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Posts Tagged ‘adivasi’

मार्क्स हों ,गांधी हों या लोहिया उनके बताये रस्ते पर चलते रहने के बजाए नई पगडंडिया बनाने वाला ही योग्य अनुगामी होता है। वह लकीर का फकीर नहीं होता , नए उसूल बताता है और उन पर चल कर दिखाता है। सुनील ने इन महापुरुषों के विचार ,सिद्धान्त और काम में नया जोड़ा। सुनील की बनाई पगडंडियों की आज चर्चा का दिन है। सुनील इन पगडंडियों पर चला भी इसलिए यह चर्चा आगे भी प्रासंगिक रहेगी।

केसला इलाके में पीने के पानी और सिंचाई के लिए छोटे बन्धों के लिए भौंरा बेतूल पैदल मार्च इलाके को रचनात्मक उर्जा देने वाला कार्यक्रम सिद्ध हुआ। इन बन्धों का प्रस्ताव मोतीलाल वोरा को किसान आदिवासी संगठन ने दिया।

आदिवासी गांव में नियुक्त मास्टर की मौजूदगी के लिए भी इस व्यवस्था में महीनों जेल जाना पड़ता है यह राजनारायण और सुनील ने बताया।

सुनील ने लम्बे चौड़े विधान सभा ,लोक सभा क्षेत्रों के बजाए व्यावाहारिक विकेन्द्रीकरण का मॉडल बताया जिनमें पंचायती व्यवस्था के वित्तीय-आर्थिक अधिकार का प्रावधान होता। पूंजीपतियों के भरोसे चलने वाले मुख्यधारा के दल ही इन बड़े चुनाव क्षेत्रों में सफल होते हैं।

जल,जंगल,जमीन के हक को स्थापित करने के लिए आदिवासी में स्वाभिमान जगाने के बाद और लगातार अस्तित्व के लिए संघर्ष करते करते सहकारिता की मिल्कियत का एक अनूठा मॉडल चला कर दिखाया।

संसदीय लोकतंत्र ,रचनात्मक काम और संघर्ष इनके प्रतीक ‘वोट,फावड़ा ,जेल’ का सूत्र लोहिया ने दिया।’वोट , फावड़ा,जेल’ के इन नये प्रयोगों के साथ-साथ सुनील ने इस सूत्र में दो नये तत्व जोड़े- संगठन और विचार । जीवन के हर क्षेत्र को प्रतिकूल दिशा में ले जाने वाली ‘प्रतिक्रांति’ वैश्वीकरण के षड़्यन्त्र को कदम-कदम पर बेनकाब करने का काम सुनील ने किया। ‘पूंजी के आदिम संचय’ के दौरान होने वाला प्रकृति का दोहन सिर्फ आदिम प्रक्रिया नहीं थी,सतत प्रक्रिया है। १९४३ में लिखे लोहिया के निबन्ध ‘अर्थशास्त्र , मार्क्स से आगे’। मार्क्स की शिष्या रोजा लक्सेमबर्ग की तरह लोहिया ने बताया कि पूंजीवाद को टिकाये रखने के लिए साम्राज्यवादी शोषण जरूरी है। समाजवादी मनीषी सच्चिदानन्द ने आन्तरिक उपनिवेशवाद का सिद्धान्त प्रतिपादित किया। सुनील ने इस सिद्धान्त को परिमार्जित करते हुए कहा कि  सिर्फ देश के अन्दर के पिछाड़े गये भौगोलिक इलाके ही नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था के खेती,छोटे उद्योग जैसे क्षेत्र भी आन्तरिक उपनिवेश हैं। खेती के शोषण से भी पूंजीवाद को ताकत मिलती है।

्सुनील

सुनील

भ्रष्टाचार और घोटालों से उदारीकरण की नीतियों का संबध है यह सुनील हर्षद मेहता के जमाने से सरल ढंग से समझाते आए थे। इस संबंध को पिछले दिनों चले ‘भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन’ ने पूरी तरह नजरअन्दाज किया था। बल्कि इस आन्दोलन के तमाम प्रणेता इसे सिर्फ नैतिकतावादी मुहिम के रूप में चला कर घोटालों से जुड़े कॉर्पोरेट घरानों और फिक्की जैसे उद्योगपतियों के समूहों को इस बात द्वारा आश्वस्त करते रहे कि आपको लाभ देने वाली नीतियों की चर्चा को हम अपनी मुहिम का हिस्सा नहीं बना रहे हैं ।

