‘खुले विश्व’ के बन्द होते दरवाजे
May 26, 2007 by अफ़लातून
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[ १८ मई २००७ को 'इंटरनेट की सेंसरशिप पर जोर ' विषयक एक खबर बी बी सी हिन्दी पर आई है । ३० दिसम्बर , २००२ के 'हिन्दुस्तान' के सम्पादकीय पृष्ट पर इस मसले पर मेरा लेख 'खुले विश्व' के बंद होते दरवाजे छपा था । हिन्दुस्तान के संजाल संस्करण के इस तिथि के पुरालेख संजाल पर उपल्ब्ध नहीं हैं । यहाँ दे रहा हूँ । ]
इंटरनेट या विश्वव्यापी मकड़जाल ( वर्ल्ड वाइड वेब ) द्वारा सूचनाओं के आदान - प्रदान की व्यवस्था सूचना क्रान्ति का सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा है । क्रांतियों के महान उद्देश्यों की तरह इंटरनेट की स्थापना के समय से कुछ महान उद्देश्यों को जोड़ा जाता रहा है । एक लक्ष्य था कि इससे अधिक से अधिक व्यक्ति और समूह अपने विचार और सृजन को प्रकट कर सकेंगे ।विश्व के एक कोने में कम्प्यूटर के एक ‘क्लिक’ से दूसरे कोने में सृजित वेबसाइट का सम्पर्क स्थापित हो जाएगा , निर्विघ्न और निष्पक्ष सूचना के आदान - प्रदान हेतु । इन आदर्शों को क्रान्तिकारी माना जा सकता है ।फिलहाल इन महान आदर्शों की पूर्ति में कई किस्म की प्रतिक्रांतिकारी वर्जनाएं रोड़ा बनी हुईं हैं । ये वर्जनाएं भाषा , वित्त और तकनीकी संबधी तो हैं ही , सेंसरशिप के कारण भी हैं । विश्व के बहुत बड़े इलाके के लोगों के लिए सूचना और संचार तकनीकी का लाभ लेना ढांचागत कमियों के कारण असंभव है । उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इन कमियों से बाधित हो जाती है । अफ्रीका के गरीब मुल्कों में प्रति १०,००० व्यक्ति इस मकड़जाल (वेब) से जुड़े सिर्फ दो कम्प्यूटर उपलब्ध हैं जबकि सबसे अमीर मुल्कों में इतनी ही आबादी के पीछे १२०० ऐसे कम्प्यूटर उपलब्ध हैं । इंटरनेट पर उपलब्ध कुल सूचना का ५२ प्रतिशत अंग्रेजी , ६.९७ प्रतिशत जर्मन , ५.४८ प्रतिशत स्पैनिश , ४.४३ प्रतिशत फ्रेंच , ३.०६ प्रतिशत इटालियन तथा २.७ प्रतिशत पोर्तगीज़ भाषा में उपलब्ध है । इस वजह से गरीब मुल्कों के रंगीन चमड़ी के लोगों के लिए इस क्रान्ति का लाभ पाना बहुत कठिन हो जाता है ।
इंटरनेट में सेंसरशिप का प्रश्न आजकल अंतर्राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना हुआ है । विभिन्न संस्थाएं , संगठन , कंपनियां और देश अपनी भौगोलिक सीमा के अंतर्गत इंटरनेट पर रोक लगा रहे हैं । दरअसल सूचना के स्रोत और सूचना प्राप्त करन के इच्छुक के बीच कई कड़ियों की श्रृंखला होती है । इस श्रृंखला की किसी भी कड़ी द्वारा अगली कड़ी तक सम्प्रेषण से इंकार किया जाना आजकल वृद्धि पर है । वैसे इन कड़ियों से जुड़े कंप्यूटर द्वारा यह दायित्व न निभा पाना कुछ अन्य तकनीकी कारणों से भी होता है । परंतु अन्य किसी व्यक्ति की पहल पर सूचना को छानने , छांटने की प्रक्रिया आजकल पहले से अधिक हो रही है । अश्लीलता ,शराब , ड्रग्स आदि से जुड़ी वेब साइट्स से अभिवावक अपने बच्चों को बचाना चाहते हैं । कुछ कंपनियां उत्पादकता बढ़ाने के उद्देश्य से अपने कर्मचारियों द्वारा मनोरंजन और मनसायन की वेबसाइट्स देखने-सुनने पर रोक लगाती हैं । सरकारें अपनी भौगोलिक सीमा के अंतर्गत कुछ सूचना सामग्रियों को प्रविष्ट नहीं होने देना चाहतीं हैं । इन सबमें एक समान