासी को अपना खोया हुआ अधिकार नहीं मिला । आदिवासियों को उसका जंगल पर अधिकार वापस मिलना चाहिए । जंगल में उसे अपने निस्तार की लकड़ी , फाटा , चराई आदि की छूट होनी चाहिए । जंगल में नाकेदार की दादागिरी बंद होना चाहिए । सरकार को कटाई की अनुमति आसपास के गांवों से लेनी चाहिए एवं उसका आधा पैसा उस ग्राम के विकास पर खर्च होना चाहिए ।
  2. जमीन का पट्टा    जंगल जमीन जोतने एवं उस पर फलदार पौधे लगाने का अधिकार आदिवासियों को मिलना चाहिए यह मांग समाजवादी जनपरिषद सालों से कर रही है। यह एकमात्र पार्टी है जो इस मुद्दे को लेकर वर्षों से आंदोलन कर रही है । जंगल जमीन के पट्टे देने के लिए एक नया कानून भी बन गया है । लेकिन उस कानून का कहीं कोई पालन नहीं हो रहा है । नाम करने के लिए जैसे तैसे लोगों के फार्म भर दिए । उस कानून का सही सही पालन होना चाहिए और उस कानून के अनुसार आदिवासियों से गलत तरीके से छुड़ाई गई सारी जंगल जमीन के पट्टे मिलने चाहिए। इसमें वनग्राम में लाइन सरकाकर छुड़ाई गई जमीन शामिल है ।
  3. तेन्दु पत्ता    हर बार चुनाव के समय आदिवासियों को तेंदुपत्ता के नाम पर करोड़ों रुपये दिये जाते हैं । इसका मतलब यह है कि चार साल तक तेन्दुपत्ते की कमाई का करोड़ों रुपये सरकार में बैठे अधिकारी और मंत्री खा जाते हैं । आज मंहगाई तीन गुना बढ़ गई और बीड़ी की कीमत भी लेकिन पिछले १५ सालों से तेन्दुपत्ता कड़ाई दर मात्र दस रुपये सैंकड़ा बढ़ी । इसके साथ ही समितियों में इस समय लाखों रुपये हैं उसका हिसाब किताब दिया जाना चाहिए और वो पैसा ग्राम विकास में खर्च किया जाना चाहिए ।
  4. आदिवासी विरोधी कानूनों में बदलाव  संविधान के अनुच्छेद ६ के अनुसार अगर कोई कानून आदिवासी के हितों के खिलाफ है तो प्रदेश का राज्यपाल अकेले ही उसमें जरूरी सुधार कर सकता है या उस पर रोक लगा सकता है । यह अधिकार सिर्फ आदिवासी क्षेत्र के लिए है । उदाहरण के लिए वन्य कानून १९२७ का वन्य प्राणी कानून १९७२ से आदिवासियों के जंगल पर हक खत्म होते हैं तो राज्यपाल एक आदेश से उस पर रोक लगा सकता है । लेकिन आज तक इस अधिकार का किसी राज्यपाल ने न तो उपयोग किया न किसी पार्टी ने इसकी मांग की ।   समाजवादी जनपरिषद इस बात के लिए लगातार अपना संघर्ष जारी रखेगी कि आदिवासी विरोधी सारे कानूनों में बदलाव किया जाये । इसके लिए राज्यपाल संविधान में दी गई शक्तियों का उपयोग कर यह काम करें और स्थाई हल के लिए संसद और विधानसभाओं के जरिए इन कानूनों में बदलाव किया जाये ।
  5. राष्ट्रीय उद्यान अभयारण्य  देश का पर्यावरण भोग विलास भरी जिस जीवन शैली से नष्ट हो रहा है उसे बदलने की बजाए सरकार पर्यावरण बचाने के नाम पर शेर पालने की योजना लाती रहती है । शेर पालने के नाम पर आदिवासियों के गांव के गांव उजाड़े जा रहे हैं । समाजवादी जनपरिषद मानती है कि शेर और आदिवासी जमाने से साथ रहते आ रहे हैं इसके गांव उजा्ड़ने की जरूरत नहीं है और इन योजनाओं से पर्यावरण नहीं बचेगा उसके लिए हमारी विकास नीति बदलना होगा ।

