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संसद ने जुवेनाइल जस्टिस ऐक्ट यानी किशोर न्याय कानून पर मुहर लगा दी है। अब नए कानून के मुताबिक संगीन जुर्मों के मामले में 16 साल के ऊपर के लड़कों पर भी आम अदालतों में मुकदमा चलाया जा सकेगा- बशर्ते जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड इसकी इजाज़त दे दे। यानी जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड अपराध की गंभीरता और आरोप के घेरे में आए नाबालिग की मानसिक उम्र देखते हुए तय करेगा कि उसके लिए नाबालिग बोर्ड की ज़रूरत है या फिर आम अदालतों की। दरअसल 16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में हुए एक गैंगरेप के बाद देश भर में जो आंदोलन चला, उसकी एक लोकप्रिय मांग यह थी कि नाबालिगों की उम्र 18 से घटा कर 15 या 16 साल की जाए। क्योंकि इस मामले के पांच आरोपियों में जिसे सबसे बड़ा मुजरिम बताया जा रहा था, वह नाबालिग था और इसी दिसंबर में तीन साल की सज़ा काट कर छूट गया। उसकी रिहाई के वक़्त दुबारा चले आंदोलन ने सरकार और राजनीतिक दलों को मजबूर किया कि वे लोगों की आवाज़ सुनें और जुवेनाइल जस्टिस ऐक्ट में संशोधन का यह कानून पास करें। तो अब कानून बन गया है, लेकिन इस बात पर विचार करना ज़रूरी है कि क्या इस कानून के बाद निर्भया जैसी लड़कियां वाकई सुरक्षित रहेंगी।
इसमें शक नहीं कि 16 दिसंबर 2012 की रात दिल्ली की एक चलती बस पर एक युवा लड़की के साथ जिस तरह सामूहिक बलात्कार और वहशी व्यवहार हुआ- उसके ब्योरे सबके रोंगटे खड़े करते रहे हैं। यह स्वाभाविक ही है कि ऐसे वीभत्स अपराध के मुजरिमों के प्रति एक तरह की घृणा पैदा हो। 16 दिसंबर 2012 के तत्काल बाद इस वारदात पर हुई देशव्यापी प्रतिक्रिया से लेकर इसके एक नाबालिग मुजरिम को छोड़ने को लेकर पैदा हुए ताज़ा गुस्से तक को इस सामूहिक भावना का उचित विस्फोट कहा जा सकता है। लेकिन एक मुजरिम को दंड देने की सामूहिक भावना के बीच भी यह ख़याल रखना ज़रूरी है कि हमारा क्रोध न्याय के विवेक की जगह न ले ले, कि अपने गुस्से में हम कहीं ऐसे निष्कर्षों तक न पहुंच जाएं जो आने वाले दिनों में पलट कर नए अन्यायों की वजह बन जाएं।
क्योंकि 16 दिसंबर के बाद स्त्री सुरक्षा को लेकर चली बहसों ने अनजाने और अनायास ही ‘जुवेनाइल’ को जैसे एक गंदा शब्द बना दिया है। सारी बहस जैसे यहां आकर ठिठक गई है कि ‘जुवेनाइल’ की उम्र घटाई जाए- जैसे स्त्री अपराधों के लिए ये किशोर ही सबसे बड़े ज़िम्मेदार हों, जैसे इस देश के बालिगों के इस देश के नाबालिगों से ख़तरा हो।
लेकिन हक़ीक़त क्या वाकई इतनी ख़ौफ़नाक है? क्या जुवेनाइल या किशोर उम्र के बच्चे इतने अपराध करते हैं कि उनकी उम्र राष्ट्रीय बहस का इकलौता सवाल बनती दिखे? ठोस आंकड़े कुछ और कहानी बताते हैं। भारत की आबादी में 35 फ़ीसदी हिस्सा जुवेनाइल यानी 18 साल से नीचे के किशोरों का है। जबकि 2014 के आंकड़े बताते हैं कि अपराध में उनका हिस्सा महज 1.2 प्रतिशत का है। यानी जितने नाबालिग अपराध करते हैं, उससे ज़्यादा वे अपराध झेलते हैं। और इन अपराध करने वाले नाबालिगों की पृष्ठभूमि में जाएं तो पता चलता है कि सामाजिक तौर पर कई गंभीर अपराधों के शिकार ये भी होते हैं। बाल अधिकारों के लिए काम कर रहे हर्षमंदर ने बहुत उचित ही यह लिखा है कि दरअसल नाबालिगों को बालिगों से बचाने की जरूरत है। सवाल है, महिलाओं के ख़िलाफ़ सबसे ज़्यादा अपराध कौन करता है। आंकड़े जो जवाब देते हैं, उनके मुताबिक चालीस पार की उम्र के लोग। जाहिर है, जुवेनाइल की बहस में वे असली अपराधी छुप जाते हैं जिनकी वजह से महिलाओं का सड़क पर चलना, दफ़्तर में काम करना और यहां तक कि घर में रहना भी दूभर हो जाता है।
लेकिन हम यह देखने को तैयार नहीं होते क्योंकि एक बहुत मुश्किल लड़ाई के आसान तरीक़े और आसान शिकार खोज कर आंदोलन और इंसाफ़ करने बैठ जाते हैं। इससे यह संदेह होता है कि क्या हम वाकई बलात्कार या महिला अपराध को लेकर इतने संवेदनशील हैं जितना दिखने की कोशिश कर रहे हैं? हमारे लिए 16 दिसंबर का गैंगरेप बस एक प्रतीक भर है जिसके मुजरिमों को जेल से न निकलने देकर हम यह तसल्ली पाल लेंगे कि इंसाफ़ हो गया और लड़कियां अब सुरक्षित हैं। जबकि सच्चाई यह है कि 16 दिसंबर के बाद भी बलात्कार या यौन शोषण से जुड़े अपराधों में कमी नहीं आई है- कहीं छोटी बच्चियां तो कहीं बुज़ुर्ग महिलाएं इस वहशत की जद में हैं। 16 दिसंबर 2012 की तारीख़ बेशक इस लिहाज से अहम है कि इस दिन घटी एक त्रासदी को भारतीय महिलाओं ने अपने साथ हो रहे अपराध की एक बड़ी स्मृति में बदला और वह ज़रूरी बहस खड़ी की जिसके बाद बलात्कार या यौन उत्पीड़न की शिकार लड़कियां खुलकर सामने आ रही हैं, अपनी शिकायत दर्ज करा रही हैं।
लेकिन यह काफी नहीं है। यह समझना भी ज़रूरी है कि बलात्कार इस देश में सामजिक उत्पीड़न और राजनीतिक दमन तक का हथियार है। दबंग और आर्थिक तौर पर ताकतवर जातियां दलित और कमज़ोर पृष्ठभूमि से आई लड़कियों को बार-बार इसका शिकार बनाती रही हैं जिस पर कहीं कोई नाराज़गी नहीं दिखती। झारखंड और छत्तीसगढ़ से लेकर पूर्वोत्तर और कश्मीर तक ऐसे ढेर सारे अभियोग हैं जो बताते हैं कि सुरक्षा के नाम पर, राजनीतिक दमन के लिए, लड़कियां बलात्कार की शिकार बनाई जाती रहीं। छत्तीसगढ़ की सोनी सोरी ने जो कुछ झेला, वह निर्भया से ज़रा ही कम था- लेकिन सोनी सोरी पर नक्सली होने की मुहर लगाई गई, शायद इसीलिए सबने मान लिया कि उसके साथ जो हुआ, वह जायज़ हुआ। अगर नहीं तो जंतर-मंतर पर वह भीड़ उसके लिए क्यों नहीं उमड़ी जो निर्भया के लिए उमड़ी?
इस पूरी बहस में एक पक्ष उस तथाकथित आधुनिकता का है जो बाजार बना रहा है। बाज़ार ने बड़े निर्मम ढंग से स्त्री को सिर्फ देह में और उसकी देह को बस वस्तु में बदल डाला है। जो फिल्में बन रही हैं, जो विज्ञापन बन रहे हैं, जो बाज़ार का पूरा तामझाम बन रहा है, वह स्त्री देह को आखेट बनाकर हो रहा है। पिछले दिनों पटना में मीडिया में स्त्रियों को लेकर चल रही दो दिन की एक कार्यशाला के दौरान अभिनेत्री सोनल झा ने किसी टीवी चैनल पर चल रहे क्रिकेट मैच के बाद के एक आयोजन का ज़िक्र किया जिसमें एक स्टार खिलाड़ी तो पूरे सूटबूट में बात कर रहे थे लेकिन उनसे जो महिला बात कर रही थी, वह बिल्कुल खुले परिधानों में थी। जाहिर है, क्रिकेट की चर्चा में भी लड़की के क्रिकेट-ज्ञान से ज्यादा अहम उसका ग्लैमरस दिखना है। यह अनायास नहीं है कि इन दिनों बड़ी तेजी से दुनिया भर में फूल-फल रहे पर्यटन उद्योग के नाम पर सबसे ज़्यादा ‘सी, सन और सेक्स’ बेचा जा रहा है। इक्कीसवीं सदी में औरत की तस्करी का कारोबार ऐसे ग्लोबल आयाम ले चुका है, जैसा पहले किसी सदी ने देखा न हो।
तो एक तरफ़ स्त्री को लगातार हेय और उपभोग्य और कमतर बनाती बाज़ार-प्रेरित तथाकथित आधुनिकता है जो उसे सामान में बदलती है और दूसरी तरफ सामाजिक, आर्थिक और मर्दवादी आधार पर उसका लगातार उत्पीड़न कर रही परंपरा है, जो उसकी आज़ादी को उसकी बदचलनी की तरह देखती है- इन दोनों के बीच अगर कोई निर्भया अकेली निकलती है तो वह बस इसलिए असुरक्षित नहीं होती कि कुछ खूंखार किस्म के लड़के उसके पीछे लग जाते हैं, वह इसलिए भी असुरक्षित होती है कि इस आधुनिकता ने उसे सामान बना डाला है और परंपरा ने उसे बदचलन ठहरा दिया है- उस पर हमला आसान होता है, वह एक आसान शिकार होती है। निर्भया के मामले में शिकारियों की हैसियत अगर कुछ बड़ी होती, अगर वे किन्हीं बड़े घरों के बेटे होते तो कहना मुश्किल है कि वे उतनी आसानी से पकड़े जाते जितनी आसानी से ये बस ड्राइवर, क्लीनर या फल विक्रेता पकड़े गए।
बहरहाल, इस बहस के आख़िरी सिरे पर लौटें- उस खूंखार नाबालिग तक जो समाज के लिए सबको ख़तरा लग रहा है। हो सकता है, वह ख़तरा हो, लेकिन फिर यह सवाल पूछना ज़रूरी हो जाता है कि आख़िर बाल सुधार गृह में उसके बिताए तीन सालों के दौरान वाकई उसको सुधारने की कोशिश क्यों नहीं हुई? क्योंकि हमारी जेलों की तरह हमारे बाल सुधार गृह भी अपराध छुड़ाने के नहीं, अपराधी बनाने के कारख़ाने हैं। बाल सुधार गृहों की अपनी एक हकीक़त है जिसे देखकर कोई न्यायप्रिय व्यवस्था शर्मसार हो जाए। अगर ऐसा नहीं होता, बाल सुधार गृह वाकई बाल सुधार गृह होते तो इस नाबालिग मुजरिम को वे कुछ बदलते। लेकिन यह सोच शायद वहां विकसित ही नहीं हो पाई। दरअसल हमारे नाबालिग मुजरिम हमारी अपनी सामाजिक विफलताओं की संतानें हैं। हम इस विफलता को पहचानने और स्वीकार करने की जगह ऐसा दिखावा कर रहे हैं जैसे इस मुजरिम को कुछ और सज़ा देकर हम अपनी निर्भयाओं को बचा लेंगे। जबकि लड़ाई की यह मुद्रा उस वास्तविक लड़ाई से काफी दूर ही नहीं, उसके विरुद्ध भी खड़ी है जो निर्भयाओं को एक गरिमापूर्ण और सुरक्षित जीवन देने के लिए ज़रूरी है। क्योंकि अंततः एक स्त्री के सम्मान के लिए अपरिहार्यतः एक व्यापक मानवीय समाज का होना ज़रूरी है जो अपनी लड़कियों की भी फिक्र करे, अपने नाबालिगों और बच्चों की भी।जुवेनाइल जस्टिस ऐक्ट अपनी जगह काम करेगा, लेकिन समाज के विवेक को भी जागना होगा।

