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मार्क्स हों ,गांधी हों या लोहिया उनके बताये रस्ते पर चलते रहने के बजाए नई पगडंडिया बनाने वाला ही योग्य अनुगामी होता है। वह लकीर का फकीर नहीं होता , नए उसूल बताता है और उन पर चल कर दिखाता है। सुनील ने इन महापुरुषों के विचार ,सिद्धान्त और काम में नया जोड़ा। सुनील की बनाई पगडंडियों की आज चर्चा का दिन है। सुनील इन पगडंडियों पर चला भी इसलिए यह चर्चा आगे भी प्रासंगिक रहेगी।

केसला इलाके में पीने के पानी और सिंचाई के लिए छोटे बन्धों के लिए भौंरा बेतूल पैदल मार्च इलाके को रचनात्मक उर्जा देने वाला कार्यक्रम सिद्ध हुआ। इन बन्धों का प्रस्ताव मोतीलाल वोरा को किसान आदिवासी संगठन ने दिया।

आदिवासी गांव में नियुक्त मास्टर की मौजूदगी के लिए भी इस व्यवस्था में महीनों जेल जाना पड़ता है यह राजनारायण और सुनील ने बताया।

सुनील ने लम्बे चौड़े विधान सभा ,लोक सभा क्षेत्रों के बजाए व्यावाहारिक विकेन्द्रीकरण का मॉडल बताया जिनमें पंचायती व्यवस्था के वित्तीय-आर्थिक अधिकार का प्रावधान होता। पूंजीपतियों के भरोसे चलने वाले मुख्यधारा के दल ही इन बड़े चुनाव क्षेत्रों में सफल होते हैं।

जल,जंगल,जमीन के हक को स्थापित करने के लिए आदिवासी में स्वाभिमान जगाने के बाद और लगातार अस्तित्व के लिए संघर्ष करते करते सहकारिता की मिल्कियत का एक अनूठा मॉडल चला कर दिखाया।

संसदीय लोकतंत्र ,रचनात्मक काम और संघर्ष इनके प्रतीक ‘वोट,फावड़ा ,जेल’ का सूत्र लोहिया ने दिया।’वोट , फावड़ा,जेल’ के इन नये प्रयोगों के साथ-साथ सुनील ने इस सूत्र में दो नये तत्व जोड़े- संगठन और विचार । जीवन के हर क्षेत्र को प्रतिकूल दिशा में ले जाने वाली ‘प्रतिक्रांति’ वैश्वीकरण के षड़्यन्त्र को कदम-कदम पर बेनकाब करने का काम सुनील ने किया। ‘पूंजी के आदिम संचय’ के दौरान होने वाला प्रकृति का दोहन सिर्फ आदिम प्रक्रिया नहीं थी,सतत प्रक्रिया है। १९४३ में लिखे लोहिया के निबन्ध ‘अर्थशास्त्र , मार्क्स से आगे’। मार्क्स की शिष्या रोजा लक्सेमबर्ग की तरह लोहिया ने बताया कि पूंजीवाद को टिकाये रखने के लिए साम्राज्यवादी शोषण जरूरी है। समाजवादी मनीषी सच्चिदानन्द ने आन्तरिक उपनिवेशवाद का सिद्धान्त प्रतिपादित किया। सुनील ने इस सिद्धान्त को परिमार्जित करते हुए कहा कि  सिर्फ देश के अन्दर के पिछाड़े गये भौगोलिक इलाके ही नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था के खेती,छोटे उद्योग जैसे क्षेत्र भी आन्तरिक उपनिवेश हैं। खेती के शोषण से भी पूंजीवाद को ताकत मिलती है।

्सुनील

सुनील

भ्रष्टाचार और घोटालों से उदारीकरण की नीतियों का संबध है यह सुनील हर्षद मेहता के जमाने से सरल ढंग से समझाते आए थे। इस संबंध को पिछले दिनों चले ‘भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन’ ने पूरी तरह नजरअन्दाज किया था। बल्कि इस आन्दोलन के तमाम प्रणेता इसे सिर्फ नैतिकतावादी मुहिम के रूप में चला कर घोटालों से जुड़े कॉर्पोरेट घरानों और फिक्की जैसे उद्योगपतियों के समूहों को इस बात द्वारा आश्वस्त करते रहे कि आपको लाभ देने वाली नीतियों की चर्चा को हम अपनी मुहिम का हिस्सा नहीं बना रहे हैं ।