इच्छा होती है कि जो हम अन्य लोगों को नहीं देखने देना चाहते हैं , उसे छांटा जाए और छाना जाए । निर्विघ्न और निष्पक्ष सूचना पहुंचाने के इंजीनियरिंग के सिद्धान्त को मानने वाले बहुत लोग अब इसे एक राजनीतिक मूल्य मानने लगे हैं । सेक्स , नशा और अपराध की वेबसाइट पर रोक के लिए सार्वजनिक इच्छा के आधार पर एक तकनीक विकसित हो चुकी है । सरकारों द्वारा इंटरनेट में छलनियों ( फिल्टर) का प्रयोग व्यापक हो रहा है । चीन , क्यूबा और सऊदी अरब जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति परंपरागत रूप से प्रतिकूल आचरण वाली सरकारों के अलावा पश्चिमी लोकतंत्र वाले देशों में भी ये तरीके आम हो रहे हैं ।
आतंकवाद विरोधी अभियान के तहत नए सुरक्षा उपायों के नाम पर ये कदम उठाए गए हैं। उल्लेखनीय है कि इन देशों में चिट्ठी - पत्री की गोपनीयता तथा पत्रकारों द्वारा समाचारों के स्रोत घोषित न करने का अधिकार लंबे संघर्षों के बाद मिला हुआ था । इंटरनेट पर लगाई जाने वाली हर किस्म की छलनी में एक समानता होती है । वह यह है कि सभी प्रकार की छलनियों द्वारा रोकी गयी वेबसाइटों की सूची सार्वजनिक नहीं हो पातीं । इस प्रकार सूचना प्राप्त करने का इच्छुक व्यक्ति यह नहीं जान पाता है कि इच्छित सूचना उसे क्यों नहीं मिल पा रही है । विभिन्न देशों में इंटरनेट पर सरकारी नियंत्रण का स्वरूप अलग - अलग है । यहाँ एक बानगी प्रस्तुत है ।
बहरीन प्रशासन द्वारा जिन वेबसाइटों पर रोक है उन्हें ‘ पक्षपातपूर्ण सूचनाओं , अफवाहों और झूठ का यंत्र ‘ माना जाता है । बेलारूस में सभी इंटरनेट उपभोक्ताओं को सरकारी ‘ बेलपाक ‘ नामक सर्विस प्रोवाइडर ( इंटरनेट सेवा प्रदान करने वाले कंप्यूटर और कंपनी ) का ही प्रयोग करना पड़ता है । कनाडा में दिसंबर , २००१ से लागू आतंकवाद विरोधी कानून द्वारा सभी इलेक्ट्रानिक संचार प्रणालियाँ नियंत्रित की गयी हैं । चीन के इंटरनेट एसोशियेशन ने सभी संबंधित पक्षों से मार्च २००२ से एक समझौते पर हस्ताक्षर करवाए , जिसके द्वारा ‘राष्ट्रीय सुरक्षा और स्थिरता के हानि पहुँचाने वाली सूचनाओं को प्रकट नहीं किया जाएगा ।’ यूरोपीय संघ की संसद द्वारा ३० मई , २००२ को सभी सदस्य देशों को निर्देश दिया गया कि वे ऐसे कानून बनाएं , जिनके द्वारा सभी इंटरनेट सेवा प्रदान करने वाले तथा टेलीफोन कंपनियों को उनके द्वारा किए गए समस्त संचार - सम्पर्कों का लेखा - जोखा रखना पड़ेगा। फ्रांस की के अदालत ने मई , २००० में ‘याहू’ ( कंप्यूटर सेवा कंपनी ) को आदेश दिया वह फ्रांस के इंटरनेट उपभोक्ताओं को ऐसी साइट दिखाने पर रोक लगाये , जिनके द्वारा नाज़ी स्मृति चिह्नों को नीलामी द्वारा बेचा जाता है ।इस आदेश के अनुपालन के लिए ‘याहू’ को फ्रांस के नागरिकों द्वारा उसकी ‘सर्च इंजन’ प्रयोग पर छलनी लगानी पड़ी । १० अक्टूबर , २००२ को वियतनाम सरकार ने एक नियम बनाया है , जिसके द्वारा इंटरनेट पर सूचना प्रसारित करने वाले हर नागरिक को सर्वप्रथम सूचना और संस्कृति मंत्रालय से लाइसेंस लेना होगा तथा हर वेबसाइट पर सामग्री देने वाले प्रत्येक व्यक्ति की पहचान बतानी होगी ।
साभार : इंटरनैशनल हेराल्ड ट्रिब्यून