स्रोतः सामयिक वार्ता

यूपीए सरकार के दौरान अमेरिका से परमाणु डील और परमाणु दायित्व क़ानून के प्रावधानों को देसी-विदेशी निवेशकों के हित में मोड़ने का भले ही भाजपा विपक्ष में रहने के दौरान दस सालों तक विरोध करती रही हो, मोदी सरकार ने इस मुद्दे पर अपनी पारी ठीक वहीं से शुरू की जहां मनमोहन सिंह ने छोड़ी थी. सत्तासीन होने के कुछ ही हफ़्तों बाद मोदी सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के अतिरिक्त प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किया और फिर जल्दी ही देश के परमाणु-विरोधी समूहों और कार्यकर्ताओं को देशद्रोही बताने वाली आईबी रिपोर्ट जारी की गयी, जिसमें  अणुमुक्ति समूह से लेकर सीएनडीपी सहित तमाम समूह शामिल थे. इसके साथ ही प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं का सिलसिला शुरू हुआ जिसमें लगभग हर देश के साथ परमाणु संधि किसी तमगे की तरह शामिल रहती है.
फुकुशिमा दुर्घटना के बाद जहां पूरी दुनिया में विभिन्न देशों ने परमाणु ऊर्जा से तौबा कर ली है, भारत ने अंतर्राष्ट्रीय लॉबियों के दबाव में अँधेरे कुएं में छलांग लगाने की नीति अपनाई है. नए साल में, एक बार फिर 26 जनवरी को जो कि देश की संप्रभुता का उत्सव होता है, फ्रांस के राष्ट्रपति ओलांदे मुख्य अतिथि होंगे और फ्रांस से परमाणु डील आगे बढ़ाई जाएगी. दिसम्बर में जब नरेंद्र मोदी रूस गए तो वहाँ भी उन्होंने राष्ट्रपति पुतिन के साथ परमाणु डील की जिसके तहत कूडनकुलम में अणु बिजलीघरों की संख्या बढ़ाई जाएगी. 2015 में इस रास्ते में निर्णायक मोड़ आए. साल की शुरूआत में 26 जनवरी को अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा की यात्रा के दौरान मोदी सरकार ने उनको यह आश्वासन दिया कि किसी दुर्घटना की स्थिति में अमेरिकी कंपनियों को जवाबदेह ठहराने और उनसे मुआवजा माँगने के बजाय भारत सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनियों के माध्यम से उनका मुआवजा भारतीय जनता के पैसों से चुकाएगी. और साल के अंत में जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे की यात्रा के दौरान भारत-जापान परमाणु समझौते के लिए एक एमओयू पर हस्ताक्षर किया गया जिसका भारत भर में किसानों-मछुआरों और नागरिक समूहों ने विरोध किया, उनके समर्थन में जापान में लोग सडकों पर उतरे तथा दुनिया के कई दूसरे देशों में अणुविरोधी कार्यकर्ताओं ने जापानी दूतावास के दौरान प्रदर्शन किया.
भारत और जापान के बीच यह समझौता इसी वजह से काफी महत्वपूर्ण है कि यह दरअसल 2005 में हुए भारत-अमेरिका परमाणु समझौते का बचा हुआ टुकड़ा है. उस समझौते के दस साल बाद भी अमेरिकी कंपनियों – वेस्टिंगहाउस तथा जेनेरल इलेक्ट्रिक(जीई), और फ्रांसीसी कंपनी अरेवा के अणुबिजली प्रोजेक्ट भारत की ज़मीन पर अटके पड़े हैं तो इसका एक बड़ा कारण भारत और जापान के बीच अब तक परमाणु समझौता न होना है. दोनों बड़ी अमेरिकी परमाणु कंपनियों में इस बीच जापानी शेयर बढ़े हैं और वेस्टिंगहाउस का नाम अब वेस्टिंगहाउस-तोशिबा है और जीई अब जीई हिताची है. बाज़ार में हुए इस बड़े बदलाव ने भारत और अमेरिका की राजनीतिक संधि के सामने समस्या खडी कर दी है. फ्रेंच कंपनी अरेवा के डिज़ाइन में एक बिलकुल ही ज़रूरी पुर्जा – रिएक्टर का प्रेशर वेसल – सिर्फ जापानी कम्पनियां बनाती हैं और उसके लिए भी जापान से भारत का कानूनी करार ज़रूरी है.

लेकिन इस डील को लेकर जापान पर अमेरिका और फ्रांस का दबाव बना हुआ है इसलिए इसको परवान चढाने की कोशिश तो जारी रहेगी. साथ ही, अपने व्यापक प्रभावों के कारण इस डील का बड़े पैमाने पर विरोध भी बना रहेगा. शिंजो आबे की भारत यात्रा के ठीक एक दिन पहले हिरोशिमा और नागासाकी के दोनों मेयर एक साथ आए और प्रेस कांफ्रेंस कर के इस डील का विरोध किया. जापानी राजनीतिक सिस्टम के लिए यह एक असाधारण घटना थी. इसके अलावा, परमाणु दुर्घटना की विभीषिका झेल रहे फुकुशिमा के मेयर कात्सुताका इदोगावा ने भी परमाणु समझौते का मुखर विरोध किया. जापान की कम्यूनिस्ट पार्टी और अन्य विपक्षी दलों ने भी इस समझौते का विरोध किया.

शिंजो आबे जिस हफ्ते भारत आए उसी सप्ताह में फुकुशिमा से यह खबर आई की दुर्घटना के चार साल 9 महीने बाद बीस किलोमीटर के दायरे में खतरनाक रेडियोधर्मी कचरे के कुल नब्बे लाख बड़े-बड़े थैले पसरे हुए हैं, जिसको निपटाने के लिए न कोई जगह है न तकनीक क्योंकि परमाणु विकिरण हज़ारों सालों तक रहता है. फुकुशिमा प्लांट अभी भी नियंत्रण से बाहर है और अत्यधिक तापमान को ठंडा रखने के लिए पिछले पांच सालों से प्रतिदिन सौ टन से अधिक पानी काफी दूर से डाला जा रहा है, जो अति-विषाक्त होकर वापस आता है और जापानी सरकार और टेप्को कंपनी के लिए सरदर्द बना हुआ है. इन पांच सालों में हज़ारों टन ऐसा पानी विशालकाय टैंकों में जमा हो रहा है क्योंकि इसे समुद्र में सीधा छोड़ना पूरे प्रशांत महासागर को विषैला बना देगा. फिर भी, बरसात के मौसम में चुपके से कंपनी द्वारा काफी विकिरण-युक्त जहरीला पानी समुद्र में छोड़ने का खुलासा हुआ है.

