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[नवम्बर 1956 में,विश्व-बौद्ध-सम्मेलन काठमंडू (नेपाल) में दिया गया बाबासाहेब का व्याख्यान]

मित्रों!आज जिस युग में हम विचर रहे हैं,उसमें संसार के बुद्धिवादी विचारकों को मानव जीवन को सुखी एवं समृद्ध बनाने के लिए केवल दो ही मार्ग ही दिखाई पड़ते हैंः पहला मार्ग साम्यवाद का है और दूसरा बौद्ध-धर्म का।शिक्षित युवकों पर साम्यवाद (Communism) का प्रभाव अधिक दिखाई देता है,इसका प्रमुख कारण यह है कि साम्यवाद का प्रचार सुसंगठित रूप से हो रहा है,और इसके प्रचारक बुद्धिवादी दलीलें पेश करते हैं।बौद्ध-धर्म भी बुद्धिवादी है,समता-प्रधान है।और परिणाम की ओर ध्यान दिया जाए,तो साम्यवाद से अधिक कल्याणकारी है। इसी तत्त्व पर अपने विचार आपके आगे रखना चाहता हूं।क्योंकि मैं समझता हूं,यह बात शिक्षित युवकों के आगे रखना अति आवश्यक है।

मेरे विचार में साम्यवाद की इस चुनौती को स्वीकार करते हुए बौद्ध-भिक्षुओं को चाहिए कि वे युगानुरूप अपनी विचार-पद्धति एवं प्रचार-कार्य में परिवर्तन करें और भगवान बुद्ध के विचार विशुद्ध रूप में शिक्षित युवकों के सामने रखें।बौद्ध धर्म के उत्थान और उन्नति के लिए इसीकी अत्यन्त आवश्यकता है।यदि इस काम को बौद्ध भिक्षु उचित प्रकार से न कर सकेंगे,तो बौद्ध धर्म की बहुत हानि होगी।इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।सारे संसार में व्याप्त कम्युनिज्म को भगवान बुद्ध की विचार प्रणाली में केवल यही उत्तर है कि मानव-जीवन को सुखी बनाने का साम्यवाद एक समीपी किन्तु टेढ़ा मार्ग है। बौद्ध-धर्म यद्यपि अपेक्षाकृत एक लम्बा रास्ता है किन्तु इस समीपी और टेढ़े रास्ते पर चलने की अपेक्षा यह एक सुन्दर,हितकर,समुचित और सम्यक राज-मार्ग है।

मार्क्सवादी साम्यवाद के मार्ग में संकट है,विपत्तियां हैं,इसीलिए उस मार्ग से हमें जहां पहुंचना है,वहां पहुंच पायेंगे या नहीं,इसमें संदेह है।

मार्क्सवादी साम्यवादी की मुख्य बात यह है कि संसार में आर्थिक शोषण से उत्पन्न विषमता के कारण ही बहुसंख्यक लोग दीन और दास बनकर कष्ट उठा रहे हैं।इस आर्थिक विषमता के शोषण और लूट को रोकने का एक ही रास्ता है,जिसके द्वारा व्यक्तिगत सीमित अधिकार को नष्ट किया जाए और उसकी जगह संपत्ति का राष्ट्रीयकरण या सामाजीकरण करके राष्ट्रीय अधिकार को अधिष्ठित किया जाय,जिससे श्रमिकों के राज्य की स्थापना हो,शोषण बंद हो और श्रमजीवी-वर्ग सुखी हो।

बौद्ध-धर्म का मुख्य तत्त्व भी मार्क्सवाद के अनुसार ही है। इसके अनुसार संसार में दुख है और उस दुख को दूर करना आवश्यक है।भगवान बुद्ध ने भी जिस दुख का निरूपण किया है,वह सांसारिक दुख ही है।बुद्ध-वचनों में इसके अनेक प्रमाण पाए जाते हैं। बौद्ध-धर्म अन्य धर्मों की भांति आत्मा और परमात्मा के संबंध पर आधारित नहीं है,बौद्ध-धर्म जीवन की अनुभूति पर अधिष्ठित है।दुख का पारलौकि अर्थ लगाकर पुनर्जन्म से उसका संबंध जोड़ना बुद्ध-मत के विरुद्ध है।संसार में दरिद्रता में जन्म लेकर प्लनेवाले दुखों का नाश होना अनिवार्य आवश्यक है।यह मान लेने के बाद देखना होगा कि इस दुख को हटाने के भगवान ने कौन-कौन से मार्ग बताये हैं। भगवान बुद्ध ने आदर्श बौद्ध समाज के तत्त्व संघ के अन्तर्निहित किए हैं।संघ में व्यक्तिगत संपत्ति के अधिकार के लिए कोई स्थान नहीं है।भिक्षु को केवल आठ चीजें अपने पास रखने का आदेश है।इन आठों में सबसे पहला वस्त्र है।इसमें भी परिग्रह की भावना का निर्माण न होने पाये,इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है।

संपत्ति पर व्यक्ति -विशेष का अधिकार सारे अनर्थों का कारण है यह बात भगवान बुद्ध ने कार्ल मार्क्स से चौबीस सौ वर्ष पहले जान ली थी।बुद्ध और मार्क्स में जो अन्तर है,वह केवल उस दुख के दूरीकरण के लिए बताए हुए उपायों में है।मार्क्स के मतानुसार संपत्ति पर से व्यक्ति का अधिकार हटाने का एक-मात्र साधन बलप्रयोग है,इसके विपरीत भगवान बुद्ध के विचारानुसार करुणा,मैत्री,समता,प्रेम,तृष्णा का त्याग,विराग आदि प्रमुख साधन हैं।बलपूर्वक सत्ता ग्रहण करके साम्यवादी अधिनानायकी स्थापित करके व्यक्तिगत अधिकार नष्ट करने में मार्क्सवादी प्रणाली थोड़े दिनों तक अच्छी मालूम होती है,इसके बाद कटु हो जाती है।क्योंकि बलपूर्वक अधिष्ठित अधिनायकी तथा उसके द्वारा आरंभ होने वाले हत्याकांड की परिसमाप्ति कब होगी,इसकी निश्चयता नहीं है।और यदि अधिनायकी कहीं असफल हो गयी ,तो फिर अपरिमित रक्तपात के सिवा और कोई मार्ग नहीं रह जाता। हिंसा के द्वारा स्थापित समता समाज में दृढता नहीं हो पाती,क्योंकि बल का स्थान धीरे-धीरे किस अन्य तत्त्व द्वारा ग्रहण किया जायेगा,इसका कोई उत्तर मार्क्स की मत-प्रणाली में नहीं है। हिंसा-प्रधान साम्यवादी शासन-प्रणाली में -शासन-चक्र अपने आप ही धीरे-धीरे नष्टप्राय होता जायेगा।यह बात भ्रममूलक नहीं है।

इसके विपरीत बुद्ध-प्रदर्शित अहिंसा,करुणा,मैत्री,समता द्वारा दुखों और क्लेशों की निवृत्ति का मार्ग श्रेयस्कर है,क्योंकि वह चित्त की विशुद्धि और हृदय-परिवर्तन के पुनीत तत्त्व पर आधारित है।मनुष्य के जीवन को सुखी बनाने के लिए नैतिक रूप से उसके मन को सुसंस्कृत करना अनिवार्य आवश्यक है,इस बात पर भगवान बुद्ध ने जितना अधिक ध्यान दिया उतना शायद संसार के किसी भी धर्म-प्रवर्तक या विचार-प्रणाली ने नहीं दिया।मनुष्य में विवेक हमेशा जागृत और सक्रिय बनाये रखने के लिए सदाचरण या शील को श्रद्धा का अधिष्ठान प्रदान करना भगवान बुद्ध का हेतु या लक्ष्य है। शील या सदाचरण को श्रद्धा का रूप प्राप्त होने के बाद दुख कम करने के लिए अर्थात शोषण और आर्थिक लूट रोकने के लिए बलप्रयोग की आवश्यकता नहीं रहती। ”State shall wither away.”(राज्य स्वयं सूख जाएगा) लेनिन का यह मधुर स्वप्न यदि साकार होगा,तो वह बलप्रयोग द्वारा स्थापित की हुई अधिनायकी द्वारा नहीं,वरन बुद्ध-प्रदर्शित शील-सदाचार और विशुद्धि-तत्त्व से ही होगा।

अदिनायकी का भगवान बुद्ध ने विरोध किया है।अजातशत्रु के एक मंत्री ने एक बार उनसे प्रश्न किया-“भगवन! बज्जियों पर हम किस प्रकार विजय प्राप्त कर सकेंगे?”भगवान बुद्ध ने उत्तर में कहा-“बज्जी लोग जब तक गणतंत्र-शासन का संचालन बहुमत से करते रहेंगे,तब तक वे अजेय हैं।जिस दिन बज्जी गणतंत्र शासन-प्रणाली को त्याग देंगे, उसी दिन वे पराजित हो जायेंगे।”भगवान बुद्ध का यह नीतिप्रधान लोकतंत्र का मार्ग मार्क्सवादी अधिनायक-तंत्र की पएक्षा अधिक हितकर एवं चिरस्थायी है।मुझे आशा है साम्यवाद का यह कल्याणकारी प्राचीन मार्ग यदि आज भी हम युवक समाज के सामने समुचित रूप से रख सकें,तो यह उन्हें आकर्षित किये बिना न रहेगा।

भगवान ने पने भिक्षुओं को “बहुजन-हित और बहुजन-सुख” के लिए आदेश किया था कि “संसार की हर दिशा में जाकर मेरे इस आदि में कल्याण करनेवाले,मध्य में कल्याण करनेवाले और अंत में कल्याण करनेवाले धर्म का प्रचार करो और विशुद्ध ब्रह्मचर्य का प्रकाश करो।”किंतु आज हम देखते हैं,भिक्षुगण मनमुख हो अपने-अपने विहार में रहकर आत्मोन्नति का मार्ग ढूंढ़ रहे हैं।यह कदापित उचित और हितकर नहीं है। बौद्ध धर्म एकांत में आचरण किया जानेवाला कोई रहस्यमय आचार नहीं है,यह एक प्रबल सामाजिक संघ-शक्ति है।आज भी विनाश की भयानक चोटी पर खड़े संसार का मार्ग दिखाने का सामर्थ्य इस शक्ति में है। भगवान बुद्ध के आदेश को स्मरण रखते हुए उनके पवित्र कल्याणकारी धर्म का चारों ओर प्रचार करने की चेष्टा भिक्षुओं को करना चाहिए।

नोट(अनुवादक का)-कम्युनिस्ट और कम्युनिज्म के संबंध में बाबासाहेब ने अपने लाहौर वाले भाषण “जातिभेद का विनाश” में तथा नागपुर के भाषण” हम बौद्ध क्यों बनें?” में भी अच्छा प्रकाश डाला है।ये दोनों व्याख्यान अलग-अलग छपे हैं।

अर्थशास्त्र के प्रोफेसर अरूण कुमार, काले धन पर लिखने वाले सबसे अधिक उद्घ्रित लेखकों में से एक हैं. उन्होंने ‘ द ब्लैक इकॉनॉमी इन इंडिया'(पेंग्विन, 1999)   तथा ‘इंडियन इकॉनॉमी सिन्स इंडिपेंडेंस:  परसिस्टिंग कोलोनियल डिसरप्शन ‘ (विज़न बुक्स,  2013) पुस्तकें लिखी हैं. India Legal’s के Editor-in-Chief, इन्द्रजीत बाधवार और Associate Editor मेहा माथुर को दिए गए साक्षात्कार में प्रो कुमार बताते हैं कि कैसे जल्दीबाज़ी में उठाया गया ये क़दम माँग, रोज़गार और  निवेश को बिपरीत ढंग से प्रभावित करेंगे.