सुनील की बताई राह यथास्थितिवाद की राह नहीं है , बुनियादी बदलाव की राह है। सुनील के क्रांति के लिए समर्पित जीवन से हम ताकत और प्रेरणा पाते रहेंगे।

सुनील की स्मृति में कुछ चित्र

दिल्ली विधान सभा चुनाव 2015  के नतीजे  भारत  की अलोकतांत्रिक FPTP चुनाव पद्धति के खतरों को पुष्ट करते हैं. इसमे वोट प्रतिशत  और सीटों की संख्या निम्न लिखित है —
1. आ आ पा –   54.3 %  — 67 सीटें
2.  भा  ज  पा-  32.1 %  — 3   सीटें
3.  कांग्रेस    –   9.8 %   —  0  सीट
4.  ब स पा   –   1.3 %   —  0  सीट
5 . अन्य      –    2.5 %  —  0  सीट

इसकी तुलना में  2013  के दिल्ली चुनाव में यही आंकड़े  निम्न लिखित थे —
1. आ आ पा –   29.5 %  — 28  सीटें
2.  भा  ज  पा-  33.1 %  — 31   सीटें
3.  कांग्रेस    –   24.6 %   —  8  सीटे
4.  ब स पा   –   5.4  %   —   0  सीट
5 . अन्य      –   7.4  %   —   2  सीटे
 ऊपर की तालिका से यह साफ़ है कि आनुपातिक रूप से 2015 में भा ज पा को 21 सीटें, कांग्रेस को 6 सीटें और ब स पा को 1 सीट  और आ आ पा को केवल 38 सीटें  मिलनी चाहिए . दिल्ली के मतदाताओं में भा ज पा की ज़मीन बिलकुल कायम है.
इसी विश्लेषण से 2014 की  लोक सभा में भा ज पा  को 31 % मत से केवल 167 सीटें मिलनी चाहिए थी. उसके आधार पर केंद्र में उसकी अकेले या वर्तमान NDA की  सरकार बन ही नहीं सकती थी. उस हालत में मोदी उन अतिवादी निर्णयों को ले ही नहीं सकते थे, जो उन्होंने पिछले  नौ  महीनो में लिए हैं.
FPTP चुनाव प्रणाली के खतरे साफ़ हैं – वह देश को अलोकतांत्रिक शाषण की ओर ले जाता है – कभी भी तानाशाही का शाषक ला सकता है .  सभी राजनीति से जुड़े लोगों को इन खतरों को समझ कर पूरी ताकत से देश में आनुपातिक प्रतिनिधित्व” (Proportional Representation- PR) लाने के आन्दोलन में लग जाना चाहिए.
आज दुनिया के 80 देश PR के द्वारा अपनी सरकार चुनते हैं, जिनमे जर्मनी सहित यूरोप के दर्जन से ज्यादा देश शामिल हैं.   PR के बारे में ज्यादा जानने के लिए इन links पर खटका मार कर पढ़े.
http://www.cric11.com/ceri/

– चन्द्रभूषण चौधरी , राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ,समाजवादी जनपरिषद

अफ़लातून अफलू:

वरिष्ट पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन की दिल्ली चुनाव परिणाम पर टिप्पणी –

Originally posted on Siddharth Varadarajan:

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10 February 2015

Make No Mistake. This Is Modi’s Defeat

Siddharth Varadarajan on what has driven voters from BJP to AAP.Narendra Modi, as the saying goes, should have been careful about what he wished for. “Jo desh ka mood hai,” he declared during the election campaign for the Delhi assembly, “wahi Dilli ka mood hai.” Now that Delhi has given the Aam Aadmi Party 67 out of 70 seats and 54 per cent of the popular vote, the Prime Minister must be wondering what this means for the emerging mood elsewhere in the country.