एक तरफ फुकुशिमा के दुर्घटनाग्रस्त संयंत्र पर काबू नहीं पाया जा सका है तो दूसरी तरफ कम से कम दो लाख लोग जापान जैसे सीमित भूभाग वाले इलाके में बेघर हैं, जिनको सहयोग और मुआवजा देने से सरकार और कंपनी दोनों मुंह मोड़ चुके हैं. इस हालत में, जापान का भारत को परमाणु तकनीक बेचना पूरी तरह अनैतिक है और दरअसल अपने उन परमाणु कारपोरेटों को ज़िंदा रखने की कोशिश का नतीजा है जिनके सारे संयंत्र फुकुशिमा के बाद से पूरे जापान में जन-दबाव में बंद हैं और वे अपना घाटा नहीं पूरा कर पा रहे हैं.

दूसरी तरफ, भारत में परमाणु बिजलीघरों के बेतहाशा निर्माण से लाखों किसानों और मछुआरों की ज़िंदगी तबाह हो रही है और यह परमाणु डील उनके लिए बेहद बुरी खबर है. किसानों की प्राथमिक चिंता तो ज़मीन छीने जाने को लेकर है लेकिन जिन गाँवों की ज़मीन नहीं भी जा रही उनको भी परमाणु बिजलीघरों से बिना दुर्घटना के भी सामान्यतः निकालने वाले विकिरण-युक्त गैस और अन्य अपशिष्टों से बीमारियों का खतरा है, जैसा दुनिया के सभी मौजूदा परमाणु कारखानों के मामले में दर्ज किया गया है. जैतापुर के नजदीक घनी आबादी वाले मछुआरों के गाँव हैं और परमाणु बिजली घर से निकालने वाला गरम पानी आस-पास के समुद्र का तापमान 5 से 7 डिग्री बढ़ा देगा जिससे उनको मिलने वाली मछलियाँ उस इलाके से लुप्त हो जाएँगी. इसके साथ ही भारत में परमाणु खतरे की आशंका भी निर्मूल नहीं है. परमाणु सेक्टर के पूरी तरह गोपनीय और गैर-जवाबदेह होने और आम तौर पर दुर्घटनाओं से निपटने में सरकारी तंत्र की नाकामी के कारण पहले से ही खतरनाक परमाणु संयंत्र भारत आने पर और ज़्यादा खतरनाक हो जाते हैं. परमाणु उत्तरदायित्व मामले पर सरकार और आपूर्तिकर्ता कारपोरेटों के रुख से तो यही पता चलता है कि उनको अपने ही बनाए उत्पादों की सुरक्षा का भरोसा नहीं है और पूरी मीडिया का इस्तेमाल कर के वे जिन संयंत्रों की सुरक्षा का दावा कर रहे हैं और साधारण लोगों को अपनी सुरक्षा दांव पर लगाने को कह रहे हैं, खुद अपना पैसा तक मुआवजे की राशि के बतौर दांव पर रखने को तैयार नहीं हैं.

इसी महीने पेरिस में हुए जलवायु परिवर्तन पर ग्लोबल बैठक (COP21) में भी भारत समेत अन्य सरकारों ने परमाणु ऊर्जा को कार्बन-विहीन और हरित बताकर समस्या की बजाय समाधान का हिस्सा बताने की कोशिश की है और दुनिया भर में परमाणु लौबी की कोशिश है कि इस बहाने विस्तार किया जाए. लेकिन यह तर्क कई स्तरों पर विरोधाभास से भरा हुआ है. एक तो जैतापुर में परामाणु प्लांट लगाने के लिए भारत की सबसे ख़ूबसूरत और पर्यावरणीय दृष्टी से नाज़ुक कोंकण इलाके के पूरे पारिस्थितिक और वनस्पति तंत्र को खुद परमाणु कारखाना बरबाद कर रहा है, और इसके लिए सरकार ने बिलकुल फर्जी तरीके से पर्यावरणीय मंजूरी हासिल की है. दूसरे, वैसे भी परमाणु कारखानों के निर्माण से लेकर युरेनियम ईंधन के खनन, परिवहन और सैंकड़ों साल तक परमाणु कचरे के निस्तारण में कार्बन-उत्सर्जी प्रक्रियाओं का इस्तेमाल होता है जिनको परमाणु लौबी अपने कार्बन छाप (footprint) में नहीं गिनती.

दिसंबर में जापानी परधानमंत्री जैसे नरेंद्र मोदी के लिए सांता क्लॉज़ बन के आए थे. बुलेट ट्रेन, लड़ाकू नौसेनिक विमान, औद्योगिक गलियारे के लिए निवेश और भारत-जापान परमाणु समझौता. भारतीय मीडिया को ज़्यादा तरजीह देने लायक मामले बुलेट ट्रेन और बनारस में शिंजो आबे की गंगा आरती ही लगे, लेकिन इसी बीच परमाणु समझौते को भी मुकम्मल घोषित कर दिया गया. हिन्दुस्तान टाइम्स के विज्ञान व अंतर्राष्ट्रीय मामलों के प्रभारी पत्रकार परमीत पाल चौधरी ने अपने सरकारी स्रोतों के हवाले से इस परमाणु डील को फाइनल करार दे दिया और यह भी खबर दी कि अमेरिकी कंपनी वेस्टिंगहाउस अब रास्ता साफ़ होने के बाद 1000 मेगावाट क्षमता के 6 परमाणु बिजली कारखाने बेचने का मसौदा लेकर तैयार है.

लेकिन भारत में मीडिया और सरकार के दावों के विपरीत, परमाणु समझौता अभी संपन्न नहीं हुआ है. भारत और जापान की साझा घोषणा में परमाणु मसले पर सैद्धांतिक सहमति का उल्लेख है और इसके लिए एक एमओयू पर हस्ताक्षर होने की सूचना है. यह एमओयू भारतीय सरकार ने सार्वजनिक नहीं किया है लेकिन जापान में इसे साझा किया गया है. यह एमओयू दो लम्बे वाक्यों की घोषणा भर है जिसमें समझौता शब्द तीन बार आता है – हमने द्वीपक्षीय समझते के लिए समझौता कर लिया है ताकि निकट भविष्य में समझौता हो पाए. यह एमओयू परमाणु डील को दोनों तरफ के अधिकारियों के हवाले कर देता है, जिससे भारतीय मीडिया ने अपने हिसाब से यह अर्थ निकाला कि शीर्ष स्तर समझौता हो गया और बाकी ब्योरों पर काम होना भर बचा है. जबकि जापानी मीडिया और राजनीतिक गलियारों में स्थिति बिलकुल उलटी है. भारत के साथ परमाणु डील जापान की पारंपरिक अंतर्राष्ट्रीय नीति से मेल नहीं खाता क्योंकि जापान हिरोशिमा के बाद परमाणु निरस्त्रीकरण का पैरोकार रहा है और परमाणु अप्रसार संधि(एनपीटी) से बाहर के देशों से परमाणु तकनीक का लेन-देन नहीं करता. जापान के विदेश-मंत्रालय और नीति अधिष्ठान में पिछले दस सालों से इस बात को लेकर एक मजबूत अंदरूनी अस्वीकार्यता रही है और कयास यही लगाए जा रहे थे कि अगर डील हो पाती है तो विदेश मंत्रालय और इसके अधिकारियों को किनारे रखकर जापान के दक्षिणपंथी प्रधानमंत्री शिंजो आबे के व्यक्तिगत दबाव में ही होगी. इस डील की जद्दोजहद को वापस मंत्रालय तक पहुँचने को जापान में एक कदम पीछे जाना समझा जा रहा है. लेकिन मोदी जी के भारत में अंतर्राष्ट्रीय उपलब्धियों का ढोल पीटने से कौन रोक सकता है.

परमाणु ऊर्जा का सच

जैतापुर या कूडनकुलम का आंदोलन हो या भारत-जापान परमाणु समझौते के खिलाफ इस हफ्ते होने वाला देशव्यापी आंदोलन, इन सभी मौकों पर देश के शहरी मध्यवर्ग और उसके साथ-साथ मीडिया से लेकर अदालतों तक सबका रुख यही रहता है कि विस्थापन, पर्यावरण और सुरक्षा के सवाल तो अपनी जगह ठीक हैं, लेकिन भारत को बिजली तो चाहिए।विकास तो चाहिए। देश के लिए विकास, विकास के लिए बेतहाशा बिजली और बिजली के लिए अणु-बिजलीघर, इन तीनों कनेक्शनों को बिना किसी बहस के सिद्ध मान लिया गया है और आप इस तर्क की किसी भी गाँठ को दूसरी सूचनाओं-परिप्रेक्ष्यों से खोलने की कोशिश करते हैं तो राष्ट्रद्रोही करार दे दिए जाते हैं.