सुनील की बताई राह यथास्थितिवाद की राह नहीं है , बुनियादी बदलाव की राह है। सुनील के क्रांति के लिए समर्पित जीवन से हम ताकत और प्रेरणा पाते रहेंगे।

सुनील की स्मृति में कुछ चित्र

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आदिवासी यानी आदिकाल से रहने वाले इस देश के मूल निवासी! पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने एक फैसले में इस बात को दोहराया है कि आर्यो और द्रविड़ो से भी पहले आदिवासी समूह इस भारत भूमि पर रहते थे। उन्हें छोडकर बाकी सब यहां बाहर से आकर बसें है, चाहे हजारों साल पहले क्यों न बसें हो। विडंबना यह है कि इस भूमि के सबसे पुराने मूल निवासी ही सबसे ज्यादा शक्तिहीन, भूमिहीन, बेघर, वंचित, दलित और गरीब है। आधुनिक विकास के यज्ञ में सबसे ज्यादा बलि उनकी जिंदगियों की ही चढी है और आधुनिक सत्ता-प्रशासन की संवेदन शून्यता, दमन, शोषण व भ्रष्टाचार के शिकार भी वे सबसे ज्यादा हुए है। कोई अचरज की बात नही है कि देश के आदिवासी इलाकों में माओवादी हिंसा की आग धधक उठी है। वैसे कई जगह और कई मौको पर वे लोकतांत्रिक तरीकों से भी आवाज उठाते रहे है तथा कई बार अपने को असहाय पाकर उन्होने नियति को चुपचाप मंजूर भी कर लिया है। आदिवासियों की यह हालत भारतीय लोकतंत्र पर एक गहरा प्रश्नचिन्ह खडा करती है।
इतिहास इस बात का गवाह है कि जब प्लासी की लड़ाई में सिराजुद्दौला की हार के साथ ही भारत के ऊपर अंग्रेजो की सत्ता कायम होने का रास्ता साफ हो गया था, उन्हें पहली सशक्त चुनौती भारत के जंगलों में आदिवासियों के प्रतिरोध से ही मिली। 1857 के काफी पहले आदिवासियों के विद्रोह शुरू हो गए थे। 1857 में भी और बाद में महात्मा गांधी के नेतृत्व में आजादी के आंदोलन में भी उनकी जोरदार भागीदारी रही, भले ही इतिहास की किताबों में उसे ठीक से दर्ज न किया गया हो। देश आजाद होने के बाद समता, विविधता और समरसता पर आधारित एक नए भारत के निर्माण का मौका आया था, जिसमें औपनिवेशिक काल के अन्यायों का निराकरण हो सकता था। भारत के संविधान निर्माताओं ने भी संविधान के अंदर आदिवासियों के हितों के संरक्षण और संवर्धन के प्रावधान करने की कोशिश की, किंतु अन्य कई मामलों की तरह इस में भी भारतीय जनता के साथ विश्वासघात हुआ। संविधान की मूल भावना और इसके महान लक्ष्यों की धज्जियां उड़ती रही।
आजादी मिलने के बाद पहली बड़ी घटना बस्तर के राजा प्रवीरचन्द भंजदेव की पुलिस द्वारा हत्या थी, जिसने आगे की घटनाओं का संकेत दे दिया था। भंजदेव आदिवासी नहीं थे, लेकिन वे आदिवासियों के राजा थे और यह आंदोलन पूरी तरह आदिवासियों का ही था। बाद की फर्जी मुठभेड़ो का यह संभवतः पूर्वाभास था। उधर पश्चिम की नकल पर चली विकास योजनाओं में भी सबसे ज्यादा आदिवासियों का ही आशियाना उजड़ा। बड़े बांध हो या बड़े कारखाने – ‘आधुनिक भारत के मंदिरों’ की बुनियाद आदिवासियों और जंगलो के विनाश पर ही रखी गई। भिलाई, बोकारो या राउरकेला – सब आदिवासियों की जमीन पर ही बने। आज भी उनके आसपास रहने वाले आदिवासी कंगाल, कुपोषित, वंचित और फटेहाल है। आधुनिक विकास की इन विसंगतियों के भतीभांति सामने आने के बाद भी उस पर गंभीरता व ईमानदारी से पुनर्विचार की प्रक्रिया अभी तक शुरू नहीं हुई है। बल्कि वैश्वीकरण के ताजे दौर में विकास के नाम पर आदिवासी जीवन पर हमला बढ़ गया है।
भारतीय संविधान में राष्ट्रपति को और प्रांतो में उसके प्रतिनिधि के रूप में राज्यपालों को अनुसूचित जनजातियों के संरक्षण की विशेष शक्तियां और जिम्मेदारी दी गई थी। वे चाहें तो आदिवासी इलाको में किसी भी कानून या योजना के क्रियान्वयन को रोक सकते है। लेकिन स्वतंत्र भारत में आज तक एक बार भी राष्ट्रपति या किसी राज्यपाल ने आदिवासियों के हित में इन शक्तियों का प्रयोग नही किया। भूरिया समिति की रपट के आधार पर बने ‘पेसा’ कानून का क्रियान्वयन से ज्यादा उल्लंघन होता रहा है। छत्तीसगढ़ सरकार ने तो सरगुजा जिले में एक ग्रामसभा द्वारा बिजली कारखानें के लिए जमीन देने से इंकार करने पर उस गांव को नगर में बदलने का कमाल कर दिया, ताकि पेसा कानून आडे नही आए। आदिवासी इलाको की ग्राम सभा या जनसुनवाई को हमारे आईएएस अफसर अपनी जूती की नोक के बराबर भी नहीं समझते है। कमोबेश यही हाल दो वर्ष पहले संसद में पारित वन अधिकार कानून का भी हो रहा है।