साक्षात्कार के अंश –

प्रश्न – कब और किन परिस्थितियों में विमुद्रीकरण एक अर्थशास्त्रीय उपकरण की तरह उपयोग किया जाता है और वैश्विक स्तर पर इसका प्रयोग कितना सामान्य है ?

उतर — आर्थिक बदलाव के एक उपकरण के रूप में इसका प्रयोग कई जगहों पर हुआ है, पर उस तरह नहीं जैसे कि भारत में हुआ है. ऐसा उन जगहों पर बडे तादाद में किया गया जहां मुद्रा अपना मूल्य पूरी तरह खो चुकी थी, जैसे सोवियत संघ या वाइमर गणराज्य, जहां आपको रोजमर्रा की जरूरतों के लिए बोराभर पैसे ले जाने पडते. वहां मुद्रा को समाप्त कर दिया और नयी मुद्रा सुजित की गयी. मगर भारत ऐसी परिस्थिति में नहीं है.

प्रश्न – क्या भारतीय अर्थव्यवस्था ऐसे संकट का सामना कर रही थी कि इस तरह के तीव्र और भारी भरकम ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की आवश्यकता पडी?

उत्तर — ऐसा नहीं है.  वास्तव में हमारे मैक्रो-इकॉनॉमिक सूचक काफी अच्छे थे.  पर असल मुद्दा है,  इससे हासिल क्या हुआ?  प्रधानमंत्री के अनुसार, यहां दो उद्देश्य हैं. पहला है आतंकियों के वित्तपोषण और नकली नोटों पर अंकुश लगाना और दूसरा यह कि काले धन की अर्थव्यवस्था, जो बहुत बडी हो चुकी है, गरीबी और सारी समस्याओं की जड है, उससे छुटकारा पाना. सवाल है – क्या विमुद्रीकरण इन दोनों समस्याओं से निजात दिलाता है?  जहां तक नकली नोटों की बात है,  वो दस लाख में केवल 400 हैं, जो नगण्य हैं. रिजर्व बैंक के अनुसार 400 करोड रूपये के नकली नोट  ही बाजार में हैं. बाजार में कूल मुद्रा है साढे सत्रह लाख करोड रूपये. य़े ऊंट के मूंह में जीरा के समान है, नगण्य है. आतंकियों को पैसे की जरूरत होती है जिसके लिए वो नकली नोट छापते हैं और इसे फैलाते हैं. पर एक बार उन्होंने पैसा किसी और को दे दिया तो ये अर्थव्यवस्था में घूमता रहता है. इस वजह से उन्हें ज्यादा से ज्यादा नकली नोट छापने होते हैं. इसे रोकने की जरूरत है. आप इसे कैसे रोकेंगे?  नोटबंदी से नहीं, क्योंकि नकली नोटों को बनाने में अन्य देशों की सरकारें भी संलिप्त हैं. वे नए किस्म के नोट की भी नकल कर सकते हैं.

प्रश्न – विगत वर्षों में भारत की विकास दर,  व्यापार,  सकल घरेलू उत्पाद और विदेशी मुद्रा भंडार अमूमन अच्छे रहे हैं. फिर इस फलदायी व्यवस्था में छेडछाड क्यों?

उत्तर — ये पूरी तरह एक गलत आकलन है कि आप इस उपाय से काले धन की अर्थव्यवस्था से निजात पा लेंगे. इसका मतलब समझिए.  आप कमाते हैं जिसमें से आप बचाते हैं और संपत्ति अर्जित करते हैं. आपकी आय जितनी भी हो आप उसका एक हिस्सा खर्च करते हैं और कुछ बचा लेते हैं और वो बचत आप कई तरह की संपत्तियों में निवेश करते हैं. इससे आपका धन बनता है. धन को कई तरह से रखा जाता है. आप इसे मकान, जमीन, सोना, शेयर बाजार या नकदी में रख सकते हैं. नकदी तो आपके धन का एक हिस्सा होता है – संभवत: आपके पूरे धन का मात्र एक प्रतिशत. काले धन की अर्थव्यवस्था मेरे हिसाब से जीडीपी का 62% है. फिलहाल 150 लाख करोड की जीडीपी में हम हर साल 93 लाख करोड की काली कमाई पैदा कर देते हैं. काला धन इसका तीन गुना,  लगभग 300 लाख करोड हो सकता है जिसमें से 3 लाख करोड रूपये नकदी के रूप में है जिसे हम काला पैसा कहते हैं.

प्रश्न – तो क्या काला धन और काली कमाई में फर्क है?

उत्तर – हां, काली कमाई, काली मुद्रा और काला धन, तीनों ही अलग हैं. अक्सर लोग भूल कर बैठते हैं. उन्हें लगता है तीनों एक ही हैं. काली मुद्रा देश में काले धन की मात्र एक प्रतिशत है. मान लेते हैं आप तीन लाख करोड रूपये अलग करने में पूरी तरह सफल हो जाते हैं तो भी आप केवल 1% ही अलग कर रहे हैं.

अगला मुद्दा है क्या आप तीन लाख करोड रूपये अलग कर पाएंगे?  लोगों ने इसे सफेद करने के तरीके खोज लिए हैं. जिस दिन ये घोषणा हुई, खबर आई कि तीन बजे रात तक ज्वेलरी की दूकानें खुली थीं. वे पुरानी तारीखों की रसीदें देकर सोने की बिक्री दिखा रहे थे. एक व्यापारी ने कहा,  उसके पास 20 करोड रूपये थे और उसने अपने कर्मचारियों के चार महिनों की पगार पहले ही दे दी. वे इसे बैंक में जमा करेंगे.  इस तरह उनकी काली मुद्रा का उपयोग हो गया. इसके बाद ग्रामीण इलाकों में जनधन योजना के बैंक खातों में बडे पैमाने पर काली मुद्रा जमा की जा रही है. एक जमींदार 100 लोगों को 20,000 लेकर बैंक में जमा करने को कह सकता है तो आप यहां तक कि तीन लाख करोड का भी विमुद्रीकरण नहीं कर पाएंगे. ज्यादा से ज्यादा 50,000 से 70,000 करोड रूपये ही चलन से निकाल सकते हैं. इस तरह दोनों ही उद्देश्य, जिनका प्रधानमंत्री ने उल्लेख किया है,  पूरे नहीं होंगे.

और तो और, आप मूश्किल से एक साल के लिए तीन लाख करोड रूपये की मुद्रा पर चोट कर सकते हैं पर काली कमाई पहले की तरह ही जारी रहेगी जैसे नकली दवा बनाकर,  नशीली चीजें बेचकर, कैपिटेशन फीस वसूलकर, खरीद-बिक्री के गलत रसीद दिखाकर इत्यादि. इस तरह नकदी यहां फिर से पैदा हो जाएगी. और आप दो हजार के नोट ला रहे हैं जिससे काली मुद्रा को रखना और आसान होगा. ऐसे तो आप अपने ही तर्क को कमजोर कर रहे हैं कि बडे नोट काले धन को जमा करने में सुविधाजनक होते हैं इसलिए इन्हें हटाने की जरूरत है.

प्रश्न – हम सभी जानते हैं कि भारत में विशाल और निरंतर बढती एक समानांतर अर्थव्यवस्था है. बहुत चालाकी के साथ,  यह समानांतर अर्थव्यवस्था पूरी तरह नकदी पर चलती रहती है. यह रोजगार, उपभोक्ता मांग, ग्रामीण कर्ज़, अनौपचारिक बैंकिंग और मुद्रा प्रवाह को सफलता से चलाते रही है. विमुद्रीकरण इन क्रियाकलापों पर कैसे चोट करेगा?  इसे रॉबिनहुड की तरह के उपाय के रूप में पेश किया जा रहा है – अमीरों से लूटकर गरीबों को देना. इस तरह का राजनीतिक संदेश दिया जा रहा है. क्या यह एक गरीब-हितैषी-प्रयास है?