2011 के मार्च में फुकुशिमा दुर्घटना हुई और जब बीबीसी ने साल के अंत में एक अंतर्राष्ट्रीय सर्वे कराया तो यह पाया कि पूरी दुनिया में दुर्घटना के बाद अणुऊर्जा को लेकर आम धारणा बदली है और परमाणु ऊर्जा को लेकर जनसमर्थन न्यूनतम स्तर पर पहुँच गया है. फुकुशिमा में जो हुआ, और अब भी हो रहा है, वह पूरी दुनिया की आँखें खोलने वाला साबित हुआ है और पिछले पांच सालों में कई देशों ने अपनी ऊर्जा नीति में आमूलचूल बदलाव किए हैं. जर्मनी, ऑस्ट्रिया, स्वीडन और स्विट्ज़रलैंड जैसे देशों ने पूरी तरह परमाणु-मुक्त ऊर्जानीति बनाई है तो फ्रांस ने जिसकी 75% बिजली अणुऊर्जा से आती है, इसको तत्काल 50% तक लाने की घोषणा कर दी है और वहाँ क्रमशः इसे और कम किया जाएगा।लेकिन इसी दौरान भारत के सुदूर दक्षिणी छोर पर कूडनकुलम में स्थानीय लोगों का आंदोलन चल रहा था, और भारत की सरकार ने ग्रामीणों के सवालों को वाजिब मानकर उनसे बात करने की बजाय मनोवैज्ञानिक चिकित्सकों का एक दल देश के सबसे प्रसिद्ध मनोचिक्त्सा संस्थान से भेजा!

जब इन काउंसिलरों से बात नहीं बनी तो हज़ारों पुलिस और अर्द्धहसैनिक बल भेजे गए और जल्दी ही पूरे गाँव को घेर कर उसका खाना-पानी-यातायात सब हफ्ते भर काट दिया गया, लोगों को पुलिस ने घर में घुसकर पीटा और उनकी नावें तोड़ दीं, और मनमोहन सिंह सरकार ने उस उलाके के आठ हज़ार से अधिक लोगों के ऊपर देशद्रोह का मुकदमा दायर कर दिया। बर्बर सरकारी दमन में चार लोग मारे गए और औरतों समेत सैंकड़ों स्थानीय लोग महीनों तक जेल में ठूंस दिए गए. मछुआरों की शांतिपूर्ण रैली को पुलिस ने खदेड़कर समुद्र में धकेल दिया जहां उनके ऊपर नौसेना के विमान मंडरा रहे थे. किसी सरकार ने अपने ही लोगों के खिलाफ ऐसा खुला युद्ध लड़ा हो, इसकी मिसालें कम ही मिलती हैं. सुप्रीम कोर्ट ने भी कूडनकुलम केस में उठाए गए आठ छोटे और ठोस सवालों – जिनका सम्बन्ध इस परियोजना में पर्यावरण और सुरक्षा नियमों की घातक अवहेलना से था – पर कुछ नहीं कहा और जजों ने 250 पन्नों के फैसले में बार-बार सिर्फ यही दुहराया कि देश को विकास और ऊर्जा की ज़रुरत है. और इस आधार पर अणुऊर्जा विभाग को सादा चेक दे दिया, जैसे परमाणु ऊर्जा अगर ज़रूरी हो तब खुद सरकारी सुरक्षा मानकों की खुली अवहेलना भी वाजिब हो जाए. कूडनकुलम केस में तो कोर्ट से याचिका में यह पूछा तक नहीं गया था कि वह बताए कि देश को परमाणु ऊर्जा चाहिए कि नहीं, और यह फैसला करना वैसे भी कोर्ट का क्षेत्राधिकार नहीं है.

आखिर फुकुशिमा के बाद भी भारत में परमाणु ऊर्जा को लेकर इतना तगड़ा सरकारी समर्थन क्यों है? फुकुशिमा के बाद की दुनिया में अणुऊर्जा के इतने बड़े विस्तार की योजना बना रहा देश भारत अकेला क्यों बचा है? अपने निर्णायक संकट के दौर से गुज़र रही अंतर्राष्ट्रीय परमाणु लॉबी की आशा भारत क्यों है जहां सरकार पर्यावरणीय कानूनों, सुरक्षा व उत्तरदायित्व के सवालों और स्थानीय जन-प्रतिरोधों सबको किनारे करते हुए उसका स्वागत करने को तैयार है?

क्यों है भारत में परमाणु ऊर्जा की लिए अंधी दौड़?

क्या सचमुच भारत को परमाणु की ज़रुरत है? यह पूछने से पहले सरकार और उसके कारिंदों से यह पूछना चाहिए कि आप इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंचे कि भारत को परमाणु ऊर्जा की, और वह भी इतनी बड़ी मात्रा में, सचमुच ज़रुरत है? 2004 तक खुद अणु ऊर्जा विभाग के कागज़ों में कहीं इतने बड़े पैमाने पर परमाणु ऊर्जा के विस्तार का ज़िक्र नहीं था. लेकिन 2006 में घोषित समेकित ऊर्जा नीति में अचानक हमें बताया गया कि सन 2052 तक 250 गीगावाट यानी कुल बिजली का पचीस प्रतिशत परमाणु से आना चाहिए। मौजूदा उत्पादन ढाई प्रतिशत से भी कम है. 2004 और 2006 के बीच ऐसा क्या हुआ? क्या बिजली को लेकर कोई राष्ट्रीय बहस हुई? इसमें गैर-सरकारी विशेषज्ञ और ऊर्जा तथा विकास को ज़मीनी व वैकल्पिक नजरिए से देखने वाले नागरिक शामिल थे? नहीं ऐसा कुछ नहीं हुआ. बल्कि विदेशों से परमाणु बिजलीघरों के आयात और इतने बड़े पैमाने विस्तार की बात खुद अणुऊर्जा विभाग के लिए औचक खबर की तरह आई.

ऐसा इसलिए हुआ कि 2004 और 2006 बीच 2005का साल आया. इस साल भारत और अमेरिका बीच एक व्यापक परमाणु डील हुई. मनमोहन सिंह अमेरिका के दौरे पर थे और परमाणु डील की पेशकश अमेरिकी तरफ से आई थी.

क्या थी यह डील? यह डील भारत सारतः को अमेरिकी विदेश-नीति की आगोश में लेने की कवायद थी जिसके लिए भारत के परमाणु हथियारों को अंतर्राष्ट्रीय वैधता दिलाना इस डील का मकसद था.

भारत ने 1950 और 1960 के दशक में ब्रिटेन, कनाडा और अमेरिका आदि देशों से शांतिपूर्ण उपयोग के नाम पर जो परमाणु तकनीक और सामग्री हासिल की थी, उसी का इस्तेमाल कर के 1974 में पहला बम-विस्फोट किया था, जिसके बाद भारत पर पूरी दुनिया ने परमाणु के क्षेत्र में प्रतिबन्ध लगा दिया था. ये प्रतिबन्ध 1998 के परमाणु टेस्ट के बाद और कड़े किए गए थे. लेकिन 1974 और 1998 के बीच अंतर यह था कि भारत 1991 में अपना बाज़ार खोल चुका था और इतने बड़े उपभोक्ता समूह वाले देश पर आर्थिक प्रतिबन्ध से खुद अमेरिका और पश्चिमी देशों को ही नुकसान हो रहा था. साथ ही, उन्हें अंतर्राष्ट्रीय चौपालों पर भारत को अपने साथ बिठाना था और ईरान से लेकर चीन तक को लेकर बिछी शतरंज में भारत को अपने साथ रखना था. उस स्तर के एक पार्टनर की हैसियत के साथ भारत पर 35 सालों से चले आ रहे ये प्रतिबन्ध मेल नहीं खाते थे. इसलिए परमाणु डील दरअसल भारत के हथियारों को वैधता देकर उसे बदलती दुनिया में अपने साथ बिठाने की कवायद ज़रूरी थी.

लेकिन भारत पर दशकों से प्रतिबन्ध सिर्फ अमेरिका ने नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी(International Atomic Energy Agency- IAEA) और 46 देशों के परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह(Nuclear Suppliers Group-NSG) ने लगाए थे और इन मंचों से भारत को मान्यता दिलवाने में और भी समय व उपाय लगे. भारत ने NSG देशों को अपनी एंट्री के बदले में भारी मात्रा में परमाणु बिजलीघर व यूरेनियम खरीदने का वादा किया। इस सौदे में भी अमेरिका को बड़ा शेयर मिला क्योंकि उसी के समर्थन से इतना बड़ा बदलाव संभव हुआ. तो भारत का मानचित्र उठाकर अमेरिका को परमाणु ऊर्जा प्रकल्पों के लिए दो साइट और फ्रांस को एक बड़ी साइट, रूस को दो नई जगहें और अन्य देशों को इन नई अणु-भट्ठियों के लिए भारी मात्रा में ईंधन-खरीद का वादा किया गया.

ऐसा करते समय न तो इन जगहों पर रह रहे लोगों से पूछा गया, न इन इलाकों के पर्यावरण की बात सोची गयी, न ऊर्जा मंत्रालय से पूछा गया कि क्या सचमुच परमाणु ऊर्जा की इतनी बड़ी ज़रुरत है और न ही अब तक बम बनाने की संवेदनशीलता के कारण नियंत्रित स्तर पर काम कर रहे परमाणु ऊर्जा विभाग से यह पूछा गया कि उसके पास इन 35 नई परियोजनाओं के लिए इंजीनियर और अनुभव भी है.