भारत में भी पोटा द्वारा ई-मेल तथा सभी इलेक्ट्रॉनिक संचार में हस्तक्षेप का शासन को अधिकार मिल चुका है । सऊदी अरब द्वारा समस्त इंटरनेट आदान - प्रदान की प्रणाली सरकार द्वारा घोषित रूप से नियंत्रित है । सरकार द्वारा वेबसाइटों की एक काली सूची बनाई गयी है , जिन्हें देखने का निर्देश कंप्यूटर को देने पर मनाही की सूचना परदे पर प्रकट हो जाती है । अक्टूबर , २००१ में अमेरिका के पैट्रियॉट एक्ट ( राष्ट्रभक्त अधिनियम ) के लागू होने के बाद से कई इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियों ने ‘ कार्निवोर ‘ ( मांसभक्षी ) नामक एक सॉफ़्ट्वेयर का प्रयोग शुरु किया है , जिसके द्वारा इलेक्ट्रॉनिक निगरानी (मॉनिटरिंग ) की जाती है ।इसके प्रयोग की एक घटना काफी चर्चित हुई और उल्लेखनीय है । आतंकवादी घतनाओं के सिलसिले में एफ़.बी.आई को किसी ऐसे व्यक्ति जानकारी लेनी थी , जो शौकिया गोताखोर ( स्कूबा डाइवर ) था। एफ. बी. आई. की मदद के लिए सभी शौकिया डाइवर संघों ने अपने समस्त पंजीकृत सदस्यों के संपूर्ण ‘डाटाबेस’(कंप्यूटर और इंटरनेट के व्यवहार के समस्त तथ्य ) प्रदान कर दिए । इसका मतलब हुआ कि सभी सदस्यों के क्रय , विक्रय , टेलीफोन , यात्रा , ई-मेल आदि की विस्तृत जानकारी एफ. बी. आई. के हवाले कर दी गयी । एक डाइवर , जो संयोग से वकील था , को जब इसकी जानकारी मिली तो उसने इस कदम का प्रतिवाद किया ।अमेरिकी सीनेट द्वारा २० नवंबर, २००२ को पारित होमलैन्ड्स एक्ट ने पूंजीवाद में अभिव्यक्ति की आजादी की मान्यता और वास्तविकता के बीच की खाई के ऊपर से परदा उठा दिया है । पूरे विश्व को मानवाधिकार और लोकतंत्र की सीख देने वाले देश के नागरिक आज सुरक्षा की नाम पर किए गए उपायों से भयभीत हो गए हैं । इस कानून की व्याख्या आउर लागू किए जाने के तरीकों के ऐसे दमनात्मक दुष्परिणाम होंगे , जो शब्द और छवि के मुक्त प्रवाह को ही नहीं , अपितु आम अमेरिकी नागरिक के रोजमर्रा के जीवन में अतिक्रमण करेंगे । ४० अरब डॉलर के बजट आवंटन द्वारा एक नया विभाग सृजित किया गया है जो आगामी वर्ष तक एक लाख ७० हजार कर्मचारियों की फौज के साथ पूर्णरूपेण सक्रिय हो जायेगा ।ये कर्मचारी २२ सरकारी विभागों से नियोजित किए जाएंगे । १९४७ में रक्षा विभाग गठन के बाद हुआ यह सब से बड़ा पुनर्गठन है । मानवाधिकार संगठनों ने इस पर उंगली उठाई है । सुरक्षा सम्बन्धी कम्पनियों को इस कदम से काफ़ी मुनाफा होगा । ९ सितम्बर , २००१ की घटनाओं का एक प्रमुख शिकार इंटरनेट भी बना है।इंटरनेट और दूरसंचार कम्पनियों द्वारा जनता के ई-मेल आदान-प्रदान व इंटरनेट गतिविधियों की पूरी जानकारी इतनी आसानी से पुलिस व सुरक्षा एजेन्सियों को सौपीं जा रही है कि वे कंपनोयां इन सुरक्षा एजेन्सियों का हथियार बन गयी हैं । सूचना क्रान्ति के इन हथियारों के इस असाधारण दुरुपयोग के फलस्वरूप प्रत्येक अमेरिकी नागरिक सिद्धान्त: संदेह के घेरे में है ।
साभार : http://www.newsline.com.pk/NewsApr2006/IMAGES/media.jpg