डा.ब्रहमेदव शर्मा के रूप में भारत के अनुसूचित जातियों व जनजातियों के आयुक्त की उनचालीसवीं रपट एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है जिसने हालातों का विस्तार से जायजा लिया था तथा सुझाव भी दिए थे। किंतु यह रपट अलमारियों में रखी धूल खा रही है। उधर डा.शर्मा सेवानिवृत्त के बाद खुद मैदान में कूद पड़े तो जगदलपुर में सत्ता व कंपनियों के दलालों द्वारा उनके कपड़े फाडने जैसी फजीहत कर दी गई।
आजाद भारत में आदिवासियों के उत्पीड़न का एक बड़ा स्त्रोत वन कानून, वन प्रबंधन और वननीति रही है। अंग्रेजो द्वारा भारतीय जंगलों पर अपना कब्जा करने, व्यवसायिक दोहन तथा आदिवासियों का अधिकार खत्म करने के हिसाब से बने कानूनों व नीति को आजाद भारत में भी जारी रखा गया। विश्व बैंक और अन्य विदेशी सहायता ने भी इसी को पुष्ट किया। इसकी मूल मान्यता है कि जंगलो में आदिवासियों की उपस्थिति ही जंगल व जंगली जानवरों के नाश का कारण है, इसलिए उनको हटाया जाए या उनके द्वारा जंगल उपयोग को रोका जाए। हम भूल गए कि जंगल, जंगली जानवरों और आदिवासियों का सह-अस्तित्व हजारों सालों से रहा है। उनको अलग किया तो न जंगल बचेंगे और न आदिवासी बचेंगे। हमने शेरों और हाथियों के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय उद्यान व अभयारण्य तो बनाए लेकिन यह भूल गए कि आदिवासियों के संरक्षण की भी जरूरत है और जंगल व जंगली जानवरों के नाश के दोषी आदिवासी नहीं, खुद औपनिवेशिक व आजाद सरकारों की नीतियां रही है। करीब 50 हजार शेरों और लाखो वन्य प्राणियों का शिकार तो आजादी के पहले के सौ वर्षो में अंग्रेज अफसरों व नवाबों-राजाओं द्वारा हुआ है। गुनाह किसी का और सजा किसी और को! आदिवासियों के साथ यह अन्याय और साम्राज्यवादी सलूक आज भी जारी है।
आदिवासियों के अपने विशिष्ट धर्म, रीति-रिवाज, भाषा, संस्कृति और पहचान भी लगातार हमले का शिकार हो रहे है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 350 ए में स्पष्ट निर्देश था कि – ‘प्रत्येक राज्य और उस राज्य के अंतर्गत प्रत्येक स्थानीय सत्ता भाषाई अल्पसंख्यक समूहों के बच्चों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा की पर्याप्त सुविधा जुटाएगी।’ किंतु आज तक आदिवासी बच्चों को उनकी अपनी भाषाओं से शिक्षा देने की व्यवस्था नहीं की गई। आदिवासी भाषाएं गहरे संकट में है और खत्म हो रही है और एक भाषा के साथ एक समुदाय की संस्कृति, पहचान, इतिहास और आत्मविश्वास जुड़े होते है, जिन पर संकट आता है।
यदि भारतीय लोकतंत्र को सही मायने में सार्थक और भागीदारी वाला बनाना है तो इसके ढांचे, इसकी शैली और इसके अमल को बुनियादी रूप से बदलना जरूरी हो गया है। भारतीय जनता के सबसे नीचे के पायदान पर स्थित आदिवासियों का क्या होता है यह इसकी असली परीक्षा होगी। इसके लिए राजधानियों के वातानुकूलित महलों में अफसरों-नेताओं-कंपनियों द्वारा लिए जाने वाले फैसलों को रोककर, गांवों-जंगलों में रहने वाले लोगों को अपने फैसले लेने का अधिकार देना पडेगा। इसके लिए मौजूदा पंचायती राज नाकाफी है। भारत की केन्द्रीकृत सत्ता और अफसरशाही के ढांचे को तोड़कर, प्रशासनिक ढांचे को बुनियादी रूप से बदलकर, मौजूदा कानूनों व नीतियों की गहरी समीक्षा करके, विकास के मौजूदा माॅडल को भी बदलना पडेगा। भारतीय लोकतंत्र के छः दशक पूरे होने यदि सबसे पुराने धरती-पुत्र असंतुष्ट, बैचेन व संकटग्रस्त है तो इसकी गंभीर समीक्षा व बुनियादी बदलाव का वक्त आ गया है।