भारत में परमाणु ऊर्जा वैसे ज़रूरी है या नहीं या उसके खतरों के मद्देनज़र क्या विकल्प हैं, यह मेरे लिए एक दूसरी बहस का सवाल है जो जनपथ के पाठकों से करने के लिए मैं तैयार हूँ, लेकिन सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि परमाणु ऊर्जा के महा-विस्तार की मौजूदा योजना का उन सवालों से कोई सीधा लेना-देना है ही नहीं। भारत में लग रहे परमाणु संयंत्र असल में वह कीमत है जो हम परमाणु बमों के लिए – असल में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर परमाणु बम-संपन्न देशों के क्लब में शामिल होने के लिए – चुका रहे हैं.

और यही वजह है कि इन नए बिजलीघरों से देश के पर्यावरण को हो रहे घातक नुकसान के सवाल, इनसे जितने लोगों को बिजली, विकास व रोजगार मिलेगा उससे कहीं बड़ी संख्या में लोग बेघर और आजीविका-विहीन होंगे यह सवाल, देश में परमाणु सुरक्षा के लिए स्वतंत्र व विश्वसनीय ढांचा न होने का सवाल, स्थानीय समुदाओं के लोकतांत्रिक हितों का सवाल, ऊर्जा तथा परमाणु मामलों के उन विशेषज्ञों के सवाल जिनमें से कई सरकार का हिस्सा रहे हैं और देश-विदेश में प्रतिष्ठित हैं – इन सारे का सरकार के लिए कोई मतलब नहीं क्योंकि उसके लिए परमाणु संयंत्रों का आयात विदेशनीति के लेन-देन से जुड़ा है. 2005 में अमेरिका और उसके बाद फ्रांस, रूस, कनाडा, ब्रिटेन, कज़ाख़िस्तान, मंगोलिया, आस्ट्रेलिया जैसे सभी देशों से हुई इन परमाणु डीलों से बंधे होने की वजह से दरअसल भारत ने वह संप्रभुता खो दी है, जिसका इस्तेमाल कर के दूसरे देश फुकुशिमा से सबक लेकर स्वतंत्र और वैकल्पिक ऊर्जा नीति बना रहे हैं.

एक आख़िरी बात यहां जोड़ना ज़रूरी है कि आम समझ या अपेक्षा के ठीक विपरीत, भारत के संसदीय वामपंथ ने अमेरिका के साथ हुए परमाणु डील की इसलिए आलोचना नहीं की थी कि इससे भारत की ज़मीन पर खतरनाक परमाणु संयंत्र आएँगे। सीपीएम की आलोचना का मुख्य स्वर यह था कि इस डील के बदले भारत का भविष्य में परमाणु टेस्ट करने का विकल्प चला जाएगा, इस डील में बाकी तकनीकें मिल रही हैं लेकिन परमाणु ईंधन के पुनर्संस्करण(reprocessing) की तकनीक नहीं मिल रही है, आयातित रिएक्टरों(अणु बिजलीघरों) पर अंतर्राष्ट्रीय निगरानी होगी, इत्यादि इत्यादि।

जैतापुर, मीठीविर्दी और कोवाडा जैसे जगहों के किसान और मछुआरे मध्यवर्ग के उस सपने की मार झेल रहे हैं जिसमें भारत को सुपर पावर बनना है. इतना सबकुछ कर के भी वह हैसियत मिलती दिख नहीं रही क्योंकि जार्ज बुश के दौर से दुनिया आगे बढ़ चुकी है. जिन परमाणु बमों से भारत की ताकत बढ़नी थी, उनके एवज में देश ने ये खतरनाक और महंगे बिजलीघर खरीदना मंजूर किया है और अब उनमें दुर्घटना की स्थिति में विदेशी कंपनियों को मुआवजा न देना पड़े इसकी जुगत में लगी है सरकार। हैसियत और ताकत बम बनाने से नहीं आती. एक तीसरी दुनिया का देश जब शार्टकट इस्तेमाल कर के पहली दुनिया में घुसना चाहता है जबकि आधी से अधिक आबादी दो सदी पीछे जी रही हो, तो यही गत होती है जो भारत की अब हो रही है. प्रधानमंत्री मेगा शो करने वाले फूहड़ नौटंकीबाज़ में तब्दील हो गया है.

परमाणु बम बनाने के बाद कोई शांति नसीब नहीं हुई बल्कि असुरक्षा का एक दुष्चक्र शुरू हुआ है और एटम बम बनाने के डेढ़ दशक बाद भारत दुनिया में सबसे अधिक हथियार खरीदने वाला देश बन बैठा है. परमाणु बमों को लेकर झूठे गर्व और भ्रम पर चर्चा किसी और लेख में.

फिलहाल यह कि जापान के साथ समझौता 2005 से बन रही उस तस्वीर का आख़िरी और निर्णायक टुकड़ा है क्योंकि जापानी पुर्ज़ों की आपूर्ति के बगैर भारत में अमेरिकी और फ्रांसीसी परियोजनाएं अटकी पड़ी हैं. देश के किसानों-मछुआरों जीविका और ज़िंदगी बचाने का यह आख़िरी मौक़ा है और बात सिर्फ उन्हीं की नहीं है क्योंकि परमाणु दुर्घटना में सिर्फ वे ही नहीं मरेंगे।

यह अटकी हुई डील जैतापुर, मीठी विरदी और कोवाडा के किसानों के लिए आख़िरी उम्मीद है क्योंकि उनकी अपनी सरकार उनको दगा दे चुकी है और बिजली और विकास के पीछे पागल देश का मध्यवर्ग उन्हें भूल चुका है. जैतापुर में 2006 से किसानों और मछुवारों का संघर्ष जारी है, जिसमें 2010 में एक शांतिपूर्ण जुलूस के दौरान पुलिस फायरिंग में एक युवक की जान तक जा चुकी है. पूरे इलाके की नाकेबंदी, स्थानीय आंदोलन के लीडरों को पकड़कर हफ़्तों जेल में डालना, धमकाना-फुसलाना, और आस-पास के जिलों से पहुंचने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं को जिलाबदर घोषित करना कांग्रेस-एनसीपी की सरकार में भी हुआ और अब महाराष्ट्र की भाजपा सरकार में भी जारी है. परियोजना का विरोध करने वाले सभी लोग बाहरी और विदेशी-हित से संचालित घोषित कर दिए गए हैं और फ्रांसीसी कंपनी एकमात्र इनसाइडर और देशभक्त बची है. 2010 में देश के दूसरे इलाकों से समर्थन में पहुंचकर सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों ने एक यात्रा निकाली जिसमें पूर्व नौसेनाध्यक्ष एडमिरल रामदास और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस सावंत भी शामिल थे, लेकिन सबको हिरासत में ले लिया गया. जैतापुर में किसान ज़्यादातर हिन्दू हैं और मछुआरे मुस्लिम. जिन किसानों के नाम ज़मीन थी कम-से-कम उनको मुआवजा मिला लेकिन उन मछुआरों को कुछ नहीं मिला क्योंकि उनके पास समंदर का कोई कागज़ नहीं है. परमाणु प्लांट से जो गर्म अपशिष्ट पानी निकलेगा वह आस-पास के समुद्री तापमान को 5 से 7 डिग्री बढ़ा देगा जिससे मछलियों की खेप समाप्त हो जाएगी. इस संवेदनशील प्लांट के आस-पास समुद्र में जो 5 किमी तक जो सेक्यूरिटी तैनात होगी वह भी साखरी नाटे और कई दूसरे मछुआरे गाँवों की जीविका छीन लेगी क्योंकि उस दायरे में मछली पकड़ना बंद हो जाएगा. शिवसेना और भाजपा का उस इलाके में राजनीतिक प्रभुत्व है और इस मामले को हिन्दू-मुस्लिम बना देने की कोशिश भी वे कर ही रहे हैं.