दलितों के सवाल

        दलितों के लिए सबसे बड़ा सवाल छुआछूत मुक्त समाज में बराबरी का स्थान पाना है। आज भी समाज में बड़े पैमाने पर छुआछूत फैली हुई है जो न सिर्फ़ गैर कानूनी है बल्कि मानवता के खिलाफ है । इसके साथ ही दलितों को अपने खोये हुए संसाधन , जमीन आदि पर हक पाना और बदलते समय में रोजगार के सही अवसर पाना है । दलितों के यह सवाल वर्तमान विकास की अंधी दौड़ और उदारीकरण की नीति से हल नहीं होंगे । आज कांग्रेस हो या भाजपा , सभी पर्टियों ने जो आर्थिक नीति अपनाई है उसमें अमीर और अमीर हो रहा है।हमारे जमीन आदि सारे संसाधन कंपनियों के हाथों सौंपे जा रहे हैं । बसपा की मायावती भी उत्तरप्रदेश में यही नीति अपनाये हुए हैं । अब आप दलितों की मुखिया होकर बड़ी पार्टियों जैसी नीतियाँ अपनायेंगी तो दलित सही अर्थों में मुक्त कैसे होगा ।

    समाजवादी जनपरिषद का मानना है कि बाबा साहेब अम्बे्डकर का अधूरा सपना असल रूप में पूरा करना है । इंसान में जात-पांत , धर्म , अमीर,गरीब का भेद समाप्त होना चाहिए। छुआछूत इंसानियत के नाम पर सबसे बड़ा कलंक है । इसे जड़ से मिटाने के लिए तथा कानूनी स्तर पर भी ठोस काम होना चाहिए । व्यापक दलित समाज की आर्थिक स्थिति सुधरे इस दिशा में ठोस नीतिगत बदलाव करने होंगे । वैश्वीकरण और उदारीकरण की नीति छो्ड़कर  गरीबों के हितों को साधने वाली नीति अपनाना होगी क्योंकि ज्यादातर दलित गरीब है । चूँकि दलितों के परम्परागत रोजगार नहीं रहे उन्हें जमीन दी जाना चाहिए । छोटे-छोटे उद्योगों को बढ़ावा दिया जाये जिससे दलित भी उद्यमी बन सकें । दलितों से छुड़ाई गई जमीन वापस की जाए । प्रशासनिक सुधार के जरिये दलितों पर अत्याचार के मामले में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर कड़ी कार्यवाही हो ।

[ जारी ]  अगले हिस्से – अल्पसंख्यक , साम्प्रदायिकता

पिछले भाग : एक , दो

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घोषणा पत्र क्यों ?

    आमतौर पर पार्टियों के लिए चुनाव घोषणापत्र एक रस्म अदायगी होता है । चुनाव के बाद वे इसे भूल जाती हैं । जो पार्टी सरकार बनाती है , वे अपनी घोषणाओं को लागू करने की कोई जरूरत नहीं समझती है । कई दफ़े वे अपने घोषणा पत्र के खिलाफ़ काम करती हैं । जो पार्टी हार जाती है , वह भी अपने घोषणापत्र के मुद्दों को लेकर आवाज उठाने और संघर्ष करने के बजाय चुपचाप बैठकर पांच साल तक तमाशा देखती है ।

    समाजवादी जनपरिषद यह घोषणापत्र पूरी गंभीरता से मध्य प्रदेश की जनता के सामने पेश कर रही है । इसमें न केवल प्रदेश की मौजूदा खराब हालत के बारे में विश्लेषण है , और मौजूदा सरकारों और पार्टियों की नीतियों पर टिप्पणी है , बल्कि मध्यप्रदेश की जनता की मुक्ति कैसे होगी , मध्यप्रदेश का विकास कैसे होगा , नया मध्यप्रदेश कैसे बनेगा , इस बारे में समाजवादी जनपरिषद की समझ तथा कार्य योजना का यह एक दस्तावेज है । बड़ी पार्टियों द्वारा उछाले गए नकली मुद्दों और नारों को एक तरफ करके जनता के असली मुद्दों को सामने लाने की एक ईमानदार कोशिश है ।

