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मानव समाज में खेती का स्थान तीन कारणों से महत्वपूर्ण रहा है,रहेगा। (1)पहला कारण वह है जो अधिकांशतः चर्चा में आता है ।तमाम औद्योगिकरण और विकास के बावजूद आज भी मानव जाति का अधिकांश हिस्सा गांवों में रहता है और अपनी जीविका के लिए खेती,पशुपालन आदि पर आश्रित है। भारत समेत दुनिया के अनेक देशों में आज भी रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत खेती व पशुपालन ही है।किंतु खेती का महत्व महज इस सांख्यिकीय कारण से ही नहीं है। दो और ज्यादा महत्वपूर्ण और बुनियादी कारण हैं। (2) दूसरा कारण यह है कि खेती से ही मनुष्य की सबसे बुनियादी जरूरत भोजन की पूर्ति होती है। अभी तक खाद्यानों का कोई औद्योगिक या गैर खेती विकल्प आधुनिक टेक्नोलॉजी नहीं ढूढ पायी है और भविष्य में इसकी संभावना भी नहीं है। इसलिए जब स्वाभिमानी और जागरूक समाज या राष्ट्र खाद्य स्वालंबन की रणनीति बनाते हैं या अंतरष्ट्रीय कूटनीति में खाद्य आपूर्ति को एक औजार बनाया जाता है, तो खेती का महत्व अपने आप स्पष्ट हो जाता है। (3) खेती के साथ एक तीसरी विशेषता यह है कि मनुष्य समाज की आर्थिक गतिविधियों में यहीं ऐसी गतिविधि है, जिसमें वास्तव में उत्पादन और नया सृजन होता है। प्रकृति की मदद से किसान बीज के एक दाने से बीस से तीस दाने तक पैदा कर लेता है।उधोगों, सेवाओं आदि अन्य आर्थिक गतिविधियों में प्रायः कोई नया उत्पादन नहीं होता है,पहले से उत्पादित पदार्थों(जिसे कच्चा माल कहा जाता है)का रूप परिवर्तन होता है।उर्जा या कैलोरी की दृष्टि से भी देखें ,तो जहाँ अन्य आर्थिक गतिविधियों में ऊर्जा की खपत होती है,खेती और पशुपालन में उर्जा(या कैलोरी )का सृजन होता है।खेती में वानिकी और खनन को भी जोड़ा जा सकता है,वे भी प्रकृति से जुड़े हैं, हलाकि एक सीमा से ज्यादा से ज्यादा खनन विनाशकारी हो सकता है। इसमें मार्के की बात प्रकृति का योगदान है।खेती में प्रकृति मानव श्रम के साथ मिलकर वास्तव में सृजन करती है।
इन तीन विशेषताओं के कारण मानव-समाज में खेती आदि का महत्व बना रहेगा।किन्तु आधुनिक सभ्यता और पूँजीवादी समाज में इन तीनों विशेषताओं को नकारने और पलटने की कोशिश हो रही है।ग्लोबीकरण ने इस प्रवृत्ति को और तेज किया है,जिससे नए संकट खड़े हो रहे हैं।खेती की जनई टेक्नोलॉजी इतनी आक्रामक है कि वह प्रकृति से जुड़ी इस गतिविधि को प्रकृति के विरुद्ध खड़ी कर रही,जिससे जल भंडार खाली हो रहें हैं, भूमि का कटाव, बंजरिकरण या दलदलीकरण हो रहा है,अधिकाधिक ऊर्जा की खपत हो रही है, वातावरण में विष घुलते जा रहे हैं और जैविकविविधता का तेजी से ह्रास हो रहा है।खेती में कीटों व रोगों का प्रकोप बढ़ा है,जोखिम बढ़ी है और पैदवार में ठहराव आ गया है। उतनी ही पैदवार के लिए किसान को निरन्तर बढ़ती हुई मात्रा में रसायनिक खाद ,कीटनाशक दवाईयों तथा पानी का इस्तेमाल करना पड़ रहा है।किसान के संकट का एक स्रोत आधुनिक टेक्नोलॉजी है।इसी प्रकार खाद्य आपूर्ति एवं खाद स्वावलम्बन के स्रोतों के बजाय अब खेती को तेजी से पूँजीवादी बाज़ार और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की न मिटने वाली भूख की रणनीति का एक पुर्जा बनाया जा रहा है।भारत जैसे तमाम देशों को यह सिखाया जा रहा है कि उन्हें अपनी जरूरत के अनाज,दालें व खाद्य तेल पैदा करने की जरूरत नहीं है, दुनिया मे जहाँ सस्ता मिलत है वहाँ से ले लें।इसी करण पिछले तीन चार सालों में ही यह हालत आ गई है कि जिस भारत के गोदामों में अनाज रखने की जगह नहीं होती थी, उसे इस वर्ष भारी मात्रा में गेहूं आयात करना पड़ रहा है।खाद्य तेल का आयात तो पहले ही कुल खपत के आधे स्तर पर पहुँच गया है।अफ्रीका के लोग भी पहले अपनी जरूरत का अनाज स्वयं पैदा कर लेते थे।लेकिन यूरोप के गुलामी के दौर में वहाँ की खेती को इस प्रकार बदला व नष्ट किया गया कि अब वहां बारंबार भीषण अकाल पड़ते हैं।
भारत में हरित क्रान्ति की खुशहाली कुछ क्षेत्रों, कुछ वर्गों और कुछ फसलों तक सीमित रही।लेकिन इस सीमित खुशहाली के दिन भी अब लद गए।जिस विश्व बैंक ने अपने पहले नई टेक्नोलॉजी के प्रचार प्रसार के लिए सभी आवश्यक उपादान(उन्नत बीज, रसायनिक खाद, कीटनाशक दवाइयां, सिचाई, बिजली, डीजल, आधुनिक कृषि यंत्र) सरकार द्वारा सस्ते व अनुदानयुक्त देने की सिफारिश की थी, उसी ने रंग बदल दिया।वर्ष 1991 के बाद विश्व बैंक और अंतरष्ट्रीय कोष के निर्देश में भारत सरकार ने अनुदानों को कम करते हुए क्रमशः इन सारे उपक्रमों को महंगा करने के रणनीति अपनाई । दूसरी ओर विश्व व्यापार संगठन के स्थापना के साथ ही खुले आयात की नीति के चलते कृषि उपज के सस्ते आयात ने भारतीय किसानों की कमर तोड़ दी।बढ़ती लागत और कृषि उपज के घटते (या पर्याप्त न बढ़ते) दामों के दोमों के दोनों पाटो के बीच भारतीय किसान बुरी तरह पिसने लगे। खेती घाटे का धंधा पहले से था,लेकिन अब यह घाटा तेजी से बढ़ने लगा और किसान कर्ज में डूबने लगे।संकट इतना गहरा हो गया कि किसान देश के कई हिस्से में और कोई चारा न देख बड़ी संख्या में आत्म हत्या करने लगे पिछले छ सात वर्षों से किसानों की आत्म हत्या का दौर लगातार जारी है।यह एक अभूतपूर्व स्थिति है जो जबरदस्त संकट का घोतक है।किन्तु इससे अप्रभावित भारत की सरकारें ग्लोबीकरण प्रणीत सुधारों की राह पर आगे बढ़ती जा रही हैं।भारत के छोटे और मध्यम किसान या तो आत्म हत्या कर लें या उनकी जमीने नीलाम हो जाय या वे स्वंय जमीन बेचने को मजबूर हो जाय, यह सुधारों का एक अघोषित एजेंडा है,क्यों कि जमीन कुछ लोगों के हाथों में केंद्रित हो जाय, जमीन की जोट बढ़ जाय और कम्पनियों के सीधे या अप्रत्यक्ष नियंत्रण में आ जाय-यह कथित सुधरों का एक लक्ष्य है। इन्हीं सुधारों के अंतर्गत जमीन की हदबन्दी के कानून शिथिल किया जा रहा है,नए बीज कानून और पेटेंट कानून बनाए जा रहे हैं,जमीन की खरीद फरोख्त से लेकर बीज आपूर्ति,कंट्रैक्ट खेती, विपणन आदि खेती की सभी गतिविधियों में विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को खुली छूट दी जा रही है और सारी चिंताओ और चेतावनियों को ताख पर रखकर जीन समिश्रन खेती की अनुमति दी जा रही है।इस प्रकार खेती को कम्पनीयों के हाथ में सौपने तथा खेती से जुड़ी आबादी को भी कम करने का एक बर्बर अमानवीय अभियान चल रहा है।किंतु एक अहम सवाल इस अंधी दौड़ में भुला दिया जा रहा है।यूरोप-अमेरिका में जब खेती से आबादी को विस्थापित किया गया तो वह औद्योगिक क्रांति और गोरे लोगों द्वारा दुनिया के विशाल भूभाग पर कब्जे की प्रक्रिया में खप गई।लेकिन भारत जैसे देश में खेती में लगी आबादी कहाँ जायगी ?क्या भारत के उधोगों में और शहरों में उनके खपाने की क्षमता है?क्या देश में बेरोजगारी पहले से चरम सीमा पर पहुँच नहीं गई है?
संक्षेप में,भारतीय खेती के संकट के तीन आयाम हैं: (1) आधुनिक पूंजीवादी विकास में खेती को एक आंतरिक उपनिवेश के रूप में पूँजी निर्माण का स्रोत बनाना (2) हरित क्रांति के भ्रामक नाम से एक अनुपयुक्त,साम्रज्यवादी ,किसान विरोधी व प्रकृतिक-विरोधी टेक्नोलॉजी थोपना और (3) ग्लोबीकरण के तहत किसानों पर हमले तथा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के कब्जे की प्रक्रिया को और तेज करना।कहने की जरूरत नहीं है कि ये तीनों आयाम एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और एक बड़ी प्रक्रिया के हिस्से हैं।
भारतीय खेती पर बढ़ते इस संकट ने पिछले तीन दशकों में अनेक सशक्त किसान आंदोलनों को जन्म दिया। तमिलनाडु, कर्नाटक ,महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा आदि राज्यों में लाखों की संख्या में किसान अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर निकले।बाद में उड़ीसा,राजस्थान आदि प्रान्तों में भी किसानों के शसक्त आंदोलन उभरे।ये आंदोलन ज्यादातर मुख्य धारा के राजनीति दलों के बाहर, अलग एवं स्वतंत्र रहे।किसान आंदोलन ही नहीं ,इस अवधि के सभी जनांदोलन प्रमुख राजनीतिक दलों के दायरे से बाहर रहे,जिससे जाहिर होता है कि ये दल आम जनता से कटते गए और उनकी समस्याओं के संदर्भ में अप्रसांगिक बन गए। कहने को ज्यादातर मुख्यधारा राजनीतिक पार्टियों के किसान प्रकोष्ठ या मंत्र हैं, लेकिन उन्होंने कभी भी पार्टी तंत्र से बाहर आकर किसान हित मे आंदोलन नहीं किया।
किशन पटनायक इस काल के भारत के प्रमुख समाजवादी चिन्तक और कर्मी रहे हैं। भारतीय राजनीति में जनांदोलनों की बढ़ती भूमिका को उन्होंने बहुत पहले पहचाना ,समझा, उनसे एक रिश्ता बनाया और उन्हें एक वैचारिक दिशा देने की कोशिश की।किसान आंदोलन के वे प्रबल समर्थक रहे।व्यवस्था परिवर्तन की किसी भी प्रक्रिया में वे किसान और किसान आंदोलनों की महत्वपूर्ण भूमिका मानते थे।वे किसान आंदोलन के इस पूरे दौर के भगीदार ,गवाह, नजदीक के पर्वेक्षक तथा हस्तक्षेप करने के इक्छुक रहे।इस प्रक्रिया में उन्होंने समय-समय पर लेख लिखे, भाषण दिए और टिप्पणियां कीं। उनमें प्रमुख लेखों एवं भाषणों का संकलन इस पुस्तक में किया गया है। इनसे हमें भारत के किसान आंदोलन के बारे में महत्वपूर्ण जानकारियां, अंतरदृष्टि और समझ मिलती है। पुस्तक के पहले खण्ड में भारत का किसान आंदोलन के क्रम में महत्वपूर्ण घटनाओं की एक झांकी मिलती है।दक्षिण के किसान आंदोलन पर तो हिंदी में जानकारी दुर्लभ है। वोट क्लब की ऐतिहासिक रैली में टिकैत-शरद जोशी का झगड़ा भारत के किसान आंदोलन के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ था। इस प्रसंग पर भी किशन पटनायक का एक महत्वपूर्ण लेख है, जिसमें किसान आंदोलन की प्रमुख कमजोरियों को भी इंगित किया गया है। दूसरे खण्ड के लिखों से किसान आंदोलन की वैचारिक दृष्टि ,रणनीति और राजनीति के बारे में सम्यक विश्लेषक मिलता है, जो भावी किसान आंदोलन के लिये भी काफी मददगार हो सकता है,वैसे भी, भारत के किसान आंदोलन पर अच्छी पुस्तकें नहीं के बराबर हैं।डॉ ईश्वरी प्रसाद द्वारा संपादित एक पुस्तक ‘भारत के किसान ‘दस वर्ष पहले प्रकाशित हुई थी,वह भी अप्राप्य है।यानी किशन पटनायक की यह शिकायत सही है कि भारत के बौद्धिक वर्ग ने किसान आंदोलन को गंभीरता से नहीं लिया है। इस दृष्टि से भी किशन पटनायक की यह पुस्कट एक महत्वपूर्ण अभाव को पूरा करती है।
अस्सी और नब्बे के दशक में भारत में बड़े-बड़े किसान आंदोलन हुए।किसानों के बड़े-बड़े धरने और रैलियां ह
हुईं, जिनमें लाखों किसानों ने भाग लिया। किसानों का शोषण, कृषि उपज का उचित दाम न मिलना,किसानों पर बढ़ता कर्ज, किसानों पर बढ़ते हुए शुल्क, बिजली के बढ़ते बिल आदि उनके प्रमुख मुद्दे थे।लेकिन इतने सख्त आन्दोलनों के बावजूद आजाद भारत के किसान की क्या स्थिति है?किसान आन्दोलनों की जो प्रमुख मांगे थीं, वे पूरी होना तो दूर हालत उल्टी होती गई,किसान की दुर्गती बढ़ती गई।ग्लोबिकरण कि नीतियों ने उसे बड़ी संख्या में आत्म हत्याओं के कगार पर पहुँचा दिया। किसान आंदोलनों की तीव्रता भी धीरे-धीरे कम होती गई। वे ठंठे हो गये,कमजोर हो गए या बिखरते चले गए।ऐसा क्यों हुआ, इसके तटस्थ मूल्यांकन का समय आ गया है।
आम तौर पर किसी आंदोलन की असफलता के लिए इसके नेतृत्व तथा कुछ व्यक्तियों को दोषी ठहरा दिया जाता है लेकिन यह सरलीकरण और सतही विश्लेषण ही होता है गहराई से देखें तो इसके दो प्रमुख कारण थे। एक तो, किसान आंदोलनों में आम तौर पर व्यापक वैचारिक परिप्रेक्ष्य, दिशा और समझ का अभाव रहा।वे अपनी तत्तकालीन संकीर्ण मांगों में ही उलझे रहे।किसानों की स्थिति और किसानों के शोषण की ऐतिहासिक रूप से पड़ताल करते हुए गहराई से विशलेषण करने की जरूरत उन्होंने नहीं समझी।ऐसा विश्लेषण उन्हें इस अनिवार्य नतीजे पर पहुचाता की पूरी व्यवस्था को बदले वगैर किसानों की मुक्ति सम्भव नहीं है।इससे किसान आंदोलनों का चरित्र ज्यादा क्रांतिकारी बनता, दूसरा किसानों की मांगों को पूरा करने के लिए सरकारी नीतियों को बदलने और सत्ता को प्रभावित करने की संयुक्त रणनीति तथा योजना उन्होंने नहीं बनाई। यदि वे ऐसा करते, एक तो उन्हें देश के समस्त किसान आन्दोलनों को एकजूट करने की जरूरत का ज्यादा तीव्रता से अहसास होता। दूसरे, देश के अन्य शोषित और वंचित तबकों के आन्दोलनों के साथ एकता बनाने की जरूरत महसूस होती। साथ ही,किसानों की और शोषितों की एक अलग राजनीति खड़ी करने की दिशा में वे कदम बढ़ाते। यदि सरकारें बार-बार किसान विरोधी नीतियां अपना रही हैं, तथा दल परिवर्तन से सरकार की नीतियों में कोई फर्क नहीं आ रहा है,तो वे स्वयं किसान पक्षी राजनीतिक ताकत खड़ी करने के बराबर में गंभीरता से सोचते।किशन पटनायक ने इन दोनों आवश्यकताओं को अपने लेखन एवं भाषणों में बार-बार,अलग-अलग तरीकों से,अलग अलग रूपों में,प्रतिपादित किया है।
इस अर्थ में किसान आंदोलन एवं किसान संगठन राजीनीति से परे या अराजनीतिक नहीं रह सकते वे मौजूदा भ्रष्ट ,अवसरवादी,यथास्थितिवादी, निहित स्वार्थों वाले राजनीतिक दलों से अलग रहें, यह तो ठीक है।लेकिन उन्हें अपनी राजनीति बनानी पड़ेगी,नहीं तो ये ही दल उनका इस्तेमाल चुनाव में तथा अन्ययत्र अपनी ओछी व टुच्ची राजनीति के लिए करते रहेंगे। चुकी किसानों के स्वार्थ इस व्यवस्था के दूसरे समूहों के स्वार्थ से टकराते हैं, इसलिए किसान आंदोलन को अपनी राजनीति व रणनीति गढ़ना होगा।
किसान आंदोलन संकीर्ण भी नहीं हो सकता।वह एक ट्रैड यूनियन की तरह नहीं चलाया जा सकता, इस बात को भी किशन पटनायक ने रेखांकित किया है।।संगठित मजदूरों का आंदोलन संकीर्ण हो सकता है! एक फ़ैक्टरी के मजदूरों का वेतन मौजूदा व्यवस्था के अन्दर बढ़ सकता है ;व्यवस्था परिवर्तन के वगैर वह सम्भव है।लेकिन किसानों की आमदनी मौजूदा व्यवस्था में नहीं बढ़ सकती।इसका कारण न केवल यह है कि किसानों का तादाद बहुत ज्याद है और वे देश के आबादी का खास एवं सबसे बड़ा हिस्सा हैं। बल्कि यह भी है कि किसानों और गांव खेती के शोषण पर यह पूरी व्यवस्था टिकी है।इसलिए किसान आंदोलन को अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए परिवर्तनवादी और क्रांतिकारी बनना ही पड़ेगा।
वैसे तो, मानव इतिहास की सारी नगरी सभ्यताएं व बड़े-बड़े साम्रज्य किसानों के शोषण पर ही आधारित थे बड़े-बड़े मंदिर, राजाओं और सामंतों के महल, उनकी ऐयासी, सेनाएं ,युद्ध सबका बोझा अंततः किसान ही उठाते थे।ज्यादा लगान व अत्याचार जब बर्दाश्त से बाहर हो जाते थे, तो कभी-कभी किसान विद्रोह भी होते, किन्तु ये विद्रोह तत्कालीन और स्थानीय होते थे। वे या तो दबा दिए जाते या कुछ राहत मिलने पर शांत हो जाते थे। औद्योगिक पूंजीवाद के साथ ही किसानों के शोषण ने पहली बार सार्वदेशिक तथा विकराल रूप धारण किया है।
18 वीं शताब्दि से यूरोप में औद्योगिक क्रांति के साथ जिस पूंजीवाद का विकास हुआ है,उसमें औपनिवेशिक शोषण अंतर निहित और अनिवार्य पूंजीनिर्माण के लिए अतिरिक्त मूल्य का स्रोत सिर्फ फैक्ट्री मजदूरों का शोषण नहीं है, बल्कि दुनिया के उपनिवेशों के किसानों और मजदूरों का शोषण है, इसे रोजा लग्जमबर्ग और राममनोहर लोहिया ने अच्छी तरह समझाया है।उपनिवेशों के आजाद होने के बाद यह शोषण नव औपनिवेशिक तरीकों से जारी रहा है।देश के बाहर के उपनिवेशों या नव उपनिवेशों के शोषण मौक़ा नहीं मिलने पर पूंजीवाद देश के अंदर उपनिवेश खोजता है। सचिदानंद सिन्हा तथा किशन पटनायक ने इसे ‘आंतरिक उपनिवेश ‘ का नाम दिया है।पिछड़े और आदिवासी इलाके भी आंतरिक उपनिवेश हो सकते हैं लेकिन गांव और खेती भी एक प्रकार के आंतरिक उपनिवेश हैं।गांव और खेती में पैदा होने वाली चीजों के दाम कम रखकर, गांव के उधोग खत्म करके उन्हें कारखनिया माल का बाजार बनाकर गांव में विशाल बेरोजगारी एव कंगाली पैदा करके उधोग के लिये सस्ता श्रम जुटाकर ,तथा गांव और खेती को तमाम तरह की सुविधाओं व विकास से वंचित रखकर ही औद्योगिकरण तथा पूँजीवादी विकास संभव होता है और हुआ है। इसलिए आधुनिक पूँजीवादी औद्योगिक विकास में गांव खेती का शोषण अनिवार्य है।किसान मुक्ति के किसी भी आंदोलन को अंततः इस’ विकास ‘ और इस पर आधारित आधुनिक सभ्यता पर सवाल खड़े करने होंगे तथा इसके खिलाफ बगावत करनी होगी।इस वैचारिक परिप्रेक्ष्य के अभाव में किसान आंदोलन आगे नहीं बढ़ पाएंगे, दिशाहीन होकर ठहराव के शिकार हो जायेगें।
भारत का ही उदाहरण ले। जवाहरलाल नेहरु के प्रधानमंत्री रहते अर्थशास्त्री एवं संख्यकीविद प्रशांत चंद्र महालनोबिस ने दूसरी पंचवर्षीय योजना से देश में भारी उधोगों के विकास की जो योजना बनाई।वह खेती गांवो को शोषित वंचित रखने की रणनीति पर ही आधारित थी। सरकारी और निजी क्षेत्र ,दोनों में औद्योगिकरण को बल देने के लिये सस्ता कच्चा माल और सस्ता श्रम मिले, मजदूरों को अधिक मजदूरी न देनी पड़े इसके लिए खाद्यानों के दाम भी कम रखे जाये–यह महालनोबिस मॉडल में अंतरनिहित था।नतीजा यह हुआ की भारत के जिन किसानों ने आजादी के आंदोलन में बढ़ चढ़ कर भाग लिया तथा जो इस आंदोलन के मुख्य आधार थे,वे शोषित वंचित बने रहे तथा कंगाली और बदहाली से आजाद नहीं हो पाए।ऐसे ही धोखा सोवियत क्रांति के बाद वहाँ के किसानों के साथ हुआ।जब स्तालिन के नेतृत्व में सामूहिक फार्म बनाने के लिए किसानों से जबर्दस्ती जमीन छीन ली गई और विरोध करने वाले असंख्य किसानों को मौत के घाट उतार दिया गया।गांव और किसान को वंचित रखके ही भारी औधोगीकरण, सेना एवं शस्त्र निर्माण तथा अन्तरीक्ष अभियान का कार्यक्रम सोवियत संघ में चलता रहा। चीनी क्रांति तो मुख्यतः किसानों की ही क्रांति थी। इसने चीन में साम्यवाद को एक नया और खाटी देशी रूप दिया।लेकिन औद्योगिक विकास का वही पूँजीवादी विचार ही हावी होने के कारण अंततः चीन भी तेजी से पूँजीवादी ग्लोबीकरण की राह पर जा रहा है।वहाँ भी बहुत तेजी से एवं बहुत बड़े पैमाने पर किसानों और गांवों को कंगाली, बेरोजगारी, बदहाली और विस्थापन का शिकार होना पड़ रहा है।
कुल मिलाकर,किसानों की मुक्ति के लिए आधुनिक औद्योगिक सभ्यता से मुक्ति होगा और एक गांव केंद्रित, विकेन्द्रित, नई सभ्यता की तलाश करना होगा।किशन पटनायक की विशेषता यह है कि वे सिर्फ किसान संगठन के विविध आयामों की ही पड़ताल नहीं करते और मौजूदा व्यवस्था की महज आलोचना ही नहीं करते, विकल्प व समाधान भी खोजते चलते हैं। किसान विद्रोह का घोषणा पत्र और किसान राजनीति के सूत्र नामक लेखों में वे किसानों की दृष्टि से भावी समाज की रचना के कुछ सूत्र भी पेश करते हैं।तारतम्य में वे पूंजीवाद के एक गैर मार्क्सवादी विकल्प की तलाश का आह्वान करते हैं ,क्योंकि मार्क्सवाद उस उत्पादन प्रणाली से बहुत ज्यादा जुड़ा है, जिसमें कृषि व किसानों का शोषण निहित है।
विचारों के स्तर पर पुरानी मान्यताओं व पुराने ढांचे को खंडित करने और नए विकल्पों की तलाश करने का काम किसान आंदोलन के नेतृत्व को करना होगा और जागरूक बुद्धजीवियों को करना होगा।इस मामले में भारत के बुद्धिजीवियों और शास्त्रों की कमियां तथा असफलता किशन पटनायक को काफी कचोटती हैं।उनकी विसंगतियों और अपनी पीड़ा को किशन पटनायक ने ‘कृषक क्रांति’ और शास्त्रों का अधूरापन नामक लेख में व्यक्त किया है।
जब हम ‘किसान’ की बात करते हैं, तो उससे क्या आशय है?किसान की परिभाषा में खेत में काम करने वाला मजदूर शामिल है या नहीं है ? भूमि के मालिक किसान और भूमिहीन मजदूर के हित भिन्न एवं परस्पर विरोधी हैं या उनमें कोई एकता हो सकती है? ये प्रश्न किसान आंदोलन के संदर्भ में बार-बार सामने आते हैं।किशन पटनायक का मानना है कि किसान और खेतिहर मजदूर द्वन्द तो है,लेकिन यह बुनियादी द्वंद नहीं है।जो किसान आंदोलन नव औपनिवेशिक शोषण और आंतरिक उपनिवेश के वैचारिक परिप्रेक्ष्य में चीजों को देखेगा, वह उससे संघर्ष के लिए खेतिहर मजदूरों को अपने साथ लेने का प्रयास करेगा।यदि किसान और खेतिहर मजदूर एक हो गए ,तो बड़ी ताकत पैदा होगी,जो पूंजीवाद, साम्रज्यवाद, ग्लोबीकरण और साम्प्रदायिकता का मुकाबला कर सकेगी।पुस्तक के अंतिम दो लेखों में किशन पटनायक ने इस प्रश्न को सुंदर तरीके से संबोधित किया है।
अस्सी के दशक के अंत में भारत में किसान आंदोलन अपने शिखर पर था।कर्नाटक में प्रो. एम. डी. नंजुदास्वामी के नेतृत्व में, महाराष्ट्र के शरद जोशी के नेतृत्व में और पश्चिमी उत्तर प्रदेश ,हरियाणा, पंजाब में महेंद्र सिंह टिकैट के नेतृत्व में किसान आंदोलन की एक जबरदस्त लहर चल रही थी।इन आंदोलनों की एकता और समन्वित कार्यवाही देश इतिहास को एक नया मोड़ दे सकती थी।लेकिन यह ऐतिहासिक मौका हाथ से चला गया। 2 अक्टूबर 1989 को दिल्ली की वोट क्लब की विशाल रैली में मंच पर हुए विवाद की घटना मानो एक संकेत थी। इसके बाद से किसान आंदोलनों का ज्वार उतरने लगा।ऐसा क्यों हुआ ,इसको जानने के लिए जिज्ञासु अध्येताओं को इन आंदोलनों की पृष्ठभूमि ,उनके सामाजिक आधार ,नेतृत्व, विचारधारा ,घटनाओं और परिस्थितियों का विस्तार से अध्ययन करना पड़ेगा। उन्हें किशन पटनायक के इस पुस्तक से मद्दद और महत्वपूर्ण संकेत मिलेंगे।
इस संदर्भ में एक प्रसंग का जिक्र करना मौजू होगा।संभवत वोट क्लब रैली के पिछले वर्ष की बात होगी,जब किसान संगठनों की अंतरराज्यीय समन्वय समिति का गठन हो गया था।इस समिति की बैठक नागपुर में हुई, जिसमें महाराष्ट्र, कर्नाटक ,गुजरात, पंजाब, हरियाणा, उड़ीसा, मध्यप्रदेश आदि के प्रतिधिनि मौजूद थे, किन्तु बैठक नागपुर में होने के कारण महाराष्ट्र के प्रतिनिधि ज्यादा थे।इस बैठकर में कुछ प्रतिनिधियों के द्वारा शेतकरी संघटना द्वारा अनाज व कपास की खेती छोड़कर किसानों को यूकेलिप्टस की खेती करने का आह्वान पर सवाल उठाए गए।किशन पटनायक भी इस बैठक में मौजूद थे। उन्होंने कहा कि किसान चुकी देश का सबसे बड़ा तबका है, उसका स्वार्थ देश से अलग नहीं हो सकता।उसे देश के स्वार्थ के बारे में भी सोचना पड़ेगा।किशन पटनायक ने यह भी कहा कि किसानों के बेहतरी के लिए सिर्फ कृषि उपज के ज्यादा दाम मांगने से बात नहीं बनेगी।औधोगिक दामों पर नियंत्रण की मांग करनी पड़ेगी।इसका मतलब है कि पूरी व्यवस्था को बदलने की बात सोचनी पड़ेगी। एक समग्र नीति बनानी पड़ेगी। किसानों के नजरीय से विकास नीति कैसी हो ,उधोग नीति कैसी हो, शिक्षा नीति कैसी हो, प्रशासन व्यवस्था कैसी हो-सबकी रूप रेखा बनानी पड़ेगी और सबके बारे में सोचना पड़ेगा।किन्तु शरद जोशी और उनके जिंसधारी सिपहसलारों ने किशन पटनायक की बात बिलकुल नहीं चलनी दी।उनका कहना था कि कृषि उपज का दाम ही सब कुछ है।किसानों का सही दाम मिलने लगे, तो सब ठीक हो जाएगा। किशन पटनायक के विचारों पर आगे चर्चा व बहस भी बैठक में नहीं होने दी गई।काश ! यदि किशन पटनायक की बात पर किसान आंदोलनों के नेताओं ने गौर किया होता और अपने आन्दोलनों को उस दिशा में ढाला होता तो, न केवल किसान आंदोलनों का,बल्कि देश का इतिहास भी कुछ दूसरा हो सकता था। किन्तु आगे की प्रवृत्तियों के लक्षण यहीं दिखने लगे थे।शरद जोशी के बाद ग्लोबीकरण, उदारीकरण और बाजारवाद के पक्के समर्थक साबित हुए।इसलिए शायद वे उस बैठक में बहस से बचना चाहते थे।शरद जोशी ने किसानों को सब्जबाग दिखाए की मुक्त व्यापार नीतियों से उनके उपज का निर्यात बढ़ेगा और उन्हें आकर्षक दाम मिलेंगे।लेकिन हुआ ठीक उल्टा।कृषि उपज का आयात बढ़ा तथा घरेलू मंडियों में भी दाम गिर गए। शरद जोशी तो उन्नति करते हुए राज्य सभा सदस्य बन गए और ‘कृषि लागत एवं मूल्य आयोग’ के अध्यक्ष बन गए, किन्तु महाराष्ट्र के किसान आत्महत्याओं की कगार पर पहुँच गए। अंतरराष्ट्रीय बाजार आखिरकार शरद जोशी की सदिच्छाओं से काम नहीं करता, ताकतवर पश्चिमी देशों, उनके विशाल अनुदानों और उनकी विशाल बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के स्वार्थो के मुताबिक काम करता है।किसान आन्दोलनों के लिए यह एक महत्वपूर्ण सबक है।
किशन पटनायक आज हमारे बीच में नहीं हैं। किन्तु उनके विचारों और विश्लेषण से किसान आंदोलन को एक नई दिशा मिल सकेगी, साथ ही परिवर्तन चाहने वाले सभी व्यक्तियों व समूहों की समझ भी समृद्ध होगी, इसी आशा और विश्वास के साथ यह छोटी-सी पुस्तक पाठकों की सेवा में पेश है।

