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गत 5 अगस्त को केंद्र की भाजपा नीत एनडीए सरकार ने जम्मू-कश्मीर से संविधान के विशेष प्रावधान अनुच्छेद-370 के कई प्रमुख प्रावधानों को निष्प्रभावी बना दिया। इसके साथ ही केंद्र ने जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य के दर्जे के साथ ही पूर्ण राज्य का दर्जा भी समाप्त कर उसे दो हिस्सों में केंद्र शासित प्रदेशों के रूप में विभाजित कर दिया।

केंद्र ने संसद से तीन प्रस्ताव पारित कराए हैं। इनमें से एक में संविधान संशोधन कर कश्मीरी संविधान सभा के न रहने की स्थिति में उसका अधिकार राष्ट्रपति में निहित कर दिया गया है। असल में पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा था कि अनुच्छेद 370 को हटाने का अधिकार कश्मीर की संविधान सभा को है। लेकिन 1957 में संविधान सभा के भंग हो जाने पर दूसरी बार संविधान सभा का गठन कर ही इस प्रावधान पर विचार किया जा सकता है। इस फैसले को पलटने के लिए भाजपा सरकार ने संविधान में ही संशोधन कर दिया है।

सरकार ने एक तरह से सांप्रदायिक पक्ष लेते हुए न केवल राज्य का दर्जा खत्म कर दिया है बल्कि उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित भी कर दिया है। इसके साथ ही पूरी घाटी में संचार सेवा को ठप कर करीब 50 हजार सुरक्षाबलों को तैनात कर दिया है। लोगों पर अघोषित कर्फ्यू लागू कर दिया गया है। ऐसा कर सरकार ने ऐतिहासिक भूल को सुधारने और आतंकवाद व अलगाववाद प्रभावित राज्य में शांति बहाली की उम्मीद का दावा किया है।

लेकिन जब हम संविधान, लोकतांत्रिक व्यवस्था, कानून का राज जैसे सिद्धांतों और भाजपा जैसी पार्टी की सोच और चरित्र के आधार पर आकलन करते हैं तो पता चलता है कि यह सब कार्रवाई केंद्र की भाजपा- एनडीए सरकार ने संविधान का उल्लंघन करने, लोकतंत्र का गला घोंटने, संघवाद, बहुलवाद को नजरंदाज कर अपना एकत्ववादी, सांप्रदायिक हिन्दूवादी एजेंडा लागू करने के लिए ऐसा किया है। यह इस बात से भी पुष्ट होता है कि‍ भाजपा सरकार ने यह सब राज्य की जनता को विश्वास में लिए बिना किया है, जिसका वादा जम्मू कश्मीर के विलय के वक्त किया गया था। अपनी अलोकतांत्रिक और धूर्ततापूर्ण कार्रवाई के समर्थन मे गृहमंत्री ने दिवंगत समाजवादी नेता डॉ- राम मनोहर लोहिया का नाम बिना किसी संदर्भ के लेने की धृष्टता की है कि‍ लोहिया अनुच्छेद 370 के खिलाफ थे। इसका कांगेस के एक प्रमुख नेता ने भी समर्थन किया। हम इस अभद्रतापूर्ण बयान की निंदा करते हैं। डा लोहिया ने हमेशा भारत-पाकिस्‍तान महासंघ बनाने की बात की जिसमें सीमाओं को मुक्‍त आवागमन के लिए खुला छोड़ा जा सके।

सजप मानती है कि जम्मू-कश्मीर में पूरे देश की तरह ही जन भावना को कुचलने का काम केंद्र की सरकारें करती रही है। चाहे कांग्रेस सरकार की 1953 का कश्मीर संविधान को नजरंदाज कर भारी बहुमत से चुने गए जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री शेख अब्दुतल्ला को अपदस्थ करना और अगले बीस साल के लिए जेल में डालना रहा हो, बाद के दिनों में धांधली कर चुनाव जीतना रहा हो या भाजपा की अब की कार्रवाई हो, सरकारें राज्य में सांप्रदायिक सौहार्द से छेड़छाड़ कर ही कार्रवाई करती रही है। कहना न होगा कि भाजपा सरकार की कार्रवाई की कांग्रेस महासचि‍व समेत कई नेताओं ने समर्थन किया हे और कांग्रेस नेतृत्व ने मौन साध रखा है।

सजप मानती है कि केंद्र की सरकारों की तरह ही राज्य की नेशनल कांफ्रेंस- पीडीपी- भाजपा सरकार की भी इस समस्या के समाधान की कोई इच्छाशक्ति नहीं रही है। यद्यपि नेशनल कांफ्रेंस भारत विभाजन के खिलाफ रहा और उसने राज्य के सांप्रदायिक माहौल को संतुलित रखने में शुरू से ही भूमिका निभाई है लेकिन बाकी समस्याओं को दूर करने और लोगों की बेहतरी के लिए उसका भी नकारापन रहा है। नेकां और पीडीपी शुरू से जनकल्याण के काम में जुटी रहती तो आज राज्य की शैक्षणिक, आर्थिक और राजनीतिक, सामाजिक स्थिति बेहतर हुई रहती। लेकिन देश के बाकी दलों की तरह ही उनका व्यवहार भी गैर जिम्मेदाराना रहा है। इस स्थिति में देश भर में सांप्रदायिक उन्माद और वैमनस्य पैदा कर भाजपा-आरएसएस घटिया लाभ लेने की फिराक में है। सजप केंद्र सरकार की इस धोखेबाजी, असंवैधानिक, गैर जिम्मेदाराना और धूर्तता से भरी इस प्रवृत्ति की कड़ी निंदा करती है।