    समाजवादी जनपरिषद जीते या हारे , इस घोषणापत्र में घोषित मुद्दों , नीतियों व घोषणाओं को लेकर वह लगातार विधानसभा के अंदर व बाहर संघर्ष करेगी । यह संघर्ष तब तक जारी रहेगा , जब तक जनता की छाती पर चढ़कर उसका खून चूसने वाले भ्रष्टाचारियों , बेईमानों , लुटेरों का राज खतम नहीं हो जाता और मेहनतकश लोगों की बराबरी एवं हक वाली एक नयी क्रांतिकारी व्यवस्था कायम नहीं हो जाती ।

मध्यप्रदेश के राजनैतिक हालात

    जो हालत भारत की राजनीति की है , वही कमोबेश मध्यप्रदेश की है , बल्कि यहाँ पर पिछले काफी समय दो पार्टियों का एकाधिकार होने से हालत और खराब है । कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों अदल-बदल कर इस प्रदेश पर राज कर रही हैं । दोनों की नीतियों , चरित्र व आचरण में कोई खास फर्क नहीं है । दोनों ने मिलकर प्रदेश की जनता को फुटबॉल बना दिया है । जनता एक से त्रस्त होकर दूसरी पार्टी को सत्ता में लाती है , फिर उनसे परेशान होकर वापस पहली को गद्दी पर बैठाती है । जो पार्टी सरकार में नहीं होती है , वह जनता के मुद्दों और कष्टों को लेकर कोई जोरदार आन्दोलन करने की जरूरत नहीं समझती , बल्कि वह चाहती है कि जनता की परेशानी बढ़े , जिससे उन्हें वापस सत्ता में आने का मौका मिले ।

    कांग्रेस ने सड़क , बिजली , पानी , शिक्षा और स्वास्थ्य का निजीकरण शुरु किया जिसे भाजपा ने आगे बढ़ाया । मतलब जनता की इन जरूरी आवश्यकताओं को पूरा करने की जवाबदारी सरकार की बजाए निजी कम्पनियों ( सेठों ) की हो गयी ।  यह कम्पनियां यह सुविधायें उन्हीं लोगों को देंगी जो उसका , उनकी तय की गई दरों पर भुगतान कर सकेगा।

    सरकारी स्कूलों में मास्टर और किताबें नहीं हैं । चारों तरफ़ निजी स्कूलों का बोलबाला है । अस्पतालों के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं, लोग प्रायवेट डॉक्टरों से भरोसे इलाज करा रहे हैं । बात यहीं रुक जाती है ऐसा नहीं है । प्रदेश की लाखों एकड़ जमीन भूमिहीनों को देने के बजाए बड़ी बड़ी कम्पनियों को लम्बी लीज पर दी जा रही है ।

    प्रदेश सरकार की सारी योजनाएँ भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई हैं । चाहे वो रोजगार गारंटी योजना हो , या शक्तिमान या जननी सुरक्षा । न तो रोजगार गारंटी में पूरा काम मिल रहा है न मजदूरी । सरकार ने रही सही कसर गरीबी रेखा से लोगों के नाम काटकर पूरी कर दी है ।  प्रदेश में भूख और कुपोषण से बच्चों की मौत का ताण्डव चल रहा है । ” गरीब की थाली नहीं रहेगी खाली” का जो नारा भाजपा ने दिया था वो उलटा हो गया । प्रदेश का किसान खाद , बिजली पानी के साथ-साथ समर्थन मूल्य और समय पर अपनी फसल का भुगतान पाने के लिए भटकता रहा । राजनैतिक विकल्पहीनता और जड़ता की इस हालत को बदलना जरूरी है । समाजवादी जनपरिषद इसके लिए पूरी कोशिश करेगी ।

[ जारी ]

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१५ अगस्त २००६ को हिन्दी का चिट्ठा शुरु किया था । एक साल पूरा होने पर मूल्यांकन किया था । इस चिट्ठे पर पिछले साल कुल १२५ पोस्ट और ३४१ टिप्पणीयाँ थीं  , इस साल ७३ पोस्ट लेकिन टिप्पणियाँ ३४१ ही हैं । अन्य दो चिट्ठे : यही है वह जगह पर इस साल ५७ पोस्ट और २२ टिप्पणियां हैं तथा शैशव पर ६४ पोस्ट तथा १८७ टिप्पणियाँ हैं । सुरे – बेसुरे गीत-संगीत का एक नया चिट्ठा पिछले साल शुरु किया उसमें ४३ पोस्ट और १७२ टिप्पणियाँ हैं ।