To understand the scale of the defeat that Modi – who was not just the face and voice of his party’s campaign but its totem as well – has just led his party to, consider this simple statistic: the 3 seats the BJP managed to win under his leadership this…

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‘’ शिक्षा का बाजार एक विकृति है । किसी भी आधुनिक समाज में शिक्षा के बाजार का मतलब क्या है ? हमारे शिक्षण संस्थानों को पहले हम शिक्षा का मंदिर कहते थे । अब वे शिक्षा की दुकानें बन गई हैं । वहां मुनाफाखोरी चल रही है , घोटाले हो रहे हैं । इसमें यही होगा। भोपाल में व्यापमं (व्यावसायिक परीक्षा मंडल , मध्य प्रदेश ) घोटाला हुआ। मेडिकल की सीटों के लिए आज दस से बीस लाख रुपए लिए जा रहे हैं , चारों तरफ यह हो रहा है । होशंगाबाद में ५ – ६ बी.एड. कॉलेज खुल गए हैं और वहां चालीस हजार फीस है और एक लाख दे दीजिए तो बिना एटैण्डेंस (उपस्थिति) आपको सब मिल जाएगा और आप पास भी हो जाएंगे । यह शिक्षा के बाजार का परिणाम है । बाजार में उसी के लिए जगह है जिसके पास पैसा है । बाज़ार जो टुकड़े व जूठन फेंकेगा , आप उसे उठा सकते हैं ।‘’
‘’ बाजारीकरण क्यों बढ़ रहा है ? निजीकरण की मांग जनता की ओर से नहीं आई । यह विश्व बैंक द्वारा भारत की शिक्षा नीति और व्यवस्था को प्रभावित करके शिक्षा का बाजारीकरण किया गया है । इसमें नेताओं के अपने स्वार्थ हैं । वे सब शिक्षा के इस धंधे में कूद पड़े हैं । जितने भी स्कूल – कॉलेज – मेडिकल ,इंजीनियरिंग , बी.एड हैं – सब नेताओं ने खोल लिए हैं। यह आज उनका निहित स्वार्थ बन गया है। सभी सरकारें शिक्षा के निजीकरण को अंधाधुंध तरीके से बढ़ावा दे रही हैं। इस देश में शिक्षा का धंधा सबसे ज्यादा मुनाफेवाला , सबसे ज्यादा अनियंत्रित और सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ने वाला धंधा बन गया है। बड़े – बड़े नेताओं से लेकर छुटभैया नेताओं तक सब इसमें टूट पड़े हैं । इसमें अनाप – शनाप लूट और शोषण है और देश का नुकसान है ।‘’
‘’……… निजी स्कूल का मतलब ही भेदभाव है । जिसके पास पैसा है , उसका बच्चा ऊंचे स्कूल में पढ़ेगा । जिसके पास और पैसा है , उसका बच्चा विदेश में पढ़ने जाएगा । जिसके पास पैसा नहीं है और जो सबसे ज्यादा उपेक्षित , गरीब व मजदूर का बच्चा है , वह सरकारी स्कूल में जाएगा। शिक्षा में भेदभाव, स्वास्थ्य में भेदभाव। बच्चे तो भगवान की देन हैं फिर आप उन बच्चों में भेदभाव क्यों कर रहे हैं ? आपकी समान अवसर की बात सिर्फ एक ढकोसला है । शिक्षा में भेदभाव नहीं होना चाहिए।…‘’
( लोकसभा चुनाव , २०१४ के दौरान राजनीतिक दलों के साथ शिक्षा नीति पर ०७ अप्रैल २०१४ को भोपाल में आयोजित संवाद में सुनील ,राष्ट्रीय महामंत्री ,समाजवादी जनपरिषद के विडियो रेकार्डिंग से लिप्यांतरित ।)
– ‘भारत शिक्षित कैसे बने?’,ले. सुनील,प्रकाशक – किशोर भारती ,अप्रैल २०१४, पृ. ४६ – ४७ से उद्धरित ।

अफ़लातून अफलू:

अनुवादक अखिल कात्याल को बधाई । जैसे अंग्रेजी न जानने वाले प्रणोय राय को जानने वालों में कम हैं वैसे ही अंग्रेजी जानने वालों में किशनजी को जानने वाले कम होंगे – इसलिए अखिल कात्याल और काफिला का आभार।

Originally posted on Kafila:

Translated from the original Hindi by Akhil Katyal

Kishen Pattnayak (1930-2004) was a socialist thinker and writer. He had been a member of the Indian parliament from Orissa. Pattanayak was the founding editor of a Hindi monthly periodical called ‘Samayik Varta’. In this Hindi essay ‘Professor Se Tamashgeer’ published in March, 1994, he understands Prannoy Roy as representative of a new class of intellectuals which came into being precisely with the changing economic policies of the Indian government in the early ’90s.

Those who do not know English in this country might not know Prannoy Roy. But knowing him is important because Prannoy Roy represents a new social phenomenon. Prannoy Roy’s fame has been sealed by the program “The World This Week” running every Friday on Doordarshan. Not unlike a magician putting on a show, it has lately become quite an art for Doordarshan to concentrate the attentions of the…

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मोदी सरकार के आज के इस निर्णय का सभी लोग विश्लेषण करें; जिसमे

हुर्रियत नेताओं और पाक उच्चायुक्त की बातचीत से नाराज भारत सरकार ने पाकिस्तान से बातचीत रद्द कर दी है। 25 अगस्त को इस्लामाबाद में दोनों देशों के विदेश सचिवों के बीच वार्ता होनी थी. रिश्तों को पटरी पर लाने के लिए होने वाली इस बातचीत के रद्द होने से दोनों देशों के बीच रिश्तों के भविष्य पर क्या असर पड़ेगा?

 
मुझे लगता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा भा ज पा का तर्क हीन मुस्लिम द्वेषी दिमाग भारत की विदेश नीति को बरबाद कर के ही रहेगा. और उस पर तड़का लगा हुआ है नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व जो अंदर से बहुत कमजोर है।  अपने भद्दे और भड़काऊ चुनाव भाषणो से मोदी ने अपने रा स्वं  सं जैसे दिमाग वाली  बड़ी भीड़ को मुस्लिम विरोध  के लिए उत्तेजित  दिया है. वार्ता को रद्द करने का फैसला शायद दो वजह से लिया गया है – 1 . विपक्षी पार्टियों द्वारा पाक सीमा पर हो रही फ़ौजी झड़पों पर मोदी का उपहास  2 . कमजोर मोदी की यह मानसिक जरूरत कि उसे मुस्लिम विद्वेषी भीड़ की नज़र में बहादुर दीखना चाहिए।
वार्ता रद्द करने के  लिए यदि कोई और खुफिया सूचना सरकार के पास होती  तो हुर्रियत नेता के पाकिस्तानी उच्चायुक्त से मिलने  पहले ही इस्लामाबाद बैठक रद्द करने की घोषणा सरकार  कर चुकी होती.
हुर्रियत जैसे किसी एक निस्तेज और छिन्न भिन्न हो चुके अलगाव वादी संगठन  नेता का पाकिस्तानी उच्चायुक्त से मिलना ऐसी बड़ी शरारत नहीं है जिसकी वजह से दोनों देशों के बीच पूरी कूटनीतिक प्रक्रिया तोड़ दी जाय। कूटनीतिक प्रक्रिया को तोड़ने से दोनों देशो  बीच ढेरों संभावित प्रगति – आर्थिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक, व्यापार, क्षेत्रीय (सार्क), खेल कूद सहयोग, सिविल सोसायटी के आदान प्रदान, ये सभी इससे रुक जाते हैं. आम ज्ञान है कि लड़ाई और कूटनीति दोनों साथ चलते रहते हैं।
सभी देशों के राजदूत तो मेज़बान देश के बिभिन्न नागरिकों से मिलते ही रहते हैं. पाकिस्तान में ज्यादा लोकतांत्रिक व्यवस्था के पैरोकार किसी संगठन के  नेता से क्या इस्लामाबाद स्थित भारतीय राजदूत को नहीं मिलना चाहिए ? क्या पाकिस्तानी सरकार ऐसी किसी मुलाक़ात से क्या कूटनीतिक प्रक्रिया को तोड़ देगी?
इस सरकार, भा ज पा, और वर्त्तमान में देश का सबसे बड़ा संकट यह है कि आगे सरकार के  सारे निर्णय केवल एक व्यक्ति नरेंद्र मोदी के दिमाग से लिए जाएंगे. अभी भा ज  पा  के सारे छोटे- बड़े  नेता और  मन्त्री इतने दास और ग़ुलाम दिमाग के हैं कि मोदी स्वयं सारे महत्वपूर्ण निर्णय लेगा।  वह कोई बड़ा काम किसी दूसरे नेता , मन्त्री या अफसरों के जिम्मे छोड़ेगा ही नहीं। किसी से निर्णायक सलाह भी नहीं लेगा. कोई मंत्री, पूरा काबीना या अफसर में निर्णय करने का अधिकार माँगने की हिम्मत भी नहीं है. इंदिरा गांधी की कार्य शैली को याद करें।
 जिन थैली शाहों, उद्योग पतियों की ग़ुलामी वह कर रहा है वे देश चलाने के  राजनीतिक और नीतिगत मामलों में गलत ही सलाह देंगे.
इस नए नैपोलियन का वाटरलू वही होगा।  लेकिन तब तक  देश बरबाद  हो चुका होगा.
आप सब 5 साल पूरा होने के बहुत पहले ही इस सरकार को हटाने की कोशिश में जी जान से लग जाएं। पहला कदम है अगले विधान सभा चुनावों में भा जा पा को सत्ता से बाहर रखने  लिए अन्य सभी  दलों के बीच राजनीतिक समझौते और बिहार जैसा महा गठबंधन.
 