जम्मू-कश्मीर या किसी राज्य की स्वायतत्ता और संघात्मक ढांचे पर बात करते समय सजप का यह भी मानना है कि प्राकृतिक संसाधनों पर मूल वासियों और “लम्बे समय के वासियों” का व्यक्तिगत और सामुदायिक अपरिवर्तनीय (unquestionable) अधिकार सजप की आधार भूत मान्यताओं में है। सजप मानती रही है कि सरकार द्वारा प्रायोजित सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए भी ज़मीन, जंगल, खनिज और जल का अधिग्रहण वहाँ की स्थानीय लोकतांत्रिक सरकारों (ग्राम सभा, पंचायत, ज़िला परिषद वग़ैरह) की सहमति से ही हो सकती है।

जिस तौर तरीके को कश्मीर में अपनाया गया उससे यह अंदेशा बनता है कि वर्तमान की कार्रवाई को केंद्र एक लिटमस टेस्‍ट के तौर पर ले सकता है और इसमें सफल होने के बाद वह आदिवासी इलाके, अन्य राज्यों के विशेषाधिकार और यहां तक कि विरोधी दल शासित राज्य सरकारों को कुचलने के लिए वहां भी ऐसी कार्रवाई कर सकता हैं और वहां के संवैधानिक अधिकारों को समाप्त कर सकता है और तानाशाही कायम की जा सकती है। भंग या निलंबित विधानसभा के अधिकार राज्यपाल के माध्यम से राष्ट्रपति को दे देना अलोकतांत्रिक, असंवैधानिक है। कश्मीर की संविधान सभा, विधानसभा की शक्ति राज्यपाल, राष्ट्रपति में निहित मान लेना तानाशाही का द्योतक है।

वैसे तो सजप की स्थायी मांग है कि कश्मीर समस्या के हर पहलुओं की संवेदनशीलता और अंतरराष्ट्रीय गंभीरता के साथ जांच-परख कर कूटनयिक पहल की जानी चाहिए और पूरे भारतीय समाज को इसमें संलग्न कर ऐसे समाधान की दिशा में बढ़ना चाहिए, जिससे कश्मीर और पाकिस्तान, बांग्लादेश समेत समूचे दक्षिण एशिया में शांति-सौहार्द कायम हो सके। तभी हम उम्मीद कर सकते हैं कि कश्मीर समस्या का समाधान भी आकार ले पाएगा।

लेकिन वर्तमान परिस्थिति में सजप मानती है कि जिस तरह से बन्दूक के साये में यह सब किया गया हमें उसका खुलकर विरोध किया जाए। देश के संविधान प्रदत्त संघीय ढांचे पर केंद्र सरकार ने सोच समझ कर आघात किया है। कश्मीर के अलगाववादी तत्वों को भारत सरकार के कदम से बल मिलेगा। किसी भी समुदाय से बात किए बिना उनके बारे में फैसला एकदम अलोकतांत्रिक और तानाशाही भरा है।

जहां तक कश्‍मीर पर अवैध कब्‍जे की बात है तो पीओके के अलावा चीन ने भी अक्‍साई चिन के बड़़े भूभाग यानी लगभग 33,000 वर्ग किलोमीटर जमीन कब्‍जा रखी है। इस पर सरकार ने अब तक कोई बयान भी जारी नहीं किया है। लद्दाख को केंद्र शासित बनाने पर चीन के विरोध में दिए गए बयान का भी भारत सरकार ने कोई प्रतिकार नहीं किया है। जो तत्‍काल किया जाना चाहिए था।

सजप मांग करती है कि

तत्‍कालकि तौर पर

– कश्मीर की वास्तविक स्थिति यानी तत्काल 5 अगस्त से पूर्व की स्थिति बहाल की जाए।

– वहां तत्काल विधानसभा का चुनाव कराकर लोकप्रिय सरकार गठित की जाए।

– दो पूर्व मुख्यमंत्रि‍यों व अन्य नेताओ की गिरफ्तारी निंदनीय है। उनकी तुरंत रिहाई हो।

– सरकार की वर्तमान कार्रवाई पर उच्चस्तरीय और संवैधानिक जांच बैठाई जाए।

– अनुच्छेद 370 पर निर्णय राज्य की जनता को विश्वास में लेकर व़हां संविधान सभा गठित कर हो।

– दीर्घकालिक तौर पर

-पाकिस्तान से बातचीत शुरू कर समस्या का स्थायी समाधान खोजें।

– भारत-पाकिस्‍तान-बांग्‍लादेश का महासंघ बनाने की दिशा में स्थिति को अनुकूल करने पर काम हो।

– चीन द्वारा कब्‍जा किए अक्‍साई चिन इलाके को वापस लेने के प्रयास किए जाएं।

– किसी राज्य से राज्य का दर्जा खत्म करने का संवैधानिक प्रावधान को रद्द किया जाए।

– केंद्र- राज्‍य संबंधों को संघीय दृष्टि से पुनर्परिभाषित करने के लिए दूसरे ‘केंद-राज्‍य संबंध आयोग’ का गठन किया जाए।