    इस चिट्ठे पर गत एक वर्ष में निम्न स्थानों से पाठक पहुँचे , जिनके रचनाकारों का मैं शुक्रगुजार हूँ :

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इस चिट्ठे पर मौजूद निम्नलिखित कड़ियों पर उनके सामने लिखी संख्या में पाठक यहाँ से गए :

 

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इन शब्दों को खोजते हुए ,सामने लिखी तादाद में लोग पिछले एक साल में इस चिट्ठे पर आए :

2007-08-15 to Today

Search Views
कविताएँ 265 More stats
अम्बेडकर 163 More stats
तुलसीदास 160 More stats
स्वामी विवेकान 137 More stats
नारी 99 More stats
विवेकानन्द 78 More stats
भीमराव अम्बेडक 73 More stats
गांधी 68 More stats
उत्तर प्रदेश 64 More stats
हिटलर 56 More stats
tulsidas 54 More stats
उपभोक्तावादी स 46 More stats
विवेकानन्द साह 44 More stats
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मायावती 39 More stats
ऑनलाइन 35 More stats
खेती 34 More stats
पानी की कमी 34 More stats
उपभोक्तावाद 28 More stats
महात्मा गांधी 28 More stats
गोस्वामी तुलसी 27 More stats
महिला दिवस 27 More stats
globalisation 27 More stats
आरक्षण 22 More stats
वैश्वीकरण 22 More stats
विवेकानन्द स्व 21 More stats
गाँधी 19 More stats
पत्रकारिता 18 More stats
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हिन्दी दिवस 18 More stats
राष्ट्रीय स्वय 17 More stats
harda 17 More stats
मित्र 16 More stats
उदय प्रकाश 16 More stats
नेता 16 More stats
asterix 15 More stats
उपभोक्तावादी 15 More stats
रघुवीर सहाय 15 More stats
गांधीजी के बार 14 More stats
नरेन्द्र मोदी 14 More stats
भविष्य 14 More stats
पानी 13 More stats
rangoli 13 More stats
bbc hindi.com 13 More stats
कहानी 12 More stats
नेहरू 12 More stats
राधा 11 More stats
स्वामी विवेकान 11 More stats
वेब पत्रकारिता 10 More stats
मानवाधिकार 10 More stats

सर्च इन्जनों में इस्तेमाल किए गए उपर्युक्त शब्दों ,नामों , पदों में अम्बेडकर + भीमराव अम्बेडकर अथवा स्वामी विवेकानन्द + विवेकानन्द + vivekanand + विवेकानन्द साह अथवा  गोस्वामी तुलसीदास+ तुलसीदास + tulsidas खोजने वालों की तादाद काएदे से जोड़ कर बतायी जानी चाहिए ।

  मुझे यक़ीन है कि सर्च इन्जनों के माध्यम से भविष्य में भी लोग इन महत्वपूर्ण शब्दों , नामों , पदों को खोजते इस चिट्ठे पर मँडराएंगे ।

  पिछले एक साल की पोस्टों को वर्गीकृत कर ‘विषय सूची’ में डालने का काम अतिशीघ्र हो जाएगा।  पिछले साल यह काम किया गया था । इससे ब्लॉग के अलावा ब्लॉग में छुपी वेब साइट को भी लोग देख सकते हैं । पिछले एक साल में प्रस्तुत ऑनलाइन पुस्तिकाओं को भी एक साथ प्रस्तुत कर दिया जाएगा , ऐसे

पिछले एक वर्ष में मेरी कौन सी पोस्ट्स कितनी पढ़ी गयीं ?