उत्तर — नहीं.  मूल रूप से ये समानांतर अर्थव्यवस्था नहीं है. भारत में काले धन की अर्थव्यवस्था और सफेद धन की अर्थव्यवस्था,  दोनों ही बडे पैमाने पर एक दूसरे के साथ गुंथे हुए हैं. इसलिए जब आप अपनी जमीन या मकान बेचते हैं तो आप एक ही साथ काली और सफेद कमाई करते हैं. जब आप चीनी का उत्पादन करते हैं, तब आप उत्पादन का 90% ही दिखाते हैं और 10% नहीं दिखाते. इस वजह से जब अवैध धन की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है तब वैध धन की अर्थव्यवस्था भी साथ ही प्रभावित होती है. यह प्रयास जो अवैध की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने के लिए लाया गया है, वह सफेद धन की अर्थव्यवस्था को भयंकर रूप से प्रभावित कर रहा है. मांग घटती चली जा रही है.  जैसा कि किसी ने अच्छा दृष्टांत दिया है, अगर आप किसी के शरीर में से 85% खून ले लें फिर 5% डाल दें,  तो उस व्यक्ति के शरीर का क्या होगा?  वो मर जाएगा. इसी तरह से, जब आप 85% मुद्रा अर्थव्यवस्था से निकाल लेते हैं और इसके बदले धीरे धीरे 5% डालते हैं तब मुद्रा  प्रवाह कम हो जाता है. दूकानों में ग्राहक घट गए हैं. मोबाइलों की रिजार्जिंग घट गई हैं. गुब्बारे वाला के गुब्बारे नहीं बिक रहे. छोटे व्यापारी अपने माल नहीं बेच पा रहे. यहां तक कि बडे व्यापारी भी अपने माल नहीं बेच पा रहे क्योंकि मनमाफिक खर्च कम हो गया है. उदाहरण के लिए, एक कमीज़ खरीदने को मैं अगले महिने तक टाल देता हूं तो आय की कमी मांग को घटा रही है. जब मांग कम पड जाती है, उत्पादन घट जाता है. रोजगार कम हो जाते हैं और निवेश गिर जाता है. तो इसके दीर्घगामी दुष्प्रभाव होते हैं. अगर ऐसा एक या दो महिने जारी रहता है तो निवेश गिर जाएगा और साल भर से ज्यादा का वक्त तक इसका असर बना रहेगा. नकद की किल्लत को तुरंत दूर नहीं किया जा सकता. इससे मांग 50 दिनों से ज्यादा वक्त तक प्रभावित होगी.

आपको 14.5 लाख करोड रूपये के 500 और 1000 के नोट बदलने हैं जिसे आपने 15 सालों या उससे भी ज्यादा वक्त में छापा था. पर आपको बदलना है तुरंत. ये संभव नहीं है क्योंकि आपको कागज और स्याही की जरूरत है जो ज्यादातर आयात किये जाते हैं. और स्याही की आपूर्ति का अभाव है, जिसके चलते उन्होंने कुछ दिनों पहले निविदा जारी की.  बिजनेस स्टैंडर्ड के अनुसार,  कागज और स्याही की कमी ना भी होने पर नोट छापने में 108 दिन लगेंगे और अगर आप 100 का नोट छाप रहे हैं तो 1000 के नोट की अपेक्षा 10 गुना ज्यादा वक्त की आपको जरूरत है और इसे होने में बहुत लंबा वक्त लगेगा.

दूसरी बात है,  लोग नोटों को जमा कर रहे हैं क्योंकि वे आश्वस्त नहीं है कि कब आपूर्ति सामान्य होगी. इसकी वजह से, नोटों की मांग ड्योढी हो जाएगी. जो लोग सबसे ज्यादा दिक्कतों का सामना करेंगे, वे असंगठित क्षेत्र के हैं, जिनके पास ना तो क्रेडिट कार्ड, ना डेबिट कार्ड और ना कार्ड रीडर है. ये वही लोग हैं जिन्हें नोटो की सबसे ज्यादा जरूरत है. पूरी कृषि असंगठित क्षेत्र है. ये क्षेत्र कारखाना उत्पादन और सेवा का भी महत्वपूर्ण सप्लायर और ग्राहक है.

प्रश्न – क्या ऐसा कोई खतरा है कि लोगों का एक बडा हिस्सा आर्थिक रूप से अशक्त हो जाएगा?

उत्तर – यही तो हो रहा है. जिससे गुब्बारे वाले की आय तेजी से गिर गयी है.  एक भिखारन ने बताया कि लोग अब भीख नहीं दे रहे और उसके चार छोटे छोटे बच्चे थे, जिनमे से एक खाने की कमी से मर गया. जिन लोगों का 500-1000 के नोटों से कोई वास्ता नहीं था, वे भी प्रभावित हो रहे हैं. ग्रामीण इलाकों में किसान बीज और खाद खरीदने में सक्षम नहीं हैं. अढतिया के पास कर्ज देने को पैसे नहीं हैं. इसके चलते अगले साल की बुआई भी प्रभावित हो सकती है. आप पैसा तो नहीं खाते. पैसे से आप खाना, कपडा और सेवा खरीद सकते हैं. इसलिए पैसा प्रवाह में हो. ये शरीर में रक्त के प्रवाह की तरह है, जिसके वजह से सब कुछ चलता है. अगर इसकी कमी होती है, तो समस्या होगी.

प्रश्न – इस समय हमें असुविधा हो रही है. वास्तविक दिक्कतें कब शुरू होंगी?  आप क्या सोचते हैं?

उत्तर – वास्तविक तकलीफ तो गरीबों के लिए जारी है ही. मध्य वर्ग के लिए वास्तविक तकलीफ कम है क्योंकि हम क्रेडिट कार्ड का उपयोग करते हैं. ये शुरू तब होगी जब हमारी आय प्रभावित होगी. जब उत्पादन कम होगा तब मध्य वर्ग छंटनी का सामना करेगा. ट्रकवाले हडताल पर चले जाएंगे, जो कि एक संभावना है. अगर सरकार ने ठीक से तैयारियां की होती और नोटों के प्रवाह के प्रबंध किए होते तो संभवत: ये तकलीफ कम हो गयी होती.

प्रश्न – क्या नकद की पुरानी व्यवस्था को चलने देना एक विकल्प था?

उत्तर – ऐसा कदम काले धन की अर्थव्यवस्था को खत्म नहीं करता बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था के लिए समस्या खडी कर देता है. बात ये है कि काले धन की अर्थव्यवस्था कल से नहीं शुरू हुई,  ये जारी है 70 सालों से. तो इस समस्या को रातोंरात ठीक भी नहीं किया जा सकता. कोई जादु की छडी नहीं है. आप जो कर सकते थे वो ये कि व्यवस्था में जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए लोकपाल की नियुक्ति करते, काले धन से निपटने के उपायों में, व्यापारियों,  नेताओं, नौकरशाहों, पुलिस और न्यायपालिका जो जवाबदेह नहीं है, तो जवाबदेही लाएंगे कैसे?  ये एक कुञ्जी है. अगर आप इन सबके बीच जवाबदेही ला सकते हैं तो आप काले धन की समस्या को हल कर सकते हैं. इसलिए राजनीतिक दलों का सूचना का अधिकार के तहत आना जरूरी है. पर वे इसके लिए तैयार नहीं हैं. भ्रष्टाचार उजागर करने वाले लोग (व्हिसलब्लोअर) बहुत महत्वपूर्ण हैं. क्योंकि यही वे लोग हैं जो व्यापमं या आदर्श जैसे घोटाले सामने लाते हैं. पर व्हिसलब्लोअर बिल को सशक्त करने के बदले इसे कमजोर किया जा रहा है. दूसरी बात,  हम प्रत्यक्ष कर के सरलीकरण के लिए बहुत कुछ नहीं कर रहे. माल एवं सेवा कर (जीएसटी) है, पर ज्यादा महत्वपूर्ण प्रत्यक्ष कर नियमावली विधेयक है. आप को प्रत्यक्ष कर को सरलीकृत करना बाक़ी है. खुफिया एजेंसियां हवाला पहचानती हैं पर आप उसके ऊपर कुछ नहीं करते. तो ऐसी कई चीजें हैं जो आप तुरंत कर सकते हैं क्योंकि आपके पास नियम मौजूद हैं. इससे पता चलता है कि नीयत ठीक नहीं है. अगर  आपने इन कानूनों का सहारा लिया होता, तो काली कमाई ना करने वाले उन 97% लोगों पर बिना प्रतिकूल प्रभाव डाले आप काले धन में लगे 3% लोगों पर निशाना साध सकते थे. वास्तव में, 97% लोग काले धन की अर्थव्यवस्था के कारण पहले से ही पीडित हैं और अब उन पर दूसरे बोझ भी लाद दिए गए हैं – बिना काले धन की समस्या का हल निकाले.

प्रश्न – उनके लिए आपने सुगम तरीका नहीं दिया है जो अनजाने में काले धन की अर्थव्यवस्था के अंग हो गए हैं?

उत्तर – नहीं. आय घोषणा योजना 30 सितंबर तक की थी जिसमें आप 15% जुर्माने के साथ काले धन की घोषणा कर सकते थे. वित्त मंत्री ने कहा,” कृपया साफ होकर आयें तभी आप चैन से सो पायेंगे” (प्लीज़ कम क्लीन देन यू कैन स्लीप इन पीस).  पर जब आप कहते हैं कि हम भ्रष्ट व्यापारी के खिलाफ कदम नहीं उठायेंगे तब तक वे खुश हैं. तो जहां माफी दी गयी वहां फायदा नहीं हुआ. स्वैच्छिक घोषणा योजना (वी डी एस ) भारत में छ: बार लागू की गयी है.  सरकार ने 1997 में उच्चतम न्यायालय में हलफनामा दिया कि हम कभी इस तरह की योजना नहीं लाएंगे. कारण रहा कि ये ईमानदार लोगों के साथ अन्याय था. ईमानदार व्यापार की पूंजी धीरे धीरे बढ रही है क्योंकि वो पूरा कर दे रहा है. बेइमान व्यापारी की पूंजी तेजी से बढ रही है.  इसलिए ईमानदार कहता है मुझे भी बेइमान होने दो. स्वैच्छिक घोषणा योजना पर 1997 में कैग ने दो चीजें बतायीं. लोग अभ्यस्त कर अपराधी हो गये हैं. जिन लोगों ने पिछली पांच योजनाओं में घोषित की, उन्होंने ही छठी योजना में भी घोषित की. उन्होंने सोचा कि दूसरी योजना आ जाएगी, थोडा और पैसा कमा लें. इस तरह 1997 के बाद उन्होंने स्वैच्छिक घोषणा की ही नहीं, जबकि 2016 की आय  घोषणा योजना भी स्वैच्छिक घोषणा योजना की ही तरह थी. मॉरीशस का रास्ता भी स्वैच्छिक घोषणा योजना की तरह है. आप पैसा बाहर भेजते हैं, वापस घूमा कर ले आते हैं और इस तरह आप कर नहीं देते. हमारे पास अद्भूत कानून हैं पर हम उन्हें लागू नहीं करते.  इन कानूनों को लागू करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए.