प्रथम विश्वयुद्ध में इंग्लैंड सफल हुआ था उसके बावजूद युद्ध के दिनों में मानवाधिकारों जो पाबंदिया थी उन्हें जारी रखने की बात शासकों के दिमाग में थी।विश्वयुद्ध में अंग्रेज फौज में पंजाब से काफी सैनिकों की बहाली हुई थी।अंग्रेज अधिकारी,पुलिस के सिपाहियों को लेकर देहातों में पहुंच जाते और गांवों में से युवकों को जबरदस्ती अंग्रेज फौज में भर्ती कराने ले आते।जहां एक ओर,सैनिक भरती किए गए वहीं दूसरी ओर भारत से जंग के लिए दस करोड पाउंड का जंगी कर्ज भी उठाया गया।आयात निर्यात पर असर पडने से कीमतेंं बहुत बढ़ गईं।
दिसंबर 1917 में अंग्रेजों ने एक ‘राजद्रोह समिति’ गठित की जिसे रॉलेट समिति के नाम से जाना जाता है।जुलाई 1918 में इसकी रपट छप कर आई। इस रिपोर्ट में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को गुंडों का आंदोलन कहा गया था,जो लूटपाट और हत्याएं करते हैं।इसमें यह दिखाने की कोशिश की गई थी थी कि भारत के देशभक्त अराजकतावादी हैं,लूटपाट,आगजनी और मारकाट में विश्वास करते हैं,कि उनसे समाज को बहुत बड़ा खतरा है और भारत में शांति भंग होने का डर है।
उस रिपोर्ट में कहा गया था कि ऐसे अपराधी तत्वों को दबाकर रखने में मुश्किल पेश आ रही है इसलिए नए कानून बनाने की जरूरत है।इन कानूनों के तहत जंग के दौरान नागरिकों के हकों पर लगी पाबंदियां जंग के बाद भी जारी रहने वाली थीं।कमिटी की रिपोर्त में दो नये कानून प्रस्तावित किए गए-
1.प्रेस पर कड़ा नियंत्रण रखे जाने का प्रावधान
2.गिरफ्तार किए गए लोगों को बिना कोर्ट में पेश किए दो वर्ष तक बिना कोर्ट में पेश किए जेल में रखा जा सकता था।
यही वह वक्त था जब भारत के राजनीतिक क्षितिज पर गांधीजी का प्रवेश हुआ।यदि उस समय गांधीजी देश की आजादी की लड़ाई में नहीं उतरे होते और उसकी बागडोर उनके हाथों में नहीं आई होती तो हमारे संघर्ष की दिशा और स्वरूप कुछ और होता।यह अपने में अलग लेख का विषय है।
रॉलेट समिति की सिफारिश के अनुरूप एक कानून बना दिया गया।
अब इस कानून केे प्रतिकार में हो रही सभा के दौरान हुए नरसंहार के विवरण में न जाकर वर्तमान में आने की गुजारिश है।
आपातकाल के दौरान मौलिक अधिकार निलंबित रहते हैं।यानि अभिव्यक्ति,घूमने फिरने,आस्था,जिंदा रहने के अधिकार स्थगित!
दो किस्म के आपातकाल का प्रावधान है-1अंतरिक संकट से उत्पन्न ,2. बाह्य संकट से उत्पन्न यानी युद्ध की घोषणा के बाद।
पहले किस्म का आपातकाल इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 को लगाया था।दूसरे किस्म का आपातकाल हर युद्ध के समय लागू होता है।
तानाशाही बनाम लोकतंत्र के मुद्दे पर लडे गए 1977 के आम चुनाव में लोकतंत्र की जीत हुई तो आंतरिक आपातकाल लागू करने का तरीका अत्यंत कठिन हो गया।संसद में दो तिहाई मतों के अलावा दो तिहाई राज्यों में दो तिहाई बहुमत की शर्त जोड़ दी गई।
अब मौलिक अधिकारों को स्थगित रखने के लिए बाह्य खतरे और युद्ध की परिस्थिति सरल है।
फिर रॉलैट कानून जैसे प्रावधान का मतलब होगा युद्ध के बाद भी मौलिक अधिकारों को निलंबित रखना! यानी तानाशाही।
संवैधानिक प्रावधानों से आंतरिक आपातकाल अब कठिन है।युद्ध वाला सहज है।
इसलिए13 अप्रैल 1919 के सौ साल पूरे होने पर हमें यह याद रखना है कि घोषित – अघोषित आपातकाल फिर न हो यह सुनिश्चित किया जाए।

सत्ता में आने के लिए नरेंद्र मोदी ने ऐलान किया था कि आपराधिक मामलों वाले विधायकों,सांसदों पर विशेष अदालतें बना कर सर्वोच्च न्यायालय के जज की देखरेख में मामले चलाए जाएंगे ताकि साल भर के भीतर ऐसे सभी लोग जेल के भीतर हो जाएंगे। (वीडियो में यही कह रहे हैं)
*पूर्व सांसद एहसान जाफरी समेत दर्जनों लोगों की बर्बर हत्या के मामले में खुद नरेंद्र मोदी से फोन पर बात करने के बावजूद हस्तक्षेप न करने के कारण हत्या का मामला बनता है अथवा नहीं इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने विचार करना स्वीकार किया है।
*सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अमित शाह को हत्या के मामले में गुजरात प्रान्त प्रवेश पर रोक लगाई गई थी।न विशेष अदालत बनी,न सर्वोच्च न्यायालय के जज की देखरेख में मामला चला।वे बरी हो गए।
*गुजरात कैडर के सर्वाधिक IPS अफसर गंभीर आपराधिक मामलों में जेल में थे।विशेष अदालत में सर्वोच्च न्यायालय के जज की देखरेख में मामले नहीं चले,वे बाहर हैं।
*समझौता एक्सप्रेस आतंकी विस्फोट मामले के फैसले में जज ने कहा कि सर्वोत्तम साक्ष्य नहीं पेश किए गए इसलिए अभियुक्त बरी किए जा रहे हैं।मोदी और जेटली इन आतंकियों से पूरे हिन्दू समाज को जोड़ने का जैसा प्रयास कर रहे हैं उससे स्पष्ट है कि सत्ता में बने रहने पर आगे की अदालत में सरकार अपील करने से रही।मालेगांव आतंकी विस्फोट मामले को भी लाचार तरीके से देखा गया।
*HSBC, पनामा पेपर्स,PNB चोरी,राष्ट्रीकृत बैंकों के बकाया जैसे आर्थिक मामलों में पूरी ढिलाई बरती गई।
*नोटबंदी द्वारा काले धन के भंडार को नए नोटों में बदलने की व्यवस्था की गई।
ई है इनकी चौकीदारी!