सुनील

7 जून 2006

अडाणी एग्री लॉजिस्टिक्स लिमिटेड (AAL) और भारतीय खाद्य निगम (FCI) का 30 वर्षों का भाडा चुकाने के आश्वासन का समझौता बरसों पहले हो चुका है। फिलहाल अडाणी की कंपनी भारतीय खाद्य निगम के लिए पंजाब हरयाणा,तमिलनाडु,कर्नाटक,महाराष्ट्र तथा पश्चिम बंग में 5लाख 75 हजार टन खाद्यान्न को सेवा प्रदान करती है।इसके अतिरिक्त मध्य प्रदेश सरकार के लिए यह कंपनी 3 लाख टन संभालती है।इस कंपनी का दावा है कि आने वाले दिनों में बिहार,उत्तर प्रदेश,पंजाब,हरयाणा,महाराष्ट्र तथा गुजरात में 4,000,00 अतिरिक्त खाद्यान्न संभालेगी।खाद्यान्न की मालिक फिलहाल भारतीय खाद्य निगम है।खेती संबंधित नये कानूनों के तहत खाद्यान्न ‘अनिवार्य वस्तु’ नहीं रह गए हैं तथा इनकी जमाखोरी पर से अंकुश हटा दिया गया है।

सिर्फ गेहूं के लिए AAL और FCI के बीच देश भर से गेहूं जुटाने का जो समझौता है उसके तहत अडाणी ने 7 बेस (आधार) और फील्ड (क्षेत्रीय) डीपो बनाए हैं।इन भंडारों से अडाणी के अपने रेल मालवाहक डिब्बे जुड़े हुए हैं।कंपनी ने देश को दो सर्किट में बांटा है,इनकी क्षमता भी नीचे दी जा रही है-

सर्किट 1

बेस डिपो भंडारण क्षमता (मेट्रिक टन)

मोगा (पंजाब) 2000,000

फील्ड डिपो भंडारण क्षमता (मेट्रिक टन)

चेन्नै 25,000

कोयंबटूर 25,000

बंगलुरु 25,000

सर्किट 2

बेस डिपो भंडारण क्षमता (मेट्रिक टन)

कैथल (हरयाणा) 2000,000

फील्ड डिपो भंडारण क्षमता (मेट्रिक टन)

नवी मुंबई (महाराष्ट्र) 50,000

हुगली 25,000

दोनों बेस डिपो में इकट्ठा गेहूं देश भर में जिन इलाकों में गेहूं की कमी है उन इलाकों में बनाए गए फील्ड डिपो में पहुंचाया जाता है।

डॉ. स्वाति का गैरबराबरी और अन्याय के खिलाफ़ जुझारू जज़्बा हमेशा आह्वान देता रहेगा!

समाजवादी जन परिषद (सजप) की उपाध्यक्ष और अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच (अभाशिअमं) के सचिव-मंडल की समाजवादी जन परिषद (सजप) की उपाध्यक्ष और अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच (अभाशिअमं) के सचिव-मंडल की सदस्य डॉ. स्वाति का 2 मई 2020 को शाम 8:30 बजे वाराणसी के बीएचयू अस्पताल में निधन हो गया। गुर्दों को बुरी तरह नाकाम करने वाली बहुत ही कम होने वाली मल्टिपल माईलोमा नामक प्लाज़्मा कोशिकाओं की कैंसर की बीमारी से बहादुरी से जूझते हुए उनकी साँस छूटी। तक़रीबन एक साल तक के इस तकलीफ़देह दौर में उन्हीं की तरह अरसे से जाने-माने समाजवादी नेता, उनके पति अफ़लातून, कई अस्पतालों में उनकी आखिरी साँसों तक हर पल उनके संग जुड़े रहे।

शिक्षा और विज्ञान-कार्य
21 अप्रैल 1948 को ग्वालियर, मध्य प्रदेश के बंगाली परिवार में जन्मी डॉ. स्वाति ने 1967 में कमला राजा गर्ल्स स्नातकोत्तर कॉलेज, ग्वालियर से स्वर्णपदक के साथ बीएससी (फिज़िक्स) पास की। 1969 में उन्होंने मुंबई के आईआईटी-बॉम्बे से फिज़िक्स में एमएससी पूरी की और 1974-75 में अमरीका के यूनिवर्सिटी ऑफ़ पिट्सबर्ग से एटॉमिक फिज़िक्स में पीएचडी की। पश्चिम के विश्वविद्यालयों से पीएचडी करने वाले अपने समकालीन ज़्यादातर युवा हिंदुस्तानियों से अलग डॉ. स्वाति अपने मुल्क वापस लौटकर समाजवादी समाज बनाने के लिए अवाम की जद्दोजहद में शामिल होने को बेचैन थीं।
अमरीका के लुभावने अध्यापन और शोध के मौके छोड़कर, पीएचडी के बाद ही वे भारत लौट आईं और कुछ वक्त तक रुड़की विश्वविद्यालय में पढ़ाती रहीं। 1979 में डॉ. स्वाति की नियुक्ति फिज़िक्स में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के महिला महाविद्यालय में हो गई। यहाँ वे 30 सालों से भी ज़्यादा अरसे तक अध्यापन और शोध का काम करती रहीं और 2013 में असोशिएट प्रोफ़ेसर के पद पर रिटायर हुईं।
1990 के दशक के शुरूआती सालों से ही डॉ. स्वाति ज़मीनी सामाजिक-राजनीतिक काम में पूरी संजीदगी से सक्रिय रहीं, लेकिन उन्होंने विज्ञान के प्रति अपना लगाव नहीं छोड़ा और 2005 में बायोइन्फ़ॉर्मेटिक्स के बिल्कुल नए क्षेत्र में शोध करना शुरू किया। अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में 35 शोध परचे प्रकाशित करने के अलावा बीएचयू में बायोइन्फॉर्मेटिक्स का विभाग शुरू करने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कई पीएचडी छात्रों को तैयार किया, जिन्होंने आगे चल कर शोध में नाम कमाया। सजप और अभाशिअमं दोनों संगठनों में वरिष्ठ पदाधिकारी की दोहरी ज़िम्मेदारियां संभालने के बावजूद सूक्ष्मजीवियों के आरएनए में संरचनात्मक बदलावों पर उनका एक परचा अभी पिछले साल ही प्रकाशित हुआ है। वे जेएनयू और आईआईआईटी हैदराबाद में विज़िटिंग प्रोफेसर भी रहीं।

सियासी सफर
गौरतलब है कि डॉ. स्वाति जब अमेरिका से लौटी थीं, वह आपातकाल के बाद का सियासी सरगर्मियों का वक्त था। वे जल्द ही उस दौर के सक्रिय समाजवादी आंदोलन के संपर्क में आईं। जब 1980 में उत्पीड़ित वर्गों और जातियों का ज़मीनी आंदोलन खड़ा करने के लिए किशन पटनायक, भाई वैद्य, जुगल किशोर रायबीर, सच्चिदानंद सिन्हा जैसे नेता और कई छात्र कार्यकर्ता जुटे, तो समता संगठन नामक उस समूह के संस्थापक सदस्यों में डॉ. स्वाति शामिल थीं। इस गुट के सदस्य बतौर उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों में खास तौर पर आदिवासियों, दलितों, किसानों और मजदूरों के साथ काम किया। जब सुनील और राजनारायण जैसे ज़मीनी नेताओं को होशंगाबाद (मध्य प्रदेश) जेल में भेजा गया तो उन्होंने गाँव-गाँव जाकर लोगों को एकजुट करने के लिए विश्वविद्यालय की नौकरी से लंबी छुट्टी ले ली।
वाराणसी में आंदोलन को ज़रूरी स्त्रीवादी मोड़ देते हुए उन्होंने ’नारी एकता मंच’ का गठन करने में भूमिका निभाई, जिसमें सभी वर्गों और जातियों से स्त्रियाँ शामिल हुईं और स्त्री क़ैदी, घरेलू हिंसा, दहेज पीड़ित व स्त्रियों के दीगर मुद्दों को लेकर आवाज़ उठाई गई। समाजवादी अध्यापक गुट के सदस्य के रूप में वे विश्वविद्यालय के स्तर पर आंदोलनों में शरीक रहीं और बीएचयू के अध्यापक संगठन की उपाध्यक्ष चुनी गईं। वाराणसी के सुंदर बगिया इलाके के विपन्न बच्चों को पढ़ाने के लिए भी उन्होंने वक्त निकाला।
जब 1995 में समता संगठन और दूसरे संगठनों ने मिलकर आर्थिक विकेंद्रीकरण, वैकल्पिक समाजवादी विकास का मॉडल और समतामूलक समाज बनाने के लिए प्रतिबद्ध राजनीतिक दल, समाजवादी जन परिषद (सजप) बनाया, तो डॉ. स्वाति पार्टी के सचिव-मंडल की सदस्य बनीं और राज्य तथा राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर अहम शख़्सियत बतौर काम करती रहीं। लगातार अध्ययन और चिंतन में जुटी रहकर उन्होंने राजनीति में स्त्रियों के मुद्दों पर सवाल उठाए और इस पर पार्टी के मुखपत्रों, सामयिक वार्ता और समता इरा, में लेख लिखे। देश में चल रहे जनविज्ञान आंदोलनों में भी उनकी बड़ी भागीदारी थी। मुनाफ़ाखोरी, ज़ुल्म और गुलामगिरी बढ़ाने के पूँजीवादी हथकंडों में इस्तेमाल होने के बजाए विज्ञान की जनता की भलाई के लिए क्या भूमिका हो सकती है, इस सवाल पर उनकी गहरी समझ थी।
दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद डॉ. स्वाति ने अपनी काफ़ी ऊर्जा सांप्रदायिक विभाजनकारी ताकतों का प्रतिरोध करने में लगाई।