दूसरी बात,  नकद का अर्थ अनिवार्यत: काला पैसा नहीं होता. तो, 17.5 लाख करोड रूपये में से 14.5 लाख करोड रूपये 500-1000 के नोटों में है. इसमें से 50% व्यापार में लगा होगा. अगर आप पेट्रोल पम्प जाते हैं, तो दिन के अंत में कैशियर के पास नोटों का बंडल देखते हैं. रेलवे, एयरपोर्ट – हर जगह जरूरत है. कंपनियों के पास थोडा ही काला-नकद है. ज्यादातर नकद सफेद है. जिसे अर्थव्यवस्था को प्रवाह में बनाए रखने में उपयोग किया जाता है. घरेलू तौर पर, एक साधारण चपरासी की 10,000-20,000 की काली कमाई काले धन की अर्थव्यवस्था के सामने कुछ भी नहीं है. एक मधु कोडा की काली कमाई पूरे तृतीय और चतुर्थ वर्गीय कर्मचारियों की काली कमाई से ज्यादा है. ये भ्रांति है कि काला धन मतलब नकदी है. इसी जगह मोदी की समझ में कमी है. उन्होने सोचा कि अगर वो नकदी पर चोट करेंगे तो काले धन की अर्थव्यवस्था भरभरा जाएगी.

प्रश्न – ये तो स्वार्थ-निहित राजनीतिक आदर्श की तरह लगता है.

उत्तर – राजनीतिक स्वार्थ यह है की मैं गरीबों का नायक हो जाऊं. कि मैंने काले धन की अर्थव्यवस्था तोड दी, जो गरीबों को प्रभावित कर रही थी. अगर दो लाख करोड वापस  आये तो वे
ये कहेंगे कि मैं दस करोड परिवारों को 20,000-20,000 रू दे रहा हूं. इन अमीर लोगों ने ये पैसा चुरा लिया था इसलिए मैंने उनसे वापस ले लिया है और गरीबों में बांट दिया है. पर इन कारणों से ये बेअसर रहेगा कि जब एकबार में गरीब 20,000 रू ले रहे होंगे,  तो अगर इनकी नौकरी ही चली जाएगी तो ये आगे के सालों में काफी ज्यादा खो देंगे.

प्रश्न – तो आप कह रहे हैं कि ये बहुत ही आधारभूत संरचनात्मक सुधार है, जिसका मतलब क्रमिक सुधारवाद है? जैसे चंद्रशेखर को सोना गिरवी रखना पडा था, क्योंकि उस वक्त संकट की स्थिति थी? कुछ हद तक 1972 के  संकट जैसा, जब इंदिरा गांधी ने गेंहूं पर नियंत्रण के आदेश जारी किए थे?

प्रश्न – पर बात ये है कि ये उपाय संकट के दौड़ में किए गए थे. इससे तो हरेक चीज पर असर हो रहा है.

प्रश्न – तो ये लाख टके की राजनीतिक भूल है ?

उत्तर — व्यापारी वर्ग उनका समर्थन छोड देगा क्योंकि व्यापारी बहुत परेशान है, किसान परेशान है, कर्मचारी परेशान है. वो ये करेंगे कि दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई में नकद की आपूर्ति कर देंगे और राष्ट्रीय मीडिया कहेगी कि लाइनें कम हो रही हैं. पर गांवों में नकद कम रह जाएंगे.  उन्हें बैंक में पैसे लेने के लिए लंबी दूरियां तय करनी होती है और कई बार खाली हाथ लौटना पडता है.  टियर -2 और टियर-3 के शहरों में बहुत कम पैसे हैं.

प्रश्न – अब ये लॉकरों तक भी जा सकते हैं?

उत्तर –  नहीं, इससे केवल मध्यम वर्ग ही प्रभावित होता है. गरीब लॉकरों का उपयोग नहीं करते.

प्रश्न – मगर राजनीतिक दलों को उन 3% से ही पैसा मिलता है.

उत्तर — पर अगर आपमें वो करने की राजनैतिक इच्छाशक्ति है तो ये करने की भी राजनीतिक इच्छाशक्ति होनी चाहिए. जैसे यूपी के एक नेता को चंदा देने वालों से कहते पाया गया कि पुराना नोट दे जाएं और नया नोट ले जाएं. तो राजनीतिक दल के चंदे नहीं रूकेंगे. अब 2000 के नोटों से और आसानी हो जाएगी. उन्हें कुछ नहीं होगा.  आज मैं एक कमिश्नर से बात कर रहा था, जिन्होंने बताया कि हम उन मामलों को हाथ नहीं लगाते जिनके पीछे राजनैतिक ताकतें हों. वैसे आय कर विभाग के पास इतनी तहकीकात करने की शक्ति भी नहीं है.

प्रश्न – ये केवल एक आदमी के दिमाग की उपज है?

उत्तर –उन्होंने किसी से भी विमर्श नहीं किया.  अपनी बातों में उन्होंने कहा कि सरकार के विभाग और बैंक इस बारे में पहली बार सुन रहे हैं.

प्रश्न – हमें संविधान की धारा 21 देखना चाहिए.  संविधान संपत्ति का अधिकार देता है. आपकी जीविका एक मौलिक अधिकार है.

उत्तर — वे यह नहीं कर रहे. वे पुराने नोटों को नये नोटों से बदल रहे हैं. वो आपको आपकी संपत्ति से बेदखल नहीं कर रहे.

प्रश्न -पर वे जीने के साधन लूट रहे हैं.

उत्तर — ये इस कदम का परिणाम है. जहां तक संपत्ति की बात है, वो आपकी संपत्ति नहीं लूट रहे. “मैं भुगतान का वादा करता हूं” ( आई प्रॉमिस टू पे), ये कहना एक कानूनी निविदा है. सरकार समान मूल्यों के नये नोट छाप रही है. पर इससे मंदी आती है. यह एक मूर्खतापूर्ण कदम है. किसी भी नीति के गलत दिशा में जाने की संभावना होती है.

प्रश्न – क्या इस प्रक्रिया के लिए उच्चतम न्यायालय दोषवार भी ठहरा सकता है?

उत्तर — उच्चतम न्यायालय एक जिम्मेवार संस्था है. ये कोई भी बात मौखिक रूप से कह सकता है,  डांट सकता है, पर जब फैसला आता है तो ये सतर्क हो जाते हैं. जनहित याचिकायें  दायर भी की गई हैं, और सरकार इन्हें उच्चतम न्यायालय में इकट्ठा चाहती है. और न्यायालय ने अभी तक इससे इंकार  किया है. पर अंतत: ये हो सकता है कि न्यायालय ये कहे कि ये तो नीतिगत मामला है. हम इसमें कुछ नहीं कर सकते.

प्रश्न – एक आदमी वो करने की कोशिश कर रहा है जो किया नहीं जा सकता, बिना किसी सलाह के?

उत्तर – इस तरह भारत जैसे जटिल देश को नहीं चलाया जाता.  अगर मैं उस जगह पर होता तो मैं 100 लोगों से पूछता. वे अपनी कैबिनेट में किसी पर भरोसा नहीं करते और उनके मोबाइल रखवा लेते हैं. रात 8 बजे तक उन्हें एक हॉल में रखा जाता है. उर्जित पटेल ने सभी बैंकोंवालों को बुलाया और उन्हें एक महत्त्वपूर्ण घोषणा पर नज़र रखने को कह दिया. ये, भारत जैसे जटिल देश में इस तरह की जटिल नीति लाने का तरीका बिल्कूल नहीं है

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‘खादी का मतलब है देश के सभी लोगों की आर्थिक स्वतंत्रता और समानता का आरंभ। लेकिन कोई चीज कैसी है , यह तो उसको बरतने से जाना जा सकता है – पेड की पहचान उसके फल से होती है। इसलिए मैं जो कुछ कहता हूं उसमें कितनी सचाई है, यह हर एक स्त्री-पुरुष खुद अमल करके जान ले। साथ ही खादी में जो चीजें समाई हुई हैं,उन सबके साथ खादी को अपनाना चाहिए। खादी का एक मतलब यह है कि हम में से हर एक को संपूर्ण स्वदेशी की भावना बढ़ानी चाहिए और टिकानी चाहिए;यानी हमें इस बात का दृढ़ संकल्प करना चाहिए कि हम अपने जीवन की सभी जरूरतों को हिन्दुस्तान की बनी चीजों से,और उनमें भी हमारे गांव में रहने वाली आम जनता की मेहनत और अक्ल से बनी चीजों के जरिए पूरा करेंगे।इस बारें में आज कल हमारा जो रवैया है,उसे बिल्कुल बदल डालने की यह बात है।मतलब यह कि आज हिन्दुस्तान के सात लाख गांवों को चूस कर और बरबाद कर के हिंदुस्तान और ग्रेट ब्रिटेन के जो दस-पांच शहर मालामाल हो रहे हैं,उनके बदले हमारे सात लाख गांव स्वावलंबी और स्वयंपूर्ण बने,और अपनी राजी खुशी से हिंदुस्तान के शहरों और बाहर की दुनिया के लिए इस तरह उपयोगी बनें कि दोनों पक्षों को फायदा पहुंचे।‘ महात्मा गांधी ने खादी के अपने बुनियादी दर्शन को इन शब्दों में अपनी प्रसिद्ध पुस्तिका ‘रचनात्मक कार्यक्रमः उसका रहस्य और स्थान’ में प्रस्तुत किया है। अब हमें गांधीजी के ‘पेड के फल की पहचान’ करनी है। यह रचनात्मक कार्यक्रम सत्याग्रह के लिए आवश्यक अहिंसक शक्ति के निर्माण हेतु बनाये गये थे।इन कार्यक्रमों का प्रतीक था-चरखा।लोहिया ने कई बरस बाद कहा कि हम रचनात्मक कार्यक्रम का प्रतीक ‘फावडा’ को भी चुन सकते हैं।

दावोस में शुरु हो रहे विश्व आर्थिक सम्मेलन के मौके पर इंग्लैण्ड की एक स्वयंसेवी संस्था ने एक रपट जारी की है जिसके मुताबिक भारत के सबसे दौलतमन्द एक फीसदी लोग देश की कुल दौलत के अट्ठावन फीसदी के मालिक हैं।यह आंकड़ा देश में भीषण आर्थिक विषमता का द्योतक है। यानी गांधीजी ने खादी के जिस कार्यक्रम को 1946 में ‘आर्थिक समानता का आरंभ’ माना था उसकी यात्रा उलटी दिशा में हुई है। इस देश में खेती के बाद सबसे बडा रोजगार हथकरघे से मिलता था ।उन हथकरघों तथा उन पर बैठने वाले बुनकरों की तथा खादी के उत्पादन के लिए आवश्यक ‘हाथ-कते सूत’ और उसे कांतने वाली कत्तिनों की हालत की पड़ताल जरूरी है। इसके साथ जुड़ा है ग्रामोद्योग तथा कुटीर व लघु उद्योग का संकट।