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अफलातून

जनसत्ता 15 अगस्त, 2014 : गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने राज्यसभा में कहा, ‘मत भूलिए कि महात्मा गांधी, जिनको हम आज भी अपना पूज्य मानते हैं, जिन्हें हम राष्ट्रपिता मानते हैं,

उन्होंने भी आरएसएस के कैंप में जाकर ‘संघ’ की सराहना की थी।’

1974 में ‘संघ’ वालों ने जयप्रकाशजी को बताया था कि गांधीजी अब उनके ‘प्रात: स्मरणीयों’ में एक हैं। संघ के काशी प्रांत की शाखा पुस्तिका क्रमांक-2, सितंबर-अक्तूबर, 2003 में अन्य बातों के अलावा गांधीजी के बारे में पृष्ठ 9 पर लिखा गया है: ‘‘देश विभाजन न रोक पाने और उसके परिणामस्वरूप लाखों हिंदुओं की पंजाब और बंगाल में नृशंस हत्या और करोड़ों की संख्या में अपने पूर्वजों की भूमि से पलायन, साथ ही पाकिस्तान को मुआवजे के रूप में करोड़ों रुपए दिलाने के कारण हिंदू समाज में इनकी प्रतिष्ठा गिरी।’’ संघ के कार्यक्रमों के दौरान बिकने वाले साहित्य में ‘गांधी वध क्यों?’ नामक किताब भी होती है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, हिंदू राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता और समाचार-पत्रों द्वारा दंगों की रिपोर्टिंग की बाबत खुद गांधीजी का ध्यान खींचा जाता रहा और उन्होंने इन विषयों पर साफगोई से अपनी राय रखी। विभाजन के बाद संघ के कैंप में गांधीजी के जाने का विवरण उनके सचिव प्यारेलाल ने अपनी पुस्तक ‘पूर्णाहुति’ में दिया है। इसके पहले, 1942 से ही संघ की गतिविधियों को लेकर गांधीजी का ध्यान उनके साथी खींचते रहते थे। दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी के तत्कालीन अध्यक्ष आसफ अली ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों के बारे में प्राप्त एक शिकायत गांधीजी को भेजी और लिखा था कि वे शिकायतकर्ता को नजदीक से जानते हैं, वे सच्चे और निष्पक्ष राष्ट्रीय कार्यकर्ता हैं।

9 अगस्त, 1942 को हरिजन (पृष्ठ: 261) में गांधीजी ने लिखा: ‘‘शिकायती पत्र उर्दू में है। उसका सार यह है कि आसफ अली साहब ने अपने पत्र में जिस संस्था का जिक्र किया है (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) उसके तीन हजार सदस्य रोजाना लाठी के साथ कवायद करते हैं, कवायद के बाद नारा लगाते हैं- हिंदुस्तान हिंदुओं का है और किसी का नहीं। इसके बाद संक्षिप्त भाषण होते हैं, जिनमें वक्ता कहते हैं- ‘पहले अंगरेजों को निकाल बाहर करो उसके बाद हम मुसलमानों को अपने अधीन कर लेंगे, अगर वे हमारी नहीं सुनेंगे तो हम उन्हें मार डालेंगे।’ बात जिस ढंग से कही गई है, उसे वैसे ही समझ कर यह कहा जा सकता है कि यह नारा गलत है और भाषण की मुख्य विषय-वस्तु तो और भी बुरी है।

‘‘नारा गलत और बेमानी है, क्योंकि हिंदुस्तान उन सब लोगों का है जो यहां पैदा हुए और पले हैं और जो दूसरे मुल्क का आसरा नहीं ताक सकते। इसलिए वह जितना हिंदुओं का है उतना ही पारसियों, यहूदियों, हिंदुस्तानी ईसाइयों, मुसलमानों और दूसरे गैर-हिंदुओं का भी है। आजाद हिंदुस्तान में राज हिंदुओं का नहीं, बल्कि हिंदुस्तानियों का होगा और वह किसी धार्मिक पंथ या संप्रदाय के बहुमत पर नहीं, बिना किसी धार्मिक भेदभाव के निर्वाचित समूची जनता के प्रतिनिधियों पर आधारित होगा।