स्रोतः सामयिक वार्ता

वर्ष 2015 के अक्टूबर में यूजीसी ने केंद्रीय विश्वविद्यालयों में एमफिल और पीएचडी के शोधार्थियों को मिलने वाली  गैर-नेट फेलोशिप बंद कर दी। इसके बाद कई राज्यों में इसके विरोध में प्रदर्शन हुए, लेकिन सरकार ने अभी तक इस मसले पर ऐसा कोई फैसला नहीं लिया है जो प्रदर्शनकारियों को संतुष्ट कर सके। विरोध की पहली चिंगारी तब फूटी जब प्रदर्शनकारियों ने 21 अक्टूबर, 2015 को यूजीसी भवन पर डेरा डाला। दो महीने से भी ज्यादा लंबे समय तक यूजीसी भवन के सामने धरने पर बैठे प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने कई बार बर्बर तरीके से लाठीचार्ज किया। लेकिन उनका हौसला न तो ये लाठियाँ कम कर पाईं न दिसंबर-जनवरी की सर्द रातों में होने वाली परेशानियाँ। एक बार तो ऐसा हुआ कि पुलिस की लाठियों से घायल प्रदर्शनकारी अस्पताल से निकलने के बाद घर या कैंपस जाकर आराम करने के बदले सीधे धरना स्थल पहुँच गए। उनके इस जज्बे ने भारत के कई विश्‍वविद्यालयों के विद्यार्थियों में संघर्ष की प्रेरणा जगाई और धीरे-धीरे दिल्ली में शुरू हुआ यह विरोध प्रदर्शन भारत के कई शहरों में फैल गया। 

सरकार ने जिस तरीके से आंदोलनकारियों की आवाज को दबाने की कोशिश की है उसे देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि मौजूदा सरकार उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय पूँजी का रास्ता साफ करने के लिए अपने ही नागरिकों को कुचलने के लिए तैयार बैठी है। देश की राजधानी में महिला प्रदर्शनकारियों को पुरुष पुलिसकर्मियों ने दौड़ा-दौड़ाकर पीटा और कई प्रदर्शनकारियों को तो अस्पताल में दाखिल करना पड़ा। कुछ प्रदर्शनकारियों को बस में भी पीटा गया। इस दमन को देखने के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब सरकार दिल्ली में अपने नागरिकों के साथ ऐसा व्यवहार कर सकती है तो आदिवासियों के इलाकों में वह क्या-क्या करती होगी।  

यूजीसी भवन के सामने धरने पर बैठे विद्यार्थियों के मनोबल को तोड़ने के लिए सरकार ने तमाम पैंतरे आजमाए। यूजीसी भवन में महिला प्रदर्शनकारियों को शौचालय का इस्तेमाल करने से रोका गया। लाठीचार्ज के दौरान उन कार्यकर्ताओं को घेरकर मारा गया जिन्होंने इस आंदोलन में नेतृत्वकारी भूमिका निभाई है। महिला प्रदर्शनकारियों को यह कहा गया कि ऐसे विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने पर पुलिस उनके कपड़े निश्चित तौर पर फाड़ेगी। क्या ऐसा दमन सरकार के आदेश के बिना हो सकता है? इस सवाल का एकमात्र जवाब है – ‘नहीं’। सर्द रातों में उन्हें कई बार पास के कब्रिस्तान से लकड़ियों का इंतजाम करना पड़ता है। वे कनॉट प्लेस, मंडी हाउस आदि जगहों पर सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करके पैसा जुटा रहे हैं। हर नया दिन उनके लिए दर्जनों नई समस्याएँ लेकर आता है, लेकिन वे शिक्षा को बचाने की लड़ाई में किसी तरह का समझौता करने को तैयार नहीं हैं। वे यह अच्छी तरह जानते हैं कि शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ लड़ी जाने वाली लड़ाई एक-दो महीने में नहीं खत्म हो सकती है। लेकिन वे यह भी जानते हैं कि इस संघर्ष से विचारों के जो बीज समाज में बोए जा रहे हैं वे आने वाले समय में बड़े आंदोलनों के फलदार पेड़ जरूर बनेंगे। प्रदर्शनकारियों ने अखिल भारतीय स्तर पर एक समन्वय समिति बनाई है जो देश के विभिन्न राज्यों के कैंपसों में इस आंदोलन से जुडी गतिविधियों के समन्वय का काम कर रही है। बैरिकेड के सामने कक्षा चलाने से लेकर कविता पाठ आयोजित करने जैसे कई रचनात्मक काम किए जा रहे हैं।  

जेएनयू के शोधार्थी वीरेंद्र का मानना है कि यूजीसी भवन के सामने धरने पर बैठे साथियों के संघर्ष की तरह यादवपुर विश्वविद्यालय और एफटीआईआई में हुए विरोध प्रदर्शनों में भी किसी राजनीतिक संगठन की केंद्रीय भूमिका नहीं देखी गई। वे संगठन के पारंपरिक ढाँचे और संगठित होने के अनौपचारिक स्वरूप के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि संगठन का पुराना ढाँचा अपने अंतर्विरोधों को दूर नहीं कर पा रहा है इसलिए संघर्ष के नए तरीके सामने आ रहे हैं जिसमें किसी एक संगठन की निर्णायक भूमिका नहीं दिखती है। वर्धा स्थित महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय के लगभग 60 विद्यार्थियों ने दिल्ली में चल रहे विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया। इस बात को ध्यान में रखना जरूरी है कि इस विश्वविद्यालय के विद्यार्थी दो महीने से भी ज्यादा लंबे समय से यूजीसी भवन के सामने धरने पर बैठे हैं। दूसरे राज्य से दिल्ली आकर तमाम परेशानियों का सामना करते हुए सरकार की जनविरोधी नीतियों का विरोध करने के इस जज्बे को देखते हुए आने वाले समय में कैंपस राजनीति के मजबूत होने की उम्मीद बँधती है। एक बड़ी बात यह है कि अंडरग्रैजुएट विद्यार्थियों ने भी विरोध प्रदर्शनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। वे भी यह जानते हैं कि आज जो संकट उच्च शिक्षा पर मँडरा रहा है कल वह उनकी पढ़ाई को भी प्रभावित करेगा। अलीगढ़, इलाहाबाद, गया, चंडीगढ़ आदि शहरों से सैकड़ों विद्यार्थियों ने दिल्ली आकर इस संघर्ष में हिस्सा लिया। दिल्ली के कई विश्‍वविद्यालयों के विद्यार्थियों ने उच्च शिक्षा को पूरी तरह बाज़ार के हवाले करने के खतरों के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, हरियाणा आदि राज्यों की यात्रा की। एक लंबे समय बाद देश में किसी मसले पर कैंपस राजनीति में ऐसी सक्रियता देखने को मिली।

भारत में उच्च शिक्षा का बाजार बहुत बड़ा है। उच्च शिक्षा के लगभग तीन करोड़ विद्यार्थियों को ग्राहक बनाकर बहुत बड़ा मुनाफा कमाने की उम्मीद कर रहे पूँजीपति शिक्षा नीति को मनचाहे ढंग से बदलने की कोशिश कर रहे हैं। दुनिया के कई देशों में यही हो रहा है। विश्व व्यापार संगठन एशिया और अफ्रीका में शिक्षा के बाजार पर कब्जा करने के लिए शिक्षा को देश की संप्रभुता के दायरे से बाहर निकाल कर एक ऐसे समझौते के जाल में उलझाना चाहता है जो सरकारों को अपने देश के संस्थानों को किसी तरह की आर्थिक मदद देने से रोक दे। इससे निजी संस्थानों का रास्ता साफ हो जाएगा। अभी उच्च शिक्षा में अच्छे सरकारी संस्थानों की मौजूदगी के कारण निजी विश्वविद्यालयों का धंधा मंदा चल रहा है।   
वर्ष 2015 में चिली, दक्षिण अफ्रिका, ऑस्ट्रिया, ब्राजील समेत बहुत-से अन्य देशों में शिक्षा में जनविरोधी बदलावों के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला चलता रहा। तुर्की और ऑस्ट्रिया में आंदोलनकारियों पर आतंकवाद विरोधी धाराएँ लगा दी गईं। पूँजी की तानाशाही में शिक्षा पाने के अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे लोग आतंकवादी घोषित हो जाते हैं और हथियार बेचने वाले लोगों को राजकीय सम्मान देकर बुलाया जाता है। ऐसे समय में समाज के सभी तबकों को शिक्षा के अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे लोगों का साथ देना चाहिए। यूजीसी के सामने धरने पर बैठे विद्यार्थी केवल अपनी फेलोशिप को कायम रखने या उसकी राशि बढ़ाने की माँग नहीं कर रहे हैं। वे शिक्षा पर होने वाले खर्च को बजट का 10 प्रतिशत करने की भी माँग कर रहे हैं। उनकी एक माँग शिक्षा के निजीकरण को रोकने की भी है। सरकार अभी इन माँगों को माने या न माने, समाज को इन माँगों की अहमियत से अनजान नहीं होना चाहिए। एक लंबे संघर्ष की जमीन तैयार हो गई है। इस पर विचारों की फसल उगाने की जिम्मेदारी हम सभी की है।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने फेलोशिप के मामले में पहले प्रदर्शनकारियों को भ्रमित करने की कोशिश की। स्मृति ईरानी ने मीडिया के सामने प्रदर्शनकारियों को एक समिति गठित करके उनकी माँगों पर विचार करने का आश्वासन दिया, जबकि प्रदर्शनकारी ऐसी किसी समिति के गठन के खिलाफ थे जिसका मकसद योग्यता के बहाने फेलोशिप के दायरे को छोटा करना है। मीडिया के एक तबके ने समिति गठित होने को आंदोलनकारियों की माँग पूरी होने के तौर पर पेश किया। इससे विद्यार्थियों में भी भ्रम फैला। उच्च शिक्षा तक पहुँचने वाले विद्यार्थी पहले ही प्रवेश परीक्षा और इंटरव्यू में अपनी योग्यता साबित कर चुके होते हैं। ऐसे में उन्हें फेलोशिप देने के लिए उनकी योग्यता को आँकने के लिए अलग से कोई मापदंड बनाने का कोई औचित्य नहीं नजर आता। योग्यता का पैमाना तब कहाँ चला जाता है जब देश को विनाश की खाई में धकेलने वाले वाले सांसदों को लाखों का वेतन मिलता है? अगर व्यवस्था में ही कोई कमी है तो किसी एक तबके की योग्यता पर ही सवाल क्यों उठाया जाए?

