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Posts Tagged ‘women”s day’

[ गुजरात में 2002 में हुए नरसंहार के दरमियान एक रक्त रंजित महिला का चित्र देश भर में छपा था। चित्र उत्तर गुजरात के लूनावडा का था। उसी वर्ष दैनिक हिंदुस्तान के वाराणसी संस्करण के पत्रकार मित्र ने साथी स्वाति से महिला संगठनकर्ता के नाते अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के लिए संदेश मांगा था । साथी स्वाति ने यह पत्र लिखा। 7 मार्च 2002 के दैनिक हिंदुस्तान,वाराणसी में यह छपा।]

बहन,

हम महिला आंदोलन से जुड़ी बहनें हर साल 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाते हैं।यह दिन इंग्लैण्ड की मजदूर महिलाओं की सम्मानजनक मजदूरी व समान वेतन की लड़ाई, उनके शोषण व शोषण पर जीत की याद में व अपने अंतर की शक्ति को पहचानने, एकजुटता बनाने के लिए होता है। किसी की भी लड़ाई (अगर वह सामाजिक रूप से सही और बुलंद हो) से खुद को जोड़ने से बेगानापन या मानसिक गुलामी के हालात नहीं बनते। मगर आज अपने रहनुमाओं ने औरत को देशों, जातियों, धर्मों,वर्गों में बांटने के नजरिए को पुख्ता कर दिया है। भुला दी गई है वह पुरानी कहावत , ‘औरत चाहे किसी भी जाति की हो,अपने घर की कहारिन है’।इस कहावत में भी हमारे समाज की जाति व्यवस्था, उसके श्रम के बंटवारे व शारीरिक श्रम से जुड़ी अप्रतिष्ठा की भावना निहित है।यह सच्चाई है कि आज भी घर के अंदर व बाहर दोनों जगह औरत चाहे व किसी भी अंचल की व समाज की किसी भी श्रेणी की क्यों न हो,दबायी जाती है। अपवाद स्वरूप कुछ महिलाएं मिलेंगी जो अपनी जिंदगी के बारे में स्वयं निर्णय ले सकें,पर वह महज अपवाद ही होंगी।

भाजपा के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने वर्ष 2001 को नारी सशक्तिकरण वर्ष घोषित किया।सेमिनारों के व्याख्यान और प्रसार माध्यमों की घोषणाओं से प्रतीत होने लगा कि नारी आंदोलन की कोई आवश्यकता अब भारतीय समाज को नहीं रही क्योंकि नारी आंदोलन के प्रमुख मुद्दों – कन्या भ्रूण हत्या,पारिवारिक हिंसा, व राजनीतिक शक्तिकरण (विधायिकाओं में 33% आरक्षण का महिला बिल)- को सरकार ने अपना लिया है व अपना मन बना लिया है कि वह इन पर शीघ्र ही कार्रवाई करेगी।

2001 के अंत तक स्पष्ट हो गया कि महिलाओं को बरगलाने के अलावा इनमें से किसी पर भी कारगर कानून बनाने की इच्छा शक्ति सरकार की नहीं है।उदाहरण के लिए कन्या भ्रूण हत्या का व्यापक कानून 1996 में ही बन गया था परंतु उस पर अमल नहीं किया गया-कड़ाई से अमल की बात तो दूर रही।मई 2001 में संशोधन हेतु सरकार ने जिस तरह की जांच समितियों का गठन किया उनकी सिफारिशों के लागू होने पर इस कानून के शिकंजे से बच निकलना ज्यादा आसान हो गया है।

दरअसल मनुवादी समाज की स्थापना को आदर्श मानने वाले संघ परिवार के राजनैतिक प्रतिनिधि स्त्री के शक्तिकरण हेतु ठोस उपाय कैसे लागू करेंगे। वादों की मृगमरीचिकाओं में जनता को भटका जरूर सकते हैं। औरतों के संदर्भ में इनकी मूल दृष्टि पर गौर करें। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन प्रमुख श्री गोलवलकर ने हिंदू स्त्री को पारिवारिक संपत्ति में बराबर का हिस्सा देने वाले कानून का विरोध किया था।भाजपा महिला मोर्चा की पूर्व अध्यक्ष विजयराजे सिंधिया ने सती निरोधक कानून का विरोध करते हुए कहा था,’हिंदू स्त्री को सती होने का बुनियादी अधिकार है चूंकि इससे हमारी गौरवमयी परंपरा और संस्कृति संरक्षित होती है। भाजपा महिला मोर्चा की एक अन्य पूर्व अध्यक्ष व वर्तमान में केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड की अध्यक्ष श्रीमती मृदला सिन्हा ने 1993 में      ‘द टेलिग्राफ’ से साक्षात्कार में निम्नलिखित बातें कहीं थीं।जिस जिम्मेदार पद पर आज वे आसीन हैं उसके मद्देनजर स्त्री-कल्याण के भाजपाई रवैये का अंदाज लगाया जा सकता है। मृदुला सिन्हा के शब्दों मेँ