‘‘धर्म एक निजी विषय है, जिसका राजनीति में कोई स्थान नहीं होना चाहिए, विदेशी हुकूमत की वजह से देश में जो अस्वाभाविक परिस्थिति पैदा हो गई है, उसी की बदौलत हमारे यहां धर्म के अनुसार इतने अस्वाभाविक विभाग हो गए हैं। जब देश से विदेशी हुकूमत उठ जाएगी, तो हम इन झूठे नारों और आदर्शों से चिपके रहने की अपनी इस बेवकूफी पर खुद हंसेंगे। अगर अंगरेजों की जगह देश में हिंदुओं की या दूसरे किसी संप्रदाय की हुकूमत ही कायम होने वाली हो तो अंगरेजों को निकाल बाहर करने की पुकार में कोई बल नहीं रह जाता। वह स्वराज्य नहीं होगा।’’

गांधीजी विभाजन के बाद हुए व्यापक सांप्रदायिक दंगों के खिलाफ ‘करो या मरो’ की भावना से दिल्ली में डेरा डाले हुए थे। 21 सितंबर ’47 को प्रार्थना-प्रवचन में ‘हिंदू राष्ट्रवादियों’ के संदर्भ में उन्होंने टिप्पणी की: ‘‘एक अखबार ने बड़ी गंभीरता से यह सुझाव रखा है कि अगर मौजूदा सरकार में शक्ति नहीं है, यानी अगर जनता सरकार को उचित काम न करने दे, तो वह सरकार उन लोगों के लिए अपनी जगह खाली कर दे, जो सारे मुसलमानों को मार डालने या उन्हें देश निकाला देने का पागलपन भरा काम कर सके। यह ऐसी सलाह है कि जिस पर चल कर देश खुदकुशी कर सकता है और हिंदू धर्म जड़ से बरबाद हो सकता है। मुझे लगता है, ऐसे अखबार तो आजाद हिंदुस्तान में रहने लायक ही नहीं हैं। प्रेस की आजादी का यह मतलब नहीं कि वह जनता के मन में जहरीले विचार पैदा करे। जो लोग ऐसी नीति पर चलना चाहते हैं, वे अपनी सरकार से इस्तीफा देने के लिए भले कहें, मगर जो दुनिया शांति के लिए अभी तक हिंदुस्तान की तरफ ताकती रही है, वह आगे से ऐसा करना बंद कर देगी। हर हालत में जब तक मेरी सांस चलती है, मैं ऐसे निरे पागलपन के खिलाफ अपनी सलाह देना जारी रखूंगा।’’

प्यारेलाल ने ‘पूर्णाहुति’ में सितंबर, 1947 में संघ के अधिनायक गोलवलकर से गांधीजी की मुलाकात, विभाजन के बाद हुए दंगों और गांधी-हत्या का विस्तार से वर्णन किया है। प्यारेलालजी की मृत्यु 1982 में हुई। तब तक संघ द्वारा इस विवरण का खंडन नहीं हुआ था।

गोलवलकर से गांधीजी के वार्तालाप के बीच में गांधी मंडली के एक सदस्य बोल उठे- ‘संघ के लोगों ने निराश्रित शिविर में बढ़िया काम किया है। उन्होंने अनुशासन, साहस और परिश्रमशीलता का परिचय दिया है।’ गांधीजी ने उत्तर दिया- ‘पर यह न भूलिए कि हिटलर के नाजियों और मुसोलिनी के फासिस्टों ने भी यही किया था।’ उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को ‘तानाशाही दृष्टिकोण रखने वाली सांप्रदायिक संस्था’ बताया। (पूर्णाहुति, चतुर्थ खंड, पृष्ठ: 17)

अपने एक सम्मेलन (शाखा) में गांधीजी का स्वागत करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेता

गोलवलकर ने उन्हें ‘हिंदू धर्म द्वारा उत्पन्न किया हुआ एक महान पुरुष’ बताया। उत्तर में गांधीजी बोले- ‘‘मुझे हिंदू होने का गर्व अवश्य है। पर मेरा हिंदू धर्म न तो असहिष्णु है और न बहिष्कारवादी। हिंदू धर्म की विशिष्टता जैसा मैंने समझा है, यह है कि उसने सब धर्मों की उत्तम बातों को आत्मसात कर लिया है। यदि हिंदू यह मानते हों कि भारत में अहिंदुओं के लिए समान और सम्मानपूर्ण स्थान नहीं है और मुसलमान भारत में रहना चाहें तो उन्हें घटिया दरजे से संतोष करना होगा- तो इसका परिणाम यह होगा कि हिंदू धर्म श्रीहीन हो जाएगा… मैं आपको चेतावनी देता हूं कि अगर आपके खिलाफ लगाया जाने वाला यह आरोप सही हो कि मुसलमानों को मारने में आपके संगठन का हाथ है तो उसका परिणाम बुरा होगा।’’

इसके बाद जो प्रश्नोत्तर हुए उन२में गांधीजी से पूछा गया- ‘क्या हिंदू धर्म आतताइयों को मारने की अनुमति नहीं देता? यदि नहीं देता, तो गीता के दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने कौरवों का नाश करने का जो उपदेश दिया है, उसके लिए आपका क्या स्पष्टीकरण है?’