सरकार की संवेदनहीनता का एक उदाहरण यह भी है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने दिसंबर और जनवरी की ठंड में सड़क के किनारे सो रहे विद्यार्थियों को कई बार बात करने से इनकार करके वापस लौटा दिया। जिस समिति को दिसंबर के अंतिम सप्ताह तक रिपोर्ट पेश करने की जिम्मेदारी दी गई थी, वह जनवरी के पहले सप्ताह के बीत जाने के बाद भी खामोश बैठी है। हालाँकि इस समिति का विद्यार्थियों की माँगों से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन इसकी कार्यशैली ही सरकार की मंशा स्पष्ट कर देती है। इस समिति के अध्यक्ष गौतम बरुआ ने कहा है कि वे मीडिया से प्रदर्शनकारियों की माँगों की जानकारी लेने के बाद उन पर विचार जरूर करेंगे। अगर वे चार कदम चलकर यूजीसी भवन के गेट तक चले जाते तो उन्हें प्रदर्शनकारियों की माँगों की जानकारी पाने के लिए मीडिया पर निर्भर नहीं होना पड़ता। इस गेट के सामने दो महीने से भी ज्यादा लंबे समय से प्रदर्शनकारियों ने धरना डाल रखा है। तब उन्हें यह भी मालूम हो जाता कि जनकवि विद्रोही ने इसी गेट के पास अंतिम साँस ली। उस अंतिम साँस में भी जनता को शिक्षा का अधिकार दिलाने का संकल्प शामिल था।           
                            

             

                        
एक अत्यन्त मेधावी, सुन्दर , और सं
वेदनशील युवा राजनैतिक तरुण की मौत ने भारतीय समाज को हिला दिया है। इस युवा में जोखिम उठाने का साहस था और अपने से ऊपर की पीढ़ी के उसूलों को आंख मूंद कर न मानने की फितरत थी। वह एक राजनैतिक कार्यकर्ता था,उसका संघर्ष राजनैतिक था । वह आतंक के आरोप में दी गई फांसी के विरुद्ध था तो साथ-साथ आतंक फैलाने के लिए सीमा पार से आये घुसपैठियों से मुकाबला करते हुए मारे गए जवानों की शहादत के प्रति श्रद्धावनत होकर उसने कहा था, ‘अम्बेडकरवादी होने के नाते मैं जिन्दगी का पक्षधर हूं । इसलिए उन जवानों की शहादत के प्रति नमन करता हूं।‘ उसकी मेधा से टक्कर लेने की औकात उसकी विरोधी विचारधारा से जुड़े उस शिक्षण संस्था के छात्रों में नहीं थी और न ही उस शैक्षणिक संस्था के बौने कर्णधारों में थी इसलिए सत्ता के शीर्ष पर बैठे आकाओं की मदद से एक चक्रव्यूह रचा गया था । सत्ताधारी ताकतें रोहित द्वारा फांसी की सजा के विरोध की चर्चा करती हैं लेकिन रोहित के समूह (अम्बेडकर स्टुडेन्ट्स एसोशियेशन) द्वारा मनु-स्मृति दहन तथा गत नौ वर्षों में 9 दलित छात्रों द्वारा शैक्षणिक उत्पीडन के कारण की गई आत्महत्याओं के विरोध की चर्चा करने का साहस नहीं जुटा पातीं।
  लखनऊ में अम्बेडकर विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में छात्रों के प्रत्यक्ष विरोध के बाद प्रधानमंत्री जिस भाषण में ‘मां भारती के लाल की मृत्यु’ के प्रति अपनी संवेदना प्रकट करते हैं वहीं यह कहने से हिचकिचाते नहीं हैं कि बाबासाहब अपने जीवन में आने वाले कष्ट चुपचाप सहन कर जाते थे , किसी से शिकवा तक नहीं करते थे। बाबासाहब के बारे में प्रधानमंत्री का दावा निराधार है। बाबासाहब द्वारा महाड सत्याग्रह (अस्पृश्यों के वर्जित तालाब से घोषणा करके ,समर्थकों के साथ पानी पीना) तथा मनुस्मृति दहन चुपचाप सहन करते जाने का विलोम थे। पुणे करार के दौरान हुई बातचीत में गांधीजी ने उनकी वकालत के बारे में पूछा था। बाबासाहब ने उन्हें बताया था कि अपने राजनैतिक-सांगठनिक काम के कारण वे वकालत में कम समय दे पा रहे हैं। उसी मौके पर शैशव से तब तक उनके साथ हुए सामाजिक भेदभाव और उत्पीड़न की उनके द्वारा बताई गई कथा गांधी के विचार पत्रों -हरिजनबंधु (गुजराती), हरिजनसेवक (हिन्दी) तथा हरिजन (अंग्रेजी) में छपे थे।
भारतीय समाज और राजनीति में सकारात्मक बदलाव आ रहे हैं। पिछड़े और दलित खुली स्पर्धा में अनारक्षित सीटों पर दाखिला पाते हैं,वजीफा हासिल करते हैं और लोक सेवा आयोग की अनारक्षित सीटों पर चुन जाते हैं । यह समाज की सकारात्मक दिशा में गतिशीलता का मानदण्ड बनता है। ऐसे युवाओं की तादाद उत्तरोत्तर बढ़ रही है और बढ़ती रहेगी। गैर आरक्षित खुली सीटों पर चुने जाने वाले ऐसे अभ्यर्थियों के कारण आरक्षित वर्गों के उतने अन्य अभ्यर्थियों को आरक्षण के अन्तर्गत अवसर मिल जाता है। यहां यह स्पष्ट रहे कि यदि अनारक्षित खुली स्पर्धा की सीटों पार आरक्षित वर्गों के अभ्यर्थियों को जाने से रोका जाए तब उसका मतलब गैर-आरक्षित तबकों के लिए पचास फीसदी आरक्षण देना हो जाएगा। सामाजिक यथास्थिति की ताकतें इस सकारात्मक परिवर्तन से खार खाती हैं। इस प्रकार पढ़ाई-लिखाई में कमजोर ही नहीं मेधावी छात्र-छात्राओं को भी विद्वेष का सामना करना पड़्ता है। यानी उत्पीडन का आधार छात्र का पढ़ाई में कमजोर या मजबूत होना नहीं अपितु उसकी जाति होती है।
  शैक्षणिक संस्थाएं व्यापक समाज का हिस्सा भी हैं और वहीं इनकी अपनी एक दुनिया भी है। हर जमाने के सत्ता संतुलन को बनाये रखने के लिए जिन लोगों की आवश्यकता होती है उनका निर्माण इन संस्थाओं में किया जाता है। रोहित को यथास्थितिवाद का पुर्जा बनाना शिक्षा व्यवस्था के बस की बात न थी। व्यापक समाज और विश्वविद्यालय परिसर को देखने की उसकी दृष्टि सृजनात्मक थी,दकियानुसी नहीं थी। हैदराबाद शहर के बाहर बसाये गये इस परिसर के पेड़-पौधे ,जीव-जंतुओं से लगायत अंतरिक्ष तक उसकी नजर थी। अपनी राजनीतिक पढ़ाई के अलावा कुदरत से मानव समाज की बढ़ रही दूरी को वह शिद्दत से महसूस करता था। उसके फेसबुक चित्रों का एक अल्बम हैदराबाद विश्वविद्यालय की वानस्पतिक और जैविक संपदा के सूक्ष्म निरीक्षण से खींचे गए फोटोग्राफ्स को समर्पित है।
  रोहित जैसा होनहार तरुण की प्रतिभा उच्च शिक्षा के प्रतिष्ठानों में पुष्पित-पल्लवित हो सके यह अत्यन्त दुरूह है। इस दुर्गम पथ पर चलते वक्त उसे कदम-कदम पर लड़ना पड़ा होगा। राजनीति और शिक्षा के संचालकों को उसने चुनौती दी होगी। किसी देश का लोकतंत्र उसकी संस्थाओं के अलोकतांत्रीकरण से कमजोर होता है। उन संस्थाओं में लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी है कि प्रशासनिक तंत्र के हर स्तर पर छात्र-अध्यापक-कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व हो। उच्च शिक्षण संस्थाओं की स्वायत्तता की पोल खुलनी अब शेष नहीं है। दिल्ली विश्वविद्यालय में केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री की शैक्षणिक ‘उपलब्धियों’ की सूचनाओं को देने के जिम्मेदार बाबुओं के खिलाफ कार्रवाई के वक्त ही विश्वविद्यालयी आजादी के बाद केन्द्र सरकार द्वारा उच्च शिक्षा की बाबत पहली समिति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में बनी थी स्वायत्तता की हकीकत सामने आ गई थी। राष्ट्रीय महत्व की संस्थायें आई.आई.टी. से लगायत इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट जैसे तमाम शिक्षण संस्थानों में दिल्ली में बैठे शैक्षणिक तंत्र के नौकरशाहों द्वारा बेहयाई से दखलंदाजियां की गई हैं।
     उच्च शिक्षा केन्द्रों में यौन उत्पीडन की रोकथाम के लिए सर्वोच्च न्यायालय के विशाखा फैसले की सिफारिशों की मूल भावना के अनुरूप समितियां बनी हैं। जातिगत विद्वेष की रोकथाम के लिए भी इस प्रकार की समितियां गठित होनी चाहिए। फिलहाल विश्वविद्यालयों में अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ बने हुए हैं परन्तु वे नख-दन्त विहीन हैं। लाजमी तौर पर इन समितियों में  पिछड़े और दलित समूहों की नुमाइन्दगी भी होनी चाहिए। यह गौरतलब है कि गैर-शिक्षक कर्मचारी चयन,शिक्षक व गैर-शिक्षक आवास आवण्टन समिति में अनुसूचित जाति/जनजाति का प्रतिनिधित्व होता है। इनमें पिछड़ी जातियों तथा महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
  केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के विजिटर पदेन राष्ट्रपति होते हैं तथा इन्हें विश्वविद्यालयों की प्रशासनिक-शैक्षणिक जांच के अधिकार का प्रावधान हर केन्द्रीय विश्वविद्यालय के कानून में होता है। इस प्रावधान के तहत सिर्फ काशी विश्वविद्यालय में दो बार विजिटोरियल जांच हुई है न्यायमूर्ति मुदालियर की अध्यक्षता में तथा न्यायमूर्ति गजेन्द्र गडकर की अध्यक्षता में। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की अध्यक्ष रही माधुरी शाह की अध्यक्षता में सभी केन्द्रीय विश्वविद्यालयों की जांच समिति गठित हुई थी। रोहित की मृत्यु के पश्चात एक व्यापक सन्दर्भ की जांच आवश्यक है। निर्भया कान्ड के बाद बने न्यायमूर्ति वर्मा की समयबद्ध कार्यवाही तथा बुनियादी सुधार के सुझावों से हमें सीख लेनी चाहिए तथा उच्च शिक्षा की बाबत उस प्रकार की जांच की जानी चाहिए। केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा घोषित जांच इस व्यापक उद्देश्य की दृष्टि से नाकाफी प्रतीत होती है।
अफलातून