sjpsunil@gmail.com

लेखक समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और आदिवासी इलाकों का मैदानी कार्यकर्ता है।

कृपया आलेख प्रकाशित होने पर कतरन एवं पारिश्रमिक निम्न पते पर भेजे:
सुनील
ग्राम/पोस्ट केसला, वाया इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.) 461111
फोन: 09425040452

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[मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में वन्य प्राणियों के लिए तीन सुरक्षित उद्यान/अभयारण्य बनाए गए है– सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान, बोरी अभयारण्य और पचमढ़ी अभयारण्य। तीनों को मिलाकर फिर सतपुड़ा टाईगर रिजर्व बनाया गया है। तीनों के अंदर कुल मिलाकर  आदिवासियों के लगभग 75 गांव है और इतने ही गांव बाहर सीमा से लगे हुए है। इन गांवों के लोगों की जिंदगी और रोजी–रोटी का मुख्य आधार जंगल है। पर अब इन गांवों को हटाया जा रहा है। बोरी अभयारण्य का धांई पहला गांव है जिसे हटाया जा चुका है। बाबा मायाराम विस्थापन झेल रहे आदिवासियों पर मेरे चिट्ठों पर लिखते रहे हैं । प्रस्तुत है इस क्रम की दूसरी कड़ी। बाबा मायाराम की अति शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक में इस प्रकार के लेख होंगे । उन्होंने यह लेख इन्टरनेट पाठकों के लिए सहर्ष दिए हैं । कोई पत्रिका/अखबार/फीचर एजंसी/वेब साइट यदि इसे प्रकाशित करना चाहती है तो यह उम्मीद की जाती है कि पारिश्रमिक और कतरन बाबा मायाराम को भेजे। – अफ़लातून]
दोपहर भोजन की छुट्टी में बच्चे खेल रहे हैं। उछल–कूद रहे हैं। शिक्षक अपने कक्ष में बैठे कुछ लोगों से गप–शप कर रहे हैं। इसी समय मैं अपने एक सहयोगी के साथ नई धांई स्कूल पहुंचा। यह गांव नया है, जो वर्ष 2005 के आसपास ही अस्तित्व में आया है। पहले यह गांव बोरी अभयारण्य के अंदर बसा था। सतपुड़ा टाईगर रिजर्व के अंतर्गत आने वाले बोरी अभयारण्य के इस गांव को विस्थापित कर बाबई तहसील में सेमरी हरचंद के पास बसाया गया है।

एक साथ पांच कक्षाएं

एक साथ पांच कक्षाएं

नई धांई की बसाहट पूरी हो गई है। बड़े आकार के कबेलू (खपरैल) वाले मकान बन गए हैं। घरों के पीछे बाड़ी है, जिसमें मक्का बोया गया है। आधी–अधूरी पक्की सड़कें बन गई है। गांव में घुसते ही एक बोर्ड लगा है जिसमें नई धांई का मोटा–मोटी ब्यौरा दिया गया है। सतही तौर पर देखने में यहां सुंदर बसाहट और पुनर्वास का आभास मिलता है पर यहां के  बच्चों और ग्रामीणों से बात करने पर उजड़ने का दर्द छलकने लगता है।