शिक्षा आंदोलन में योगदान
2009 में अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच (अभाशिअमं) के संस्थापक सदस्य-संगठनों में समाजवादी जन परिषद (सजप) शामिल था। हालाँकि शुरूआती दौर में अभाशिअमं के अध्यक्ष मंडल में सजप के प्रतिनिधि, जेएनयू से पढ़े और आदिवासियों व विपन्न तबकों के साथ काम कर रहे, श्री सुनील थे, डॉ. स्वाति ने अभाशिअमं के कार्यक्रमों, खास तौर पर 2010 में संसद मार्च व प्रदर्शन के लिए कई राज्यों से लोगों को लामबंद करने में अहम भूमिका निभाई। अप्रैल 2014 में सुनील के असमय निधन के बाद अभाशिअमं ने डॉ. स्वाति और अफ़लातून जी, दोनों को सजप के प्रतिनिधि बतौर राष्ट्रीय कार्यकारिणी में आने का न्यौता दिया। फरवरी 2018 में डॉ. स्वाति अभाशिअमं के सचिव-मंडल में आ गईं। तब से वे सचिव मंडल का स्तंभ बनी रहीं हैं और उन्होंने हर प्रस्तावित कार्ययोजना और फ़ैसले को अपने आलोचनात्मक नज़रिए से बेहतर बनाया।
डॉ. स्वाति की दूरदर्शिता और जनाधार को लामबंद करने की उनकी नेतृत्व क्षमता की वजह से ’केजी से पीजी’ तक बराबरी और सामाजिक न्याय-आधारित समान शिक्षा व्यवस्था और पूरी तौरपर मुफ़्त शिक्षा के अभाशिअमं के देशव्यापी आंदोलन के नए आयाम उभरे हैं। उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों में सजप की इकाइयों को अपने-अपने इलाकों में अभाशिअमं की मुख्य माँग यानी ‘केजी से बारहवीं कक्षा तक ’समान स्कूल व्यवस्था’ के समर्थन में आगे बढ़ने को तैयार किया है। लगातार हुए दो घटना-क्रमों ने डॉ० स्वाति के सचिव मंडल में आने से पहले ही शिक्षा आंदोलन में उनकी बढ़ती हुई भूमिका को निखरने में मदद दी। पहली, यह कि भारत सरकार द्वारा डब्ल्यूटीओ–गैट्स (WTO-GATS) को उच्च शिक्षा का मुद्दा खैरात दिए जाने की पहलकदमी वापस लेने के लिए अगस्त, 2015 में अभाशिअमं ने देशव्यापी जन-आंदोलन खड़ा करने का आह्वान किया। इस मुद्दे का महत्व समझकर उन्होंने वाराणसी में एक डब्ल्यूटीओ-विरोधी सम्मेलन का आयोजन किया, जिसमें बड़ी तादाद में लोगों ने हिस्सा लिया। दूसरी, यह कि अप्रैल, 2016 में अभाशिअमं ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के ऐतिहासिक आदेश (अगस्त, 2015) को देशभर में लागू करने की मांग को लेकर राष्ट्रीय असेंबली का आयोजन किया। उक्त आदेश के मुताबिक, उत्तर प्रदेश सरकार के खजाने से किसी भी तरह का माली लाभ (तनख़्वाह, मानदेय, भत्ता, ठेके का भुगतान, सलाहकार फीस या कुछ और भी) लेने वालों के लिए यह अनिवार्य होगा कि वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ने को भेजें, चाहे उनका सामाजिक-आर्थिक रुतबा कैसा भी हो। डॉ. स्वाति ने देश के विभिन्न हिस्सों से, खास तौर पर उत्तर प्रदेश से, राष्ट्रीय असेंबली में शामिल होने के लिए लोगों को एकजुट किया। इसी तरह फरवरी 2019 की हुंकार रैली के लिए उन्होंने दूरदराज के आदिवासी इलाकों तक से लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की।

भाषा और समाज
डॉ. स्वाति, अंग्रेज़ी और हिन्दी में समान रूप से काम करती थीं और बांग्ला धाराप्रवाह बोलती थीं। तीन साल पहले नागालैंड में उसकी 16 ज़ुबानों को बचाने और आगे बढ़ाने पर हुए सेमिनार में हिस्सा लेने के बाद उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि “जब तक समाज में वर्ग (या जाति) का बँटवारा रहेगा, भाषाएँ भी वर्गों और जातियों में बँटी रहेंगी!” इसलिए उनका मत था कि भारतीय समाज को समाजवादी और मानवीय खाके में नए सिरे से गढ़ने के लिए वैकल्पिक शिक्षाशास्त्र ज़रूरी है। जब 2017 में उत्तर प्रदेश सरकार ने हिन्दी माध्यम में चल रहे 5000 प्राथमिक स्कूलों को इंग्लिश-मीडियम में तब्दील करने का फ़ैसला लिया तो उनकी मादरी ज़ुबान के माध्यम से तालीम की प्रतिबद्धता को बड़ी चुनौती मिली। इस फ़ैसले की वजह से बच्चों की बड़ी तादाद में शिक्षा से होने वाली बेदखली के खिलाफ़ आंदोलन खड़ा करने के अलावा उनके पास कोई विकल्प न बचा था।

ऐतिहासिक संदर्भ और हमारा संकल्प
डॉ. स्वाति के निधन से सजप और अभाशिअमं दोनों संगठनों में एक बड़ा शून्य बन गया है, जिसे भर पाना मुश्किल होगा। बदकिस्मती से यह ऐसे वक्त हुआ है जब मुल्क आज़ादी के बाद के सबसे कठिन सियासी दौर से गुज़र रहा है। ऐसे वक्त स्वाति जैसी शख़्सियत का होना देश के लिए निहायत ज़रूरी था।
हमें इस अनोखी बात पर गौर करना चाहिए कि एक शख़्सियत ने विज्ञान और वैज्ञानिक सोच की राह पर चलते हुए सक्रिय राजनीति और समाज में बराबरी और इंसाफ के लिए ज़मीनी जद्दोजहद में भी हिस्सा लिया। जब इतिहास में ऐसी मिसालें ढूँढी जाएँगी, तो इस अनोखे किरदार के एक उम्दा प्रतिनिधि बतौर डॉ. स्वाति को उनकी यह ऐतिहासिक जगह देने से कोई इंकार नहीं कर पाएगा !
तक़रीबन एक साल की अवधि में ही अभाशिअमं ने अपने दो स्तंभ खो दिए हैं – डॉ. मेहर इंजीनियर और डॉ. स्वाति – दोनों ही पेशे से वैज्ञानिक थे। दोनों ने हमारे आंदोलन में अपनी खास भागीदीरी निभाई। आइए, हम उनके अभी बाक़ी रह गए एजेंडे पर काम करते रहने की शपथ लें और उन दोनों को सलाम कहें!
समाजवादी जन परिषद (सजप) की उपाध्यक्ष और अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच (अभाशिअमं) के सचिव-मंडल की सदस्य डॉ. स्वाति का 2 मई 2020 को शाम 8:30 बजे वाराणसी के बीएचयू अस्पताल में निधन हो गया। गुर्दों को बुरी तरह नाकाम करने वाली बहुत ही कम होने वाली मल्टिपल माईलोमा नामक प्लाज़्मा कोशिकाओं की कैंसर की बीमारी से बहादुरी से जूझते हुए उनकी साँस छूटी। तक़रीबन एक साल तक के इस तकलीफ़देह दौर में उन्हीं की तरह अरसे से जाने-माने समाजवादी नेता, उनके पति अफ़लातून, कई अस्पतालों में उनकी आखिरी साँसों तक हर पल उनके संग जुड़े रहे।

शिक्षा और विज्ञान-कार्य
21 अप्रैल 1948 को ग्वालियर, मध्य प्रदेश के बंगाली परिवार में जन्मी डॉ. स्वाति ने 1967 में कमला राजा गर्ल्स स्नातकोत्तर कॉलेज, ग्वालियर से स्वर्णपदक के साथ बीएससी (फिज़िक्स) पास की। 1969 में उन्होंने मुंबई के आईआईटी-बॉम्बे से फिज़िक्स में एमएससी पूरी की और 1974-75 में अमरीका के यूनिवर्सिटी ऑफ़ पिट्सबर्ग से एटॉमिक फिज़िक्स में पीएचडी की। पश्चिम के विश्वविद्यालयों से पीएचडी करने वाले अपने समकालीन ज़्यादातर युवा हिंदुस्तानियों से अलग डॉ. स्वाति अपने मुल्क वापस लौटकर समाजवादी समाज बनाने के लिए अवाम की जद्दोजहद में शामिल होने को बेचैन थीं।
अमरीका के लुभावने अध्यापन और शोध के मौके छोड़कर, पीएचडी के बाद ही वे भारत लौट आईं और कुछ वक्त तक रुड़की विश्वविद्यालय में पढ़ाती रहीं। 1979 में डॉ. स्वाति की नियुक्ति फिज़िक्स में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के महिला महाविद्यालय में हो गई। यहाँ वे 30 सालों से भी ज़्यादा अरसे तक अध्यापन और शोध का काम करती रहीं और 2013 में असोशिएट प्रोफ़ेसर के पद पर रिटायर हुईं।
1990 के दशक के शुरूआती सालों से ही डॉ. स्वाति ज़मीनी सामाजिक-राजनीतिक काम में पूरी संजीदगी से सक्रिय रहीं, लेकिन उन्होंने विज्ञान के प्रति अपना लगाव नहीं छोड़ा और 2005 में बायोइन्फ़ॉर्मेटिक्स के बिल्कुल नए क्षेत्र में शोध करना शुरू किया। अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में 35 शोध परचे प्रकाशित करने के अलावा बीएचयू में बायोइन्फॉर्मेटिक्स का विभाग शुरू करने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कई पीएचडी छात्रों को तैयार किया, जिन्होंने आगे चल कर शोध में नाम कमाया। सजप और अभाशिअमं दोनों संगठनों में वरिष्ठ पदाधिकारी की दोहरी ज़िम्मेदारियां संभालने के बावजूद सूक्ष्मजीवियों के आरएनए में संरचनात्मक बदलावों पर उनका एक परचा अभी पिछले साल ही प्रकाशित हुआ है। वे जेएनयू और आईआईआईटी हैदराबाद में विज़िटिंग प्रोफेसर भी रहीं।

सियासी सफर
गौरतलब है कि डॉ. स्वाति जब अमेरिका से लौटी थीं, वह आपातकाल के बाद का सियासी सरगर्मियों का वक्त था। वे जल्द ही उस दौर के सक्रिय समाजवादी आंदोलन के संपर्क में आईं। जब 1980 में उत्पीड़ित वर्गों और जातियों का ज़मीनी आंदोलन खड़ा करने के लिए किशन पटनायक, भाई वैद्य, जुगल किशोर रायबीर, सच्चिदानंद सिन्हा जैसे नेता और कई छात्र कार्यकर्ता जुटे, तो समता संगठन नामक उस समूह के संस्थापक सदस्यों में डॉ. स्वाति शामिल थीं। इस गुट के सदस्य बतौर उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों में खास तौर पर आदिवासियों, दलितों, किसानों और मजदूरों के साथ काम किया। जब सुनील और राजनारायण जैसे ज़मीनी नेताओं को होशंगाबाद (मध्य प्रदेश) जेल में भेजा गया तो उन्होंने गाँव-गाँव जाकर लोगों को एकजुट करने के लिए विश्वविद्यालय की नौकरी से लंबी छुट्टी ले ली।
वाराणसी में आंदोलन को ज़रूरी स्त्रीवादी मोड़ देते हुए उन्होंने ’नारी एकता मंच’ का गठन करने में भूमिका निभाई, जिसमें सभी वर्गों और जातियों से स्त्रियाँ शामिल हुईं और स्त्री क़ैदी, घरेलू हिंसा, दहेज पीड़ित व स्त्रियों के दीगर मुद्दों को लेकर आवाज़ उठाई गई। समाजवादी अध्यापक गुट के सदस्य के रूप में वे विश्वविद्यालय के स्तर पर आंदोलनों में शरीक रहीं और बीएचयू के अध्यापक संगठन की उपाध्यक्ष चुनी गईं। वाराणसी के सुंदर बगिया इलाके के विपन्न बच्चों को पढ़ाने के लिए भी उन्होंने वक्त निकाला।
जब 1995 में समता संगठन और दूसरे संगठनों ने मिलकर आर्थिक विकेंद्रीकरण, वैकल्पिक समाजवादी विकास का मॉडल और समतामूलक समाज बनाने के लिए प्रतिबद्ध राजनीतिक दल, समाजवादी जन परिषद (सजप) बनाया, तो डॉ. स्वाति पार्टी के सचिव-मंडल की सदस्य बनीं और राज्य तथा राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर अहम शख़्सियत बतौर काम करती रहीं। लगातार अध्ययन और चिंतन में जुटी रहकर उन्होंने राजनीति में स्त्रियों के मुद्दों पर सवाल उठाए और इस पर पार्टी के मुखपत्रों, सामयिक वार्ता और समता इरा, में लेख लिखे। देश में चल रहे जनविज्ञान आंदोलनों में भी उनकी बड़ी भागीदारी थी। मुनाफ़ाखोरी, ज़ुल्म और गुलामगिरी बढ़ाने के पूँजीवादी हथकंडों में इस्तेमाल होने के बजाए विज्ञान की जनता की भलाई के लिए क्या भूमिका हो सकती है, इस सवाल पर उनकी गहरी समझ थी।
दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद डॉ. स्वाति ने अपनी काफ़ी ऊर्जा सांप्रदायिक विभाजनकारी ताकतों का प्रतिरोध करने में लगाई।

शिक्षा आंदोलन में योगदान
2009 में अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच (अभाशिअमं) के संस्थापक सदस्य-संगठनों में समाजवादी जन परिषद (सजप) शामिल था। हालाँकि शुरूआती दौर में अभाशिअमं के अध्यक्ष मंडल में सजप के प्रतिनिधि, जेएनयू से पढ़े और आदिवासियों व विपन्न तबकों के साथ काम कर रहे, श्री सुनील थे, डॉ. स्वाति ने अभाशिअमं के कार्यक्रमों, खास तौर पर 2010 में संसद मार्च व प्रदर्शन के लिए कई राज्यों से लोगों को लामबंद करने में अहम भूमिका निभाई। अप्रैल 2014 में सुनील के असमय निधन के बाद अभाशिअमं ने डॉ. स्वाति और अफ़लातून जी, दोनों को सजप के प्रतिनिधि बतौर राष्ट्रीय कार्यकारिणी में आने का न्यौता दिया। फरवरी 2018 में डॉ. स्वाति अभाशिअमं के सचिव-मंडल में आ गईं। तब से वे सचिव मंडल का स्तंभ बनी रहीं हैं और उन्होंने हर प्रस्तावित कार्ययोजना और फ़ैसले को अपने आलोचनात्मक नज़रिए से बेहतर बनाया।
डॉ. स्वाति की दूरदर्शिता और जनाधार को लामबंद करने की उनकी नेतृत्व क्षमता की वजह से ’केजी से पीजी’ तक बराबरी और सामाजिक न्याय-आधारित समान शिक्षा व्यवस्था और पूरी तौरपर मुफ़्त शिक्षा के अभाशिअमं के देशव्यापी आंदोलन के नए आयाम उभरे हैं। उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों में सजप की इकाइयों को अपने-अपने इलाकों में अभाशिअमं की मुख्य माँग यानी ‘केजी से बारहवीं कक्षा तक ’समान स्कूल व्यवस्था’ के समर्थन में आगे बढ़ने को तैयार किया है। लगातार हुए दो घटना-क्रमों ने डॉ० स्वाति के सचिव मंडल में आने से पहले ही शिक्षा आंदोलन में उनकी बढ़ती हुई भूमिका को निखरने में मदद दी। पहली, यह कि भारत सरकार द्वारा डब्ल्यूटीओ–गैट्स (WTO-GATS) को उच्च शिक्षा का मुद्दा खैरात दिए जाने की पहलकदमी वापस लेने के लिए अगस्त, 2015 में अभाशिअमं ने देशव्यापी जन-आंदोलन खड़ा करने का आह्वान किया। इस मुद्दे का महत्व समझकर उन्होंने वाराणसी में एक डब्ल्यूटीओ-विरोधी सम्मेलन का आयोजन किया, जिसमें बड़ी तादाद में लोगों ने हिस्सा लिया। दूसरी, यह कि अप्रैल, 2016 में अभाशिअमं ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के ऐतिहासिक आदेश (अगस्त, 2015) को देशभर में लागू करने की मांग को लेकर राष्ट्रीय असेंबली का आयोजन किया। उक्त आदेश के मुताबिक, उत्तर प्रदेश सरकार के खजाने से किसी भी तरह का माली लाभ (तनख़्वाह, मानदेय, भत्ता, ठेके का भुगतान, सलाहकार फीस या कुछ और भी) लेने वालों के लिए यह अनिवार्य होगा कि वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ने को भेजें, चाहे उनका सामाजिक-आर्थिक रुतबा कैसा भी हो। डॉ. स्वाति ने देश के विभिन्न हिस्सों से, खास तौर पर उत्तर प्रदेश से, राष्ट्रीय असेंबली में शामिल होने के लिए लोगों को एकजुट किया। इसी तरह फरवरी 2019 की हुंकार रैली के लिए उन्होंने दूरदराज के आदिवासी इलाकों तक से लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की।

भाषा और समाज
डॉ. स्वाति, अंग्रेज़ी और हिन्दी में समान रूप से काम करती थीं और बांग्ला और उड़िया में धाराप्रवाह बोलती थीं। तीन साल पहले नागालैंड में उसकी 16 ज़ुबानों को बचाने और आगे बढ़ाने पर हुए सेमिनार में हिस्सा लेने के बाद उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि “जब तक समाज में वर्ग (या जाति) का बँटवारा रहेगा, भाषाएँ भी वर्गों और जातियों में बँटी रहेंगी!” इसलिए उनका मत था कि भारतीय समाज को समाजवादी और मानवीय खाके में नए सिरे से गढ़ने के लिए वैकल्पिक शिक्षाशास्त्र ज़रूरी है। जब 2017 में उत्तर प्रदेश सरकार ने हिन्दी माध्यम में चल रहे 5000 प्राथमिक स्कूलों को इंग्लिश-मीडियम में तब्दील करने का फ़ैसला लिया तो उनकी मादरी ज़ुबान के माध्यम से तालीम की प्रतिबद्धता को बड़ी चुनौती मिली। इस फ़ैसले की वजह से बच्चों की बड़ी तादाद में शिक्षा से होने वाली बेदखली के खिलाफ़ आंदोलन खड़ा करने के अलावा उनके पास कोई विकल्प न बचा था।

ऐतिहासिक संदर्भ और हमारा संकल्प
डॉ. स्वाति के निधन से सजप और अभाशिअमं दोनों संगठनों में एक बड़ा शून्य बन गया है, जिसे भर पाना मुश्किल होगा। बदकिस्मती से यह ऐसे वक्त हुआ है जब मुल्क आज़ादी के बाद के सबसे कठिन सियासी दौर से गुज़र रहा है। ऐसे वक्त स्वाति जैसी शख़्सियत का होना देश के लिए निहायत ज़रूरी था।
हमें इस अनोखी बात पर गौर करना चाहिए कि एक शख़्सियत ने विज्ञान और वैज्ञानिक सोच की राह पर चलते हुए सक्रिय राजनीति और समाज में बराबरी और इंसाफ के लिए ज़मीनी जद्दोजहद में भी हिस्सा लिया। जब इतिहास में ऐसी मिसालें ढूँढी जाएँगी, तो इस अनोखे किरदार के एक उम्दा प्रतिनिधि बतौर डॉ. स्वाति को उनकी यह ऐतिहासिक जगह देने से कोई इंकार नहीं कर पाएगा !
तक़रीबन एक साल की अवधि में ही अभाशिअमं ने अपने दो स्तंभ खो दिए हैं – डॉ. मेहर इंजीनियर और डॉ. स्वाति – दोनों ही पेशे से वैज्ञानिक थे। दोनों ने हमारे आंदोलन में अपनी खास भागीदीरी निभाई। आइए, हम उनके अभी बाक़ी रह गए एजेंडे पर काम करते रहने की शपथ लें और उन दोनों को सलाम कहें!
समाजवादी जन परिषद (सजप) की उपाध्यक्ष और अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच (अभाशिअमं) के सचिव-मंडल की सदस्य डॉ. स्वाति का 2 मई 2020 को शाम 8:30 बजे वाराणसी के बीएचयू अस्पताल में निधन हो गया। गुर्दों को बुरी तरह नाकाम करने वाली बहुत ही कम होने वाली मल्टिपल माईलोमा नामक प्लाज़्मा कोशिकाओं की कैंसर की बीमारी से बहादुरी से जूझते हुए उनकी साँस छूटी। तक़रीबन एक साल तक के इस तकलीफ़देह दौर में उन्हीं की तरह अरसे से जाने-माने समाजवादी नेता, उनके पति अफ़लातून, कई अस्पतालों में उनकी आखिरी साँसों तक हर पल उनके संग जुड़े रहे।

शिक्षा और विज्ञान-कार्य
21 अप्रैल 1948 को ग्वालियर, मध्य प्रदेश के बंगाली परिवार में जन्मी डॉ. स्वाति ने 1967 में कमला राजा गर्ल्स स्नातकोत्तर कॉलेज, ग्वालियर से स्वर्णपदक के साथ बीएससी (फिज़िक्स) पास की। 1969 में उन्होंने मुंबई के आईआईटी-बॉम्बे से फिज़िक्स में एमएससी पूरी की और 1974-75 में अमरीका के यूनिवर्सिटी ऑफ़ पिट्सबर्ग से एटॉमिक फिज़िक्स में पीएचडी की। पश्चिम के विश्वविद्यालयों से पीएचडी करने वाले अपने समकालीन ज़्यादातर युवा हिंदुस्तानियों से अलग डॉ. स्वाति अपने मुल्क वापस लौटकर समाजवादी समाज बनाने के लिए अवाम की जद्दोजहद में शामिल होने को बेचैन थीं।
अमरीका के लुभावने अध्यापन और शोध के मौके छोड़कर, पीएचडी के बाद ही वे भारत लौट आईं और कुछ वक्त तक रुड़की विश्वविद्यालय में पढ़ाती रहीं। 1979 में डॉ. स्वाति की नियुक्ति फिज़िक्स में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के महिला महाविद्यालय में हो गई। यहाँ वे 30 सालों से भी ज़्यादा अरसे तक अध्यापन और शोध का काम करती रहीं और 2013 में असोशिएट प्रोफ़ेसर के पद पर रिटायर हुईं।
1990 के दशक के शुरूआती सालों से ही डॉ. स्वाति ज़मीनी सामाजिक-राजनीतिक काम में पूरी संजीदगी से सक्रिय रहीं, लेकिन उन्होंने विज्ञान के प्रति अपना लगाव नहीं छोड़ा और 2005 में बायोइन्फ़ॉर्मेटिक्स के बिल्कुल नए क्षेत्र में शोध करना शुरू किया। अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में 35 शोध परचे प्रकाशित करने के अलावा बीएचयू में बायोइन्फॉर्मेटिक्स का विभाग शुरू करने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कई पीएचडी छात्रों को तैयार किया, जिन्होंने आगे चल कर शोध में नाम कमाया। सजप और अभाशिअमं दोनों संगठनों में वरिष्ठ पदाधिकारी की दोहरी ज़िम्मेदारियां संभालने के बावजूद सूक्ष्मजीवियों के आरएनए में संरचनात्मक बदलावों पर उनका एक परचा अभी पिछले साल ही प्रकाशित हुआ है। वे जेएनयू और आईआईआईटी हैदराबाद में विज़िटिंग प्रोफेसर भी रहीं।

