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Archive for the ‘women’ Category

[ फारसी के विद्वान श्री राकेश भट्ट अनेक सामाजिक कामों से जुड़े रहे हैं । इन दिनों बी.बी.सी के लिए खाड़ी के मुस्लिम देशों की खबरों का विश्लेषण करते हैं । सत्य के आग्रह के कारण कोई साढ़े चार साल तक ईरान की जेलों में भी रहे हैं ।
भयानक घटनाएं घटी हैं , पिछले दिनों । इनके प्रति अपना आक्रोश जताने ऐसे लोग भी सड़कों पर उतरे हैं , जिनकी उमर अभी – अभी वोट डालने की हुई है । उन्होंने बिना तोड़ – फोड़ किए , बिना बसें जलाए , बिना पत्थर फेंके ज्यादा बड़ी चोट की है सरकारों पर । इंडिया गेट , जंतर- मंतर , विजय – चौक – सब जगह ये लोग इकट्ठे होते रहे । न्याय तो दूर ठीक से सहानुभूति भी नहीं मिल पाई । लोगों का गुस्सा फांसी की मांग तक गया है , इस ताजी घटना में । पर न यह पहली थी और न अंतिम । कुमार प्रशांत के शब्दों में कहें तो ‘असफल सरकारों और निराश लोगों का समीकरण हमें ऐसे ही बर्बर समाज की ओर ले जाएगा ।’ सन १९९४ में घटी एक ऐसी घटना पर एक बेहद खामोश टिप्पणी कर रहे हैं श्री राकेश भट्ट । – संपादक ,गांधी-मार्ग ,२२३ दीनदयाल उपाध्याय मार्ग,नई दिल्ली – ११०००२ ]