२७ सितम्बर को किशन पटनायक की पुण्य तिथि पर उनके जन्म के जिले कलाहांडी में व्याख्यान : किसानों की आत्महत्या और बेरोजगारी ।
– अफलातून.

अनहद नाद

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मार्क्स हों ,गांधी हों या लोहिया उनके बताये रस्ते पर चलते रहने के बजाए नई पगडंडिया बनाने वाला ही योग्य अनुगामी होता है। वह लकीर का फकीर नहीं होता , नए उसूल बताता है और उन पर चल कर दिखाता है। सुनील ने इन महापुरुषों के विचार ,सिद्धान्त और काम में नया जोड़ा। सुनील की बनाई पगडंडियों की आज चर्चा का दिन है। सुनील इन पगडंडियों पर चला भी इसलिए यह चर्चा आगे भी प्रासंगिक रहेगी।

केसला इलाके में पीने के पानी और सिंचाई के लिए छोटे बन्धों के लिए भौंरा बेतूल पैदल मार्च इलाके को रचनात्मक उर्जा देने वाला कार्यक्रम सिद्ध हुआ। इन बन्धों का प्रस्ताव मोतीलाल वोरा को किसान आदिवासी संगठन ने दिया।

आदिवासी गांव में नियुक्त मास्टर की मौजूदगी के लिए भी इस व्यवस्था में महीनों जेल जाना पड़ता है यह राजनारायण और सुनील ने बताया।

सुनील ने लम्बे चौड़े विधान सभा ,लोक सभा क्षेत्रों के बजाए व्यावाहारिक विकेन्द्रीकरण का मॉडल बताया जिनमें पंचायती व्यवस्था के वित्तीय-आर्थिक अधिकार का प्रावधान होता। पूंजीपतियों के भरोसे चलने वाले मुख्यधारा के दल ही इन बड़े चुनाव क्षेत्रों में सफल होते हैं।

जल,जंगल,जमीन के हक को स्थापित करने के लिए आदिवासी में स्वाभिमान जगाने के बाद और लगातार अस्तित्व के लिए संघर्ष करते करते सहकारिता की मिल्कियत का एक अनूठा मॉडल चला कर दिखाया।

संसदीय लोकतंत्र ,रचनात्मक काम और संघर्ष इनके प्रतीक ‘वोट,फावड़ा ,जेल’ का सूत्र लोहिया ने दिया।’वोट , फावड़ा,जेल’ के इन नये प्रयोगों के साथ-साथ सुनील ने इस सूत्र में दो नये तत्व जोड़े- संगठन और विचार । जीवन के हर क्षेत्र को प्रतिकूल दिशा में ले जाने वाली ‘प्रतिक्रांति’ वैश्वीकरण के षड़्यन्त्र को कदम-कदम पर बेनकाब करने का काम सुनील ने किया। ‘पूंजी के आदिम संचय’ के दौरान होने वाला प्रकृति का दोहन सिर्फ आदिम प्रक्रिया नहीं थी,सतत प्रक्रिया है। १९४३ में लिखे लोहिया के निबन्ध ‘अर्थशास्त्र , मार्क्स से आगे’। मार्क्स की शिष्या रोजा लक्सेमबर्ग की तरह लोहिया ने बताया कि पूंजीवाद को टिकाये रखने के लिए साम्राज्यवादी शोषण जरूरी है। समाजवादी मनीषी सच्चिदानन्द ने आन्तरिक उपनिवेशवाद का सिद्धान्त प्रतिपादित किया। सुनील ने इस सिद्धान्त को परिमार्जित करते हुए कहा कि  सिर्फ देश के अन्दर के पिछाड़े गये भौगोलिक इलाके ही नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था के खेती,छोटे उद्योग जैसे क्षेत्र भी आन्तरिक उपनिवेश हैं। खेती के शोषण से भी पूंजीवाद को ताकत मिलती है।

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सुनील

भ्रष्टाचार और घोटालों से उदारीकरण की नीतियों का संबध है यह सुनील हर्षद मेहता के जमाने से सरल ढंग से समझाते आए थे। इस संबंध को पिछले दिनों चले ‘भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन’ ने पूरी तरह नजरअन्दाज किया था। बल्कि इस आन्दोलन के तमाम प्रणेता इसे सिर्फ नैतिकतावादी मुहिम के रूप में चला कर घोटालों से जुड़े कॉर्पोरेट घरानों और फिक्की जैसे उद्योगपतियों के समूहों को इस बात द्वारा आश्वस्त करते रहे कि आपको लाभ देने वाली नीतियों की चर्चा को हम अपनी मुहिम का हिस्सा नहीं बना रहे हैं ।

सुनील की बताई राह यथास्थितिवाद की राह नहीं है , बुनियादी बदलाव की राह है। सुनील के क्रांति के लिए समर्पित जीवन से हम ताकत और प्रेरणा पाते रहेंगे।

सुनील की स्मृति में कुछ चित्र

दिल्ली विधान सभा चुनाव 2015  के नतीजे  भारत  की अलोकतांत्रिक FPTP चुनाव पद्धति के खतरों को पुष्ट करते हैं. इसमे वोट प्रतिशत  और सीटों की संख्या निम्न लिखित है —
1. आ आ पा –   54.3 %  — 67 सीटें
2.  भा  ज  पा-  32.1 %  — 3   सीटें
3.  कांग्रेस    –   9.8 %   —  0  सीट
4.  ब स पा   –   1.3 %   —  0  सीट
5 . अन्य      –    2.5 %  —  0  सीट

इसकी तुलना में  2013  के दिल्ली चुनाव में यही आंकड़े  निम्न लिखित थे —
1. आ आ पा –   29.5 %  — 28  सीटें
2.  भा  ज  पा-  33.1 %  — 31   सीटें
3.  कांग्रेस    –   24.6 %   —  8  सीटे
4.  ब स पा   –   5.4  %   —   0  सीट
5 . अन्य      –   7.4  %   —   2  सीटे
 ऊपर की तालिका से यह साफ़ है कि आनुपातिक रूप से 2015 में भा ज पा को 21 सीटें, कांग्रेस को 6 सीटें और ब स पा को 1 सीट  और आ आ पा को केवल 38 सीटें  मिलनी चाहिए . दिल्ली के मतदाताओं में भा ज पा की ज़मीन बिलकुल कायम है.
इसी विश्लेषण से 2014 की  लोक सभा में भा ज पा  को 31 % मत से केवल 167 सीटें मिलनी चाहिए थी. उसके आधार पर केंद्र में उसकी अकेले या वर्तमान NDA की  सरकार बन ही नहीं सकती थी. उस हालत में मोदी उन अतिवादी निर्णयों को ले ही नहीं सकते थे, जो उन्होंने पिछले  नौ  महीनो में लिए हैं.
FPTP चुनाव प्रणाली के खतरे साफ़ हैं – वह देश को अलोकतांत्रिक शाषण की ओर ले जाता है – कभी भी तानाशाही का शाषक ला सकता है .  सभी राजनीति से जुड़े लोगों को इन खतरों को समझ कर पूरी ताकत से देश में आनुपातिक प्रतिनिधित्व” (Proportional Representation- PR) लाने के आन्दोलन में लग जाना चाहिए.
आज दुनिया के 80 देश PR के द्वारा अपनी सरकार चुनते हैं, जिनमे जर्मनी सहित यूरोप के दर्जन से ज्यादा देश शामिल हैं.   PR के बारे में ज्यादा जानने के लिए इन links पर खटका मार कर पढ़े.
http://www.cric11.com/ceri/

– चन्द्रभूषण चौधरी , राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ,समाजवादी जनपरिषद
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