गांधीजी ने कहा- ‘‘पहले प्रश्न का उत्तर ‘हां’ और ‘नहीं’ दोनों है। मारने का प्रश्न खड़ा होने से पहले हम इस बात का अचूक निर्णय करने की शक्ति अपने में पैदा करें कि आतताई कौन है? दूसरे शब्दों में, हमें ऐसा अधिकार तभी मिल सकता है जब हम पूरी तरह निर्दोष बन जाएं। एक पापी दूसरे पापी का न्याय करने या फांसी लगाने के अधिकार का दावा कैसे कर सकता है? रही बात दूसरे प्रश्न की। यह मान भी लिया जाए कि पापी को दंड देने का अधिकार गीता ने स्वीकार किया है, तो भी कानून द्वारा उचित रूप में स्थापित सरकार ही उसका उपयोग भलीभांति कर सकती है। अगर आप न्यायाधीश और जल्लाद दोनों एक साथ बन जाएं, तो सरदार और पंडित नेहरू दोनों लाचार हो जाएंगे- उन्हें आपकी सेवा करने का अवसर दीजिए, कानून को अपने हाथों में लेकर उनके प्रयत्नों को विफल मत कीजिए।’’

तीस नवंबर ’47 के प्रार्थना प्रवचन में गांधीजी ने कहा: ‘‘हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विचार है कि हिंदुत्व की रक्षा का एकमात्र तरीका उनका ही है। हिंदू धर्म को बचाने का यह तरीका नहीं है कि बुराई का बदला बुराई से। हिंदू महासभा और संघ दोनों हिंदू संस्थाएं हैं। उनमें पढ़े-लिखे लोग भी हैं। मैं उन्हें अदब से कहूंगा कि किसी को सता कर धर्म नहीं बचाया जा सकता।’’

अखिल भारतीय कांग्रेस समिति को अपने अंतिम संबोधन (18 नवंबर ’47) में उन्होंने कहा, ‘‘मुझे पता चला है कि कुछ कांग्रेसी भी यह मानते हैं कि मुसलमान यहां न रहें। वे मानते हैं कि ऐसा होने पर ही हिंदू धर्म की उन्नति होगी। परंतु वे नहीं जानते कि इससे हिंदू धर्म का लगातार नाश हो रहा है। इन लोगों द्वारा यह रवैया न छोड़ना खतरनाक होगा… मुझे स्पष्ट यह दिखाई दे रहा है कि अगर हम इस पागलपन का इलाज नहीं करेंगे, तो जो आजादी हमने हासिल की है उसे हम खो बैठेंगे।… मैं जानता हूं कि कुछ लोग कह रहे हैं कि कांग्रेस ने अपनी आत्मा को मुसलमानों के चरणों में रख दिया है, गांधी? वह जैसा चाहे बकता रहे! यह तो गया बीता हो गया है। जवाहरलाल भी कोई अच्छा नहीं है।

‘‘रही बात सरदार पटेल की, सो उसमें कुछ है। वह कुछ अंश में सच्चा हिंदू है। परंतु आखिर तो वह भी कांग्रेसी ही है! ऐसी बातों से हमारा कोई फायदा नहीं होगा, हिंसक गुंडागिरी से न तो हिंदू धर्म की रक्षा होगी, न सिख धर्म की। गुरु ग्रंथ साहब में ऐसी शिक्षा नहीं दी गई है। ईसाई धर्म भी ये बातें नहीं सिखाता। इस्लाम की रक्षा तलवार से नहीं हुई है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में मैं बहुत-सी बातें सुनता रहता हूं। मैंने यह सुना है कि इस सारी शरारत की जड़ में संघ है। हिंदू धर्म की रक्षा ऐसे हत्याकांडों से नहीं हो सकती। आपको अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करनी होगी। वह रक्षा आप तभी कर सकते हैं जब आप दयावान और वीर बनें और सदा जागरूक रहेंगे, अन्यथा एक दिन ऐसा आएगा जब आपको इस मूर्खता का पछतावा होगा, जिसके कारण यह सुंदर और बहुमूल्य फल आपके हाथ से निकल जाएगा। मैं आशा करता हूं कि वैसा दिन कभी नहीं आएगा। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि लोकमत की शक्ति तलवारों से अधिक होती है।’’

इन सब बातों को याद करना उस भयंकर त्रासदाई और शर्मनाक दौर को याद करना नहीं है, बल्कि जिस दौर की धमक सुनाई दे रही है उसे समझना है। गांधीजी उस वक्त भले एक व्यक्ति हों, आज तो उनकी बातें कालपुरुष के उद्गार-सी लगती और हमारे विवेक को कोंचती हैं। उस आवाज को तब न सुन कर हमने उसका गला घोंट दिया था। अब आज? आज तो आवाज भी अपनी है और गला भी! इस बार हमें पहले से भी बड़ी कीमत अदा करनी होगी।

साधारणतया मौन अच्छा है,

किन्तु मनन के लिए,

जब शोर हो चारों ओर सत्य के हनन के लिए,

तब तुम्हे अपनी बात ज्वलंत शब्दों में कहनी चाहिए ।

सिर कटाना पड़े या न पड़े,

तैयारी तो उसकी रहनी चाहिए।

भवानी प्रसाद मिश्र

इस कविता से 12 वर्ष पूर्व ब्लॉगिंग शुरू की थी। फेबु पर भक्तों के सफल हमले का प्रतिकार इस जगह से करूंगा।