सियासी सफर
गौरतलब है कि डॉ. स्वाति जब अमेरिका से लौटी थीं, वह आपातकाल के बाद का सियासी सरगर्मियों का वक्त था। वे जल्द ही उस दौर के सक्रिय समाजवादी आंदोलन के संपर्क में आईं। जब 1980 में उत्पीड़ित वर्गों और जातियों का ज़मीनी आंदोलन खड़ा करने के लिए किशन पटनायक, भाई वैद्य, जुगल किशोर रायबीर, सच्चिदानंद सिन्हा जैसे नेता और कई छात्र कार्यकर्ता जुटे, तो समता संगठन नामक उस समूह के संस्थापक सदस्यों में डॉ. स्वाति शामिल थीं। इस गुट के सदस्य बतौर उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों में खास तौर पर आदिवासियों, दलितों, किसानों और मजदूरों के साथ काम किया। जब सुनील और राजनारायण जैसे ज़मीनी नेताओं को होशंगाबाद (मध्य प्रदेश) जेल में भेजा गया तो उन्होंने गाँव-गाँव जाकर लोगों को एकजुट करने के लिए विश्वविद्यालय की नौकरी से लंबी छुट्टी ले ली।
वाराणसी में आंदोलन को ज़रूरी स्त्रीवादी मोड़ देते हुए उन्होंने ’नारी एकता मंच’ का गठन करने में भूमिका निभाई, जिसमें सभी वर्गों और जातियों से स्त्रियाँ शामिल हुईं और स्त्री क़ैदी, घरेलू हिंसा, दहेज पीड़ित व स्त्रियों के दीगर मुद्दों को लेकर आवाज़ उठाई गई। समाजवादी अध्यापक गुट के सदस्य के रूप में वे विश्वविद्यालय के स्तर पर आंदोलनों में शरीक रहीं और बीएचयू के अध्यापक संगठन की उपाध्यक्ष चुनी गईं। वाराणसी के सुंदर बगिया इलाके के विपन्न बच्चों को पढ़ाने के लिए भी उन्होंने वक्त निकाला।
जब 1995 में समता संगठन और दूसरे संगठनों ने मिलकर आर्थिक विकेंद्रीकरण, वैकल्पिक समाजवादी विकास का मॉडल और समतामूलक समाज बनाने के लिए प्रतिबद्ध राजनीतिक दल, समाजवादी जन परिषद (सजप) बनाया, तो डॉ. स्वाति पार्टी के सचिव-मंडल की सदस्य बनीं और राज्य तथा राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर अहम शख़्सियत बतौर काम करती रहीं। लगातार अध्ययन और चिंतन में जुटी रहकर उन्होंने राजनीति में स्त्रियों के मुद्दों पर सवाल उठाए और इस पर पार्टी के मुखपत्रों, सामयिक वार्ता और समता इरा, में लेख लिखे। देश में चल रहे जनविज्ञान आंदोलनों में भी उनकी बड़ी भागीदारी थी। मुनाफ़ाखोरी, ज़ुल्म और गुलामगिरी बढ़ाने के पूँजीवादी हथकंडों में इस्तेमाल होने के बजाए विज्ञान की जनता की भलाई के लिए क्या भूमिका हो सकती है, इस सवाल पर उनकी गहरी समझ थी।
दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद डॉ. स्वाति ने अपनी काफ़ी ऊर्जा सांप्रदायिक विभाजनकारी ताकतों का प्रतिरोध करने में लगाई।

शिक्षा आंदोलन में योगदान
2009 में अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच (अभाशिअमं) के संस्थापक सदस्य-संगठनों में समाजवादी जन परिषद (सजप) शामिल था। हालाँकि शुरूआती दौर में अभाशिअमं के अध्यक्ष मंडल में सजप के प्रतिनिधि, जेएनयू से पढ़े और आदिवासियों व विपन्न तबकों के साथ काम कर रहे, श्री सुनील थे, डॉ. स्वाति ने अभाशिअमं के कार्यक्रमों, खास तौर पर 2010 में संसद मार्च व प्रदर्शन के लिए कई राज्यों से लोगों को लामबंद करने में अहम भूमिका निभाई। अप्रैल 2014 में सुनील के असमय निधन के बाद अभाशिअमं ने डॉ. स्वाति और अफ़लातून जी, दोनों को सजप के प्रतिनिधि बतौर राष्ट्रीय कार्यकारिणी में आने का न्यौता दिया। फरवरी 2018 में डॉ. स्वाति अभाशिअमं के सचिव-मंडल में आ गईं। तब से वे सचिव मंडल का स्तंभ बनी रहीं हैं और उन्होंने हर प्रस्तावित कार्ययोजना और फ़ैसले को अपने आलोचनात्मक नज़रिए से बेहतर बनाया।
डॉ. स्वाति की दूरदर्शिता और जनाधार को लामबंद करने की उनकी नेतृत्व क्षमता की वजह से ’केजी से पीजी’ तक बराबरी और सामाजिक न्याय-आधारित समान शिक्षा व्यवस्था और पूरी तौरपर मुफ़्त शिक्षा के अभाशिअमं के देशव्यापी आंदोलन के नए आयाम उभरे हैं। उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों में सजप की इकाइयों को अपने-अपने इलाकों में अभाशिअमं की मुख्य माँग यानी ‘केजी से बारहवीं कक्षा तक ’समान स्कूल व्यवस्था’ के समर्थन में आगे बढ़ने को तैयार किया है। लगातार हुए दो घटना-क्रमों ने डॉ० स्वाति के सचिव मंडल में आने से पहले ही शिक्षा आंदोलन में उनकी बढ़ती हुई भूमिका को निखरने में मदद दी। पहली, यह कि भारत सरकार द्वारा डब्ल्यूटीओ–गैट्स (WTO-GATS) को उच्च शिक्षा का मुद्दा खैरात दिए जाने की पहलकदमी वापस लेने के लिए अगस्त, 2015 में अभाशिअमं ने देशव्यापी जन-आंदोलन खड़ा करने का आह्वान किया। इस मुद्दे का महत्व समझकर उन्होंने वाराणसी में एक डब्ल्यूटीओ-विरोधी सम्मेलन का आयोजन किया, जिसमें बड़ी तादाद में लोगों ने हिस्सा लिया। दूसरी, यह कि अप्रैल, 2016 में अभाशिअमं ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के ऐतिहासिक आदेश (अगस्त, 2015) को देशभर में लागू करने की मांग को लेकर राष्ट्रीय असेंबली का आयोजन किया। उक्त आदेश के मुताबिक, उत्तर प्रदेश सरकार के खजाने से किसी भी तरह का माली लाभ (तनख़्वाह, मानदेय, भत्ता, ठेके का भुगतान, सलाहकार फीस या कुछ और भी) लेने वालों के लिए यह अनिवार्य होगा कि वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ने को भेजें, चाहे उनका सामाजिक-आर्थिक रुतबा कैसा भी हो। डॉ. स्वाति ने देश के विभिन्न हिस्सों से, खास तौर पर उत्तर प्रदेश से, राष्ट्रीय असेंबली में शामिल होने के लिए लोगों को एकजुट किया। इसी तरह फरवरी 2019 की हुंकार रैली के लिए उन्होंने दूरदराज के आदिवासी इलाकों तक से लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की।

भाषा और समाज
डॉ. स्वाति, अंग्रेज़ी और हिन्दी में समान रूप से काम करती थीं और बांग्ला और उड़िया में धाराप्रवाह बोलती थीं। तीन साल पहले नागालैंड में उसकी 16 ज़ुबानों को बचाने और आगे बढ़ाने पर हुए सेमिनार में हिस्सा लेने के बाद उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि “जब तक समाज में वर्ग (या जाति) का बँटवारा रहेगा, भाषाएँ भी वर्गों और जातियों में बँटी रहेंगी!” इसलिए उनका मत था कि भारतीय समाज को समाजवादी और मानवीय खाके में नए सिरे से गढ़ने के लिए वैकल्पिक शिक्षाशास्त्र ज़रूरी है। जब 2017 में उत्तर प्रदेश सरकार ने हिन्दी माध्यम में चल रहे 5000 प्राथमिक स्कूलों को इंग्लिश-मीडियम में तब्दील करने का फ़ैसला लिया तो उनकी मादरी ज़ुबान के माध्यम से तालीम की प्रतिबद्धता को बड़ी चुनौती मिली। इस फ़ैसले की वजह से बच्चों की बड़ी तादाद में शिक्षा से होने वाली बेदखली के खिलाफ़ आंदोलन खड़ा करने के अलावा उनके पास कोई विकल्प न बचा था।

ऐतिहासिक संदर्भ और हमारा संकल्प
डॉ. स्वाति के निधन से सजप और अभाशिअमं दोनों संगठनों में एक बड़ा शून्य बन गया है, जिसे भर पाना मुश्किल होगा। बदकिस्मती से यह ऐसे वक्त हुआ है जब मुल्क आज़ादी के बाद के सबसे कठिन सियासी दौर से गुज़र रहा है। ऐसे वक्त स्वाति जैसी शख़्सियत का होना देश के लिए निहायत ज़रूरी था।
हमें इस अनोखी बात पर गौर करना चाहिए कि एक शख़्सियत ने विज्ञान और वैज्ञानिक सोच की राह पर चलते हुए सक्रिय राजनीति और समाज में बराबरी और इंसाफ के लिए ज़मीनी जद्दोजहद में भी हिस्सा लिया। जब इतिहास में ऐसी मिसालें ढूँढी जाएँगी, तो इस अनोखे किरदार के एक उम्दा प्रतिनिधि बतौर डॉ. स्वाति को उनकी यह ऐतिहासिक जगह देने से कोई इंकार नहीं कर पाएगा !
तक़रीबन एक साल की अवधि में ही अभाशिअमं ने अपने दो स्तंभ खो दिए हैं – डॉ. मेहर इंजीनियर और डॉ. स्वाति – दोनों ही पेशे से वैज्ञानिक थे। दोनों ने हमारे आंदोलन में अपनी खास भागीदीरी निभाई। आइए, हम उनके अभी बाक़ी रह गए एजेंडे पर काम करते रहने की शपथ लें और उन दोनों को सलाम कहें!
समाजवादी जन परिषद (सजप) की उपाध्यक्ष और अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच (अभाशिअमं) के सचिव-मंडल की सदस्य डॉ. स्वाति का 2 मई 2020 को शाम 8:30 बजे वाराणसी के बीएचयू अस्पताल में निधन हो गया। गुर्दों को बुरी तरह नाकाम करने वाली बहुत ही कम होने वाली मल्टिपल माईलोमा नामक प्लाज़्मा कोशिकाओं की कैंसर की बीमारी से बहादुरी से जूझते हुए उनकी साँस छूटी। तक़रीबन एक साल तक के इस तकलीफ़देह दौर में उन्हीं की तरह अरसे से जाने-माने समाजवादी नेता, उनके पति अफ़लातून, कई अस्पतालों में उनकी आखिरी साँसों तक हर पल उनके संग जुड़े रहे।

शिक्षा और विज्ञान-कार्य
21 अप्रैल 1948 को ग्वालियर, मध्य प्रदेश के बंगाली परिवार में जन्मी डॉ. स्वाति ने 1967 में कमला राजा गर्ल्स स्नातकोत्तर कॉलेज, ग्वालियर से स्वर्णपदक के साथ बीएससी (फिज़िक्स) पास की। 1969 में उन्होंने मुंबई के आईआईटी-बॉम्बे से फिज़िक्स में एमएससी पूरी की और 1974-75 में अमरीका के यूनिवर्सिटी ऑफ़ पिट्सबर्ग से एटॉमिक फिज़िक्स में पीएचडी की। पश्चिम के विश्वविद्यालयों से पीएचडी करने वाले अपने समकालीन ज़्यादातर युवा हिंदुस्तानियों से अलग डॉ. स्वाति अपने मुल्क वापस लौटकर समाजवादी समाज बनाने के लिए अवाम की जद्दोजहद में शामिल होने को बेचैन थीं।
अमरीका के लुभावने अध्यापन और शोध के मौके छोड़कर, पीएचडी के बाद ही वे भारत लौट आईं और कुछ वक्त तक रुड़की विश्वविद्यालय में पढ़ाती रहीं। 1979 में डॉ. स्वाति की नियुक्ति फिज़िक्स में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के महिला महाविद्यालय में हो गई। यहाँ वे 30 सालों से भी ज़्यादा अरसे तक अध्यापन और शोध का काम करती रहीं और 2013 में असोशिएट प्रोफ़ेसर के पद पर रिटायर हुईं।
1990 के दशक के शुरूआती सालों से ही डॉ. स्वाति ज़मीनी सामाजिक-राजनीतिक काम में पूरी संजीदगी से सक्रिय रहीं, लेकिन उन्होंने विज्ञान के प्रति अपना लगाव नहीं छोड़ा और 2005 में बायोइन्फ़ॉर्मेटिक्स के बिल्कुल नए क्षेत्र में शोध करना शुरू किया। अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में 35 शोध परचे प्रकाशित करने के अलावा बीएचयू में बायोइन्फॉर्मेटिक्स का विभाग शुरू करने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कई पीएचडी छात्रों को तैयार किया, जिन्होंने आगे चल कर शोध में नाम कमाया। सजप और अभाशिअमं दोनों संगठनों में वरिष्ठ पदाधिकारी की दोहरी ज़िम्मेदारियां संभालने के बावजूद सूक्ष्मजीवियों के आरएनए में संरचनात्मक बदलावों पर उनका एक परचा अभी पिछले साल ही प्रकाशित हुआ है। वे जेएनयू और आईआईआईटी हैदराबाद में विज़िटिंग प्रोफेसर भी रहीं।

सियासी सफर
गौरतलब है कि डॉ. स्वाति जब अमेरिका से लौटी थीं, वह आपातकाल के बाद का सियासी सरगर्मियों का वक्त था। वे जल्द ही उस दौर के सक्रिय समाजवादी आंदोलन के संपर्क में आईं। जब 1980 में उत्पीड़ित वर्गों और जातियों का ज़मीनी आंदोलन खड़ा करने के लिए किशन पटनायक, भाई वैद्य, जुगल किशोर रायबीर, सच्चिदानंद सिन्हा जैसे नेता और कई छात्र कार्यकर्ता जुटे, तो समता संगठन नामक उस समूह के संस्थापक सदस्यों में डॉ. स्वाति शामिल थीं। इस गुट के सदस्य बतौर उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों में खास तौर पर आदिवासियों, दलितों, किसानों और मजदूरों के साथ काम किया। जब सुनील और राजनारायण जैसे ज़मीनी नेताओं को होशंगाबाद (मध्य प्रदेश) जेल में भेजा गया तो उन्होंने गाँव-गाँव जाकर लोगों को एकजुट करने के लिए विश्वविद्यालय की नौकरी से लंबी छुट्टी ले ली।
वाराणसी में आंदोलन को ज़रूरी स्त्रीवादी मोड़ देते हुए उन्होंने ’नारी एकता मंच’ का गठन करने में भूमिका निभाई, जिसमें सभी वर्गों और जातियों से स्त्रियाँ शामिल हुईं और स्त्री क़ैदी, घरेलू हिंसा, दहेज पीड़ित व स्त्रियों के दीगर मुद्दों को लेकर आवाज़ उठाई गई। समाजवादी अध्यापक गुट के सदस्य के रूप में वे विश्वविद्यालय के स्तर पर आंदोलनों में शरीक रहीं और बीएचयू के अध्यापक संगठन की उपाध्यक्ष चुनी गईं। वाराणसी के सुंदर बगिया इलाके के विपन्न बच्चों को पढ़ाने के लिए भी उन्होंने वक्त निकाला।
जब 1995 में समता संगठन और दूसरे संगठनों ने मिलकर आर्थिक विकेंद्रीकरण, वैकल्पिक समाजवादी विकास का मॉडल और समतामूलक समाज बनाने के लिए प्रतिबद्ध राजनीतिक दल, समाजवादी जन परिषद (सजप) बनाया, तो डॉ. स्वाति पार्टी के सचिव-मंडल की सदस्य बनीं और राज्य तथा राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर अहम शख़्सियत बतौर काम करती रहीं। लगातार अध्ययन और चिंतन में जुटी रहकर उन्होंने राजनीति में स्त्रियों के मुद्दों पर सवाल उठाए और इस पर पार्टी के मुखपत्रों, सामयिक वार्ता और समता इरा, में लेख लिखे। देश में चल रहे जनविज्ञान आंदोलनों में भी उनकी बड़ी भागीदारी थी। मुनाफ़ाखोरी, ज़ुल्म और गुलामगिरी बढ़ाने के पूँजीवादी हथकंडों में इस्तेमाल होने के बजाए विज्ञान की जनता की भलाई के लिए क्या भूमिका हो सकती है, इस सवाल पर उनकी गहरी समझ थी।
दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद डॉ. स्वाति ने अपनी काफ़ी ऊर्जा सांप्रदायिक विभाजनकारी ताकतों का प्रतिरोध करने में लगाई।

शिक्षा आंदोलन में योगदान
2009 में अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच (अभाशिअमं) के संस्थापक सदस्य-संगठनों में समाजवादी जन परिषद (सजप) शामिल था। हालाँकि शुरूआती दौर में अभाशिअमं के अध्यक्ष मंडल में सजप के प्रतिनिधि, जेएनयू से पढ़े और आदिवासियों व विपन्न तबकों के साथ काम कर रहे, श्री सुनील थे, डॉ. स्वाति ने अभाशिअमं के कार्यक्रमों, खास तौर पर 2010 में संसद मार्च व प्रदर्शन के लिए कई राज्यों से लोगों को लामबंद करने में अहम भूमिका निभाई। अप्रैल 2014 में सुनील के असमय निधन के बाद अभाशिअमं ने डॉ. स्वाति और अफ़लातून जी, दोनों को सजप के प्रतिनिधि बतौर राष्ट्रीय कार्यकारिणी में आने का न्यौता दिया। फरवरी 2018 में डॉ. स्वाति अभाशिअमं के सचिव-मंडल में आ गईं। तब से वे सचिव मंडल का स्तंभ बनी रहीं हैं और उन्होंने हर प्रस्तावित कार्ययोजना और फ़ैसले को अपने आलोचनात्मक नज़रिए से बेहतर बनाया।
डॉ. स्वाति की दूरदर्शिता और जनाधार को लामबंद करने की उनकी नेतृत्व क्षमता की वजह से ’केजी से पीजी’ तक बराबरी और सामाजिक न्याय-आधारित समान शिक्षा व्यवस्था और पूरी तौरपर मुफ़्त शिक्षा के अभाशिअमं के देशव्यापी आंदोलन के नए आयाम उभरे हैं। उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों में सजप की इकाइयों को अपने-अपने इलाकों में अभाशिअमं की मुख्य माँग यानी ‘केजी से बारहवीं कक्षा तक ’समान स्कूल व्यवस्था’ के समर्थन में आगे बढ़ने को तैयार किया है। लगातार हुए दो घटना-क्रमों ने डॉ० स्वाति के सचिव मंडल में आने से पहले ही शिक्षा आंदोलन में उनकी बढ़ती हुई भूमिका को निखरने में मदद दी। पहली, यह कि भारत सरकार द्वारा डब्ल्यूटीओ–गैट्स (WTO-GATS) को उच्च शिक्षा का मुद्दा खैरात दिए जाने की पहलकदमी वापस लेने के लिए अगस्त, 2015 में अभाशिअमं ने देशव्यापी जन-आंदोलन खड़ा करने का आह्वान किया। इस मुद्दे का महत्व समझकर उन्होंने वाराणसी में एक डब्ल्यूटीओ-विरोधी सम्मेलन का आयोजन किया, जिसमें बड़ी तादाद में लोगों ने हिस्सा लिया। दूसरी, यह कि अप्रैल, 2016 में अभाशिअमं ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के ऐतिहासिक आदेश (अगस्त, 2015) को देशभर में लागू करने की मांग को लेकर राष्ट्रीय असेंबली का आयोजन किया। उक्त आदेश के मुताबिक, उत्तर प्रदेश सरकार के खजाने से किसी भी तरह का माली लाभ (तनख़्वाह, मानदेय, भत्ता, ठेके का भुगतान, सलाहकार फीस या कुछ और भी) लेने वालों के लिए यह अनिवार्य होगा कि वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ने को भेजें, चाहे उनका सामाजिक-आर्थिक रुतबा कैसा भी हो। डॉ. स्वाति ने देश के विभिन्न हिस्सों से, खास तौर पर उत्तर प्रदेश से, राष्ट्रीय असेंबली में शामिल होने के लिए लोगों को एकजुट किया। इसी तरह फरवरी 2019 की हुंकार रैली के लिए उन्होंने दूरदराज के आदिवासी इलाकों तक से लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की।