हाजी हुसैन बहुत कम बोलते थे । हां, कभी – कभी वो जेल के बरामदे में किसी कैदी से यह जरूर पूछ लेते थे कि घर में सब राजी – खुशी तो है ना ? हर कैदी इसका झूठा जवाब दे देता था – हां ! इस सवाल से कैदी को थोड़ी-सी राहत तो मिलती थी कि चलो कोई तो है जो उसके परिवार के बारे में चिंतित है और फिर हाजी हुसैन तो जेलर थे । हाजी हुसैन भी इस जवाब की सच्चाई को जानते थे , लेकिन ‘अल हमदुल्लिलाह’, ईश्वर तेरा भला करे कहते हुए चले जाते थे ।
यूं तो मैं जेल में उदास नहीं रहता था । लेकिन १९९४ दिसंबर महीने की एक सुबह को बहुत उदास हुआ । दिसंबर महीने में ईरान की राजधानी तेहरान गच्च बर्फ से ढक जाती है । एविन नाम का यह जेल पहाड़ियों के बीच बना हुआ है । यहां तो मौसम और भी ठंडा हो जाता है । शायद केदारनाथ – बदरीनाथ जैसी ठंड , कुछ – कुछ मेरे ननिहाल खतस्यूं सिरकोट (श्रीकोट) जैसी ।
मुझे तारीख तो ठीक याद नहीं है । लेकिन दिन याद है – बृहस्पतिवार , क्योंकि कल ही परिवार के साथ मेरी मुलाकात का दिन था । हर बुधवार को मेरी पत्नी ही आया करती थी । अन्य रिश्तेदारों को मुलाकात की मंजूरी नहीं थी । मुलाकात के समय शीशे के आरपार हम एक दूसरे को देख सकते थे । लेकिन बात दोनों तरफ रखे टेलीफोन के जरिए ही हो पाती थी । हम दोनों बहुत संयम से बातें करते थे क्योंकि ये बातें रिकार्ड होती थीं । हमारी बातों का केन्द्र अक्सर हमारी बेटी ही हुआ करती थी – जिसकी शैतानियों का जिक्र जिंदगी की तल्खियों को भुलाने में कारगर होता था – भली ही मुलाकात सात मिनटों के लिए ही क्यों न हो । हां , ठीक सात मिनट के बाद लाइन काट दी जाती थी। और इस ओर मैं हलो… हलो कहता और उस ओर से वह । लेकिन शीशे की मोटी दीवार के कारण आवाज आरपार नहीं हो पाती थी । लेकिन जो सुना नहीं जा सकता वह समझ में आ जाता था । रिश्तों के आगे भाषा की औकात बौनी पड़ती है , यह सुना जरूर था लेकिन देखा वहीं पर । खैर!
जिक्र उदासी का चल रहा था । हुआ यूं कि जेल में सुबह की हाजरी के बाद मैं नाश्ता करने लगा । एक अन्य कैदी साथी अखबार पढ़ रहा था। उसने बताया कि एक खबर हिंदुस्तान के बारे में भी छपी है । ईरान में हिंदुस्तान को बहुत इज्जत के साथ देखा जाता है । मैंने सोचा शायद कोई इसी तरह की खबर होगी , जिसमें अतिशयोक्तियों के साथ हिंदुस्तान की तारीफ की गई होगी । मैंने अपनी जगह बैठ कर कहा कि खबर का शीर्षक पढ़ दो अभी – पूरी खबर बाद में पढ़ूंगा । उसने खबर का शीर्षक पढ़ा । ‘तज्जवोज बा बानुवान-ए-जोम्बिश-ए-उत्तराखंड’ यानी उत्तराखंड आंदोलन की महिलाओं के साथ दुराचार । कमरे के सभी कैदियों ने यह खबर सुनी तो उनको विश्वास ही नहीं हुआ । ईरान के लोग समझते हैं कि हिंदुस्तान में महिलाओं की बहुत इज्जत होती है । मैंने अखबार लिया और खबर पढ़ी । खबर शायद चार या पांच पंक्तियों से बड़ी नहीं थी । इसमें करीब दो महीने पुरानी घटना का संक्षिप्त विवरण था : हिंदुस्तान के मुजफ्फरनगर शहर में पुलिस आंदोलनकारियों पर गोलियां चलाई । कुछ आंदोलनकारी शहीद हुए और पुलिस ने महिलाओं के साथ ज्यादती की । उस वक्त न जाने और कोई क्यों याद नहीं आया । लेकिन अपना गांव बहुत याद आया । बूढ़ी दादी की लगाई हुई ‘पीपल चौंरी’ , कांडा के मंदिर के रास्ते की ‘डूंडी कुलैं’ और गांव का नागरजा , गांव , पीपल , कुलैं और एक खामोश खुदा । मेरी याद में कहीं भी इंसान नहीं था ।
कैदी खामोशी की जबान को पहचानता है । इसीलिए किसी ने मुझसे इसके बारे में पूछा नहीं । उन कैदियों ने मेरी खामोशी को अपनी खामोशी का सहारा दिया । मैं कुछ देर के बाद लाईब्रेरी चला गया । कुरान की हर उस आयत (श्लोक) को पढ़ने लगा , जिसमें निर्दोष पर जुल्म करने वालों की सजा के बारे में लिखा था । बहुत सी ऐसी आयतें थीं । एक आयत मन छू गयी । कुरान के ५वें अध्याय की ३२वीं आयत – ‘यदि कोई किसी निर्दोष व्यक्ति का कत्ल करता है तो समझो कि उसने समस्त मनुष्यता का कत्ल किया है ।’ शायद मन कुछ हल्का जरूर हुआ,मगर उदास ही रहा । दिन के खाने पर भी नहीं गया और शायद लाइब्रेरी के बड़े से हॉल में मैं ही अकेला रह गया था ।
अचानक देखा कि मेरे सामने हाजी हुसैन खड़े थे । मैंने उन्हें सलाम किया और उन्होंने भी वलैकुम अस्सलाम कह कर जवाब दिया । हिंदुस्तानियों को ईरान में हिंदी कहा जाता है । उन्होंने पूछा : हिंदी , आज उदास दिख रहे हो । मैंने कहा – ‘हां हाजी ! उन्होंने मेरी उदासी का कारण पूछा तो मैंने कारण बता दिया । उन्होंने ढाढ़स बंधाते हुए कुरान की एक आयत कही जिसका मतलब है कि – ‘जिन पर अत्याचार हुए हैं , वे अब खुदा के अजीज बन चुके हैं और जो शहीद हुए हैं वे खुदा के पहलू में जिंदा हैं ।’ फिर कुछ क्षणों के बाद उन्होंने कहा कि आज शाम की नमाज के वक्त एक दुआ पढ़नी है तो मैं भी मौजूद रहूं । हां – ठीक है हाजी, मैं आ जाऊंगा। मुझे लगा कि वे मुझसे नमाज के बाद कोई दुआ पढ़वाना चाहते हैं । मेरे कुरान के प्रवचन और दुआ जेल में काफी पसंद किए जाते थे ।
शाम की नमाज पर मैं मौजूद हुआ । हाजी हुसैन भी थे । इमाम ने नमाज पढ़ाई और हाजी हुसैन को दुआ पढ़ने के लिए बुलाया । मुझे लगा कि हाजी हुसैन अब मेरा नाम पुकारेंगे और मुझसे दुआ पढ़ने के लिए कहेंगे । लेकिन ऐसा नहीं हुआ । उन्होंने खुद दुआ पढ़नी शुरु की । इसे मैं पहले भी कई बार पढ़ चुका था , सुन चुका था । लेकिन फिर अचानक उन्होंने कहा – खुदाया यहां जो लोग तेरी शरण में इकट्ठा हुए हैं,उनमें तेरा एक बंदा हिंद देश का वासी है। उसके देश में कुछ बहनों पर अत्याचार हुआ है । तू तो सबसे बड़ा न्यायकर्ता है । उन अत्याचारियों का नाश कर और जो मजलूम बहनें हैं , उनके दुखों का अंत कर, आमीन ! या रब्ब अल -आलमीन ! ऐसा ही हो ! हे समस्त ब्रह्मांडों के स्वामी !
फिर उन्होंने मेरा नाम पुकार कर मुझे बुलाया और कहा कि यदि मैं शहीदों और पीड़ित महिलाओं के नाम जानता हूं तो एक-एक नाम लेकर हम दुआ को दुहरा सकते हैं । मैंने कहा-‘मैं नाम नहीं जानता , आप सबका धन्यवाद ।’
रात को जब सोया तो मेरे एक पहलू में मेरा गांव था तो दूसरे पहलू में गांव का नागरजा , बूढ़ी दादी की लगाई हुई ‘पीपल चौंरी’ और कांदा के मंदिर के रास्ते की ‘डूंडी कुलैं’ ।
और इस बार एक इंसान भी शामिल था इनमें – हाजी हुसैन !
[डाक से ‘गांधी-मार्ग’ वार्षिक १०० रुपये ,दो वर्ष का १९० रुपए,आजीवन ५०० रुपए (व्यक्तिगत), १००० रुपए संस्थागत। शुल्क बैंक ड्राफ्ट,मनी आर्डर द्वारा ‘गांधी शान्ति प्रतिष्ठान’ के नाम भेजें। पता ऊपर दिया है ।]