हाथ से कते सूत को हथकरघे पर बुनने से गांधी-विनोबा की खादी बनती है। दुनिया के प्रारंभिक बड़े अर्थशास्त्री मार्शल के छात्र और गांधीजी के सहकर्मी अर्थशास्त्री जे.सी. कुमारप्पा के अनुसार ,’दूध का वास्तविक मूल्य उससे मिलने वाला पोषक तत्व है।‘ इस लिहाज से खादी का वास्तविक मूल्य वह है जो कत्तिनों ,बुनकरों और पहनने वालों को मिलता है।खादी के अर्थशास्त्र में गांधीजी के समय नियम था कि उसकी कीमत में से व्यवस्था पर 6.15 फीसदी से अधिक खर्च नहीं किया जाना चाहिए ताकि कत्तिनों और बुनकरों की आमदनी में कटौती न हो।कीमत निर्धारण की तिकड़मों के अलावा अब ‘व्यवस्था खर्च’ पर 25 फीसदी तक की इजाजत है। मुंबई के हुतात्मा चौक के निकट स्थित खादी भण्डार में ‘जया भादुड़ी कलेक्शन’ और दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित खादी भंडार में विख्यात डिजाइनरों के डिजाइन किए गए वस्त्र जिस कीमत पर बिकते हैं उसका कितना हिस्सा कत्तिनों और बुनकरों के पास पहुंचता है इसका अनुमान लगाया जा सकता है। इसके अलावा खादी उत्पादन करने वाली संस्थाओं को फैशन-शो जैसे आयोजनों के लिए खादी कमीशन से अधिक आर्थिक मदद मिलती है किन्तु कताई केन्द्रों में अम्बर चरखों के रख-रखाव के लिए आर्थिक मदद नहीं मिलती। सूती-मिलों के बने सूत को हथकरघे पर बुने कपडे तथा पावरलूम पर बने कपड़ों के अलावा मोटर से चलने वाले अम्बर-चरखों पर काते गये सूत के कपडों को खादी भण्डारों से बेचने के लिए अनिवार्य प्रमाणपत्र खादी कमीशन द्वारा दिया जा रहा है। इन्हें ‘लोक वस्त्र’ कह कर खादी भंडार में बेचा जा रहा है।पूर्वोत्तर भारत के हथकरघों पर मिलों के धागे से बुने गये कपडों को भी खादी में सम्मिलित करने की नीति वर्तमान सरकार ने बनाई है। ताने में मिल का सूत और बाने में हाथ-कता सूत भी खादी भंडारों से अधिकृत रूप से बेचा जा रहा है।

केन्द्र सरकार की वर्तमान खादी-नीति की समीक्षा करते वक्त हमें यह तथ्य भी नजरअन्दाज नहीं करना चाहिए कि आठ घन्टे खादी का कपड़ा बुनने वाले को 100 रुपये तथा आठ घन्टे सूत कांतने वाली कत्तिन को मात्र 25 रुपए मजदूरी मिलती है।यह सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से बहुत कम है। आजादी के पहले खादी और ग्रामोद्योग की गतिविधियां चलाने वाली संस्था अखिल भारत चरखा संघ की सालाना रपट से कुछ आंकड़ों पर ध्यान दीजिए,इन्हें गांधीजी ने उद्धृत किया है- ‘सन 1940 में 13,451 से भी अधिक गांवों में फैले हुए 2,75,146 देहातियों को कताई ,पिंजाई,बुनाई वगैरा मिला कर कुल 34,85,609 रुपये बतौर मजदूरी के मिले थे। इनमें 19,645 हरिजन और 57,378 मुसलमान थे ,और कातनेवालों में ज्यादा तादाद औरतों की थी।’ जब आंकडे खादी की बाबत हों तब उसके मापदन्ड ऐसे होते हैं। चरखा संघ किस्म के रोजगार और आमदनी वाले आंकडे खादी कमीशन ने देने बन्द कर दिए हैं। खादी का मौलिक विचार त्याग देने के कारण अब ऐसे आंकड़ों की आवश्यकता नहीं रह गयी है।

विकेंद्रीकरण से कम पूंजी लगा कर अधिक लोगों को रोजगार मिलेगा, इस सिद्धांत को अमली रूप देने वाले कानून को दस अप्रैल को पूरी तरह लाचार बना दिया गया है। सिर्फ लघु उद्योगों द्वारा उत्पादन की नीति के तहत बीस वस्तुएं आरक्षित रह गई थीं। जो वस्तुएं लघु और कुटीर उद्योग में बनाई जा सकती हैं उन्हें बड़े उद्योगों द्वारा उत्पादित न करने देने की स्पष्ट नीति के तहत 1977 की जनता पार्टी की सरकार ने 807 वस्तुओं को लघु और कुटीर उद्योगों के लिए संरक्षित किया था। 1991 के बाद लगातार यह सूची संकुचित की जाती रही। 1 अप्रैल, 2000 को संरक्षित सूची से 643 वस्तुएं हटा दी गर्इं। 10 दस अप्रैल 2015 को उन बीस वस्तुओं को हटा कर संरक्षण के लिए बनाई गई सूची को पूरी तरह खत्म कर दिया गया। विकेन्द्रीकृत छोटे तथा कुटीर उद्योगों के उत्पादों के बजाए देश के कुछ खादी भण्डारों में एक ऐसी उभरती हुई दानवाकार कम्पनी के उत्पाद बेचे जा रहे हैं।इस कम्पनी के 97 फीसदी पूंजी के मालिक की मिल्कीयत फोर्ब्स पत्रिका ने ढाई अरब डॉलर आंकी है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का वास्तविक स्वदेशी विकल्प लघु एवं कुटीर उद्योग होने चाहिए कोई दानवाकार कम्पनी नहीं।

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खादी ग्रामोद्योग आयोग के इस वर्ष के कैलेण्डर और डायरी पर गांधीजी के स्थान पर प्रधान मंत्री का चरखा जैसी आकृति के यंत्र के साथ चित्र प्रकाशित होने के बाद देश में जो बहस चली है उसे मौजूदा सरकार की खादी,हथकरघा और कुटीर उद्योग संबंधी नीति के आलोक में देखने का प्रयास इस लेख में किया गया है।प्रधान मंत्री ने स्वयं उस नीति की बाबत एक नारा दिया है-‘आजादी से पहले थी खादी ‘नेशन’ के लिए,आजादी के बाद हो खादी ‘फैशन’ के लिए’।खादी संस्थाएं विनोबा के सुझाव के अनुरूप खादी कमीशन की जगह ‘खादी मिशन’ बनाएंगी तब वह ‘अ-सरकारी खादी’ ही असरकारी खादी होगी।

(अफलातून)

राष्ट्रीय संगठन सचिव ,समाजवादी जनपरिषद।

816 रुद्र टावर्स,सुन्दरपुर,वाराणसी-221005.

aflatoon@gmail.com

प्रेस विज्ञप्ति
केसला, जनवरी 9।
अघोषित छुपा धन समाप्त करने,नकली नोटों को ख़त्म करने तथा आतंकियों के आर्थिक आधार को तोड़ने के घोषित उद्देश्यों को पूरा करने में नोटबंदी का कदम पूरी तरह विफल रहा है। इसके साथ ही इस कदम से छोटे तथा मझोले व्यवसाय व् उद्योगों को जबरदस्त आघात लगा है।महिलाओं, किसानों और मजदूरों तथा आदिवासियों की माली हालत व रोजगार के अवसरों पर भीषण प्रतिकूल असर पड़ा है।इस संकट से उबरने में लंबा समय लग जाएगा।
उपर्युक्त बाते समाजवादी जनपरिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की होशंगाबाद जिले के ग्राम भूमकापुरा में हुई बैठक में देश की वर्तमान परिस्थिति पर पारित प्रस्ताव में कही गयी है।इस प्रस्ताव में कहा गया है कि केंद्र सरकार का ‘नागदीविहीन अर्थव्यवस्था’ का अभियान चंद बड़ी कंपनियों को विशाल बाजार मुहैया कराने के लिए है। प्रस्ताव में कहा गया है कि जमीन, मकान तथा गहनों की खरीद फरोख्त में नागदविहीन लेन देन को अनिवार्य किए जाने से छुपे,अघोषित धन के एक प्रमुख स्रोत पर रोक लगाई जा सकती है परंतु सरकार की ऐसी कोई मंशा दिखाई नहीं दे रही है।
एक अन्य प्रस्ताव में विदेशों से गेहूं के आयात पर आयात शुल्क पूरी तरह हटा लिए जाने की घोर निंदा की गयी तथा समस्त किसान संगठनों से आवाहन किया गया कि इस निर्णय का पुरजोर विरोध करें।
दल की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने भारत के चुनाव आयोग से मांग की है कि पांच राज्यों में होने वाले विधान सभा चुनावों के पूर्व आम बजट पेश करने पर रोक लगाए।आयोग को भेजे गए पत्र में कहा गया है कि आगामी 31 मार्च 2017 के पूर्व बजट पेश करना गैर जरूरी है तथा यह चुनाव की निष्पक्षता को प्रभावित करेगा।
दल का आगामी राष्ट्रीय सम्मलेन 29,30 अप्रैल तथा 1मई को पश्चिम बंग के जलपाईगुड़ी में होगा।सम्मलेन में नौ राज्यों के 250 प्रतिनिधि भाग लेंगे।
राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में मुख्यत: निशा शिवूरकर,संतू भाई संत,विक्रमा मौर्य, राजेंद्र गढवाल, रामकेवल चौहान,अनुराग मोदी,फागराम,अखिला,रणजीत राय,अफलातून,स्मिता,डॉ स्वाति आदि ने भाग लिया।अध्यक्षता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष जोशी जेकब ने की।
प्रेषक,
अफलातून,
राष्ट्रीय संगठन मंत्री,समाजवादी जनपरिषद।

जारी है….