भाषा और समाज
डॉ. स्वाति, अंग्रेज़ी और हिन्दी में समान रूप से काम करती थीं और बांग्ला और उड़िया में धाराप्रवाह बोलती थीं। तीन साल पहले नागालैंड में उसकी 16 ज़ुबानों को बचाने और आगे बढ़ाने पर हुए सेमिनार में हिस्सा लेने के बाद उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि “जब तक समाज में वर्ग (या जाति) का बँटवारा रहेगा, भाषाएँ भी वर्गों और जातियों में बँटी रहेंगी!” इसलिए उनका मत था कि भारतीय समाज को समाजवादी और मानवीय खाके में नए सिरे से गढ़ने के लिए वैकल्पिक शिक्षाशास्त्र ज़रूरी है। जब 2017 में उत्तर प्रदेश सरकार ने हिन्दी माध्यम में चल रहे 5000 प्राथमिक स्कूलों को इंग्लिश-मीडियम में तब्दील करने का फ़ैसला लिया तो उनकी मादरी ज़ुबान के माध्यम से तालीम की प्रतिबद्धता को बड़ी चुनौती मिली। इस फ़ैसले की वजह से बच्चों की बड़ी तादाद में शिक्षा से होने वाली बेदखली के खिलाफ़ आंदोलन खड़ा करने के अलावा उनके पास कोई विकल्प न बचा था।

ऐतिहासिक संदर्भ और हमारा संकल्प
डॉ. स्वाति के निधन से सजप और अभाशिअमं दोनों संगठनों में एक बड़ा शून्य बन गया है, जिसे भर पाना मुश्किल होगा। बदकिस्मती से यह ऐसे वक्त हुआ है जब मुल्क आज़ादी के बाद के सबसे कठिन सियासी दौर से गुज़र रहा है। ऐसे वक्त स्वाति जैसी शख़्सियत का होना देश के लिए निहायत ज़रूरी था।
हमें इस अनोखी बात पर गौर करना चाहिए कि एक शख़्सियत ने विज्ञान और वैज्ञानिक सोच की राह पर चलते हुए सक्रिय राजनीति और समाज में बराबरी और इंसाफ के लिए ज़मीनी जद्दोजहद में भी हिस्सा लिया। जब इतिहास में ऐसी मिसालें ढूँढी जाएँगी, तो इस अनोखे किरदार के एक उम्दा प्रतिनिधि बतौर डॉ. स्वाति को उनकी यह ऐतिहासिक जगह देने से कोई इंकार नहीं कर पाएगा !
तक़रीबन एक साल की अवधि में ही अभाशिअमं ने अपने दो स्तंभ खो दिए हैं – डॉ. मेहर इंजीनियर और डॉ. स्वाति – दोनों ही पेशे से वैज्ञानिक थे। दोनों ने हमारे आंदोलन में अपनी खास भागीदीरी निभाई। आइए, हम उनके अभी बाक़ी रह गए एजेंडे पर काम करते रहने की शपथ लें और उन दोनों को सलाम कहें!
डॉ. स्वाति नहीं रहीं उन्होंने दलित, आदिवासी, किसान और श्रमिकों के साथ व्यापक रूप से काम किया था।
समाजवादी जन परिषद (सजप) की उपाध्यक्ष और अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच (अभाशिअमं) के सचिव-मंडल की सदस्य डॉ. स्वाति का 2 मई 2020 को शाम 8:30 बजे वाराणसी के बीएचयू अस्पताल में निधन हो गया। गुर्दों को बुरी तरह नाकाम करने वाली बहुत ही कम होने वाली मल्टिपल माईलोमा नामक प्लाज़्मा कोशिकाओं की कैंसर की बीमारी से बहादुरी से जूझते हुए उनकी साँस छूटी। तक़रीबन एक साल तक के इस तकलीफ़देह दौर में उन्हीं की तरह अरसे से जाने-माने समाजवादी नेता, उनके पति अफ़लातून, कई अस्पतालों में उनकी आखिरी साँसों तक हर पल उनके संग जुड़े रहे।

शिक्षा और विज्ञान-कार्य
21 अप्रैल 1948 को ग्वालियर, मध्य प्रदेश के बंगाली परिवार में जन्मी डॉ. स्वाति ने 1967 में कमला राजा गर्ल्स स्नातकोत्तर कॉलेज, ग्वालियर से स्वर्णपदक के साथ बीएससी (फिज़िक्स) पास की। 1969 में उन्होंने मुंबई के आईआईटी-बॉम्बे से फिज़िक्स में एमएससी पूरी की और 1974-75 में अमरीका के यूनिवर्सिटी ऑफ़ पिट्सबर्ग से एटॉमिक फिज़िक्स में पीएचडी की। पश्चिम के विश्वविद्यालयों से पीएचडी करने वाले अपने समकालीन ज़्यादातर युवा हिंदुस्तानियों से अलग डॉ. स्वाति अपने मुल्क वापस लौटकर समाजवादी समाज बनाने के लिए अवाम की जद्दोजहद में शामिल होने को बेचैन थीं।
अमरीका के लुभावने अध्यापन और शोध के मौके छोड़कर, पीएचडी के बाद ही वे भारत लौट आईं और कुछ वक्त तक रुड़की विश्वविद्यालय में पढ़ाती रहीं। 1979 में डॉ. स्वाति की नियुक्ति फिज़िक्स में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के महिला महाविद्यालय में हो गई। यहाँ वे 30 सालों से भी ज़्यादा अरसे तक अध्यापन और शोध का काम करती रहीं और 2013 में असोशिएट प्रोफ़ेसर के पद पर रिटायर हुईं।
1990 के दशक के शुरूआती सालों से ही डॉ. स्वाति ज़मीनी सामाजिक-राजनीतिक काम में पूरी संजीदगी से सक्रिय रहीं, लेकिन उन्होंने विज्ञान के प्रति अपना लगाव नहीं छोड़ा और 2005 में बायोइन्फ़ॉर्मेटिक्स के बिल्कुल नए क्षेत्र में शोध करना शुरू किया। अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में 35 शोध परचे प्रकाशित करने के अलावा बीएचयू में बायोइन्फॉर्मेटिक्स का विभाग शुरू करने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कई पीएचडी छात्रों को तैयार किया, जिन्होंने आगे चल कर शोध में नाम कमाया। सजप और अभाशिअमं दोनों संगठनों में वरिष्ठ पदाधिकारी की दोहरी ज़िम्मेदारियां संभालने के बावजूद सूक्ष्मजीवियों के आरएनए में संरचनात्मक बदलावों पर उनका एक परचा अभी पिछले साल ही प्रकाशित हुआ है। वे जेएनयू और आईआईआईटी हैदराबाद में विज़िटिंग प्रोफेसर भी रहीं।

सियासी सफर
गौरतलब है कि डॉ. स्वाति जब अमेरिका से लौटी थीं, वह आपातकाल के बाद का सियासी सरगर्मियों का वक्त था। वे जल्द ही उस दौर के सक्रिय समाजवादी आंदोलन के संपर्क में आईं। जब 1980 में उत्पीड़ित वर्गों और जातियों का ज़मीनी आंदोलन खड़ा करने के लिए किशन पटनायक, भाई वैद्य, जुगल किशोर रायबीर, सच्चिदानंद सिन्हा जैसे नेता और कई छात्र कार्यकर्ता जुटे, तो समता संगठन नामक उस समूह के संस्थापक सदस्यों में डॉ. स्वाति शामिल थीं। इस गुट के सदस्य बतौर उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों में खास तौर पर आदिवासियों, दलितों, किसानों और मजदूरों के साथ काम किया। जब सुनील और राजनारायण जैसे ज़मीनी नेताओं को होशंगाबाद (मध्य प्रदेश) जेल में भेजा गया तो उन्होंने गाँव-गाँव जाकर लोगों को एकजुट करने के लिए विश्वविद्यालय की नौकरी से लंबी छुट्टी ले ली।
वाराणसी में आंदोलन को ज़रूरी स्त्रीवादी मोड़ देते हुए उन्होंने ’नारी एकता मंच’ का गठन करने में भूमिका निभाई, जिसमें सभी वर्गों और जातियों से स्त्रियाँ शामिल हुईं और स्त्री क़ैदी, घरेलू हिंसा, दहेज पीड़ित व स्त्रियों के दीगर मुद्दों को लेकर आवाज़ उठाई गई। समाजवादी अध्यापक गुट के सदस्य के रूप में वे विश्वविद्यालय के स्तर पर आंदोलनों में शरीक रहीं और बीएचयू के अध्यापक संगठन की उपाध्यक्ष चुनी गईं। वाराणसी के सुंदर बगिया इलाके के विपन्न बच्चों को पढ़ाने के लिए भी उन्होंने वक्त निकाला।
जब 1995 में समता संगठन और दूसरे संगठनों ने मिलकर आर्थिक विकेंद्रीकरण, वैकल्पिक समाजवादी विकास का मॉडल और समतामूलक समाज बनाने के लिए प्रतिबद्ध राजनीतिक दल, समाजवादी जन परिषद (सजप) बनाया, तो डॉ. स्वाति पार्टी के सचिव-मंडल की सदस्य बनीं और राज्य तथा राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर अहम शख़्सियत बतौर काम करती रहीं। लगातार अध्ययन और चिंतन में जुटी रहकर उन्होंने राजनीति में स्त्रियों के मुद्दों पर सवाल उठाए और इस पर पार्टी के मुखपत्रों, सामयिक वार्ता और समता इरा, में लेख लिखे। देश में चल रहे जनविज्ञान आंदोलनों में भी उनकी बड़ी भागीदारी थी। मुनाफ़ाखोरी, ज़ुल्म और गुलामगिरी बढ़ाने के पूँजीवादी हथकंडों में इस्तेमाल होने के बजाए विज्ञान की जनता की भलाई के लिए क्या भूमिका हो सकती है, इस सवाल पर उनकी गहरी समझ थी।
दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद डॉ. स्वाति ने अपनी काफ़ी ऊर्जा सांप्रदायिक विभाजनकारी ताकतों का प्रतिरोध करने में लगाई।

शिक्षा आंदोलन में योगदान
2009 में अखिल भारत शिक्षा अधिकार मंच (अभाशिअमं) के संस्थापक सदस्य-संगठनों में समाजवादी जन परिषद (सजप) शामिल था। हालाँकि शुरूआती दौर में अभाशिअमं के अध्यक्ष मंडल में सजप के प्रतिनिधि, जेएनयू से पढ़े और आदिवासियों व विपन्न तबकों के साथ काम कर रहे, श्री सुनील थे, डॉ. स्वाति ने अभाशिअमं के कार्यक्रमों, खास तौर पर 2010 में संसद मार्च व प्रदर्शन के लिए कई राज्यों से लोगों को लामबंद करने में अहम भूमिका निभाई। अप्रैल 2014 में सुनील के असमय निधन के बाद अभाशिअमं ने डॉ. स्वाति और अफ़लातून जी, दोनों को सजप के प्रतिनिधि बतौर राष्ट्रीय कार्यकारिणी में आने का न्यौता दिया। फरवरी 2018 में डॉ. स्वाति अभाशिअमं के सचिव-मंडल में आ गईं। तब से वे सचिव मंडल का स्तंभ बनी रहीं हैं और उन्होंने हर प्रस्तावित कार्ययोजना और फ़ैसले को अपने आलोचनात्मक नज़रिए से बेहतर बनाया।
डॉ. स्वाति की दूरदर्शिता और जनाधार को लामबंद करने की उनकी नेतृत्व क्षमता की वजह से ’केजी से पीजी’ तक बराबरी और सामाजिक न्याय-आधारित समान शिक्षा व्यवस्था और पूरी तौरपर मुफ़्त शिक्षा के अभाशिअमं के देशव्यापी आंदोलन के नए आयाम उभरे हैं। उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों में सजप की इकाइयों को अपने-अपने इलाकों में अभाशिअमं की मुख्य माँग यानी ‘केजी से बारहवीं कक्षा तक ’समान स्कूल व्यवस्था’ के समर्थन में आगे बढ़ने को तैयार किया है। लगातार हुए दो घटना-क्रमों ने डॉ० स्वाति के सचिव मंडल में आने से पहले ही शिक्षा आंदोलन में उनकी बढ़ती हुई भूमिका को निखरने में मदद दी। पहली, यह कि भारत सरकार द्वारा डब्ल्यूटीओ–गैट्स (WTO-GATS) को उच्च शिक्षा का मुद्दा खैरात दिए जाने की पहलकदमी वापस लेने के लिए अगस्त, 2015 में अभाशिअमं ने देशव्यापी जन-आंदोलन खड़ा करने का आह्वान किया। इस मुद्दे का महत्व समझकर उन्होंने वाराणसी में एक डब्ल्यूटीओ-विरोधी सम्मेलन का आयोजन किया, जिसमें बड़ी तादाद में लोगों ने हिस्सा लिया। दूसरी, यह कि अप्रैल, 2016 में अभाशिअमं ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के ऐतिहासिक आदेश (अगस्त, 2015) को देशभर में लागू करने की मांग को लेकर राष्ट्रीय असेंबली का आयोजन किया। उक्त आदेश के मुताबिक, उत्तर प्रदेश सरकार के खजाने से किसी भी तरह का माली लाभ (तनख़्वाह, मानदेय, भत्ता, ठेके का भुगतान, सलाहकार फीस या कुछ और भी) लेने वालों के लिए यह अनिवार्य होगा कि वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ने को भेजें, चाहे उनका सामाजिक-आर्थिक रुतबा कैसा भी हो। डॉ. स्वाति ने देश के विभिन्न हिस्सों से, खास तौर पर उत्तर प्रदेश से, राष्ट्रीय असेंबली में शामिल होने के लिए लोगों को एकजुट किया। इसी तरह फरवरी 2019 की हुंकार रैली के लिए उन्होंने दूरदराज के आदिवासी इलाकों तक से लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की।

भाषा और समाज
डॉ. स्वाति, अंग्रेज़ी और हिन्दी में समान रूप से काम करती थीं और बांग्ला और उड़िया में धाराप्रवाह बोलती थीं। तीन साल पहले नागालैंड में उसकी 16 ज़ुबानों को बचाने और आगे बढ़ाने पर हुए सेमिनार में हिस्सा लेने के बाद उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि “जब तक समाज में वर्ग (या जाति) का बँटवारा रहेगा, भाषाएँ भी वर्गों और जातियों में बँटी रहेंगी!” इसलिए उनका मत था कि भारतीय समाज को समाजवादी और मानवीय खाके में नए सिरे से गढ़ने के लिए वैकल्पिक शिक्षाशास्त्र ज़रूरी है। जब 2017 में उत्तर प्रदेश सरकार ने हिन्दी माध्यम में चल रहे 5000 प्राथमिक स्कूलों को इंग्लिश-मीडियम में तब्दील करने का फ़ैसला लिया तो उनकी मादरी ज़ुबान के माध्यम से तालीम की प्रतिबद्धता को बड़ी चुनौती मिली। इस फ़ैसले की वजह से बच्चों की बड़ी तादाद में शिक्षा से होने वाली बेदखली के खिलाफ़ आंदोलन खड़ा करने के अलावा उनके पास कोई विकल्प न बचा था।

ऐतिहासिक संदर्भ और हमारा संकल्प
डॉ. स्वाति के निधन से सजप और अभाशिअमं दोनों संगठनों में एक बड़ा शून्य बन गया है, जिसे भर पाना मुश्किल होगा। बदकिस्मती से यह ऐसे वक्त हुआ है जब मुल्क आज़ादी के बाद के सबसे कठिन सियासी दौर से गुज़र रहा है। ऐसे वक्त स्वाति जैसी शख़्सियत का होना देश के लिए निहायत ज़रूरी था।
हमें इस अनोखी बात पर गौर करना चाहिए कि एक शख़्सियत ने विज्ञान और वैज्ञानिक सोच की राह पर चलते हुए सक्रिय राजनीति और समाज में बराबरी और इंसाफ के लिए ज़मीनी जद्दोजहद में भी हिस्सा लिया। जब इतिहास में ऐसी मिसालें ढूँढी जाएँगी, तो इस अनोखे किरदार के एक उम्दा प्रतिनिधि बतौर डॉ. स्वाति को उनकी यह ऐतिहासिक जगह देने से कोई इंकार नहीं कर पाएगा !
तक़रीबन एक साल की अवधि में ही अभाशिअमं ने अपने दो स्तंभ खो दिए हैं – डॉ. मेहर इंजीनियर और डॉ. स्वाति – दोनों ही पेशे से वैज्ञानिक थे। दोनों ने हमारे आंदोलन में अपनी खास भागीदीरी निभाई। आइए, हम उनके अभी बाक़ी रह गए एजेंडे पर काम करते रहने की शपथ लें और उन दोनों को सलाम कहें!

[जुलाई-अगस्त 1996 की ‘सामयिक वार्ता’ में साथी स्वाति की यह टिप्पणी छपी थी।वार्ता बनारस से छपती थी।]

    मेरे सामाजिक-राजनैतिक जीवन के शैशव काल में ‘लोकायन-लोकनिधि’ संस्था की ओर से आदरणीय श्री पंकज जी ने मुझे ‘भारतीय समाज में स्त्री की स्थिति’ पर पर्चा पढ़ने के लिए आमंत्रित किया था।यह मेरा इस विषय पर पहला पर्चा था जो हमारे समाज में श्रम विभाजन,जाति प्रथा व परिवार तथा समाज में स्त्री की प्रतिष्ठा पर केंद्रित था।इसके बाद उस गोष्ठी मुझसे कई प्रश्न पूछे गए अधिकांश ऊलजलूल।कंझावला (दिल्ली से सटा हरियाणा का एक गांव) से दो किसान भाई भी थे। उनमें से एक ने अपने वक्तव्य में में कहा था कि अगर औरतें घर से बाहर निकलेंगी तो उन्हें बसों में,सार्वजनिक जगहों में धक्का-मुक्की तथा शरीर को स्पर्श करती हुई मर्दों की अश्लील हरकतों को सहना ही होगा।तब डी.टी.सी. बसों में औरतों के लिए आरक्षित सीटें नहीं हुआ करती थीं। अगस्त 1988 में ज्ब श्रीमती रूपन देवल बजाज,जो कि पंजाब कैडर की आई.ए.एस. अधिकारी हैं,ने पंजाब के तत्कालीन सर्वशक्तिमान, ख्यातनामा  पुलिस महानिरीक्षक कंवरपाल सिंह गिल पर आरोप लगाया कि उन्होंने अफसरों की एक पार्टी में उनके नितंब थपथपाने की अश्लील हरकत की तो ज्यादातर अखबारों ने कहा कि यह सब तो होता ही रहता है व श्रीमती बजाज को ऐसे मामलों को सार्वजनिक नहीं करना चाहिए। विशेषतः (1) जब किसी विशिष्ट व्यक्ति द्वारा हरकत हुई हो (2) जब, वह शराब के नशे में हो।श्री कपूर (पंजाब के वित्त सचिव जिनके यहां पार्टी थी) व राज्यपाल श्री सिद्धार्थशंकर राय दोनों ने हीं श्री गिल से माफी मांग कर मामले को रफा-दफा करने की सलाह दी।मगर श्रीमती रूपन देवल बजाज व उनके पति ने न्यायालय में आई.पी.सी. धारा 354 एवं 509 के तहत मुकदमा दायर किया।इनमें से धारा 354 औरत के साथ अभद्र व्यवहार करने की है। आठ साल बाद चण्डीगढ़ की एक अदालत के मुख्य न्यायाधीश श्री दर्शन सिंह ने श्री गिल को तीन महीना सश्रम कारावास व 700 रु जुर्माना की सजा दी है। उन्हें तीन  दिन की मोहलत ऊपरी अदालत में अपील के लिए दी है।कुछ लोगों को शंका है कि अब ऐसे मुकदमों की बाढ़ आ जाएगी,कुछ को लगता है कि श्रीमती बजाज ने व्यक्तिगत खुन्नस के कारण अदालत के दरवाजे खतखटाए परंतु मुझे तो लगता है कि सामाजिक कुंठाओं और वर्जनाओं के कारण जो पुरुष की आखेटक  प्रवृत्ति बरकरार है समाज में उस पर रोक लगेगी । अश्लील हरकत करने से पुरुष डरेंगे तथा महिलाओं व लड़कियों के समाज में स्वच्छंद घूमने में सुविधा होगी।

    इस मामले में श्रीमती रूपन देवल बजाज को गलत ठहराने में दो प्रमुख स्तंभकार महिलाएं थीँ –तवलीन सिंह व नीलम महाजन सिंह।उनकी चर्चा का स्तर यह था कि जिस समाज में पार्टियों एक दूसरे के गले लोग पड़ते हैं उसमें जो गिल ने किया वह सामान्य था। श्रीमती बजाज तिल का ताड़ बना रही हैं।

संसद के इसी सत्र में कांग्रेस की सुश्री सरोज खापर्डे ने राज्यसभा में एक विधेयक रखा है जिसमें हर  गृहणी को एक साप्ताहिक अवकाश देना जरूरी हो ऐसी मांग की गई है। प्रसिद्ध वकील रानी जेठमलानी ने कहा है कि यह विधेयक अधूरा है,विवाह के समय पति की संपत्ति का आधा हिस्सा पत्नी को मिलना चाहिए। कम्युनिटी ऑफ प्रॉपर्टी (संपत्ति का आधा हिस्सा) नाम से यह फ्रांस,इंग्लैण्ड आदि कई देशों में दिया जाता है ताकि पत्नी के परिवार चलाने के योगदान की प्रतिष्ठा हो।

 

 

समाजवादी जन परिषद

816, रुद्र टॉवरकरमजीतपुरसुंदरपुर,

 वाराणसी 221005

 
 