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डॉ. अनुराग एक गंभीर चिट्ठेकार हैं ।  ’ निरुपमा की मौत के बाद /स्त्री-पुरुष सम्बन्ध पर डॉ. लोहिया’ मेरी इस पोस्ट पर उन्होंने लम्बी और जरूरी टिप्पणी की है। इस टिप्पणी को अपने चिट्ठे पर एक पोस्ट के रूप में प्रकाशित करने की उन्होंने मुझे इजाजत दी है,जिसके लिए मैं उनका आभारी हूँ ।

डॉ. अनुराग ने समाज के प्रभु वर्ग द्वारा जाति के आधार पर अखबारों में वैवाहिक विज्ञापन छपवाने का उदाहरण दिया है। इन इश्तहारों में कई बार ’कास्ट नो बार’ कहने के बावजूद  इस चतुर वर्ग के लोग धीरे से और बेशर्मी से अपनी जाति का जिक्र  कर देते हैं ।

विश्वविद्यालयों में सर्वाधिक तालीमयाफ़्ता तबका जाति का उपयोग स्वार्थ-सिद्धि के लिए करता है ।

डॉ. अनुराग ने एक मौलिक और बुनियादी सवाल किया है कि  निरुपमा की जगह निरुपम होता तो क्या सामने वाले परिवार की प्रतिक्रिया ऐसी ही होती ?