पेंटागन ( अमेरिकी रक्षा मन्त्रालय ) की गोपनीयता शोध शाखा द्वारा ‘टोटल इंफॉर्मेशन अवेयरनेस’ ( पूर्ण सूचना जागरूकता ) नामक एक अभियान चलाया जा रहा है । २० करोड़ डॉलर के बजट से चलने वाले इस अभियान का उद्देश्य इतिहास का सबसे व्यापक इलेक्ट्रॉनिक निगरानी नेटवर्क गठित करना है ।इसके द्वारा प्रत्येक अमेरिकी नागरिक द्वारा इंटरनेट सर्फिंग , पुस्तक रुचि , आय - व्यय , यात्रा - योजना और मानसिक स्वास्थ्य के अभिलेख रखे जाएंगे और उन्हें नियंत्रित किया जाएगा ताकि उनके भविष्य की आचरण का अनुमान लगाया जा सके । रीगन प्रशासन में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रह चुके जॉन पोइनडेक्स्टर इस कार्यक्रम के जनक हैं। वे षडयंत्र , संसद को झूठी सूचना देना , सरकार को धोखे में रखना तथा सबूत नष्ट करने के आरोप सिद्ध होने पर पदमुक्त किए गए थे , परंतु १९९० में यह निर्णय पलट दिया गया । इस पद्धति का तकनीकी नाम ‘डाटा माइनिंग’(आंकड़ा खनन) है तथा अब तक इसका इस्तेमाल बड़ी कंपनियों द्वारा उपभोक्ताओं के भविष्य के आचरण का पूर्वानुमान लगाने के लिए होता था । एफ. बी. आई. ने जो सूचियाँ बनाईं , उन्हें विश्व भर में इंटरनेट कंपनियों , सरकारों ,तथा एयर लाइंस को दिया गया । इन सूचियों में भूल से शामिल कर लिए गए लोगों की दिक्कतों की कल्पना करना एक आम भारतीय के लिए कठिन है । अपने नाम में ‘अट्टा’ का कुलनाम (सरनेम) होने के कारण दो निर्दोष भाई इस सूची में शामिल कर लिए गए , चूंकि ११ सितम्बर की आतंकवादी घटनाओं में ‘अट्टा’ नामक एक व्यक्ति शामिल था । दोनों भाइयों ने जब एफ. बी. आई. से संपर्क किया तब उन्हें बताया गया कि नई सूची से उनका नाम हटा लिए गए हैं परंतु पुरानी सूची जिन इंटरनेट कम्पनियों,सरकारों व एयरलाइंसों आदि को सौंपी गयी थी, उसमें सुधार करवाने में वे तकनीकी कारणों से असमर्थ हैं । व्यक्तिगत जीवन में गोपनीयता (प्राइवेसी) की अमेरिकियों की आम धारणा को बुश प्रशासन ने उलट दिया है । साम्राज्यावादी वैभव के कारण अमेरिका में गरीबी की रेखा का मानदंड बहुत ऊंचा है तथा पूंजीवादी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के अंतर्गत नागरिक आजादी का वह झंडाबरदार रहा है ।इस प्रकार भोजन और अभिव्यक्ति , दोनों के सहअस्तित्व को उपलब्धि माना जाता रहा है । समाजवादी नेता किशन पटनायक का सुझाव था कि यह उपलब्धि पूंजीवादी-लोकतांत्रिक व्यवस्था का गुण है या साम्राज्यवादी वैभव का कमाल है , इस पर अनुसंधान होना चाहिए । ११ सितम्बर २००१ की घतनाओं के बाद से अमेरिकी सरकार की इन करतूतों ने कम-से-कम इस अवधारणा को पूर्णरूपेण ध्वस्त कर दिया है कि अधिकारों की व्यवस्था अनंत वैभव में ही फलती-फूलती है ।
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आपने ठीक ही लिखा है . अमेरिका में बुश सरकार ने निजी गोपनीयता और आज़ादी का पूरी तरह परिसीमन कर दिया है . अर्थव्यवस्था खुल रही है और नागरिक आज़ादी सिकुड़ रही है .
इंटरनेट का खुला उपयोग कई कंपनियों की विकास दर को प्रभावित कर चुका है यह सच है तो इसने उनके विकास को बढ़ाया भी इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता। बात है इसके उपयोग और दुरुपयोग की। लेकिन एक नजर रखने जैसे प्रणाली तो होनी ही चाहिए। इंटरनेट से कई बार देश की अहम सूचनाएं बाहर भेजने के मामले सामने आए हैं जो कतई बर्दाशत नहीं किए जा सकते और ऐसे में इंटरनेट पर निगरानी होनी ही चाहिए। मां बाप सो गए और बच्चे हैं कि अश्लीलता की हद को पार कर जाए और कुछ ऐसा कर डाले जिससे शर्मसार होना पड़े। कंपनी में काम कर रहा कर्मचारी वेतन लेने के अलावा काम ही नही कर रहा हो और इशक लड़ाने से लेकर कंपनी की सूचनाएं बाहर भेजने में लगा हो। नजर रखनी तो जरुरी है चाहे कोई इससे सहमत हो या नहीं।