पी. लंकेश कन्नड़ के लेखक ,पत्रकार और आंदोलनकारी।एक ऐसी जमात के प्रमुख स्तंभ जो लोहिया के मुरीद होने के कारण अम्बेडकर की समाज नीति और गांधी की अर्थ नीति के हामी थे।देवनूर महादेव,यू आर अनंतमूर्ति और किशन पटनायक के मित्र और साथी।
उनकी लोकप्रिय पत्रिका थी ‘लंकेश पत्रिके’।लंकेश के गुजर जाने के बाद उनकी इंकलाबी बेटी गौरी इस पत्रिका को निकालती थी।आज से ठीक साल भर पहले गौरी लंकेश की ‘सनातन संस्था’ से जुड़े कायरों ने हत्या की।समाजवादी युवजन सभा से अपना सामाजिक जीवन शुरू करने वाले महाराष्ट्र के अंध श्रद्धा निर्मूलन कार्यकर्ता डॉ नरेंद्र दाभोलकर की हत्या भी सनातन संस्था से जुड़े दरिंदों ने की थी यह सी बी आई जांचकर्ता कह रहे हैं।सनातन संस्था के लोगों के पास से भारी मात्रा में विस्फोटक बरामद हुए तथा आतंक फैलाने की व्यापक साजिश का पर्दाफ़ाश हुआ है।यह पर्दाफाश भी राज्य की एजेंसी ने किया है।
महाराष्ट्र में व्यापक दलित आंदोलन को हिंसक मोड़ देने में RSS के पूर्व प्रचारक की भूमिका प्रमाणित है।ऐसे व्यक्ति के गैर नामजद FIR के आधार पर देश भर में सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ताओं की निराधार गिरफ्तारियों से स्पष्ट है कि आरएसएस और सनातन संस्था की राष्ट्रविरोधी कार्रवाइयों के उजागर हो जाने के कारण राजनाथ सिंह-मोदी का यह मूर्खतापूर्ण ‘बचाव’ है।
रिजर्व बैंक की अधिकृत रपट में नोटबंदी की विफलता मान ली गई है।प्रधान मंत्री ने 50 दिनों की जो मोहलत मांगी थी उसकी मियाद पूरी हुए साल भर हो गई है। ’50 दिन बाद चौराहे पर न्याय देना’ यह स्वयं प्रधान मंत्री ने कहा था इसलिए उनके असुरक्षित होने की वजह वे खुद घोषित कर चुके हैं।
एक मात्र सत्ताधारी पार्टी चुनाव में पार्टियों द्वारा चुनाव खर्च पर सीमा की विरोधी है।इस पार्टी ने अज्ञात दानदाताओं द्वारा असीमित चंदा लेने को वैधानिकता प्रदान कर राजनीति में काले धन को औपचारिकता प्रदान की है।
समाजवादी जन परिषद इस अलोकतांत्रिक सरकार को चुनाव के माध्यम से उखाड़ फेंकने का आवाहन करती हैं।
अफ़लातून,
महामंत्री,
समाजवादी जन परिषद।