बहरहाल , पाठकों के समक्ष यह जरूरी टिप्पणी प्रस्तुत है।

धर्म बड़ी फ्लेकसिबल चीज़ है …..अपनी मन मर्जी मुताबिक जिसने जो तजुर्मा करना चाहा कर दिया .ओर फेंक दिया सामने ….तजुर्मा करा किसने? …आदमी ने ….बरसो पहले बड़ी तरकीब से समाज विभाजन हुआ …मकसद ….. सत्ता ओर आर्थिक व्यवस्था एक पलड़े में रहे …बाकी बची औरत…..उसके वास्ते फिर नया तजुर्मा …शानदार तरकीबे ….शानदार मिसाले …..ओर मेंटल कंडिशनिंग …कमिया आदमी में थी …. .वक़्त बदल रहा है….दुनिया चाँद पे पहुच रही है ….करनाल ओर किसी खाप पंचायत के निर्णय पर नाक-मुंह सिकोड़ते लोग अंग्रेजी के अखबार में अपनी बेटी के लिए अपनी जाति के कोलम में वर ढूंढते है ……ओनर किलिंग को गंवारू ओर अनपढ़ तबके की सोच बताने वाले लोग …..बड़े गर्व से अपने ड्राइंग रूम में कहते है .हमारा बेटा तो जी समझदार है .लव मेरिज नहीं करेगा ….हमारी मर्जी से शादी करेगा …… किसी फरजाना के पति के दस साल बाद लौटने पे ….वर्तमान पति से उस ओर फ़ौरन धकेल दी गयी फरजाना पर चैनल बुद्धिजीवियों की जमात को बैठाकर लम्बी चौड़ी बहसे करता है ……..ओर आधे घंटे बाद ..उसी चैनल पर ..कोई ज्योतिषी आपके आज के तारो की दशा बतलाता है……पौन घंटे बाद फलां मंदिर से आरती का डायरेक्ट प्रसारण ……… पढ़े लिखे चार्टेड एकायुंटेंट ….मस्सो के इलाज़ के लिए पीर की मज़ार पे धागे बांधते है ….टीचर सुबह की रोटी खिलाने के लिए काला कुत्ता ढूंढती है ताकि उसके बेटे को नज़र न लगे……..पोस्ट ग्रेज्युट कोलेज में पढ़ने वाला प्रोफ़ेसर वोटिंग मशीन में उस आदमी को चुनता है ….चूँकि वो भी जाट है ….उसके साथ पैदल चलकर वोटिंग मशीन में आने वाला दूसरा प्रोफ़ेसर वोटिंग मशीन में गुज्जर प्रतिनिधि पर मोहर लगता है ……एक ही मोहल्ले में घर वापस आते वे हँसते बतियाते साथ आते है ……रात को सर्व धर्म सभा में खड़े वे अपना अपना भाषण पढ़ते है ….चतुर्वेदी जी को इस बात पे गुस्सा है के आई ए एस में दक्षिण की लोबी ज्यादा सक्रिय है …इसलिए उन्हें प्रमोशन जल्दी नहीं मिलता …..ओर बिश्वेषर इसलिए चतुर्वेदी से नाराज है .के उन्हें लगता है वे ब्राहमण केंडी डेट को इंटरव्यू में अधिक मार्क्स देते है …..दरअसल हम बहुत समझदार लोग है .कहानी को कहानी की तरह पढ़ते है ..ओर यथार्थ को यथार्थ की तरह …..हम जानते है कहाँ ताली बजानी है ….कहाँ समूह के पीछे खड़ा होना है …ओर .कहाँ आवाज ऊँची करनी है ……

खराबी हम सब में है …..हम सब ही मिलकर समाज बनाते है …..अपनी बेटियों-बहनों के आगे हमारे चेहरे एक से हो जाते है .वहां कोई घाल मेल नहीं रहता ……

धर्म ने तो कहा .था …ईमानदार बनो .किसी के लिए बुरा न करो….बुरा न सोचो….झूठ मत बोलो..जानवर ..प्रकृति पर दया रखो……कमाल है ना उसे कोई नहीं मानता …. ….