सजप  विज्ञप्ति

 

पत्रांक 3/ 2020                                    दिनांक 27-04- 2020

 

व्यवस्थाओं का पोल खोलती कोरोना का कहर और सजप की पहल

 

विश्वव्यापी कोरोना महामारी के उत्पन्न हुए पांच महीने हो गए। भारत में इसका पहला मामला 30 जनवरी को प्रकट हुआ। इसके बाद से तमाम कोशिशों के बावजूद यह निर्बाध बढ़ता ही जा रहा है। दुनिया में इससे अब तक मरनेवालों की संख्या दो लाख से ऊपर हो गई है। इसके सबसे ज्यादा शिकार विकसित देशों में हो रहे हैं। अमेरिका जैसी महाशक्ति कोरोना के आगे लाचार है और सबसे पीछे चलने के बाद भी वहां अभी सर्वाधित मौत के आंकड़े 55,000 से अधिक हो रहे हैं। विवादास्पद रूप से अपने उत्पत्ति स्थान में चीन में कितने लोग मारे गए हैं, इसका आंकड़ा हमेशा की तरह संदेहास्पद है। चीन जैसे कठोर नियंत्रित और एकदल आधिपत्य वाले देश में इसी नियंत्रण का नतीजा है कि बाहरी दुनिया इसके बताए आंकड़ों पर विश्वास नहीं कर रही और कई लोगों तो आशंका है कि वहां मौत के आंकड़े करोड़ तक में जा सकते हैं। इस आशंका को बल तब और मिल जाता है जब चीन एक बार कोरोना मुक्त घोषित हो जाने के बाद फिर इस संक्रमण का शिकार हो रहा है। जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने अपने परंपरागत अनुशासन और दुरुस्त सरकारी व्यवस्था की बदौलत इसके संक्रमण को एक हद तक रोकने में सफल रहा है।

 

भारत और लगभग दक्षिण एशिया में कोरोना का कहर सबसे अंत में शुरू हुआ है। इस बीच दुनिया भर की सूचनाएं हमारे यहां आती रही हैं और इससे बचाव का हमारे पास पर्याप्त समय भी मिला है। जैसा कि ऊपर बताया गया है, भारत में कोरोना का पहला मामला 30 जनवरी को केरल में उद‌्घाटित हुआ। इसके बाद सरकारी और व्यवस्थागत हीला हवाली के साथ 24 मार्च तक चला। आरोप यह भी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट‌्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 20 फरवरी के कार्यक्रम के लिए और बाद में मध्य प्रदेश में कांग्रेस सरकार गिराकर भाजपा सरकार बनाने की कवायद के लिए तब तक हीला हवाली बनाए रखा। इस दौरान कोराना भी अपना पांव पसारता रहा। अंत में 24 मार्च को बिना सर्वानुमति बनाए या इसकी पूर्व चर्चा किए सरकार की ओर से देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा कर दी गई। उस समय देश में 657 संक्रमित थे। लॉकडाउन के एक महीना से अधिक बीत जाने के बाद आज संक्रमितों की संख्या 30,000 के पास पहुंच गई है तो मृतक संख्या 1000 के आसपास हैं।

 

इस पूरे प्रकरण से एक बात साफ हो गई है कि हमारी सरकारी व्यवस्था बुरी तरह से लचर है और किसी संकट के समय इसके हाथ पावं फूल जाते हैं। हम यहां सरकार को किसी प्रकार की मोहलत देने के पक्ष में इसलिए नहीं हैं कि सरकारों को हमेशा निर्णय लेने और व्यवस्था करने की छूट होती है। सरकारों के पास हर तरह की जानकारी और विशेषज्ञता सर्वोच्च स्तर पर होती है जिसके लिए वह देश की जनता से पूरा खर्च वसूल करती है। सतर्क सरकारों ने इसका उपयोग किया है और मामले को नियंत्रण में भी रखा है। इस मामले में कई सरकारी त्रुटियां उजागर हुई हैं, जिसकी ओर हम लोगों का ध्यान आकृष्ट करना चाहेंगे।

 

30 जनवरी के बाद से देश में करीब 15 लाख लोग विदेशों से आए। इन सबके साथ जांच और व्यवहार में लापरवाही हुई। सभी को केवल मुहर लगाकर छोड़ दिया गया। इनमें से कई तो संक्रमित होने के बावजूद पारासिटमोल से बुखार कम कर हवाई अड्डों से निकल आए। इससे बड़ी संख्या में कोराना अपने स्वभाव के अनुसार संक्रमण करने में सफल रहा है। 

 

जब सबसे पहला मामला देश में आया और इसके पहले से कोरोना दुनिया में तहलका मचा रहा था तो इसका अनुभव लेकर विदेश से आनेवाले करीब 15 लाख लोगों को क्वारंटाइन किया जा सकता था। देश की सीमाओं को उसी समय सील कर बाहर से आनेवाले को रोक कर संक्रमण को रोका जा सकता था। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। नमस्ते ट्रंप कार्यक्रम में 1000 के करीब अमेरिकी और विदेशी लोग अहमदाबाद में एकत्र हुए, जिनकी कोई जांच नहीं की गई। इनमें से कई संक्रमित रहे होंगे। यह इस बात से भी साबित होता है कि गुजरात में आज की तारीख तक जो 3000 लोग संक्रमित हैं, उनमें 2000 से अधिक लोग केवल अहमदाबाद में हैं। इसी तरह दिल्ली के निजामुद्दीन में स्थित तबलीगी जमात के कार्यक्रम में दो हजार से अधिक विदेशियों को निर्बाध न केवल आने दिया गया बल्कि जमात द्वारा सूचित किए जाने के बाद भी उनहें वहां से जाने से नहीं रोका गया और न ही वहां बचे लोगों की जांच की व्यवस्था की गई। उल्टे इस घटना का दुरुपयोग कर मामले को सांप्रदायिक रंग देकर देश में उन्माद का वातावरण सत्ताधारी गठबंधन और आरएसएस ने पैदा किया।

 

अगर यह लापरवाही नहीं होती तो शायद इतने लंबे लॉकडाउन की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। केरल में मामले इसलिए नियंत्रण में आ गए, क्योंकि वहां लॉकडाउन को गंभीरता से लिया गया था। तक़रीबन 1,25,000 मामलों को पर्याप्त वॉलेंटियर की मदद से कड़ाई से निगरानी की गई। केरल में चार अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे हैं और अन्य राज्यों से ज़्यादा जोखिम हो सकता था पर प्रभावी क्वारंटाइन से हालात पर नियंत्रण कर लिया गया। देश के बाक़ी हिस्सों में भी ऐसा किया जा सकता था।  भारत में तक़रीबन 9 लाख आशा कार्यकर्ता है इन के अलावा आंगनवाड़ी वर्कर, एएनएम बड़ी संख्या में इस काम में लगाए जा सकते थे।

 

लेकिन असलियत है कि देश की सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं जर्जर हो चुकी है। पीएचसी नाममात्र के हैं। वहां कार्यकर्ता हैं तो दवाएं व जांच की मूलभूत सुविधाएं नदारद हैं। यह पिछले तीस सालों में नवउदारवादी नीतियों के कारण स्थापित निजी अस्पतालों को बढ़ावा देने का नतीजा है।

 

 जब 657 मामले थे तब सरकार ने बिना किसी जिम्मेदारी के देशभर में पूर्ण लॉकडाउन घोषित कर दिया और लाखों प्रवासी मजदूरों को रोजगार विहीन कर सड़कों पर भूखे-प्यासे मरने को छोड़ दिया। लेकिन जब प्रतिदिन 1400 से 1700 तक नए मामले आ रहे हैं, ऐसे में लॉकडाउन सरकार ने कुछ सामान को छोड़ कर सभी दुकानों को खोलने की छूट दे दी। कारखानों और व्यावसायिक प्रतिस्थानौं के लिए सशर्त छूट पहले ही दी जा चुकी है। सरकार के इन निर्णयों का क्या अर्थ लगाया जाय? ऐसे ही कई सवाल उठ रहे हैं। मसलन,

 

– कोरोना वायरस का प्रसार अब शिथिल पर गया है? तो फ़िर रोज 1400 से 1700 तक केस कैसे रिपोर्ट हो रहे हैं?

 

– कोरोना को रोकने के लिए सम्पूर्ण लॉकडाउन की आवश्यकता नहीं है? तो फ़िर पिछले एक महीने का लॉकडाउन अज्ञान के कारण लगाया गया?

 

– क्या हमने इस एक महीने में कोरोना से लड़ने की तैयारी कर ली? फ़िर अभी तक मात्र प्रति मिलियन (दस लाख में) 420 (झारखण्ड राज्य का यह आँकड़ा सबसे कम मात्र 60 का है)  जांच ही क्योँ हुए, जबकी बाकी सभी प्रभावित देशों ने अपनी जनसंख्या के प्रति मिलियन 7000 से 27000 तक जांच किए हैं।

 

– यदि हमने पीपीई (व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण) की व्ववस्था कर ली है तो सरकारी अस्पतालों के ओपीडी (ब्राह्य मरीज विभाग) क्योँ बन्द हैं? मरीजों को अन्य बीमारियों का इलाज क्योँ नहीं मिल पा रहा?

 

केंद्र एवं राज्य सरकारें (केरल और गोवा को छोडकर) अपनी नाकामी को छुपाने के लिए लॉकडाउन को ढाल बना रही है। लेकिन इस तरह के लंबे लॉकडाउन से कोरोना तो नहीं ही रुकेगा, अर्थव्यवस्था जरूर तबाह हो जाएगी। दिहाड़ी मजदूर और उनका परिवार भूख से बीमार होंगे/ मरेंगे, कोरोना के अलावा दूसरी बीमारियों से पीड़ित इलाज के अभाव में मरणासन्न होंगे/ मरेंगे और बहुत सारी समस्याएं पैदा होंगी। इसके साथ ही लॉकडाउन की पूरी कीमत असंगठित क्षेत्र के 60 फ़ीसदी आबादी से वसूली जा रही है, जिनकी दिहाड़ी चली गई और आगे भी आजीविका कोई साधन नजर नहीं आता। लॉकडाउन के कारण आनेवाली मंदी का खामियाजा भी उन्हें ही सबसे ज्यादा भुगतना पड़ेगा। इनके पास न संसाधन है और ना हीं भविष्य के लिए बचाया गया धन। सरकारी पैकेजों में इन की बुनियादी ज़रूरतों को भी अनदेखा किया गया है।

 

सांप्रदायिक उन्माद को बढ़ावा देने वाली ख़बरें भी लगातार तेज हो रही हैं। इसके साथ ही विपक्षी दलों के शासन वाले राज्य सरकारों के साथ भेदभाव और विभिन्न नियमों को लागू कर सत्ता और व्यवस्था का केंद्रीकरण किया जा रहा है। इसी मौके का नाजायज फायदा उठाकर पीएम केयर्स फंड गठित कर दिया गया है, जिसकी कोई जरूरत नहीं थी। क्योंकि प्रधानमंत्री आपदा राहत कोष पहले से ही देश में मौजूद है, जिसमें सरकारी लोगों के अलावा विपक्ष के नेता और कई अन्य प्राधिकारी होते हैं। पीएम केयर्स के द्वारा सरकार ने इसे अपने कब्जे में कर लिया है। इसका न तो कोई ऑडिट होनेवाला है और न ही इसकी जानकारी स्वच्छ व साफ रहेगी। आगे वित्तीय इमरजेंसी की भी आशंका जताई जा रही है।

 

अब जबकि मामला यहां तक बढ़ गया है और आशंका है कि आगे देश में इस का संक्रमण तेजी से फैलेगा, एक बार फ़िर सरकारों से और प्रबुद्ध जनों से आग्रह है कि दूसरे देशों के अनुभव के आधार पर कोरोना से लडाई में हम निम्न प्राथमिकताओं के आधार पर आगे बढ़ने का माहौल बनाएं-

 

  1. हॉटस्पॉट इलाकों में हर व्यक्ति की जांच की व्यवस्था की जाए।

 

2 पीपीई किट की समुचित व्यवस्था कर स्वास्थ्यकर्मियों को संक्रमित होने से बचाया जाय। अस्पतालों और वहां के ओपीडी को चालू किया जाए।

 

  1. सरकारनिजी अस्पतालों को सुविधाएं देना बंद करे तथा सरकारी स्वास्थ्य सेवा ढांचे को मजबूत करे, उस पर ज्यादा खर्च करे। डॉक्टरों की फ़ीस पर अंकुश लगाना चाहिए, उनके दाम सीजीएचएस फीस से ज़्यादा हरगिज़ नहीं होना चाहिए।

 

  1. जीडीपीका कम से कम 12 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं पर सरकारी तौर पर खर्च की योजना बनें। यह योजना विकेंद्रित रूप में यानी केंद्र, राज्य, ज़िला परिषद और ग्राम पंचायत सरकारों के स्तर पर होना चाहिए। इस राशि में हरेक स्तर को 3% का स्वत: आवंटन मासिक किश्तों में हो और ज़िम्मेदारियों का भी साफ़ बँटवारा हो। महामारी पर किए गए खर्च इसके बाहर आपदा नियंत्रण कोष से हो।

यह 12% अच्छे गरीब देशों के दशकों क़ा अनुभव जन्य आंकड़ा है। उन देशों ने स्वास्थ्य सुधार कर तुरत फ़ायदा लिया और GDP बढ़ाई।)

 

5.आपात अवस्था में निजी अस्पतालों में सभी का निःशुल्क इलाज होना चाहिए। आयुष शाखाओं को मजबूत किया जाए और उनहें पर्याप्त मदद दी जाए।

 

  1. वैश्विक महामारी का सामना करने के लिए “राष्ट्रीय / राज्य एकता सरकार”  भी अनिवार्य ज़रूरत है. अन्यथा इस आपदा का सामना करने की राजनीतिक ताक़त, सही “राष्ट्रीय मानसिक वातावरण”  और निकम्मी – असम्वेदनशील अफ़सर शाही की सक्षमता नहीं बन सकते हैं. सजप इसकी माँग पहले ही कर चुकी है. सभी सरकारें विपक्ष के नेताओं को औपचारिक रूप से मंत्रिमंडल में शामिल कर इसका पहला और छोटा क़दम लेकर केन्द्र और राज्य सरकारें  इस ढाँचे को तुरत लागू करें.

 

(गौरतलब है कि अमेरिका और जापान दोनों देशों में निजी अस्पताल है पर जापान में फ़ीस आदि पर सरकार ने एक सीमा निर्धारित की है और सभी को आय का एक निश्चित हिस्सा स्वास्थ्य निधि में काटा जाता है और जो असमर्थ है उनका बीमा सरकार करवाती है। इस तरह सभी के इलाज की बराबर व्यवस्था की गई है। दूसरी तरफ अमेरिका में बीमा राशि के अनुसार निजी बीमा कंपनियां इलाज का ग़ैर बराबर इंतज़ाम करती है। बीमा राशि कर्मचारी या व्यक्ति देते है। बुज़ुर्गों के लिए पूरा ख़र्च सरकार करती है. विधवाओं, महिला मुखिया वाले परिवार का भी ख़र्च सरकार करती है। इसके बाद भी 12 फ़ीसदी आबादी का इलाज के लिए बीमा नहीं होता है।  दुनियां में अमेरिका राष्ट्रीय आय का सबसे ज़्यादा का 18 फ़ीसदी स्वास्थ्य पर ख़र्च करता है फिर भी यह लचर है। अरबों डॉलर कदाचार के मुक़दमे अदालतों में चल रहे हैं। यहां ध्यातव्य है कि पिछले तीस सालों में हम इसी लचर व्यवस्था की तरफ बढ़ रहे हैं। निजी अस्पतालों पर आधारित आयुष्मान भारत योजना इन ख़ामियों से भरा है।)

 

  1. लॉकडाउनकड़ाई से उन्हीं जगहों पर लागू किया जाय जहाँ कोरोना के संक्रमित पाए गए हों। अनावश्यक जगहों पर लॉकडाउन करने से बीमार अस्पतालों तक नहीं पहुंच पाएंगे और कोरोना संक्रमितों की पहचान टलती जाएगी। ध्यान रहे 80% कोरोना संक्रमितों में किसी भी प्रकार के लक्षण नहीं होते। सभी जगहों से ज्यादा से ज्यादा लोगों के सैम्पल जांच होने आवश्यक हैं।

 

  1. बुलेटट्रेन, सेंट्रल विस्टा, एनपीआर जैसे फिजूल्खर्ची वाले प्रोजेक्ट निरस्त कर उन पैसों को स्वास्थ्य सुविधाओं सुधारने के लिए आवंटित किया जाए।

 

  1. वैश्विकमहामारी कोरोना, इतिहास का पहला और अपने आप में अनूठा महासंकट है जिसे जनता के हर तबके के साथ मिल कर ही हराया जा सकता है। इसमें लगातार और सही जानकारियां साझा करना, समाज के सभी वर्गों/ समूहों को विश्वास में लेना, वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना, अन्धविश्वास और अफवाहों को फैलने से रोकना और सम्प्रदायिक सौहार्द बनाए रखना जरूरी है।

 

  1. असंगठितक्षेत्र के मजदूरों के लिए रेाजगार सृजन के लिए मनरेगा जैसी योजनाओं में पर्याप्त राशि आवंटित की जाए और इनका पिछला भुगतान भी दिया जाए। निचले स्तर पर येाजनाएं बनने से पलायन रुकेगा। इन मजदूरों के खातों में प्रति व्यक्ति 10,000 रुपये तत्काल दिए जाएं।

 

  1. बेरोजगारीके दिनों तक गरीब तबकों और किसानों को राशन, बिजली, मुफ्त दी जाए और कृषि ऋ्रणों को माफ किया जाए। पीडीएस और पीएचएस सेवाओं का विकेंद्रीकरण हो। नवउदारवादी व्यवस्था को खत्म किया जाए।

 

  1. वैश्विकमहामारी का सामना करने के लिए “राष्ट्रीय / राज्य एकता सरकार”  अनिवार्य ज़रूरत है। अन्यथा इस आपदा का सामना करने की राजनीतिक ताक़त, राष्ट्रीय मानसिक वातावरण  नहीं बन सकते हैं न ही निकम्मी- असंवेदनशील अफ़सरशाही इसे संभाल सकती है। विपक्ष को औपचारिक रूप से मंत्रिमंडल में शामिल कर केंद्र और राज्य सरकारें इस ढांचे को तुरत लागू करे।

 

अतुल कुमार , सचिव

समाजवादी जन परिषद

816, रुद्र टॉवर, करमजीतपुर, सुंदरपुर, वाराणसी 221005

प्रेस विज्ञप्ति

पत्रांक 2/ 2020 दिनांक 15-04- 2020

राष्ट्रीय आपदा में राष्ट्रीय सरकार

सन 2020 मे भारत अन्य देशों की तरह एक विनाशकारी खतरे में COVID-19 विषाणु ( VIRUS) की वैश्विक महामारी के कारण गया है। बीसियों देशों के COVID-19 महामारी के आंकड़ों, विश्लेषणों और ज्ञात सुरक्षा उपायों से निष्कर्ष निकला है कि भारत में करोड़ों लोग संक्रमित होंगे और लाखों लोगों की मौत होगी। साथ ही देश की अर्थव्यवस्था, सामाजिक सदभाव, राजनीतिक स्थिरता, कानून व्यवस्था और खाद्य, सीमा तथा स्वास्थ्य सुरक्षा करीब करीब ढेर हो जायेगी। देश का विशिष्ट वर्ग (Elite), प्रशासक, राज्यतंत्र औऱ वैज्ञानिक वर्ग अब तक इन खतरों को नहीं समझ रहे हैं, और वस्तुस्थिति को जनता से छिपा रहे हैं।

संसदीय और राष्ट्रपति प्रणाली की कई लोकतान्त्रिक सरकारें चरम हालातों लम्बा युद्ध, राष्ट्रव्यापी महामारी (Nationwide Epidemic), वैश्विक आर्थिक युद्ध (Global Economic War), जलवायु महाविपत्ति (Climatic Catastrophe) जैसी मुसीबतों में अकुशल, दुविधा ग्रस्त, और निर्भीक निर्णय मे अक्षम हो जाती हैं। ऐसा इसलिए होता है कि इन सरकारों के पास सम्पूर्ण जनता का समर्थन और उसके प्रतिनिधियों की सहभागिता नहीं होती है।

ऐसे हालातों में राष्ट्रीय सरकार (National Unity Government)” बनाने का विश्व के विभिन्न देशों में कई उदाहरण रहे हैं। इन सरकारोँ ने अपने देश और समाज को भीषण संकट औऱ खतरों से उबारने में सफलता पाई। इन राष्ट्रीय सरकारोँ में संसद की बहुमत वाली पार्टी विपक्षी पार्टियों को भी सरकार में शामिल करती है। सभी पार्टियों के लोग अपने अन्तरविरोधों को कुछ वर्षों के लिये छोड देते हैं। सभी दल मंत्रिमंडल में शामिल होते हैं और तात्कालिक भीषण हालातों से देश को उबारने की कोशिश में लग जाते हैं।

हम नीचे ऐसी राष्ट्रीय एकता सरकारों (National Unity Government)” के कुछ उदाहरण देखेंगे।

1. 1861 में शुरू हुए अमेरिका के गृह युद्ध के समय संयुक्त राज्य अमेरिका में राष्ट्रीय एकता सरकार बनी जिसमें बहुमत वाली रिपब्लिकन पार्टी के अब्राहम लिंकन राष्ट्रपति बने और विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के ऐंडरू जॉनसन उपराष्ट्रपति बने। दोनों पार्टियों की सम्मिलित सरकार ने गृहयुद्ध में गोरे नस्लवादी राष्ट्रतोड़क विद्रोहियों को हराकर नस्लवाद को हराया और अमेरिकी राष्ट्र को टूटने से बचाया।