  • स्त्री को घर के बाहर कार्य नहीं करना चाहिए।परिवार अत्यंत गरीब हो तब ही वह घर के बाहर काम पर जाए।
  • स्त्रियों पर घरेलु हिंसा में क्या बुराई है?अक्सर इन मामलों में स्त्री की ही गलती होती है।
  • मैं स्त्री मुक्ति की विरोधी हूं क्योंकि स्त्री मुक्ति अनैतिकता का दूसरा नाम है।
  • मैंने दहेज दिया था और दहेज प्राप्त भी किया था।
  • स्त्री-पुरुष के समान अधिकारों का हम विरोध करते हैं।

भाजपा के पूर्व अध्यक्ष कुशाभाऊ ठाकरे ने एक उपचुनाव के दौरान सभी दलों द्वारा 3 से 7 प्रतिशत महिला उम्मीदवारों की संख्या के बारे में पूछे जाने पर कहा कि महिलाएं सही ढंग से चुनाव तभी लड़ सकती हैं जब सीट महिलाओं के लिए आरक्षित हो।कोई भी दल प्रतिनिधि बनाने का हुआ नहीं खेलना चाहता।स्पष्ट है कि राजनैतिक आरक्षण के बिना औरतें ज्यादा संख्या में सत्ता की गलियों में नहीं पहुंचेंगी।नजमा हेपतुल्ला या सुषमा स्वराज जैसी इक्की-दुक्की ‘टोकेन’,दिखाने भर के लिए प्रतिनिधि ही बनेंगी,जिसमें सत्ता चाहे किसी पार्टी की हो नियम कानून पुरुषसत्तात्मक समाज बनायेगा।

आज जब गुजरात दंगों की आग में,सांप्रदायिकता के ईंधन से दावानल सा धधक रहा है तब महिलाओं का राजनैतिक सशक्तिकरण (आरक्षण) सामाजिक परिवर्तन बलात करने के लिए एकमात्र कारगर औजार के रूप में दिखता है।महिलाएं ऐसा कानून बनाएंगी कि जिस राज्य में तीन दिन से अधिक दंगे चलेंगे वहाम संविधान की एक नयी धारा सृजित धारा के अंतर्गत राज्य के प्रशासन को पंगु मानते हुए सरकार को बरखास्त किया जाएगा और पहले चरण में राष्ट्रपति शासन होगा तथा तथा छः महीने के भीतर विधानसभा चुनाव कराए जाएंगे। राज्य शासन की अकर्मण्यता पर जनता अपना निर्णय व्यक्त कर देगी जैसे कि उत्तर प्रदेश के भाजपा-गठबंधन की सरकार पर हालिया चुनाव ने प्रश्न खड़े किए हैं।इस चुनाव परिणाम से उपजी हताशा भाजपा के आनुषंगिक संगठनों को मंदिर निर्माण की मांग को तेज करने व बलवा फैलाने की तरफ मोड़ा है।

लूनावाड़ा (गुजरात) की अनाम बहन !यह सब तथ्य,यह विश्लेषण तुम्हारा खून से सना दुखी व लाचार चेहरा देख कर तुम जैसी दुखी बहनों के लिए संदेश है। माना कि आज तुम्हारे परिवार,पड़ोसी,साथी,किसी को भी बचाने में गुजरात की सरकार या हम देशवासी नाकामयाब रहे।मगर तुम्हें इस दरिंदगी भरी जिंदगी से हमें उबारना ही होगा।उबारना ही होगा अपने देश को,समाज को अपने बच्चों के लिएजो जन्म ले चुके हैं वे भी जो अजन्मे हैं उनके लिए भी।

गोधरा से लेकर लूनावाड़ा तक,नेल्लि (असम) से लेकर दिल्ली तक सियासी खेल औरतों की इज्जत लूट कर ही खेले जाते हैं।रघुवीर सहाय ने ठीक ही कहा है कि ‘ औरत की देह ही उसका देश है।इसी से वह गढ़ती भी है-इसीसे वह बांटी भी जाती है जाति,धर्म,वर्ग,देश व संस्कृति के कटघरों में।

हमको अपनी बंटी हुई जिंदगियों,बंटे हुए अहसासात को महसूस कर एकजुटता बनानी होगी-ताकि हम लड़ सकें।उन हालात से जो हमें तोड़ते हैं और हमारे देश को भी।

डॉ स्वाति,संयोजक ,नारी एकता  IMG-20200623-WA0043

संयोजक,

 

नारी एकता

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