यहां की आबादी 336 के करीब है। यहां के बाशिन्दे सभी कोरकू आदिवासी हैं। पुराना गांव धांई जंगल के अंदर था। जहां आदिवासियों का जीवन जंगल और आंशिक तौर पर  खेती पर आधारित था। नई बसाहट में यहां हर परिवार को 5–5 एकड़ जमीन मिली है। पर ज्यादातर खेतों में पेड़ के ठूंठ होने के कारण खेती में अड़चन आ रही है।

छुट्टी के बाद स्कूल फिर शुरू हुआ। यहां पांच कक्षाएं और शिक्षक एक है। नियुक्ति तो एक और शिक्षिका की है पर वह 3 माह के लिए प्रसूति अवकाश पर है। स्कूल में बच्चों की कुल दर्ज संख्या 78 है। जब शिक्षक से यह पूछा कि आप अकेले 5 कक्षाएं कैसे संभालते हैं ? शिक्षक ने इसके जवाब में आसमान की ओर देखा जैसे कह रहे हो– भगवान भरोसे। फिर संभलते हुए कहा कि गांव का एक और पढ़ा–लिखा लड़का स्वैच्छिक रूप से बच्चों की पढ़ाई में मदद करता है।

दीदी के साथ पढ़ते हैं

दीदी के साथ पढ़ते हैं

एक ही कमरे में सभी पांचों कक्षाओं  के बच्चे ठुंसे हुए थे। मैले–कुचैले और फटे–पुराने कपड़े पहने आपस में बतिया रहे थे। स्वैच्छिक मदद करनेवाला युवक कुर्सी पर बैठकर उन्हें पढ़ा रहा था। मैं यह नहीं समझ पा रहा था कि वह कौन सी कक्षा के छात्रों को पढ़ा रहे हैं क्योंकि उनके हाथ में कोई किताब तो थी नहीं। जाहिर है जब उनकी नियुक्ति नहीं हुई है तो उन्हें पढ़ाने–लिखाने का कोई प्रशिक्षण भी नहीं मिला होगा।

जब मैंने कक्षा में जाकर बच्चों से बात करने की इच्छा जाहिर की। वह युवक अपने आप कुर्सी छोड़कर बाहर चला गया। जैसे वह इससे मुक्त होना चाह रहा था। तत्काल कक्षा हमारे हवाले कर दी। उस कमरे में शायद ज्यादा लोगों के बैठने की जगह भी नहीं थी। मैं बच्चों के साथ टाटपट्टी पर बैठ गया। शिक्षक ने हमें बच्चों से बात करने का मौका दिया। मैंने उनसे पूछा आपकी अपने पुराने गांव की सबसे अच्छी क्या याद है? सबने कोरस में जवाब दिया–नदी की।

इसके बाद उन्होंने एक के बाद एक नदियों के नाम गिनाएं–बोरी नदी, काकड़ी नदी और सोनभद्रा। सोनभद्रा यहां की बड़ी नदी है। कई और छोटे नदी–नाले हैं। छोटे–छोटे नदी घाटों के नाम बताएं। वे आगे कहते है कि हम इनमें कूद–कूदकर नहाते थे, डंगनियां से मछली और केकड़ा पकड़ते थे। अब यहां पानी ही नहीं है। वे सब तैरना जानते हैं। इनमें से कुछ नदियां सदानीरा है। इनमें साल भर पानी रहता है। वहां तो एक नदी में मगर भी रहता था।

क्या आपको जंगल से भी कुछ चीजें खाने की मिलती थी? इसके जवाब में दिलीप, सोनू, आशा और विजय आदि ने बहुत सारे फल, फूल और पत्तों के नाम गिनाए। जैसे तेंदू , अचार (जिसे फोड़कर चिरौंजी प्राप्त होती है) , कबीट , सीताफल , गुल्ली (महुए के बीज वाला फल)  , पीपल का बीज, जामुन, इमली, आम, बेर, मकोई, आंवला इत्यादि। उन्होंने कई जंगली जानवरों को भी देखा है– जैसे शेर, भालू, हाथी, सुअर, चीतल, नीलगाय, जंगली भैंसा, सोनकुत्ता, सियार, बंदर आदि।