2. 1930 की भीषण आर्थिक मंदी (The Great Depression) के समय 1931-35 में बिट्रेन में रैमसे मैकडोनाल्ड के प्रधानमंत्री काल में बहुमत वाली लेबर पार्टी ने विपक्षी लिबरल पार्टी के साथ राष्ट्रीय सरकार बनाई।

इसी राष्ट्रीय एकता के उम्मीदवारों ने 1935 का चुनाव मिलकर लड़ा और आंशिक राष्ट्रीय एकता सरकार ने द्वितीय विश्व युद्ध के अंत 1945 तक ब्रिटेन पर शासन किया।

3. दक्षिण अफ्रीका में 1994 में हुए चुनाव के बाद उन सभी दलों के सांसदो को सरकार में शामिल किया गया जिन्हें 10% से ज्यादा वोट आये थे। यह सरकार 1999 तक चली।

4. नेपाल में 2015 के भीषण भूकंप के बाद सभी बड़ी पार्टियों ने मिलकर सरकार और संसद चलाई। इसी दौरान बरसों से मतभेदों मे फँसे हुए नेपाल के नये संविधान को भी बनाया और अंगीकृत किया गया।

5. इटली में 1946 से 2014 के बीच 7 (सात) बार विभिन्न पार्टियों ने मिलकर राष्ट्रीय एकता सरकार चलाई।

6. इज़रायल में कई बार ऐसी राष्ट्रीय एकता सरकार बनी है। सबसे ताज़ा प्रयोग अभी 27 मार्च 2020 का है।

7. ऐसी सरकारे अफगानिस्तान, कनाडा, क्रोएशिया, एस्टोनिया, ग्रीस, हंगरी, केन्या, लेबनान, फिलिस्तीन, श्रीलंका, सूडान, जिम्बाब्वे वगैरह में भी बनी है।

आज भारत में इतिहास का तकाजा है कि केंद्र में इस प्रकार की राष्ट्रीय एकता सरकार तुरंत बने

अभी की कोरोना महामारी के अभूतपूर्व संकट के समय बहुमत वाले केवल एक गठबंधन की सरकार अशक्त रहेगी और कठोर सही निर्णय लेकर उसका कार्यान्वयन नहीं कर पाएगी। उस दक्षता, निर्भीक निर्णयों और कार्यान्वयन के अभाव मे देश और जनता को बीमारी, भूख, मौतें, बेरोजगारी और आर्थिक संकटों की भयानक कठिनाइयों और पीड़ा से गुजरना होगा।

इसलिए अविलंब ऐसी एक राष्ट्रीय एकता सरकार बनाने लिए मैं एक फार्मूला प्रस्तावित कर रहा हूँ मंत्रिमंडल में 100 (सौ) सदस्यों की जगह मान कर गणना करें। लोक सभा चुनाव (2019) में जिस किसी पार्टी को 1 (एक) प्रतिशत से ज्यादा मत मिले थे; उस हरेक पार्टी के प्राप्त वोट प्रतिशत के अनुपात में मंत्री रखे जाँय। 2019 के चुनाव नतीजे बताते हैं कि 13 (तेरह) दलों को एक प्रतिशत से ज्यादा मत आये थे। इन सभी दलों के सदस्यों को लेकर मंत्रिमंडल का पुनर्गठन किया जाय। एक सरसरी गणना बताती है कि केवल 80 सदस्यों का ही मंत्रिमंडल बन सकेगा। क्योंकि छोटे दलों (1% से कम वोट वाले) और स्वतंत्र उम्मीदवारों द्वारा प्राप्त मतों के आधार पर क़ोई प्रतिनिधि मंत्रिमंडल में शामिल नहीं होगा।

भारत की 130 करोड़ जनता को मौत, बीमारी और आर्थिक बरबादी से बचाने के लिए और एक समावेशी सक्षम राजनीतिक नेतृत्व तैयार करने के लिए यह संभव प्रकिया है। संसद मे बहुमत प्राप्त दल इस चुनौती को तुरंत स्वीकार करें और भारत तथा विश्व इतिहास मे एक ऊंची जगह पाएं।

सचि

Samajwadi Jan Parishad

816, Rudra Tower, Karamjeetpur, Sunderpur, Varanasi- 22`005

Press Release

Letter  2/ 2020                                                                                                                                                                           Date 15-04- 2020

Proposal for National Unity Government in Pandemic Crisis

In the year 2020, like many other countries India is on the verge of a historic calamity due to Covid-19 virus pandemic. Assessing the data , analyses and different types of known safety strategies for covid-19 virus pandemic in many other countries    leads to a conclusion that in India about tens of millions citizens  would get infected and hundreds of thousands would die . Moreover the economy , social fabric, political stability, law & order and food, health & defence security will almost collapse. The elite class, bureaucracy,  political class and scientists do not seem to be able to understand this danger till now. They are hiding the facts and future projections from people at large.

Many democratic governments- both Presidential and  Parliamentary fail to meet the challenges like prolonged war, nationwide epidemics, pandemics, global economic war and climatic catastrophe.  Governments elected through both the above mentioned patterns  turn out to be inefficient, indecisive & lack courageous decision making ability.

The governments fail because they do not have the mandate of total population & their representative participation.

In such situations in world history, there have been many successful experiments of formation of “National Unity Governments”  in several  countries.  Such National Governments  were successful in rescuing their countries & societies from dire difficulties  and dangers. In these national unity governments , the ruling majority party or coalition includes  the opposition parties or coalitions in the government.  All parties put off their differences for a short time and come together to form the government and  work collaboratively to get the country out of exigencies.

We will see some real world examples  of such National Unity Governments below.

1.  During the civil war which began in 1861 in USA, a national unity government was formed in which Abraham Lincoln of majority Republican Party became the president and Andrew Johnson of minority Democratic Party  was taken as the vice president. The coalition government of both the parties defeated white racist rebels in the civil war and saved United States of America from  disintegration .

2.   In the times of The Great Depression of 1930 in Britain, in Ramsay McDonald’s prime ministerial term,  the majority labour party collaborated with opponent Liberal Party and formed national unity government.

The candidates of this  national unity coalition together fought the UK parliamentary elections in 1935.  This  new semi national unity government ruled Britain till the end of Second World War  in 1945 .

3. After the elections held in 1994 in South Africa, MPs of all those parties  which  had got more than ten percent of total votes were included in the government. This government ruled till 1999.

4.  After the severe earthquake of Nepal in 2015, all major political parties together formed the government and conducted the parliament in cooperation. During this very period the country’s constitution which was hanging due to differences for several years,  was finalised and implemented.

5.   In Italy, from 1946 to 2014 different parties collaboratively formed the national unity governments seven times.

6.   In Israel,  this kind of national unity government has been formed several times in past. The latest such National Government has been formed very  recently  on 27th of March 2020 .

7.  Such governments have been formed in many other countries like Afghanistan , Canada,  Croatia, Estonia ,Greece,  Hungary , Kenya , Lebanon , Philippines , Sri Lanka , Sudan and Zimbabwe .

 As a historic need  of the hour, India immediately needs a  National Unity Government at the centre. In this time of unprecedented exigencies of Corona  pandemic , the conventional single party or alliance  governments would be weak, inefficient and incapable of taking and implementing hard difficult decisions. In the absence of right bold decisions & their implementation, the country and its people will suffer enormous hardships and pain of disease, hunger, deaths, unemployment and economic disaster.

To form a National Unity Government  without any delay,  I propose a formula . Let us calculate for a target of one hundred seats in the council of ministers.  In Lok Sabha elections 2019 , all parties that  garnered a minimum one percent or more  votes would be allocated the number of seats in the cabinet in proportion to  percentage of their gained votes. The results of LS elections 2019 show that there are thirteen political parties which had more than one percent of total votes . All these political parties should be included in the council of ministers . Data of elections tell that as per the formula,  there might be eighty members in such council of ministers because the parties which have gained less than one percent of votes and independent candidates would not be included in cabinet.

It is a possible initiative to develop an inclusive and capable political leadership to save our one thousand and three hundred million people of India from  disease, death and destruction of economy. The party with majority in parliament  will do well to accept it and earn a place in history of India and world.

Secretary 

[ गुजरात में 2002 में हुए नरसंहार के दरमियान एक रक्त रंजित महिला का चित्र देश भर में छपा था। चित्र उत्तर गुजरात के लूनावडा का था। उसी वर्ष दैनिक हिंदुस्तान के वाराणसी संस्करण के पत्रकार मित्र ने साथी स्वाति से महिला संगठनकर्ता के नाते अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के लिए संदेश मांगा था । साथी स्वाति ने यह पत्र लिखा। 7 मार्च 2002 के दैनिक हिंदुस्तान,वाराणसी में यह छपा।]

बहन,

हम महिला आंदोलन से जुड़ी बहनें हर साल 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाते हैं।यह दिन इंग्लैण्ड की मजदूर महिलाओं की सम्मानजनक मजदूरी व समान वेतन की लड़ाई, उनके शोषण व शोषण पर जीत की याद में व अपने अंतर की शक्ति को पहचानने, एकजुटता बनाने के लिए होता है। किसी की भी लड़ाई (अगर वह सामाजिक रूप से सही और बुलंद हो) से खुद को जोड़ने से बेगानापन या मानसिक गुलामी के हालात नहीं बनते। मगर आज अपने रहनुमाओं ने औरत को देशों, जातियों, धर्मों,वर्गों में बांटने के नजरिए को पुख्ता कर दिया है। भुला दी गई है वह पुरानी कहावत , ‘औरत चाहे किसी भी जाति की हो,अपने घर की कहारिन है’।इस कहावत में भी हमारे समाज की जाति व्यवस्था, उसके श्रम के बंटवारे व शारीरिक श्रम से जुड़ी अप्रतिष्ठा की भावना निहित है।यह सच्चाई है कि आज भी घर के अंदर व बाहर दोनों जगह औरत चाहे व किसी भी अंचल की व समाज की किसी भी श्रेणी की क्यों न हो,दबायी जाती है। अपवाद स्वरूप कुछ महिलाएं मिलेंगी जो अपनी जिंदगी के बारे में स्वयं निर्णय ले सकें,पर वह महज अपवाद ही होंगी।

भाजपा के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने वर्ष 2001 को नारी सशक्तिकरण वर्ष घोषित किया।सेमिनारों के व्याख्यान और प्रसार माध्यमों की घोषणाओं से प्रतीत होने लगा कि नारी आंदोलन की कोई आवश्यकता अब भारतीय समाज को नहीं रही क्योंकि नारी आंदोलन के प्रमुख मुद्दों – कन्या भ्रूण हत्या,पारिवारिक हिंसा, व राजनीतिक शक्तिकरण (विधायिकाओं में 33% आरक्षण का महिला बिल)- को सरकार ने अपना लिया है व अपना मन बना लिया है कि वह इन पर शीघ्र ही कार्रवाई करेगी।

2001 के अंत तक स्पष्ट हो गया कि महिलाओं को बरगलाने के अलावा इनमें से किसी पर भी कारगर कानून बनाने की इच्छा शक्ति सरकार की नहीं है।उदाहरण के लिए कन्या भ्रूण हत्या का व्यापक कानून 1996 में ही बन गया था परंतु उस पर अमल नहीं किया गया-कड़ाई से अमल की बात तो दूर रही।मई 2001 में संशोधन हेतु सरकार ने जिस तरह की जांच समितियों का गठन किया उनकी सिफारिशों के लागू होने पर इस कानून के शिकंजे से बच निकलना ज्यादा आसान हो गया है।

दरअसल मनुवादी समाज की स्थापना को आदर्श मानने वाले संघ परिवार के राजनैतिक प्रतिनिधि स्त्री के शक्तिकरण हेतु ठोस उपाय कैसे लागू करेंगे। वादों की मृगमरीचिकाओं में जनता को भटका जरूर सकते हैं। औरतों के संदर्भ में इनकी मूल दृष्टि पर गौर करें। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन प्रमुख श्री गोलवलकर ने हिंदू स्त्री को पारिवारिक संपत्ति में बराबर का हिस्सा देने वाले कानून का विरोध किया था।भाजपा महिला मोर्चा की पूर्व अध्यक्ष विजयराजे सिंधिया ने सती निरोधक कानून का विरोध करते हुए कहा था,’हिंदू स्त्री को सती होने का बुनियादी अधिकार है चूंकि इससे हमारी गौरवमयी परंपरा और संस्कृति संरक्षित होती है। भाजपा महिला मोर्चा की एक अन्य पूर्व अध्यक्ष व वर्तमान में केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड की अध्यक्ष श्रीमती मृदला सिन्हा ने 1993 में      ‘द टेलिग्राफ’ से साक्षात्कार में निम्नलिखित बातें कहीं थीं।जिस जिम्मेदार पद पर आज वे आसीन हैं उसके मद्देनजर स्त्री-कल्याण के भाजपाई रवैये का अंदाज लगाया जा सकता है। मृदुला सिन्हा के शब्दों मेँ

  • स्त्री को घर के बाहर कार्य नहीं करना चाहिए।परिवार अत्यंत गरीब हो तब ही वह घर के बाहर काम पर जाए।
  • स्त्रियों पर घरेलु हिंसा में क्या बुराई है?अक्सर इन मामलों में स्त्री की ही गलती होती है।
  • मैं स्त्री मुक्ति की विरोधी हूं क्योंकि स्त्री मुक्ति अनैतिकता का दूसरा नाम है।
  • मैंने दहेज दिया था और दहेज प्राप्त भी किया था।
  • स्त्री-पुरुष के समान अधिकारों का हम विरोध करते हैं।

भाजपा के पूर्व अध्यक्ष कुशाभाऊ ठाकरे ने एक उपचुनाव के दौरान सभी दलों द्वारा 3 से 7 प्रतिशत महिला उम्मीदवारों की संख्या के बारे में पूछे जाने पर कहा कि महिलाएं सही ढंग से चुनाव तभी लड़ सकती हैं जब सीट महिलाओं के लिए आरक्षित हो।कोई भी दल प्रतिनिधि बनाने का हुआ नहीं खेलना चाहता।स्पष्ट है कि राजनैतिक आरक्षण के बिना औरतें ज्यादा संख्या में सत्ता की गलियों में नहीं पहुंचेंगी।नजमा हेपतुल्ला या सुषमा स्वराज जैसी इक्की-दुक्की ‘टोकेन’,दिखाने भर के लिए प्रतिनिधि ही बनेंगी,जिसमें सत्ता चाहे किसी पार्टी की हो नियम कानून पुरुषसत्तात्मक समाज बनायेगा।

आज जब गुजरात दंगों की आग में,सांप्रदायिकता के ईंधन से दावानल सा धधक रहा है तब महिलाओं का राजनैतिक सशक्तिकरण (आरक्षण) सामाजिक परिवर्तन बलात करने के लिए एकमात्र कारगर औजार के रूप में दिखता है।महिलाएं ऐसा कानून बनाएंगी कि जिस राज्य में तीन दिन से अधिक दंगे चलेंगे वहाम संविधान की एक नयी धारा सृजित धारा के अंतर्गत राज्य के प्रशासन को पंगु मानते हुए सरकार को बरखास्त किया जाएगा और पहले चरण में राष्ट्रपति शासन होगा तथा तथा छः महीने के भीतर विधानसभा चुनाव कराए जाएंगे। राज्य शासन की अकर्मण्यता पर जनता अपना निर्णय व्यक्त कर देगी जैसे कि उत्तर प्रदेश के भाजपा-गठबंधन की सरकार पर हालिया चुनाव ने प्रश्न खड़े किए हैं।इस चुनाव परिणाम से उपजी हताशा भाजपा के आनुषंगिक संगठनों को मंदिर निर्माण की मांग को तेज करने व बलवा फैलाने की तरफ मोड़ा है।

लूनावाड़ा (गुजरात) की अनाम बहन !यह सब तथ्य,यह विश्लेषण तुम्हारा खून से सना दुखी व लाचार चेहरा देख कर तुम जैसी दुखी बहनों के लिए संदेश है। माना कि आज तुम्हारे परिवार,पड़ोसी,साथी,किसी को भी बचाने में गुजरात की सरकार या हम देशवासी नाकामयाब रहे।मगर तुम्हें इस दरिंदगी भरी जिंदगी से हमें उबारना ही होगा।उबारना ही होगा अपने देश को,समाज को अपने बच्चों के लिएजो जन्म ले चुके हैं वे भी जो अजन्मे हैं उनके लिए भी।

गोधरा से लेकर लूनावाड़ा तक,नेल्लि (असम) से लेकर दिल्ली तक सियासी खेल औरतों की इज्जत लूट कर ही खेले जाते हैं।रघुवीर सहाय ने ठीक ही कहा है कि ‘ औरत की देह ही उसका देश है।इसी से वह गढ़ती भी है-इसीसे वह बांटी भी जाती है जाति,धर्म,वर्ग,देश व संस्कृति के कटघरों में।

हमको अपनी बंटी हुई जिंदगियों,बंटे हुए अहसासात को महसूस कर एकजुटता बनानी होगी-ताकि हम लड़ सकें।उन हालात से जो हमें तोड़ते हैं और हमारे देश को भी।

डॉ स्वाति,संयोजक ,नारी एकता  IMG-20200623-WA0043

संयोजक,

 

नारी एकता

https://youtu.be/xjU6YwT0HZk

पसंद आए तो साझा भी कीजिए।बातचीत के आखीर में राजेंद्र राजन की कविता का अफ़लातून ने पाठ किया है।

समाजवादी जन परिषद
816, रुद्र टॉवर, करमजीतपुर, सुंदरपुर, वाराणसी 221005
प्रेस विज्ञप्ति
पत्रांक 2/ 2020 दिनांक 15-04- 2020
राष्ट्रीय आपदा में राष्ट्रीय सरकार

सन 2020 मे भारत अन्य देशों की तरह एक विनाशकारी खतरे में COVID-19 विषाणु ( VIRUS) की वैश्विक महामारी के कारण आ गया है। बीसियों देशों के COVID-19 महामारी के आंकड़ों, विश्लेषणों और ज्ञात सुरक्षा उपायों से निष्कर्ष निकला है कि भारत में करोड़ों लोग संक्रमित होंगे और लाखों लोगों की मौत होगी। साथ ही देश की अर्थव्यवस्था, सामाजिक सदभाव, राजनीतिक स्थिरता, कानून- व्यवस्था और खाद्य, सीमा तथा स्वास्थ्य सुरक्षा करीब करीब ढेर हो जायेगी। देश का विशिष्ट वर्ग (Elite), प्रशासक, राज्यतंत्र औऱ वैज्ञानिक वर्ग अब तक इन खतरों को नहीं समझ रहे हैं, और वस्तुस्थिति को जनता से छिपा रहे हैं।

संसदीय और राष्ट्रपति प्रणाली की कई लोकतान्त्रिक सरकारें चरम हालातों लम्बा युद्ध, राष्ट्रव्यापी महामारी (Nationwide Epidemic), वैश्विक आर्थिक युद्ध (Global Economic War), जलवायु महाविपत्ति (Climatic Catastrophe) जैसी मुसीबतों में अकुशल, दुविधा ग्रस्त, और निर्भीक निर्णय मे अक्षम हो जाती हैं। ऐसा इसलिए होता है कि इन सरकारों के पास सम्पूर्ण जनता का समर्थन और उसके प्रतिनिधियों की सहभागिता नहीं होती है।

ऐसे हालातों में “राष्ट्रीय सरकार (National Unity Government)” बनाने का विश्व के विभिन्न देशों में कई उदाहरण रहे हैं। इन सरकारोँ ने अपने देश और समाज को भीषण संकट औऱ खतरों से उबारने में सफलता पाई। इन राष्ट्रीय सरकारोँ में संसद की बहुमत वाली पार्टी विपक्षी पार्टियों को भी सरकार में शामिल करती है। सभी पार्टियों के लोग अपने अन्तरविरोधों को कुछ वर्षों के लिये छोड देते हैं। सभी दल मंत्रिमंडल में शामिल होते हैं और तात्कालिक भीषण हालातों से देश को उबारने की कोशिश में लग जाते हैं।

हम नीचे ऐसी “राष्ट्रीय एकता सरकारों (National Unity Government)” के कुछ उदाहरण देखेंगे।

  1. 1861 में शुरू हुए अमेरिका के गृह युद्ध के समय संयुक्त राज्य अमेरिका में राष्ट्रीय एकता सरकार बनी जिसमें बहुमत वाली रिपब्लिकन पार्टी के अब्राहम लिंकन राष्ट्रपति बने और विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के ऐंडरू जॉनसन उपराष्ट्रपति बने। दोनों पार्टियों की सम्मिलित सरकार ने गृहयुद्ध में गोरे नस्लवादी राष्ट्रतोड़क विद्रोहियों को हराकर नस्लवाद को हराया और अमेरिकी राष्ट्र को टूटने से बचाया।
  2. 1930 की भीषण आर्थिक मंदी (The Great Depression) के समय 1931-35 में बिट्रेन में रैमसे मैकडोनाल्ड के प्रधानमंत्री काल में बहुमत वाली लेबर पार्टी ने विपक्षी लिबरल पार्टी के साथ राष्ट्रीय सरकार बनाई।

इसी “राष्ट्रीय एकता” के उम्मीदवारों ने 1935 का चुनाव मिलकर लड़ा और आंशिक राष्ट्रीय एकता सरकार ने द्वितीय विश्व युद्ध के अंत 1945 तक ब्रिटेन पर शासन किया।