Note ban: Not only in Bihar, BJP went land shopping in Odisha as well

2000 के नोट की चिप से आतंकियो को ट्रेस कर मार गिराया :- तिहाड़ी चौधरी( छी न्यूज)

 

Pramod Singh

..दूसरी बात. महाधन का यह महाप्रताप है, या दूरगामी सांगठनिक सोच की विकट लीला, सभी सोशल वेबसाइट्स पर, और उससे बाहर की दुनिया में भी, भाजपाई तत्व भयानक रुप से सक्रिय हैं. इतनी गहराई तक उनका फैलाव हो गया है कि हो सकता है जो चादर ओढ़कर आप बैठे हो, उसके पैताने भाजपाई तत्व लटका हुआ हो. 2014 के ठीक पहले और उसके बाद से यह महापरिवर्तन कैसे घटित हुआ है, समाज वैज्ञानिकों और कार्यकर्ताओं के लिए गंभीर विवेचना का विषय है. लेकिन यह महाक्रांतिकारी कृत्य जो घटित हुआ है, एक बड़ी वास्तविकता है और इस तोड़ और फोड़ का फ़ायदा बड़े ढंग से पूरा भाजपा और लगभग वैसे ही स्वार्थों पर फल, पोषित हो रहा बिरादर समाज, आर्थिक क्षेत्र से जुड़ी सभी संस्थाएं काट रहे हैं. यह आन्हर सेना सिर्फ़ आपकी बात का विरोध करने को हाज़िर हुई हो, ऐसा नहीं है. प्रकट गंदा फूहड़ विरोध करने के साथ-साथ, वह किसी भी सार्थक बातचीत को भटकाने, बेमतलब करने और कंफ्यूज़न फैलाने का नंगा नाच नाचने लगती है. यही इस पूरे महाकांड का मुख्य उद्देश्य भी है, कि इनके जघन्य कृत्य होते रहें, और उसकी प्रतिक्रिया में कोई भी बात, विरोध बड़े पैमाने पर फलित हो ना सके. अगर हो तो उसे कहनेऔर सुनने, सभी वालों को, हलकान करो, कंफ्यूज़ करो और पूरी प्रक्रिया को हास्यास्पद बना दो. इससे कैसे लड़ा जाए, बड़ा विकट संकट है. इस पर सोचिए, लगातार सोचिए, इसकी अब हमेशा ज़रूरत पड़ती रहेगी. आप भाजपा के सीधे विरोधी ना भी हों तो भी उनके तरीके और दुनिया वह ऐसी बना रहे हैं कि आपको बात नहीं करने देंगे और जो भी बात होगी भाजपाई फ़ायदों की बात होगी, और माथे पर ढोल बजा-बजा कर बताया जाएगा कि वही समाज और देश का भी फ़ायदा है.

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Himanshu Kumar

मोदी जी आपका तो रोम-रोम कारपोरेट के यहां गिरवी है

आगरा की रैली में पीएम मोदी ने कहा कि वो बिकाऊ नहीं हैं। यह बात उतनी ही असत्य है जितना यह कहना कि सूरज पश्चिम से निकलता है। जो व्यक्ति बाजार की पैदाइश है और जिसकी कारपोरेट ने खुलेआम बोली लगाई हो। उसके मुंह से यह बात अच्छी नहीं लगती है। शायद मोदी जी आप उस वाकये को भूल गए जब कारपोरेट घरानों के नुमाइंदों का लोकसभा चुनाव से पहले अहमदाबाद में जमावड़ा हुआ था। इसमें अंबानी से लेकर टाटा और बजाज से लेकर अडानी तक सारे लोग मौजूद थे। पूंजीपतियों के इस मेले में आप अकेले घोड़े थे। जिसके बारे में इन धनकुबेरों को विचार करना था। फिर वहीं पर आप के ऊपर दांव लगाने का फैसला हुआ था। उसके बाद से कारपोरेट ने अपनी पूरी तिजोरियां खोल दीं। निजी टीवी चैनलों से लेकर अखबारों और सोशल मीडिया से लेकर अपने निजी तंत्र को आपके हवाले कर दिया। लोकसभा चुनाव के दौरान पांच से लेकर सात चार्टर्ड विमान आपकी सेवा में लगा दिए गए। हेलीकाप्टरों की तो कोई गिनती ही नहीं थी। एक विदेशी एजेंसी के अनुमान के मुताबिक 24 हजार करोड़ रुपये आपने पानी की तरह बहाया। क्या ये पैसा बीजेपी के पास जमा था। या फिर संघ ने उसे मुहैया कराया था। या आपके घर-परिवार वालों ने दिया था। जनता के चंदे से तो पार्टी कार्यकर्ताओं का खाना भी नहीं चल पाता। ऐसे में यह मत कहिएगा कि जनता के बल पर चुनाव लड़े।

दरअसल कारपोरेट घरानों ने आपको गोद ले लिया था। क्योंकि उसे लग गया था कि यही वो शख्स है जो उसके लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद साबित होगा। अनायास नहीं अपनी पुरानी चहेती पार्टी कांग्रेस की नाव को छोड़कर यह हिस्सा रातों रात आपकी गाड़ी में सवार हो गया। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस उनका कोई अनभल कर रही थी। सच यह है कि इस देश को वैश्वीकरण के रास्ते से जोड़ने वाला शख्स ही उसका प्रधानमंत्री था। लिहाजा उस पर भरोसा न करने का कोई कारण नहीं था। लेकिन कारपोरेट जितनी तेजी से देश के संसाधनों को लूटना चाहता था। या उस पर काबिज होना चाहता था। कांग्रेस उसके लिए तैयार नहीं थी। क्योंकि उसने मानवीय चेहरे के साथ उदारीकरण के रास्ते पर बढ़ने का फैसला लिया था। जिसके चलते उसे तमाम कल्याणकारी योजनाओं को भी चलाना पड़ रहा था। कारपोरेट जिसके धुर खिलाफ था। क्योंकि बाजार में उसके फलने-फूलने की राह में यही सबसे बड़ी बाधा थी। इसलिए कारपोरेट ने सामूहिक तौर पर आपके साथ जाने का फैसला लिया। क्योंकि उसे पता था कि आप देश के संसाधनों से लेकर पूरे बाजार को उसके हवाले कर देंगे। नीतियां कारपोरेट की होंगी, लागू सरकार करेगी। अनायास नहीं सभी सरकारी संस्थाओं को पंगु बना दिया गया है। बारी-बारी से कल्याणकारी योजनाओं को वापस लिया जा रहा है।

इसलिए मोदी जी बिकाऊ की बात तो दूर आपका तो रोम-रोम कारपोरेट के यहां गिरवी है। और अब आप बारी-बारी से उसी कर्जे को उतार रहे हैं। अदानी को पूरे कच्छ जिले की जमीन 1 रुपये प्रति एकड़ की लीज पर देना उसी का हिस्सा है। देश का पूरा सोलर प्रोजेक्ट अडानी के हाथ में है। कोई हफ्ता शायद ही बीतता हो जब बाबा रामदेव के लिए किसी तोहफे की घोषणा न होती हो। अंबानी का तो पहले साउथ ब्लाक तक ही रिश्ता था। वह भी दलालों के जरिये। लेकिन अब उनकी सीधे पीएमओ में दखल हो गई है। नोटबंदी का फैसला इसी कारपोरेट को सीधे लाभ पहुंचाने के लिए किया गया है। आप ने आगरा की रैली में खुश होकर कहा कि 5 लाख करोड़ रुपये आ गए हैं। और अब जनता और जरूरतमंद को लोन दिया जाएगा। लेकिन सच यही है कि उससे जनता नहीं बल्कि कारपोरेट की झोली भरी जाएगी। और जनता के बीच से जो लोग लोन लेंगे वो भविष्य में आत्महत्या करेंगे। लेकिन कारपोरेट का लोन माफ कर दिया जाएगा।

आपने कालाधन धारियों को गिरफ्तार कर सजा देने की बात कही है। कुछ जगहों पर छापे की खबरें भी आ रही हैं। ये कितनी अफवाह हैं और कितनी नौटंकी। इसका कुछ समय बाद ही पता चलेगा। लेकिन सच यही है कि निशाने पर अभी भी छोटी मछलियां ही हैं। अगर आप इस पूरी कवायद को लेकर गंभीर होते। तो अडानी के तकरीबन 5400 करोड़ रुपये के बाहर भेजे जाने वाले मामले में एसआईटी की जांच में बांधा नहीं डालते। लेकिन सच यही है कि आपको बड़े कारपोरेट घरानों के काले धन से कुछ नहीं लेना देना। और न ही विदेशों में जमा धन आपकी चिंता का विषय है। आप का मुख्य मकसद जनता के पैसे को बैंकों में लेकर उसे कारपोरेट के हवाले करना है।

मोदी जी जुमलों की एक सीमा होती है। यह भ्रम भी बहुत दिनों तक नहीं रहने वाला। क्योंकि इसका असर सीधे जनता पर पड़ेगा। जनता को जुमला और कारपोरेट को थैली का पर्दाफाश होकर रहेगा। वैसे भी झूठ की उम्र बहुत छोटी होती है।

ध्यान रहे कि 30 दिसंबर तक जितने मूल्य के 500 ,1000 के नोट रिजर्व बैंक में वापस जमा होंगे उस राशि को रिजर्व बैंक द्वारा जारी इन नोटों के कुल मूल्य से घटाने पर एक अन्दाज लगेगा, 500 और हजार के नोटों के रूप में काले धन का।
कुल काले धन का यह बहुत छोटा हिस्सा होगा। अर्थशास्त्री राष्ट्रीय आय का 40 फीसदी काला धन होने का अनुमान बताते हैं।

Aflatoon Afloo

उपचुनावों में जो जहां सत्ता में था जीत गया।भाजपा म प्र में ,तृणमूल बंगाल में,माकपा त्रिपुरा में,अन्नाद्रमुक तमिलनाडु में

Aflatoon Afloo

गुजरात में घूस की रकम 2000 रुपये के नोटों में पकड़ाई,दो आतंकियों के पास 2000 रु के नोट मिले और अब 2000 के नकली नोट भी मिल गये। क्या बचा?
बची है बडे उद्योगपतियों की सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में देनदारी।तो वह आम जनता के खून पसीने की कमाई निचोड कर जमा कर लेने के बाद सलट जाएगी।

Rs. 4 Lakh In Fake 2,000 Rupee Notes Seized In Odisha, 1 Arrested

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Sanjay Jothe

गाँव वाले ‘ऑनलाइन’ का अर्थ समझ रहे हैं – ‘लाइन में लगना ही ऑनलाइन होना है’ … JIO डिजिटल इंडिया

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Aparna Krishnan

Please never go cashless even if it may reduce corruption.