-चन्द्र भूषण चौधरी

पिछला भाग
आअधुनिक केंद्रित व्यवस्थाओं में ऊंचे ओहदे वाले लोग अपने फैसले से किसी व्यक्ति को विशाल धन राशि का लाभ या हानि पहुंचा सकते हैं । लेकिन इन लोगों की अपनी आय अपेक्षतया कम होती है । इस कारण एक ऐसे समाज में जहां धन सभी उपलब्धियों का मापदंड मान लिया जाता हो व्यवस्था के शीर्ष स्थानों पर रहने वाले लोगों पर इस बात का भारी दबाव रहता है कि वे अपने पद का उपयोग नियमों का उल्लंघन कर नाजायज ढंग से धन अर्जित करने के लिए करें और धन कमाकर समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करें । यहीं से राजनीति में भ्रष्टाचार शुरु होता है । लेकिन विकसित औद्योगिक समाजों में व्यवस्था की क्षमता को कायम रखने के लिए नियम कानून पर चलने और बरारबरी की प्रतिस्पर्धा के द्वारा सही लोगों के चयन का दबाव ऐसा होता है जो ऐसे भ्रष्टाचार के विपरीत काम करता है ।ऐसे समाजों में लोग भ्रष्ताचार के खिलाफ सजग रहते हैं क्योंकि इसे कबूल करना व्यवस्था के लिए विघटनकारी हो सकता है । हमारे समाज में भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐसे व्यवस्थागत मूल्यों का निर्माण नहीं हो पाया है । इसके विपरीत जहां हमारी परंपरा में संपत्ति और सामाजिक सम्मान को अलग – अलग रखा गया था वहीं आज के भारतीय समाज में संपत्ति ही सबसे बड़ा मूल्य बन गयी है और लोग इस विवेक से शून्य हो रहे हैं कि संपत्ति कैसे अर्जित की गई है इसका भी लिहाज रखें । इस कारण कोई भी व्यक्ति जो चोरी , बेईमानी , घूसखोरी तथा हर दूसरी तरह के कुत्सित कर्मोम से धन कमा लेता है वह सम्मान पाने लगता है। इस तरह कर्म से मर्यादा का लोप हो रहा है।
आधुनिकतावादियों पर , जो धर्म और पारंपरिक मूल्यों को नकारते हैं तथा आधुनिक उपकरणों से सज्जित ठाठबाट की जिंदगी को अधिक महत्व देते हैं , भ्रष्ट आचरण का दबाव और अधिक होता है । इस तरह हमारे यहां भ्रष्टाचार सिर्फ वैयक्तिक रूप से लोगों की ईमानदारी के ह्रास का परिणाम नहीं है बल्कि उस सामाजिक मूल्यहीनता का परिणाम है जहां पारंपरिक मूल्यों का लोप हो चुका है पर पारंपरिक वफादारियां अपनी जगह पर जमी हुई हैं । इसी का नतीजा है कि आधुनिकता की दुहाई देने वाले लोग बेटे पोते को आगे बढ़ाने में किसी भी मर्यादा का उल्लंघन करने से बाज नहीं आते । चूंकि हमारे समाज में विस्तृत परिवार के प्रति वफादारी के मूल्य को सार्वजनिक रूप से सर्वोपरि माना जाता रहा है कुनबापरस्ती या खानदानशाही के खिलाफ सामाजिक स्तर पर कोई खास विरोध नहीं बन पाता। आम लोग इसे स्वाभाविक मान्कर नजरअंदाज कर देते हैं। ऐसी स्थिति में इनका विरोध प्रतिष्ठानों के नियम कानून के आधार पर ही संभव हो पाता है ।