इस बातचीत के दौरान धीरे–धीरे उनकी झिझक खत्म हो गई। उनका उत्साह बढ़ने लगा। वे वहां की कई बातें खुलकर बताने लगे। कक्षा में बहुत शोर होने लगा। हर बच्चा कुछ न कुछ बताना चाह रहा था। लड़के–लड़कियां सब कोई। उन्हें याद है वहां के पहाड़, पत्थर, पेड़, नदी और वहां का अपूर्व प्राकृतिक सौंदर्य। सोनू, दिलीप, आशा, सीमा, विनेश, विजय, रवि आदि कई बच्चों ने अपनी यादें साझा कीं। वे ऐसे बता रहे थे जैसे यह सब बातें कल की हो।
यहां का चौथी कक्षा में पढ़नेवाला अनिकेश कहता है मुझे यहां कुछ अच्छा नहीं लगता। जब वे अपने गांव से उजड़ रहे थे तब उसे पता भी नहीं था कि कहां जा रहे है। वह कहता है हम अपनी बात अपने मां–बाप से भी नहीं कह पाते। वे सुबह से काम पर चले जाते हैं। फिर उनसे क्या कहें ? जब कभी ज्यादा मन भर आता है तब दोस्तों के साथ पास ही सिद्ध बाबा चले जाते हैं। जब उससे यह पूछा कि अगर उसे कहीं और ले जाया जाए तो उसे क्या–क्या चीजें चाहिए जिनसे उसे अच्छा लगेगा। उसने जवाब दिया– नदी, जंगल, पहाड़ और गाय–बैल। मैं सोच रहा था कि इन जंगल क्षेत्र के बच्चों को अपने परिवेश, जंगल–पहाड़ कितने प्रिय हैं ? काश, उनके आसपास ये चीजें होती और उनके पाठ्यक्रम में होती।

यह साफ है कि अब इन बच्चों को वह स्वच्छ , ठंडा और खुला वातावरण नहीं मिलेगा। उन्हें जंगल, पेड़ , पहाड़ , पत्थर , नदियां नहीं मिलेगी , जिनसे वे रोज साक्षात्कार करते थे, वहां खेलते थे।  जंगली जानवर नहीं मिलेंगे, जिनके संग खेलकर वे बड़े हुए थे। वे फल–फूल, पत्तियां और शहद नहीं मिलेगी , जिसे वे यूं ही तोड़कर खा लिया करते थे। अब उनकी दिनचर्या और जिंदगी बदल गई है। अब नदी की जगह उनके पास हैंडपंप हैं जिनमें ज्यादा मेहनत करने पर पानी कम टपकता है। जंगल और पहाड़ उनकी स्मृतियों में हैं। इन बच्चों को ठीक से पता भी नहीं है ​कि वे जंगल के गांव से यहां क्यों आ गए ?

बच्चों से संबंधित तमाम कानूनों की मोटी किताबों में बच्चों के लिए बहुत से प्रावधान हैं। संयुक्त राष्ट्र का समझौता है। संविधान में शिक्षा व पोषण का अधिकार है। बच्चों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट का समझौता है। उस पर भारत सरकार ने 12 नवंबर 1992 को दस्तख्वत कर अपनी मुहर लगाई है। उसमें बच्चों के जीने का अधिकार , विकास का , सुरक्षा और सहभागिता का अधिकार दिए गए है।  लेकिन इसके बावजूद हमारे देश में बच्चों की हालत अच्छी नहीं है। मध्यप्रदेश में तो इस साल कई स्थानों से कुपोषण से मौतों की खबरें आई है। आदिवासियों में कुपोषण और भी अधिक है। विस्थापन जैसे जीवन में बड़े जीवन में बड़े बदलाव लानेवाले निर्णयों में बच्चों के बारे में विशेष ध्यान देने की जरूरत है। जीवन में उथल–पुथल लाने वाले ऐसे निर्णयों में उनकी सहभागिता होनी चाहिए। लेकिन उनसे कभी उनकी रूचियों व राय के बारे में नहीं पूछा जाता है। उनकी शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं को गंभीरता से नहीं लिया जाता है।

पाठशाला : नई धाईं

पाठशाला : नई धाईं

अक्सर विस्थापन के समय यह दलील दी जाती है कि बच्चों का भविष्य बेहतर होगा। और ग्रामीण भी अपने बच्चों का भविष्य जंगल के बाहर ही देखते हैं। यह स्वाभाविक है। लेकिन नई धांई के स्कूल को देखकर ऐसी कोई उम्मीद बंधती नजर नहीं आती। जहां पांच कक्षा और एक शिक्षक है। स्कूल के ही एक हिस्से में राशन का वितरण होता है। जबकि राशन का भंडारण बाजू में स्थित आंगनबाड़ी भवन में है। ऐसे में बच्चों के बेहतर भविष्य की उम्मीद नहीं की जा सकती।

– बाबा मायाराम

लेखक का सम्पर्क पता : अग्रवाल भवन , निकट पचमढ़ी नाका , रामनगर कॉलॉनी, पिपरिया , जिला – होशंगाबाद , मध्य प्रदेश , 461775 .