Life and livlihoods come first. Small people survive on cash – flower vendors, small shopkeepers, small farmers. Fighting corruption comes second, only after survival is taken care of.

BUSINESS
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Raj Kishore

नोटबंदी से अमीर लोगों की शामत आई होती, तो अ. बच्चन जैसे अमीर इसका समर्थन क्यों कर रहे होते? क्या मोदी अचानक वामपंथी हो गए हैं? समझदार जवाब को कोई इनाम नहीं।

दिनेशराय द्विवेदी‘s post.

दिनेशराय द्विवेदी

शादी के लिए 2,50,000/- रुपए की नकदी नहीं मिलेगी किसी को

वाह! मोदी सरकार!
वाह! रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया!

यदिआप को किसी को नकदी देनी ही नहीं है तो क्यूँ इस बात की वाह वाही लूटी जा रही है कि शादी वालों को ढाई लाख नकदी दे दी जाएगी?

सीधे सीधे कह क्यों नहीं देते कि कमाओ और बैंक में जमा करो। इस्तेमाल तो तभी करना जब सरकार और आरबीआई करने दे।

ढाई लाख में क्या आता है? एक दिन की शादी के लिए कोई ढंग का मैरिज हॉल भी बुक नहीं होता।

सरकार इतनी दिवालिया हो चुकी है कि वह भी देना नहीं चाहती।

बैंक जब 2000 रुपये का विड्रॉल नहीं दे सकते तो ढाई लाख कहाँ से देंगे?

शादी के लिए बैंक कह रहे हैं कि अभी नोटिफिकेशन नहीं आया।

रिजर्व बैंक ने आज वह नोटिफिकेशन निकाला है। आप खुद पढ़ लीजिए। इस की शर्तें पढ़ कर आप को पता लग जाएगा कि सरकार का इरादा किसी को भी शादी के लिए ढाई लाख तो क्या एक रुपया भी देने का नहीं है।

क्यों थोथी घोषणाएँ कर कर के जनता को उल्लू बना रहे हैं?

Notifications

Withdrawal of Legal Tender Character of existing ₹ 500/- and ₹ 1000/- Specified Bank Notes (SBNs) – Cash withdrawal for purpose of celebration of wedding

RBI/2016-2017/145 DCM (Plg) No.1320/10.27.00/2016-17 November 21, 2016

The Chairman / Managing Director/Chief Executive Officer, Public Sector Banks / Private Sector Banks/ Private Sector Banks/ Foreign Banks Regional Rural Banks / Urban Co-operative Banks / State Co-operative Banks

Dear Sir,
Withdrawal of Legal Tender Character of existing ₹ 500/- and ₹ 1000/- Specified Bank Notes (SBNs) – Cash withdrawal for purpose of celebration of wedding
Please refer to our Circular No. DCM (Plg) No.1226/10.27.00/2016-17 dated November 08, 2016 on the captioned subject.
2. With a view to enable members of the public to perform and celebrate weddings of their wards it has been decided to allow higher limits of cash withdrawals from their bank deposit accounts to meet wedding related expenses. Yet, banks should encourage families to incur wedding expenses through non-cash means viz. cheques /drafts, credit/debit cards, prepaid cards, mobile transfers, internet banking channels, NEFT/RTGS, etc. Therefore, members of the public should be advised, while granting cash withdrawals, to use cash to meet expenses which have to be met only through cash mode. Cash withdrawals shall be subject to the following conditions:
i. A maximum of ₹ 250000/- is allowed to be withdrawn from the bank deposit accounts till December 30, 2016 out of the balances at credit in the account as at close of business on November 08, 2016.
ii. Withdrawals are permitted only from accounts which are fully KYC compliant.
iii. The amounts can be withdrawn only if the date of marriage is on or before December 30, 2016.
iv. Withdrawals can be made by either of the parents or the person getting married. (Only one of them will be permitted to withdraw).
v. Since the amount proposed to be withdrawn is meant to be used for cash disbursements, it has to be established that the persons for whom the payment is proposed to be made do not have a bank account.
vi. The application for withdrawal shall be accompanied by following documents:
(a) An application as per Annex
(b) Evidence of the wedding, including the invitation card, copies of receipts for advance payments already made, such as Marriage hall booking, advance payments to caterers, etc.
(c) A detailed list of persons to whom the cash withdrawn is proposed to be paid, together with a declaration from such persons that they do not have a bank account. The list should indicate the purpose for which the proposed payments are being made
3. Banks shall keep a proper record of the evidence and produce them for verification by the authorities in case of need. The scheme will be reviewed based on authenticity/ bona fide use thereof.
Yours faithfully,
(P Vijaya Kumar)
Chief General Manager

Encl: As above
Annex – Application Form
Name of the person making withdrawal:
Amount to be withdrawn:
PAN Number (photocopy to be retained):
Address:
Name of Bride and Groom:
Identity proof of Bride and Groom:
(Any valid identity proof, copy to be retained)
Address of Bride:
Address of Groom:
Date of marriage:
Declaration
I ——————-(Name) certify that no other person in the Groom’s/Bride’s (strike whatever is not applicable) family is withdrawing cash for the same wedding from your bank or any other bank. I hereby declare that the information provided herein and the enclosures is true and correct and I am aware that any false information makes me liable for action by the authorities.
Signature of the Applicant:
Name:
Date:
Verified by
(Name, signature and seal of the bank official not below the rank of a branch manager.

बहुत प्रिय मित्र Farid फ़रीद Khan ख़ाँ की जरूरी टिप्पणी। वे मुम्बई रहते हैं।
” नए नोट तो अभी तक नहीं मिले. सब्ज़ी भी बड़े मॉल से ख़रीदने पर मजबूर हैं क्योंकि कार्ड से पेमेंट हो सकता है वहाँ. और घूसखोरी तो दो हज़ार के नोट से भी शुरू हो चुकी है. देखा नहीं गुजरात में चार लाख सिर्फ़ दो हज़ार के नोटों में मिले हैं घूस लेते और देते हुए. सरकार घूस खोरों तक नियमित तरीके से नए नोट पहुँचा रही है लेकिन हम तक नहीं पहुँचा रही है. हम उसके किसी काम के नहीं हैं, ऊपर से विरोध भी करते हैं. उधर आतंकवाद भी शुरू हो गया है. जैसे घूस खोरों के पास पैसा आया वैसे आतंकवादियों के पास. सब चल रहा है वैसे ही.”

2016 से ही हजार के नोटों के जरिए धन बाहर जा रहा था।

Were Rs 1000 Notes Moving Towards Safe Haven Assets in Early 2016?

Via Bhaswati Ghosh :
…The effects of demonetization could last for years, driving the country into recession and pushing Indians to keep their wealth in more stable currencies, such as the euro or U.S. dollar.

“When you don’t trust a currency and you don’t trust a government you start using foreign currencies,” said Hanke. “That’s what this is going to do, I think: People will not trust the rupee.”

The Effects of India’s Currency Reform? ‘Chaos’ Say Analysts

एक पेंटर ने किसी धन पशु के यहां ₹ 4000 का काम किया। उसे सेठ ने 1 लाख के पुराने नोट दिए और वापस करने की शर्त भी नहीं रखी।ऐसे किस्से क्यों सुनने में नहीं आ रहे?

मकान की रजिस्ट्री शुल्क में पुराने नोट लिए जा रहे हैं ! काले का सफ़ेद चालू आहे।’अपने’ महाराष्ट्र में।

आज मेरी परचून की दुकान वाले 500 के नोट ले रहे थे। मिठाई वाले ने कहा बिक्री 60% कम हो गयी है। मिठाई वाले कर्मचारी को कहा गया था कि 500 की मिठाई लेने पर 500 का नोट ले लेना।बिना खाता वाले बैंकों मेँ फार्म भर कर 4000 तक के नोट बदलवाने के लिए लम्बी लाइन लगा रहे हैं।उस फार्म की भराई 10 रु. है।
सरकार के किसी जिम्मेदार से किसी ने सुना कि नये छोटे नोट भी छापे गये हैं? RBI के आंकडे के हिसाब से 80 फीसदी बडे वाले नोट चलन में थे।कुल 16 लाख करोड की मुद्रा में चलन थी।यानि 20 फीसदी ही छोटे वाले थे। 2000 ,1000 के नये नोट की बात आई है। 100,50,20,10 के पर्याप्त नये नोट नहीं आये तो छोटे व्यवसाय और खरीद -फरोख्त में हाहाकार छाया रहेगा।
1978 में 1000,5000 और 10,000 के नोटों का चलन बन्द किया गया था। ऐसे 165 करोड रुपये के नोट चलन में थे,रद्द किए जाने के बाद 135 करोड के नोट जमा हुए। काले धन पर कोई बडा प्रभाव नहीं पडा था।उसके बाद भी काले धन की व्यवस्था फलती फूलती रही। उस कदम का आम आदमी पर असर नहीं पडा था।नोट लौटाने के लिए ऐसी कतारें न थीं। लोग 10 और अधिक से अधिक 100 के नोट ले कर चलते थे इसलिए व्यापार पर असर नहीं पडा था।
यह ध्यान रहे कि हमारी अर्थव्यवस्था में चेक और प्लास्टिक मनी अभी खास प्रचलित नहीं है।हांलाकि वित्त मंत्री ने आज उसका प्रचार किया।
भारत में काला धन का शास्त्रीय अध्ययन करने वले अर्थशास्त्री (Author of `The Black Economy in India’, Penguin (India)) का अनुमान है कि 70 लाख करोड काला धन है और इसमें नगद का हिस्सा चन्द लाख करोड से अधिक नहीं है।
आम आदमी के अलावा छोटा व्यवसायी नोटबन्दी से प्रभावित हुआ है।प्रधान मन्त्री जन धन योजना के बन्द पडे खाली खाते में भी कुछ काला धन आ जाए तो अच्छा ही होगा,बशर्ते उन गरीबों को उससे कुछ लाभ हो। छोटे व्यवसाइयों पर जनसंघ के जमाने से संघ की पकड़ थी,उसमें कमी निश्चित आएगी।
– अफलातून.