  1. दक्षिण अफ्रीका में 1994 में हुए चुनाव के बाद उन सभी दलों के सांसदो को सरकार में शामिल किया गया जिन्हें 10% से ज्यादा वोट आये थे। यह सरकार 1999 तक चली।
  2. नेपाल में 2015 के भीषण भूकंप के बाद सभी बड़ी पार्टियों ने मिलकर सरकार और संसद चलाई। इसी दौरान बरसों से मतभेदों मे फँसे हुए नेपाल के नये संविधान को भी बनाया और अंगीकृत किया गया।
  3. इटली में 1946 से 2014 के बीच 7 (सात) बार विभिन्न पार्टियों ने मिलकर राष्ट्रीय एकता सरकार चलाई।
  4. इज़रायल में कई बार ऐसी राष्ट्रीय एकता सरकार बनी है। सबसे ताज़ा प्रयोग अभी 27 मार्च 2020 का है।
  5. ऐसी सरकारे अफगानिस्तान, कनाडा, क्रोएशिया, एस्टोनिया, ग्रीस, हंगरी, केन्या, लेबनान, फिलिस्तीन, श्रीलंका, सूडान, जिम्बाब्वे वगैरह में भी बनी है।

आज भारत में इतिहास का तकाजा है कि केंद्र में इस प्रकार की “राष्ट्रीय एकता” सरकार तुरंत बने

अभी की कोरोना महामारी के अभूतपूर्व संकट के समय बहुमत वाले केवल एक गठबंधन की सरकार अशक्त रहेगी और कठोर सही निर्णय लेकर उसका कार्यान्वयन नहीं कर पाएगी। उस दक्षता, निर्भीक निर्णयों और कार्यान्वयन के अभाव मे देश और जनता को बीमारी, भूख, मौतें, बेरोजगारी और आर्थिक संकटों की भयानक कठिनाइयों और पीड़ा से गुजरना होगा।

इसलिए अविलंब ऐसी एक “राष्ट्रीय एकता सरकार” बनाने लिए मैं एक फार्मूला प्रस्तावित कर रहा हूँ । मंत्रिमंडल में 100 (सौ) सदस्यों की जगह मान कर गणना करें। लोक सभा चुनाव (2019) में जिस किसी पार्टी को 1 (एक) प्रतिशत से ज्यादा मत मिले थे; उस हरेक पार्टी के प्राप्त वोट प्रतिशत के अनुपात में मंत्री रखे जाँय। 2019 के चुनाव नतीजे बताते हैं कि 13 (तेरह) दलों को एक प्रतिशत से ज्यादा मत आये थे। इन सभी दलों के सदस्यों को लेकर मंत्रिमंडल का पुनर्गठन किया जाय। एक सरसरी गणना बताती है कि केवल 80 सदस्यों का ही मंत्रिमंडल बन सकेगा। क्योंकि छोटे दलों (1% से कम वोट वाले) और स्वतंत्र उम्मीदवारों द्वारा प्राप्त मतों के आधार पर क़ोई प्रतिनिधि मंत्रिमंडल में शामिल नहीं होगा।

भारत की 130 करोड़ जनता को मौत, बीमारी और आर्थिक बरबादी से बचाने के लिए और एक समावेशी सक्षम राजनीतिक नेतृत्व तैयार करने के लिए यह संभव प्रकिया है। संसद मे बहुमत प्राप्त दल इस चुनौती को तुरंत स्वीकार करें और भारत तथा विश्व इतिहास मे एक ऊंची जगह पाएं।

अतुल कुमार
सचिव

समाजवादी जन परिषद
816, रुद्र टॉवर, करमजीतपुर, सुंदरपुर, वाराणसी 221005

सजप विज्ञप्ति

पत्रांक 3/ 2020 दिनांक 27-04- 2020

व्यवस्थाओं का पोल खोलती कोरोना का कहर और सजप की पहल

विश्वव्यापी कोरोना महामारी के उत्पन्न हुए पांच महीने हो गए। भारत में इसका पहला मामला 30 जनवरी को प्रकट हुआ। इसके बाद से तमाम कोशिशों के बावजूद यह निर्बाध बढ़ता ही जा रहा है। दुनिया में इससे अब तक मरनेवालों की संख्या दो लाख से ऊपर हो गई है। इसके सबसे ज्यादा शिकार विकसित देशों में हो रहे हैं। अमेरिका जैसी महाशक्ति कोरोना के आगे लाचार है और सबसे पीछे चलने के बाद भी वहां अभी सर्वाधित मौत के आंकड़े 55,000 से अधिक हो रहे हैं। विवादास्पद रूप से अपने उत्पत्ति स्थान में चीन में कितने लोग मारे गए हैं, इसका आंकड़ा हमेशा की तरह संदेहास्पद है। चीन जैसे कठोर नियंत्रित और एकदल आधिपत्य वाले देश में इसी नियंत्रण का नतीजा है कि बाहरी दुनिया इसके बताए आंकड़ों पर विश्वास नहीं कर रही और कई लोगों तो आशंका है कि वहां मौत के आंकड़े करोड़ तक में जा सकते हैं। इस आशंका को बल तब और मिल जाता है जब चीन एक बार कोरोना मुक्त घोषित हो जाने के बाद फिर इस संक्रमण का शिकार हो रहा है। जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने अपने परंपरागत अनुशासन और दुरुस्त सरकारी व्यवस्था की बदौलत इसके संक्रमण को एक हद तक रोकने में सफल रहा है।

भारत और लगभग दक्षिण एशिया में कोरोना का कहर सबसे अंत में शुरू हुआ है। इस बीच दुनिया भर की सूचनाएं हमारे यहां आती रही हैं और इससे बचाव का हमारे पास पर्याप्त समय भी मिला है। जैसा कि ऊपर बताया गया है, भारत में कोरोना का पहला मामला 30 जनवरी को केरल में उद्घाटित हुआ। इसके बाद सरकारी और व्यवस्थागत हीला हवाली के साथ 24 मार्च तक चला। आरोप यह भी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 20 फरवरी के कार्यक्रम के लिए और बाद में मध्य प्रदेश में कांग्रेस सरकार गिराकर भाजपा सरकार बनाने की कवायद के लिए तब तक हीला हवाली बनाए रखा। इस दौरान कोराना भी अपना पांव पसारता रहा। अंत में 24 मार्च को बिना सर्वानुमति बनाए या इसकी पूर्व चर्चा किए सरकार की ओर से देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा कर दी गई। उस समय देश में 657 संक्रमित थे। लॉकडाउन के एक महीना से अधिक बीत जाने के बाद आज संक्रमितों की संख्या 30,000 के पास पहुंच गई है तो मृतक संख्या 1000 के आसपास हैं।

इस पूरे प्रकरण से एक बात साफ हो गई है कि हमारी सरकारी व्यवस्था बुरी तरह से लचर है और किसी संकट के समय इसके हाथ पावं फूल जाते हैं। हम यहां सरकार को किसी प्रकार की मोहलत देने के पक्ष में इसलिए नहीं हैं कि सरकारों को हमेशा निर्णय लेने और व्यवस्था करने की छूट होती है। सरकारों के पास हर तरह की जानकारी और विशेषज्ञता सर्वोच्च स्तर पर होती है जिसके लिए वह देश की जनता से पूरा खर्च वसूल करती है। सतर्क सरकारों ने इसका उपयोग किया है और मामले को नियंत्रण में भी रखा है। इस मामले में कई सरकारी त्रुटियां उजागर हुई हैं, जिसकी ओर हम लोगों का ध्यान आकृष्ट करना चाहेंगे।

30 जनवरी के बाद से देश में करीब 15 लाख लोग विदेशों से आए। इन सबके साथ जांच और व्यवहार में लापरवाही हुई। सभी को केवल मुहर लगाकर छोड़ दिया गया। इनमें से कई तो संक्रमित होने के बावजूद पारासिटमोल से बुखार कम कर हवाई अड्डों से निकल आए। इससे बड़ी संख्या में कोराना अपने स्वभाव के अनुसार संक्रमण करने में सफल रहा है।

जब सबसे पहला मामला देश में आया और इसके पहले से कोरोना दुनिया में तहलका मचा रहा था तो इसका अनुभव लेकर विदेश से आनेवाले करीब 15 लाख लोगों को क्वारंटाइन किया जा सकता था। देश की सीमाओं को उसी समय सील कर बाहर से आनेवाले को रोक कर संक्रमण को रोका जा सकता था। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। नमस्ते ट्रंप कार्यक्रम में 1000 के करीब अमेरिकी और विदेशी लोग अहमदाबाद में एकत्र हुए, जिनकी कोई जांच नहीं की गई। इनमें से कई संक्रमित रहे होंगे। यह इस बात से भी साबित होता है कि गुजरात में आज की तारीख तक जो 3000 लोग संक्रमित हैं, उनमें 2000 से अधिक लोग केवल अहमदाबाद में हैं। इसी तरह दिल्ली के निजामुद्दीन में स्थित तबलीगी जमात के कार्यक्रम में दो हजार से अधिक विदेशियों को निर्बाध न केवल आने दिया गया बल्कि जमात द्वारा सूचित किए जाने के बाद भी उनहें वहां से जाने से नहीं रोका गया और न ही वहां बचे लोगों की जांच की व्यवस्था की गई। उल्टे इस घटना का दुरुपयोग कर मामले को सांप्रदायिक रंग देकर देश में उन्माद का वातावरण सत्ताधारी गठबंधन और आरएसएस ने पैदा किया।

अगर यह लापरवाही नहीं होती तो शायद इतने लंबे लॉकडाउन की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। केरल में मामले इसलिए नियंत्रण में आ गए, क्योंकि वहां लॉकडाउन को गंभीरता से लिया गया था। तक़रीबन 1,25,000 मामलों को पर्याप्त वॉलेंटियर की मदद से कड़ाई से निगरानी की गई। केरल में चार अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे हैं और अन्य राज्यों से ज़्यादा जोखिम हो सकता था पर प्रभावी क्वारंटाइन से हालात पर नियंत्रण कर लिया गया। देश के बाक़ी हिस्सों में भी ऐसा किया जा सकता था। भारत में तक़रीबन 9 लाख आशा कार्यकर्ता है इन के अलावा आंगनवाड़ी वर्कर, एएनएम बड़ी संख्या में इस काम में लगाए जा सकते थे।

लेकिन असलियत है कि देश की सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं जर्जर हो चुकी है। पीएचसी नाममात्र के हैं। वहां कार्यकर्ता हैं तो दवाएं व जांच की मूलभूत सुविधाएं नदारद हैं। यह पिछले तीस सालों में नवउदारवादी नीतियों के कारण स्थापित निजी अस्पतालों को बढ़ावा देने का नतीजा है।

जब 657 मामले थे तब सरकार ने बिना किसी जिम्मेदारी के देशभर में पूर्ण लॉकडाउन घोषित कर दिया और लाखों प्रवासी मजदूरों को रोजगार विहीन कर सड़कों पर भूखे-प्यासे मरने को छोड़ दिया। लेकिन जब प्रतिदिन 1400 से 1700 तक नए मामले आ रहे हैं, ऐसे में लॉकडाउन सरकार ने कुछ सामान को छोड़ कर सभी दुकानों को खोलने की छूट दे दी। कारखानों और व्यावसायिक प्रतिस्थानौं के लिए सशर्त छूट पहले ही दी जा चुकी है। सरकार के इन निर्णयों का क्या अर्थ लगाया जाय? ऐसे ही कई सवाल उठ रहे हैं। मसलन,

  • कोरोना वायरस का प्रसार अब शिथिल पर गया है? तो फ़िर रोज 1400 से 1700 तक केस कैसे रिपोर्ट हो रहे हैं?
  • कोरोना को रोकने के लिए सम्पूर्ण लॉकडाउन की आवश्यकता नहीं है? तो फ़िर पिछले एक महीने का लॉकडाउन अज्ञान के कारण लगाया गया?
  • क्या हमने इस एक महीने में कोरोना से लड़ने की तैयारी कर ली? फ़िर अभी तक मात्र प्रति मिलियन (दस लाख में) 420 (झारखण्ड राज्य का यह आँकड़ा सबसे कम मात्र 60 का है) जांच ही क्योँ हुए, जबकी बाकी सभी प्रभावित देशों ने अपनी जनसंख्या के प्रति मिलियन 7000 से 27000 तक जांच किए हैं।
  • यदि हमने पीपीई (व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण) की व्ववस्था कर ली है तो सरकारी अस्पतालों के ओपीडी (ब्राह्य मरीज विभाग) क्योँ बन्द हैं? मरीजों को अन्य बीमारियों का इलाज क्योँ नहीं मिल पा रहा?

केंद्र एवं राज्य सरकारें (केरल और गोवा को छोडकर) अपनी नाकामी को छुपाने के लिए लॉकडाउन को ढाल बना रही है। लेकिन इस तरह के लंबे लॉकडाउन से कोरोना तो नहीं ही रुकेगा, अर्थव्यवस्था जरूर तबाह हो जाएगी। दिहाड़ी मजदूर और उनका परिवार भूख से बीमार होंगे/ मरेंगे, कोरोना के अलावा दूसरी बीमारियों से पीड़ित इलाज के अभाव में मरणासन्न होंगे/ मरेंगे और बहुत सारी समस्याएं पैदा होंगी। इसके साथ ही लॉकडाउन की पूरी कीमत असंगठित क्षेत्र के 60 फ़ीसदी आबादी से वसूली जा रही है, जिनकी दिहाड़ी चली गई और आगे भी आजीविका कोई साधन नजर नहीं आता। लॉकडाउन के कारण आनेवाली मंदी का खामियाजा भी उन्हें ही सबसे ज्यादा भुगतना पड़ेगा। इनके पास न संसाधन है और ना हीं भविष्य के लिए बचाया गया धन। सरकारी पैकेजों में इन की बुनियादी ज़रूरतों को भी अनदेखा किया गया है।

सांप्रदायिक उन्माद को बढ़ावा देने वाली ख़बरें भी लगातार तेज हो रही हैं। इसके साथ ही विपक्षी दलों के शासन वाले राज्य सरकारों के साथ भेदभाव और विभिन्न नियमों को लागू कर सत्ता और व्यवस्था का केंद्रीकरण किया जा रहा है। इसी मौके का नाजायज फायदा उठाकर पीएम केयर्स फंड गठित कर दिया गया है, जिसकी कोई जरूरत नहीं थी। क्योंकि प्रधानमंत्री आपदा राहत कोष पहले से ही देश में मौजूद है, जिसमें सरकारी लोगों के अलावा विपक्ष के नेता और कई अन्य प्राधिकारी होते हैं। पीएम केयर्स के द्वारा सरकार ने इसे अपने कब्जे में कर लिया है। इसका न तो कोई ऑडिट होनेवाला है और न ही इसकी जानकारी स्वच्छ व साफ रहेगी। आगे वित्तीय इमरजेंसी की भी आशंका जताई जा रही है।

अब जबकि मामला यहां तक बढ़ गया है और आशंका है कि आगे देश में इस का संक्रमण तेजी से फैलेगा, एक बार फ़िर सरकारों से और प्रबुद्ध जनों से आग्रह है कि दूसरे देशों के अनुभव के आधार पर कोरोना से लडाई में हम निम्न प्राथमिकताओं के आधार पर आगे बढ़ने का माहौल बनाएं-

  1. हॉट स्पॉट इलाकों में हर व्यक्ति की जांच की व्यवस्था की जाए।

2 पीपीई किट की समुचित व्यवस्था कर स्वास्थ्यकर्मियों को संक्रमित होने से बचाया जाय। अस्पतालों और वहां के ओपीडी को चालू किया जाए।

  1. सरकार निजी अस्पतालों को सुविधाएं देना बंद करे तथा सरकारी स्वास्थ्य सेवा ढांचे को मजबूत करे, उस पर ज्यादा खर्च करे। डॉक्टरों की फ़ीस पर अंकुश लगाना चाहिए, उनके दाम सीजीएचएस फीस से ज़्यादा हरगिज़ नहीं होना चाहिए।
  2. जीडीपी का कम से कम 12 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं पर सरकारी तौर पर खर्च की योजना बनें। यह योजना विकेंद्रित रूप में यानी केंद्र, राज्य, ज़िला परिषद और ग्राम पंचायत सरकारों के स्तर पर होना चाहिए। इस राशि में हरेक स्तर को 3% का स्वत: आवंटन मासिक किश्तों में हो और ज़िम्मेदारियों का भी साफ़ बँटवारा हो। महामारी पर किए गए खर्च इसके बाहर आपदा नियंत्रण कोष से हो।
    यह 12% अच्छे गरीब देशों के दशकों क़ा अनुभव जन्य आंकड़ा है। उन देशों ने स्वास्थ्य सुधार कर तुरत फ़ायदा लिया और GDP बढ़ाई।)

5.आपात अवस्था में निजी अस्पतालों में सभी का निःशुल्क इलाज होना चाहिए। आयुष शाखाओं को मजबूत किया जाए और उनहें पर्याप्त मदद दी जाए।

  1. वैश्विक महामारी का सामना करने के लिए “राष्ट्रीय / राज्य एकता सरकार” भी अनिवार्य ज़रूरत है. अन्यथा इस आपदा का सामना करने की राजनीतिक ताक़त, सही “राष्ट्रीय मानसिक वातावरण” और निकम्मी – असम्वेदनशील अफ़सर शाही की सक्षमता नहीं बन सकते हैं. सजप इसकी माँग पहले ही कर चुकी है. सभी सरकारें विपक्ष के नेताओं को औपचारिक रूप से मंत्रिमंडल में शामिल कर इसका पहला और छोटा क़दम लेकर केन्द्र और राज्य सरकारें इस ढाँचे को तुरत लागू करें.

(गौरतलब है कि अमेरिका और जापान दोनों देशों में निजी अस्पताल है पर जापान में फ़ीस आदि पर सरकार ने एक सीमा निर्धारित की है और सभी को आय का एक निश्चित हिस्सा स्वास्थ्य निधि में काटा जाता है और जो असमर्थ है उनका बीमा सरकार करवाती है। इस तरह सभी के इलाज की बराबर व्यवस्था की गई है। दूसरी तरफ अमेरिका में बीमा राशि के अनुसार निजी बीमा कंपनियां इलाज का ग़ैर बराबर इंतज़ाम करती है। बीमा राशि कर्मचारी या व्यक्ति देते है। बुज़ुर्गों के लिए पूरा ख़र्च सरकार करती है. विधवाओं, महिला मुखिया वाले परिवार का भी ख़र्च सरकार करती है। इसके बाद भी 12 फ़ीसदी आबादी का इलाज के लिए बीमा नहीं होता है। दुनियां में अमेरिका राष्ट्रीय आय का सबसे ज़्यादा का 18 फ़ीसदी स्वास्थ्य पर ख़र्च करता है फिर भी यह लचर है। अरबों डॉलर कदाचार के मुक़दमे अदालतों में चल रहे हैं। यहां ध्यातव्य है कि पिछले तीस सालों में हम इसी लचर व्यवस्था की तरफ बढ़ रहे हैं। निजी अस्पतालों पर आधारित आयुष्मान भारत योजना इन ख़ामियों से भरा है।)

  • लॉकडाउन कड़ाई से उन्हीं जगहों पर लागू किया जाय जहाँ कोरोना के संक्रमित पाए गए हों। अनावश्यक जगहों पर लॉकडाउन करने से बीमार अस्पतालों तक नहीं पहुंच पाएंगे और कोरोना संक्रमितों की पहचान टलती जाएगी। ध्यान रहे 80% कोरोना संक्रमितों में किसी भी प्रकार के लक्षण नहीं होते। सभी जगहों से ज्यादा से ज्यादा लोगों के सैम्पल जांच होने आवश्यक हैं।
  • बुलेट ट्रेन, सेंट्रल विस्टा, एनपीआर जैसे फिजूल्खर्ची वाले प्रोजेक्ट निरस्त कर उन पैसों को स्वास्थ्य सुविधाओं सुधारने के लिए आवंटित किया जाए।
  • वैश्विक महामारी कोरोना, इतिहास का पहला और अपने आप में अनूठा महासंकट है जिसे जनता के हर तबके के साथ मिल कर ही हराया जा सकता है। इसमें लगातार और सही जानकारियां साझा करना, समाज के सभी वर्गों/ समूहों को विश्वास में लेना, वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना, अन्धविश्वास और अफवाहों को फैलने से रोकना और सम्प्रदायिक सौहार्द बनाए रखना जरूरी है।
  • असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए रेाजगार सृजन के लिए मनरेगा जैसी योजनाओं में पर्याप्त राशि आवंटित की जाए और इनका पिछला भुगतान भी दिया जाए। निचले स्तर पर येाजनाएं बनने से पलायन रुकेगा। इन मजदूरों के खातों में प्रति व्यक्ति 10,000 रुपये तत्काल दिए जाएं।
  • बेरोजगारी के दिनों तक गरीब तबकों और किसानों को राशन, बिजली, मुफ्त दी जाए और कृषि ऋ्रणों को माफ किया जाए। पीडीएस और पीएचएस सेवाओं का विकेंद्रीकरण हो। नवउदारवादी व्यवस्था को खत्म किया जाए।
  • वैश्विक महामारी का सामना करने के लिए “राष्ट्रीय / राज्य एकता सरकार” अनिवार्य ज़रूरत है। अन्यथा इस आपदा का सामना करने की राजनीतिक ताक़त, राष्ट्रीय मानसिक वातावरण नहीं बन सकते हैं न ही निकम्मी- असंवेदनशील अफ़सरशाही इसे संभाल सकती है। विपक्ष को औपचारिक रूप से मंत्रिमंडल में शामिल कर केंद्र और राज्य सरकारें इस ढांचे को तुरत लागू करे।
  • अतुल
  • राष्ट्रीय सचिव
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