मध्य प्रदेश के एक आदिवासी गांव के सरकारी स्कूल में नियुक्त शिक्षक पढ़ाने नहीं आता था।साथी राजनारायण और साथी सुनील के साथ दर्जनों आदिवासी स्त्री-पुरुषों ने ब्लॉक शिक्षा अधिकारी के यहां धरना दिया तो सरकार ने समस्या का समाधान तो नहीं किया उलटे इन सब पर ‘सरकारी काम काज में बाधा’ जैसी धारा लगा दी।मुकदमे की तारीखों पर करीब 30 – 35 किमी दूर जिला मुख्यालय पर जाना पडता था।इसलिए संगठन ने निर्णय लिया कि राजनारायण और सुनील जमानत नहीं लेंगे।दोनों साथी लंबा समय जेल में रहे। हथकड़िया पहना कर पेशी पर लाया जाता।इन साथियों के पत्र को आधार बना कर सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की गई। समता संगठन से जुड़े एक बड़े वकील साथी थे ,साथी रामभूषण मल्होत्रा,उन्होंने यह याचिका सुनील के पत्र के आधार पर दाखिल की।वे तब इलाहाबाद उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में वकालत करते थे। ‘सुनील गुप्ता व अन्य बनाम म.प्र. शासन’ के मुकदमे में बेवजह हथकड़ी पहनाने के खिलाफ ऐतिहासिक फैसला आया।
रामभूषणजी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में लड़े गए दो अन्य सामाजिक महत्व के मुकदमों का जिक्र कर रहा हूं। IIT कानपुर में सुनील सहस्रबुद्धे नामक छात्र ने अपना शोध प्रबंध हिंदी में जमा करना चाहा था,संस्थान ने इंकार कर दिया था।इस मामले को खारिज करते हुए एक जज ने कहा था ,’मैं जानता हूं कि यह शोध छात्र अंग्रेजी में लिख सकता है लिहाजा हिंदी में शोध प्रबंध नहीं जमा करने की इजाजत नहीं दी जा रही।’ सुनील सहस्रबुद्धे ने रसायनशास्त्र में पीएच.डी जमा नहीं ही की तथा नये सिरे से समाजशास्त्र में पीएच.डी की।बरसों बाद नौसेना के एक निलंबित कर्मचारी ने जब हिंदी आरोप-पत्र मांगा तब उसे नहीं दिया गया तथा मुंबई उच्च न्यायालय ने सुनील सहद्रबुद्धे के फैसले वाले तर्क पर(कि याची को अंग्रेजी आती है) याचिका को खारिज कर दिया।इसे समाजवादी जन परिषद की साथी वकील प्योली ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी।फैसला हिंदी के पक्ष में आया और निलंबन वापस हुआ,याची की बहाली हुई।
काशी विश्वविद्यालय के एक चिकित्साधिकारी ने अपनी पत्नी को जला कर मार दिया था।सेशन कोर्ट से उसे फांसी की सजा हुई।पूर्वी उ प्र के एक चर्चित माफिया के लोगों हमें धमकाने का प्रयास करते थे क्योंकि हम गवाहों के साथ कचहरी जाते थे। बहरहाल,इस चिकित्सक ने जेल में तब तक प्रतीक्षा की जब तक उसके स्वजातीय इस माफिया के पांव छूने वाले जज की बेंच नहीं लगी।उच्च न्यायालय ने उसे बरी कर दिया।हम लोगों ने उ प्र शासन के विधि सचिव को हजारों दस्तखत वाला ज्ञापन दिया कि मामले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जाए।साथी डॉ स्वाति,डॉ कमरजहां द्वारा स्थापित नारी संगठन एकता की तरफ से साथी रामभूषणजी ने हस्तक्षेप किया।सर्वोच्च न्यायालय ने पुनः उस पत्नी-हंता को दोषी पाया और आजीवन कारावास की सजा हुई।
रामभूषणजी उच्च न्यायालय के जज बन गये।उन्होंने हमें नसीहत दी थी कि मेरी बेंच में यदि मामला हो तो मिलने मत आना।हमने इस निर्देश का पालन किया।मिलते थे लेकिन मुकदमे के सिलसिले में नहीं।काशी विश्वविद्यालय द्वारा छात्र संघ को निलंबित कर दिया था। मुझे तथा छात्र संघ के दो पदाधिकारी सत्यप्रकाश सोनकर व ओमप्रकाश सिंह को भी निलंबित कर दिया था।मैंने छात्र संघ निलंबन को चुनौती दी थी।मौजूदा समय में पी यू सी एल के राष्ट्रीय अध्यक्ष समाजवादी विचार के वरिष्ठ अधिवक्ता साथी रविकिरन जैन के जरिए।रविकिरनजी को ,’वकील साहब’ संबोधित करने पर वे टोक देते हैं,’रविकिरन कहो’।बहरहाल छात्र संघ को निलंबित कर वि वि प्रशासन ने कार्यकारिणी से नया छात्र संविधान बनवा लिया था। ‘समग्र सामाजिक परिपेक्ष्य में लोकतांत्रिक असहमति प्रकट करना’ जैसे छात्र संघ के उद्देश्यों को प्रशासन ने हटा दिया था।कुछ प्रत्याशी जो पुराने संविधान के हिसाब से चुनाव लड़ सकते थे नये संविधान के तहत उन्हें चुनाव लड़ने से रोक दिया गया था।उच्च न्यायालय में इन लड़कों का मामला रविकिरनजी ने लड़ा।मैं रामभूषणजी की हिदायत को ज्यादा ही ध्यान में रखते हुए अदालत – कक्ष के बाहर टहलता रहा।वि वि के वकील ने ही मेरी याचिका का जिक्र मेरा नाम लेकर जब कर ही दिया तब मैं कक्ष के अंदर गया।रामभूषणजी ने हिंदी में आदेश दिया और प्रशासन द्वारा चुनाव लड़ने से रोके गये लड़कों को लड़ने देने स्पष्ट निर्देश दिए।कोर्ट से अनुमति पाए एक लड़के आनंद प्रधान ने चुनाव जीता।
रामभूषणजी ने जज रहते हुए एक हुए एक ऐतिहासिक फैसला फर्जी पुलिस मुठभेड़ों की बाबत था।आदित्यनाथ सरकार द्वारा दर्जनों फर्जी मुठभेड़ के मामले आजकल चर्चा में हैं।मृतकों के परिवारजनों को प्राथमिकी की नकल तक नहीं दी गई,कुछ मामलों में लाश तक नहीं सुपुर्द की गई।रामभूषणजी ने कहा था जब भी पुलिस मुठभेड़ का दावा करेगी तब – मजिस्ट्रेट द्वारा जांच की जाएगी,परिवारजनों को सूचना दी जाएगी आदि।इसके बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी ऐसे मामलों में पोस्टमॉर्टम का विडियो लेने आदि का निर्देश दिया है।
छत्तीसगढ़,ओड़ीशा,झारखंड के इलाकों में जल,जंगल,जमीन और इनमें छुपी खनिज संपदा को कंपनियों को सौंपने की होड़ मची है।ऐसे मामलों से आदिवासी का विस्थापन भी जुड़ा है।इसका अहिंसक प्रतिकार होता आया है।नियमगिरी का वेदांत विरोधी आंदोलन अहिंसक प्रतिरोध का एक ऐतिहासिक नमूना है।इस आंदोलन ने न्यायपालिका की शरण भी ली थी।कल जब छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा भारत के मुख्य न्याधीश की तस्वीर वाले स्वागत-होर्डिंग्स की तस्वीरें आलोक पुतुल के जरिए देखीं तो मुझे लगा कि यह न्याय की निष्पक्षता को प्रभावित कर सकता है।रामभूषणजी ने तो घर पर मिलने से मना किया था किन्तु रमण सिंह सरकार तो सड़क पर वंदनवार सजाए बैठी है।मेरी मांग है कि सर्वोच्च न्यायालय को स्वयं हस्तक्षेप कर इस प्रकार के स्वागत होर्डिंग्स पर रोक लगा देनी चाहिए।एक बुरी नजीर स्थापित हो रही है ,उस पर रोक लगनी चाहिए।

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