ऊपर की बातों पर विचार करने से लगता है कि जब तक संपत्ति और सत्ता का ऐसा केंद्रीयकरण रहेगा जहां थोड़े से लोग अपने फैसले से किसी को अमीरऔर किसी को गरीब बना सकें और समाज में घोर गैर-बराबरी बनी रहेगी तब तक भ्रष्टाचार के दबाव से समाज मुक्त नहीं हो सकता । यही कारण है कि दिग्गज स्वतंत्रता सेनानी और आदर्शवादी लोग सत्ता में जाते ही नैतिक फिसलन के शिकार बन जाते हैं । एक ऐसे समाज में ही जहां जीवन का प्रधान लक्ष्य संपत्ति और इसके प्रतीकों का अंबार लगाकर कुछ लोगों को विशिष्टता प्रदान करने की जगह लोगों की बुनियादी और वास्तविक जरूरतों की पूर्ति करना है भ्रष्ट आचरण नीरस बन सकता है।
भ्रष्टाचार का उन्मूलन एक समता मूलक समाज बनाने के आंदोलन के क्रम में ही हो सकता है जहां समाज के ढांचे को बदलने के राष्ट्रव्यापी आंदोलन के संदर्भ में स्थानीय तौर से भ्रष्ताचार के संस्थागत बिंदुओं पर भी हमेशा हमला हो सके ।बिहार में चलने वाले 1974 के छात्र आंदोलन की कुछ घटनाएं इसका उदाहरण हैं , जिसमें एक अमूर्त लेकिन महान लक्ष्य ‘संपूर्ण क्रांति’ के संदर्भ में नौजवानों में एक ऐसी उर्जा पैदा हुई कि बिहार के किशोरावस्था के छात्रों ने प्रखंडों में और जिलाधीशों के बहुत सारे कार्यालयों में घूसखोरी आदि पर रोक लगा दी थी । लेकिन न तो संपूर्ण क्रांति का लक्ष्य स्पष्त था और न उसके पीछे कोई अनुशासित संगठन ही था । इसलिए जनता पार्टी को सत्ता की राजनीति के दौर में वह सारी उर्जा प्राप्त हो गई ।
अंततः हर बड़ी क्रांति कुछ बुनियादी मूल्यों के इर्दगिर्द होती है । इन्हीं मूल्यों से प्रेरित हो लोग समाज को बदलने की पहल करते हैं। हमारे देश में , जहां परंपरागत मूल्यों का ह्रास हो चुका है और आधुनिक औद्योगिक समाज की संभावना विवादास्पद है , भ्रष्टाचार पर रोक लगाना तभी संभव है जब देश को एक नयी दिशा में विकसित करने का कोई व्यापक आंदोलन चले। इसके बिना भ्रष्टाचार को रोकने के प्रयास विफलाओं और हताशा का चक्र बनाते रहेंगे।
– सच्चिदानंद सिन्हा.
भाग 1

भाग 2

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