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आदिवासी

    आजादी के बाद पिछले साठ साल में आदिवासी को क्या मिला ? न तो जंगल पर हक मिला न जमीन का पट्टा । आज कहने को आदिवासियों के इतने नेता , विधायक , मंत्री हैं लेकिन आदिवासी की कोई इज्जत नहीं है । सब आदिवासी को छोटा आदमी समझते हैं । आजादी की लड़ाई में आदिवासियों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया लेकिन उनका कहीं कोई नाम नहीं है । जो मध्य प्रदेश कभी आदिवासियों का प्रदेश कहलाता था वहां आज भी आदिवासी को रोजी – रोटी के लिए दर – दर भटकना पड़ता है । जो कानून आदिवासी के हित के खिलाफ़ थे उनमें कोई सुधार नहीं किया । आज भी आदिवासी अधिकारियों अधिकारियों के डंडे का शिकार होता रहता है ।

    पिछले साठ सालों में बड़े पैमाने पर बांध , फैक्ट्री , शेर पालने आदि के नाम पर आदिवासियों को उनके घर , जंगल और जमीन से भगाया गया । न तो आदिवासियों के खेतों को पानी मिला न खाद – बीज । जितनी योजना आदिवासी के विकास के नाम पर आईं उसका कोई फायदा आदिवासियों को नहीं मिला । इन योजनाओं से अधिकारियों और दलालों ने अपने घर भर लिये । कुपोषण और भूख से आदिवासियों की मौत होती रही ।

  1. जंगल पर अधिकार इतिहास गवाह है कि किस गलत तरीके से अंग्रेजों ने आदिवासियों से उनका जंगल छीन लिया । आजादी के बाद आज तक आदिवासी को अपना खोया हुआ अधिकार नहीं मिला । आदिवासियों को उसका जंगल पर अधिकार वापस मिलना चाहिए । जंगल में उसे अपने निस्तार की लकड़ी , फाटा , चराई आदि की छूट होनी चाहिए । जंगल में नाकेदार की दादागिरी बंद होना चाहिए । सरकार को कटाई की अनुमति आसपास के गांवों से लेनी चाहिए एवं उसका आधा पैसा उस ग्राम के विकास पर खर्च होना चाहिए ।
  2. जमीन का पट्टा    जंगल जमीन जोतने एवं उस पर फलदार पौधे लगाने का अधिकार आदिवासियों को मिलना चाहिए यह मांग समाजवादी जनपरिषद सालों से कर रही है। यह एकमात्र पार्टी है जो इस मुद्दे को लेकर वर्षों से आंदोलन कर रही है । जंगल जमीन के पट्टे देने के लिए एक नया कानून भी बन गया है । लेकिन उस कानून का कहीं कोई पालन नहीं हो रहा है । नाम करने के लिए जैसे तैसे लोगों के फार्म भर दिए । उस कानून का सही सही पालन होना चाहिए और उस कानून के अनुसार आदिवासियों से गलत तरीके से छुड़ाई गई सारी जंगल जमीन के पट्टे मिलने चाहिए। इसमें वनग्राम में लाइन सरकाकर छुड़ाई गई जमीन शामिल है ।
  3. तेन्दु पत्ता    हर बार चुनाव के समय आदिवासियों को तेंदुपत्ता के नाम पर करोड़ों रुपये दिये जाते हैं । इसका मतलब यह है कि चार साल तक तेन्दुपत्ते की कमाई का करोड़ों रुपये सरकार में बैठे अधिकारी और मंत्री खा जाते हैं । आज मंहगाई तीन गुना बढ़ गई और बीड़ी की कीमत भी लेकिन पिछले १५ सालों से तेन्दुपत्ता कड़ाई दर मात्र दस रुपये सैंकड़ा बढ़ी । इसके साथ ही समितियों में इस समय लाखों रुपये हैं उसका हिसाब किताब दिया जाना चाहिए और वो पैसा ग्राम विकास में खर्च किया जाना चाहिए ।
  4. आदिवासी विरोधी कानूनों में बदलाव  संविधान के अनुच्छेद ६ के अनुसार अगर कोई कानून आदिवासी के हितों के खिलाफ है तो प्रदेश का राज्यपाल अकेले ही उसमें जरूरी सुधार कर सकता है या उस पर रोक लगा सकता है । यह अधिकार सिर्फ आदिवासी क्षेत्र के लिए है । उदाहरण के लिए वन्य कानून १९२७ का वन्य प्राणी कानून १९७२ से आदिवासियों के जंगल पर हक खत्म होते हैं तो राज्यपाल एक आदेश से उस पर रोक लगा सकता है । लेकिन आज तक इस अधिकार का किसी राज्यपाल ने न तो उपयोग किया न किसी पार्टी ने इसकी मांग की ।   समाजवादी जनपरिषद इस बात के लिए लगातार अपना संघर्ष जारी रखेगी कि आदिवासी विरोधी सारे कानूनों में बदलाव किया जाये । इसके लिए राज्यपाल संविधान में दी गई शक्तियों का उपयोग कर यह काम करें और स्थाई हल के लिए संसद और विधानसभाओं के जरिए इन कानूनों में बदलाव किया जाये ।
  5. राष्ट्रीय उद्यान अभयारण्य  देश का पर्यावरण भोग विलास भरी जिस जीवन शैली से नष्ट हो रहा है उसे बदलने की बजाए सरकार पर्यावरण बचाने के नाम पर शेर पालने की योजना लाती रहती है । शेर पालने के नाम पर आदिवासियों के गांव के गांव उजाड़े जा रहे हैं । समाजवादी जनपरिषद मानती है कि शेर और आदिवासी जमाने से साथ रहते आ रहे हैं इसके गांव उजा्ड़ने की जरूरत नहीं है और इन योजनाओं से पर्यावरण नहीं बचेगा उसके लिए हमारी विकास नीति बदलना होगा ।