‘मोदी साहब का कचरा हम लोग साफ़ कर रहे हैं।’ मेरी बैंक शाखा के साथी कैशियर ने कहा।

रिजर्व बैंक फटे,सड़े-गले नोट हर साल नष्ट करती है,नये नोट छापती है।रिजर्व बैंक का कहना है 500 और 1000 के नोट कुल मुद्रा का 86% थे।यह बैंक में जमा हो रहे हैं,सरकार के एक आदेश से।कमा कर की गई बचत नहीं है,यह।इसे धीरे-धीरे ही निकाला जा सकेगा। प्रधान मन्त्री जन धन योजना में थोक में खाते खुल गये थे,अधिकांश में लगातार जमा करने के लिए पैसे नहीं थे। सर्वोच्च न्यायालय जब अम्बानी जैसे बडे बडे बकायेदारों की सूची जारी करने को कहती है तो सरकार लजाती है। बैंकों का धन इन बकायेदारों ने खाली किया अब उनके हमदर्द साधारण जनता बैंक में धन जमा करा रहे हैं।बढ़ी हुई कुल जमा राशि के आधार पर बकायेदारों की वसूली रुक जाएगी।काला धन खुले आम सोने में और विदेशी मुद्रा (डॉलर,पाउन्ड,यूरो) में बदला जा रहा है। सचमुच उन्नति और उत्पादन होता और लोग बचत करने की स्थिति में होते तब आदर्श स्थिति होती। इससे विपरीत सरकार के निर्णय से बाध्य हो कर बैंकों में जमा राशि बचत नहीं है,बकायेदार पूंजीपतियों को इमदाद है।
रेल के उदाहरण को लें।रेल में आरक्षण कराने की मियाद बढ़ा देने की वजह से हमे उसके सूद से वंचित करते हुए रेलवे के पास हमारा पैसा तीन महीने रहता हैऔर मंत्री प्रभु उसमें से निजी बीमा कम्पनियों को दे रहे हैं।

‘सोने को छिपाना,गुपचुप ले जाना या इसका लेन-दे न करना आसान है।करोड़ों रुपये के नोट कहीं रखना आसान नहीं है किन्तु करोड़ों रुपये का सोना आसानी से बैंक के एक छोटे से लॉकर में छिपाकर रखा जा सकता है। सोने की मांग और हवस को घटाना,हतोत्साहित करना और नियंत्रित करना देश के हित में होगा।’ – सुनील

‘ आज समझ में आया की हमारे प्रधान मंत्री महोदय ने सभी के अकॉउंट क्यों खुलवाये थे।
50 दिन का समय है आपके पास नोट बदलाव सकते हो। मतलब जिसके पास बोरी भरी हुई है वो 100 लोगो को पकड़ेगा उनके अकॉउंट में थोड़े-थोड़े रूपये डलवायेगा। फिर निकाल लेगा।
वैसे समय मार्च 2017 तक है। हजारो रास्ते है चोरों के पास निकलने के लिए। क्योकि ये रास्ते छोड़े गए है चोरों के लिए।’ कहना है,मित्र Uday Che का।

ज्यादातर पेट्रोल पंप केन्द्र सरकार के मन्त्रालय की PSUs द्वारा संचालित हैं।
आज कल इन पंपो पर ‘कर-चोरी के खिलाफ लडाई में मेरा पैसा सुरक्षित है’ अभियान चलाया जा रहा है।इस दोगले प्रचार अभियान से आपको गुस्सा नहीं आया?
– मेरा पैसा इतना सुरक्षित है कि इसे मैं भी मनमाफिक नहीं निकाल सकता।
– मेरा पैसा इतना सुरक्षित हो गया कि मुझे स्थायी तौर पर असुरक्षित कर दिया।
-मेरा पैसा इतना सुरक्षित हो गया कि उसकी इज्जत हमारी ही नजरों में गिरा दी गई और उसका मूल्य अन्य मुद्राओं की तुलना में गिरता जा रहा है।
– अब तक कर-चोरी के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई? CAG ने जहां अम्बानी-अडाणी की अरबों रुपयों का कर न वसूलने पर आपत्ति की है,वह भी नहीं नहीं वसूलेंगे।
– देश का पैसा चुरा कर बाहर जमा करने वालों में से जिनके नाम पनामा वाली सूची में आए उन्हें कोई सजा क्यों नहीं दी गई ? HSBC द्वारा उजागर विदेश में देश का धन जमा करने वालों को क्या सजा दी?इसमें भी इनके यार थे।
– सितंबर में खत्म हुई आय की ‘स्व-घोषणा’ में भी टैक्स चोरों को इज्जत बक्शी गयी है अथवा नहीं?
– सुप्रीम कोर्ट में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की खस्ताहाल की मुख्य वजह अम्बानी,अडाणी और वेदान्त वाले अनिल अग्रवाल जैसों की बकायेदारी को बताया गया। इस पर नोटबंदी के पहले अरुण जेटली कह चुके हैं कि सरकारी बैंकों में पैसा पंप किया जाएगा। अब जनता का पैसा हचाहच पंप हो ही रहा है। Non performing assets बढेंगे तो इन धन पशुओं को रियायत मिल जाएगी। यह आपके यारों द्वारा कर-डकैती नहीं है?
– जिन गांवों में बैंक नहीं हैं वहां पहुंच कर पैसे क्यों नहीं बदले जा रहे? क्या आपको पता है कि समाज के सबसे कमजोर तबकों के साथ उनकी गाढी कमाई की ठगी से 500 के बदले 250 तक दिए गए हैं?

  नोट छापने का काम रिजर्व बैंक का है। जो नोट कट-फट जाते हैं या सड़ जाते हैं उन्हें नष्ट करके बाजार में विभिन्न मूल्य वाले नये नोट छापने का काम भी रिजर्व बैंक का है। हमारी अर्थव्यवस्था में 86 फीसदी नोट 500 तथा 1000 रुपये के थे। यानि छोटे नोट अर्थव्यवस्था में मात्र 14 फीसदी रहे होंगे। इस निर्णय के पहले से बैंकों के ए टी एम से अधिकतर 500 और हजार के नोट ही मिलते थे।प्रधान मंत्री ने राष्ट्र के नाम संदेश के माध्यम से 500 और 1000 रुपये के नोट सन्देश के चार घन्ट के बाद से रद्द करने की घोषणा की।उनका दावा था कि इससे काला धन पर प्रभावी रोक लगेगी और अर्थव्यवस्था का शुद्धीकरण हो जाएगा।

  यह भी कहा गया कि ऐसा पहली बार किया जा रहा है।यह बात गलत थी।1978 में जनता पार्टी की सरकार ने  हजार, 5 हजार और 10 हजार के नोटों को रद्द किया था। तब यह बडे नोट 165 करोड मूल्य के थे तथा नोटबंदी के बाद 135 करोड के नोट वापस जमा हो गये थे। काले धन पर विशेष प्रभाव नहीं पडा था तथा इस कदम के बाद भी काले पैसे की अर्थव्यवस्था फलती-फूलती रही।उस जमाने में आम आदमी की जेब में आम तौर पर 10-10 के नोट और कभी कदाच 100 के नोट रहते थे। रद्द किए गए नोटों को लौटाने के लिए लम्बी कतारें नहीं थीं।तथा अर्थव्यवस्था में छोटे व्यवसायों और उससे जुडे लोगों पर इसका कोई असर नहीं पडा था।

  80-85 फीसदी मुद्रा के चलन पर रोक से स्वाभाविक तौर जनता में हाहाकार मचा हुआ और अत्यन्त तंगी का सामना करना पड रहा है। छोटे व्यवसाय पर भारी असर हुआ है।अब भी सरकार द्वारा नये छोटे नोटों को छापने की बात नहीं हो रही है।इसलिए यह संकट लम्बे समय तक चलेगा ऐसा लगता है। इस कदम से गैर कानूनी मुद्रा बाजार (हवाला) में तेजी आ गई है। काले धन को समय समय पर सोने,डॉलर में परिवर्तित कर लिया जाता है इसलिए सोने और हवाला कारोबार में भी तेजी बनी रहेगी।

   जहां तक काला धन समाप्त करने का सवाल यह कदम न सिर्फ अपर्याप्त है बल्कि काला धन बनाने के स्रोतों और उसकी मशीनरी पर भी चोट नहीं करता है। घूस कभी चेक से नहीं दी जाती इसलिए यदि घूस लेना चालू रहा तो नगद में काले धन की जरूरत बनी रहेगी।

  जनता द्वारा अच्छा उत्पादन,व्यवसाय और रोजगार करने के बाद यदि पैसा बचाया जाता है तो उससे अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है।

उत्पादन,व्यवसाय,रोजगार के विकास के बिना जनता का पैसा बैंक में जमा करने के उपाय विफल होते हैं। प्रधान मंत्री जन-धन योजना में खुले अधिकांश खाते बिना लेन-देन के पडे रहे। ऐसा माना जा रहा है चूंकि इनमें से अधिकांश गरीबों के खाते थे जो पहली बार खुल रहे थे इसलिए इनका उपयोग काले धन को बचाने की प्रक्रिया में उपयोग हो सकता है।इसमें उन गरीबों का लाभ नगण्य होगा।
  काल धन पर गहराई से अध्ययन करने वाले विशेषज्ञों का मत है कि अर्थव्यवस्था से जुडा करीब 90 लाख करोड रुपया काला धन है| इस कदम से इसका एक बहुत छोटा हिस्सा प्रभावित होगा और विभिन्न क्षेत्रों में काला धन बनने के स्रोत बने रहेंगे।

इस कदम से पूरी तरह से अप्रभावित वह पूंजीपति वर्ग है जिन्हें सरकार के निर्णयों से हजारों करोड का लाभ होता है। यह निर्णय प्राकृतिक संसाधनों को इन लोगों को सौंपने से होने वाले अरबों के मुनाफे तथा सरकारी बैंकों में इन लोगों के बकाया हजारों करोड की वसूली न करने को कहां प्रभावित करता है? सर्वोच्च न्यायालय द्वारा खिंचाई के बाद इन बडे बकायेदारों की सूची गोपनीय तौर पर न्यायालय को सौंपी गयी है। बैंकों द्वारा कर्जा देने की सीमा निर्द्धारित होती है बैंकों में जमा पैसे से। बहरहाल  जनता की ईमानदारी की कमाई का पैसा बैंकों में जमा होगा तथा इसको निकालने पर सरकार का नियन्त्रण होगा।इस तरीके से बालात की गयी बचत के बहाने इन बडे बकायेदारों को राहत न मिले यह देखने वाली बात होगी।

अफलातून
संगठन सचिव,समाजवादी जनपरिषद

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