2007-08-15 to Today

Title Views  
‘राष्ट्र की रीढ़’ 323 More stats
रघुवीर सहाय : ती 314 More stats
गोस्वामी तुलसी 307 More stats
डॊ. भीमराव अम्ब 256 More stats
‘नारी के सहभाग ब 226 More stats
ऑनलाइन पुस्तिक 218 More stats
उदय प्रकाश की क 182 More stats
औद्योगीकरण का 173 More stats
मोदी की जीत गुज 165 More stats
परिचय 164 More stats
इस चिट्ठे की वि 163 More stats
भारत भूमि पर वि 159 More stats
नारोदनिक,मार्क 157 More stats
मायावती और चरख 149 More stats
नौ ऑनलाइन पुस् 133 More stats
‘लोकतंत्र का जि 132 More stats
ईसाई और मुसलमा 129 More stats
औद्योगिक सभ्यत 121 More stats
पूर्वी उत्तर प 111 More stats
‘वेब पत्रकारित 108 More stats
“हिटलर के नाज 107 More stats
महिला दिवस का ऐ 103 More stats
औद्योगिक सभ्यत 101 More stats
हिन्दी दिवस ( १४ 100 More stats
‘शेक्सपियर गुज 100 More stats
खेती की अहमियत 99 More stats
‘पूंजी’,रोज़ा लक् 98 More stats
असल कश्मीरियत 98 More stats
‘आरक्षण की व्यव 93 More stats
‘ नारी हानि विसे 90 More stats
बाबा साहब डॉ . भ 88 More stats
हमने मोदी को वो 87 More stats
नई राजनीति के न 84 More stats
तेलुगु कहानी : म 82 More stats
कविता : इतिहास म 80 More stats
चरम गुलामी : जब 80 More stats
पानी की जंग : ले. 78 More stats
बौद्धिक साम्रा 75 More stats
शिक्षा , मलाईदा 73 More stats
गांधी – अम्बेडक 71 More stats
परमाणु बिजली न 71 More stats
‘बिजली मुफ़्त बँ 69 More stats
गांधी , अम्बेडक 69 More stats
कत विधि सृजी ना 68 More stats
गांधी , अम्बेडक 67 More stats
गांधी से प्रभा 66 More stats
तेलुगु कहानी (२) 66 More stats
गांधी , अम्बेडक 66 More stats
बम धमाके : सच के 63 More stats
डॉ. अम्बेडकर : ए 63 More stats
गांधी , अम्बेडक 62 More stats
भारत का कुलीकर 62 More stats
बौद्धिक साम्रा 57 More stats
सूर्य हमारा पर 55 More stats
उपभोक्तावादी स 55 More stats
क्या वैश्वीकरण 54 More stats
अमृत घूंट : ले. न 54 More stats
परमाणु बिजली क 51 More stats
अहमद पटेल के भर 50 More stats
वाल मार्ट पर लि 50 More stats
शब्द , शब्द को प 48 More stats
वामपंथ का व्या 48 More stats
गाँधी – नेहरू चि 47 More stats
गांधी , अम्बेडक 45 More stats
कम्युनिस्ट देश 44 More stats
नन्दीग्राम पर 44 More stats
भारत का कुलीकर 42 More stats
यह सिर्फ शब्दो 41 More stats
पत्रकारीय लेखन 41 More stats
कोला कम्पनियों 41 More stats
मनुष्यता के मो 40 More stats
भोगवाद और ‘ वामप 40 More stats
‘चरखा’ वाले अमन 39 More stats
जल्दी में : कुंव 39 More stats
कोला कम्पनियों 39 More stats
उपभोक्तावाद का 37 More stats
मिथुन दर्शनं म 37 More stats
अमृत घूंट (३)[चा 37 More stats
‘खुले विश्व’ के 37 More stats
उपभोक्तावादी स 35 More stats
सेज विरोधी आन् 35 More stats
म.प्र. राज्य सुर 35 More stats
युद्ध पर तीन कव 34 More stats
फिर न हों हिरोश 33 More stats
कोला कम्पनियों 32 More stats
दो वर्षों में य 32 More stats
गांधी , अम्बेडक 31 More stats
जे.पी. और राष्ट् 31 More stats
तत्वज्ञानी महा 30 More stats
दिल्ली चिट्ठाक 30 More stats
मीडिया प्रसन्न 30 More stats
क्या, फिर इन्डि 30 More stats
मेरी चिट्ठाकार 30 More stats
अमृत घूंट (२) : ले 28 More stats
हम इस आवाज का मत 27 More stats
कोला कम्पनियाँ 27 More stats
वामपंथ का व्या 27 More stats
पानी की जंग : गो 27 More stats
गांधी गीता और ग 26 More stats
प्रकाश व ऊष्मा , 26 More stats