दलितों के सवाल

        दलितों के लिए सबसे बड़ा सवाल छुआछूत मुक्त समाज में बराबरी का स्थान पाना है। आज भी समाज में बड़े पैमाने पर छुआछूत फैली हुई है जो न सिर्फ़ गैर कानूनी है बल्कि मानवता के खिलाफ है । इसके साथ ही दलितों को अपने खोये हुए संसाधन , जमीन आदि पर हक पाना और बदलते समय में रोजगार के सही अवसर पाना है । दलितों के यह सवाल वर्तमान विकास की अंधी दौड़ और उदारीकरण की नीति से हल नहीं होंगे । आज कांग्रेस हो या भाजपा , सभी पर्टियों ने जो आर्थिक नीति अपनाई है उसमें अमीर और अमीर हो रहा है।हमारे जमीन आदि सारे संसाधन कंपनियों के हाथों सौंपे जा रहे हैं । बसपा की मायावती भी उत्तरप्रदेश में यही नीति अपनाये हुए हैं । अब आप दलितों की मुखिया होकर बड़ी पार्टियों जैसी नीतियाँ अपनायेंगी तो दलित सही अर्थों में मुक्त कैसे होगा ।

    समाजवादी जनपरिषद का मानना है कि बाबा साहेब अम्बे्डकर का अधूरा सपना असल रूप में पूरा करना है । इंसान में जात-पांत , धर्म , अमीर,गरीब का भेद समाप्त होना चाहिए। छुआछूत इंसानियत के नाम पर सबसे बड़ा कलंक है । इसे जड़ से मिटाने के लिए तथा कानूनी स्तर पर भी ठोस काम होना चाहिए । व्यापक दलित समाज की आर्थिक स्थिति सुधरे इस दिशा में ठोस नीतिगत बदलाव करने होंगे । वैश्वीकरण और उदारीकरण की नीति छो्ड़कर  गरीबों के हितों को साधने वाली नीति अपनाना होगी क्योंकि ज्यादातर दलित गरीब है । चूँकि दलितों के परम्परागत रोजगार नहीं रहे उन्हें जमीन दी जाना चाहिए । छोटे-छोटे उद्योगों को बढ़ावा दिया जाये जिससे दलित भी उद्यमी बन सकें । दलितों से छुड़ाई गई जमीन वापस की जाए । प्रशासनिक सुधार के जरिये दलितों पर अत्याचार के मामले में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर कड़ी कार्यवाही हो ।

[ जारी ]  अगले हिस्से – अल्पसंख्यक , साम्प्रदायिकता

पिछले भाग : एक , दो

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