पानी की जंग , ले.- 24 More stats
उसका सौन्दर्य 23 More stats
सीख वाले खेल और 23 More stats
गांधी – सुभाष : भ 22 More stats
खाद्य संकट पर प 22 More stats
राजनीति में मू 22 More stats
तीन बागी गायक 21 More stats
उपभोक्तावादी स 21 More stats
भारत भूमि पर वि 21 More stats
भाषा पर गांधी ज 21 More stats
निजी जेल कंपनि 20 More stats
क्या वैश्वीकरण 20 More stats
अयोध्या , १९९२ : 19 More stats
‘दो तिहाई आबादी 19 More stats
गांधी पर बहस : प 18 More stats
क्रांतिकारी दि 18 More stats
गीकों की ‘गूँगी 18 More stats
‘विकास’ बनाम वू 18 More stats
अमृत घूंट (४) : ले 18 More stats
महादेव देसाई (२) 18 More stats
आयात – निर्यात औ 17 More stats
नन्दीग्राम की 17 More stats
मौजूदा चुनाव क 17 More stats
सर्वत्र भारतीय 17 More stats
वैश्वीकरण : देश 17 More stats
भारत भूमि पर वि 17 More stats
भारत और उपभोक् 16 More stats
राजनीति में मू 16 More stats
राधा – कृष्णों क 16 More stats
गांधी – सुभाष : भ 15 More stats
जंगल पर हक़ जतान 15 More stats
साल-भर की चिट्ठ 15 More stats
चिट्ठेकारी का 15 More stats
परिचर्चा पर बह 15 More stats
वस्तुओं को जमा 14 More stats
” आप चिट्ठाजगत प 14 More stats
क्या वैश्वीकरण 14 More stats
चेर्नोबिल यत्र 14 More stats
जगतीकरण क्या ह 13 More stats
उपभोक्तावादी स 13 More stats
गांधी – नेहरू ची 13 More stats
राज्य आयोग का ई- 13 More stats
‘चिट्ठाजगत’ का प 12 More stats
अपठित महान : महा 12 More stats
राष्ट्रपिता : ग 12 More stats
मैथिली गुप्तजी 11 More stats
विदेशी पूँजी स 11 More stats
चिट्ठे इन्कलाब 11 More stats
क्या वैश्वीकरण 11 More stats
कुछ और विशेष क् 11 More stats
ये परदेसी जिन् 10 More stats
आदिवासियों ने 10 More stats
कचरा खाद्य : मान 10 More stats
प्रतिबन्धित पु 10 More stats
विदेशी पूंजी स 10 More stats
गांधी पर 10 More stats
बैंक बीमा और पे 9 More stats
प्लाचीमाडा की 9 More stats
विदेशी पूंजी स 9 More stats
क्या वैश्वीकरण 9 More stats
क्या वैश्वीकरण 9 More stats
आदमी का अकेलाप 9 More stats
आर्थिक संप्रभु 9 More stats
ब्लागवाणी क्यो 9 More stats
भाषा पर गांधी औ 8 More stats
क्या वैश्वीकरण 8 More stats
चिट्ठेकारी सम् 8 More stats
‘ गन – कल्चर ‘ पर च 8 More stats
विदेशी पूंजी स 8 More stats
बातचीत के मुद् 8 More stats
श्रमिकों की हत 8 More stats
सलमान खुर्शीद 7 More stats
भारत भूमि पर वि 7 More stats
उपभोक्तावादी स 7 More stats
” डबल जियोपार 7 More stats
समाजवादी कल्पन 7 More stats
‘ परिचर्चा ‘ से स 7 More stats
पानी की जंग पर र 7 More stats
विधानसभा में व 6 More stats
बनारस तुझे सला 6 More stats
गीता पर गांधी 6 More stats
पानी की जंग ( गत 6 More stats
अकाल तख़्त को मा 5 More stats
विदेशी पूंजी स 5 More stats
स्कूलों में शी 5 More stats
शैशव में अतिक् 4 More stats
पूँजीवाद के सं 4 More stats
अखबारनवीसी – सल 4 More stats
गांधी – नेहरू ची 4 More stats
रविजी , आप भी न भ 4 More stats
दोषसिद्ध रंगभे 4 More stats
भारत भूमि पर वि 3 More stats
गुलामी का दर्श 3 More stats
इन्टरनेट पर गा 3 More stats
कोला कम्पनियों 3 More stats
चीन और विदेशी प 3 More stats
आगाज़ 3 More stats
भारत भूमि पर वि 2 More stats
हत्यारों का गि 2 More stats
रामगोपाल दीक्ष 2 More stats
विदेशी पूंजी स 2 More stats
‘ परिचर्चा ‘ की ज 1 More stats
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