कहने का मतलाब हमारे समाज का भीतरी चेहरा कुछ ओर है बाहरी कुछ ओर….

हम इस वक़्त कोकटेल युग से गुजर रहे है …..जहाँ कुछ किलोमीटर पर सोच में तब्दीली आ जाती है ..यदि पुराना रजिस्टर टटोला जाए तो कितनी निरुपमाये अब तक दफ़न हो चुकी होगी…….गुमनाम…..अपने पेशे की वजह से शायद इस निरुपमा को न्याय मिल जाए ……जब तक हम इस हकीक़त को नहीं स्वीकारेगे के समाज बदल रहा है ….ओर इमोशन में भी अग्रेसिवनस आ रही है …..तब तक हम चीजों को नहीं बदल सकते …प्रोफेशनल कॉलेज में लोग बरसो से साथ रहते है .एक तरह से लिव इन की तरह ….९० प्रतिशत शादी कर लेते है .१० प्रतिशत दूसरे रिश्ते में आ जाते है .आप कह सकते है शायद वे विधार्थी थोड़ी परिपक्व सोच के होते है …कहने का मतलब है के हालात ….शहर …वक़्त के साथ आपकी सोच में तब्दीली लाते है ….इंटर नेट ओर सूचनाओं की बाढ़ के इस युग के गर फायदे है तो अपने नुकसान भी है ..जाहिर है अभिवावकों ओर बच्चो के बीच संतुलन की एक नयी थिन वो लाइन है .जिसकी रूप रेखा तय करनी है …….शायद धीरे धीरे वो भी तय होगी….

यक़ीनन कुँवारी लडकिया का मां बनना एक बड़ी दुखद घटना है .मां बाप के लिए शर्मनाक भी…… …परन्तु उसका हल हत्या तो नहीं है ..मुद्दा ये नहीं है के निरुपमा इस समाज के कुछ नियमो को उलंघन कर के साहस की कोई मिसाल बनने जा रही थी …..मुद्दा ये है के उस घटना के बाद क्या उसके जीवन लेने का हक समाज को बनता है .?…मै एक ऐसे कपल को जानता हूँ जिसमे लड़का गरीब परिवार से था..परन्तु अच्छी जॉब में था … .जाति में नीचे भी ….लड़की अच्छे परिवार से थी ….लड़का बिहार से था .दो बहनों की जिम्मेवारी थी .लड़की से लम्बे रिश्ते .थे.जाहिर है लड़की में असुरक्षा भावना भी आ रही थी …लड़के में मन ये अपराध बोध भी हो रहा था के बहनों से पहले कैसे शादी करूँ….फिर पिता को राजी भी करना था .इस उठा पुठक में दो साल गुजर गए …..बहन बीच में आई ..शादी हुई .आज एक बच्चे .के साथ है …यानी मानवीय रिश्ते में इतनी जटिलताये है ..के हमकोई एक नियम नहीं बना सकते जो सब पर लागू हो…..शायद इन दोनों के बीच रिश्ते में कुछ ऐसे घटनाक्रम रहे हो .जिनसे हम अनजान हो……शायद उन दोनों को हालात सुधरने की उम्मीद हो इसलिए वो गर्भ गिरना नहीं चाहते हो…वैसे हिंदुस्तान टाइम्स को दिए गए इंटर व्यू के मुताबिक लड़के का कहना है उन्होंने शादी की देत तय कर ली थी ..निरुपमा को अपने माँ बाप के राजी होने की उम्मीद थी……

हाँ बदलते वक़्त के साथ अपरिपक्व मस्तिष्क शायद जिंदगी के कुछ महत्वपूर्ण निर्णय लेने के काबिल न हो .बतोर एक अभिवावक जिसने अपना बचपन से उसे बढ़ा किया है उसे उसकी जिंदगी में कभी नरम कभी गरम होने का हक है….पर एक्सट्रीम स्टेप लेकर हत्या करने का नहीं…..इस समस्या के जड़ में क्या है ?जाति ?सोचिये अगर मां बाप पहले राजी हो जाते ओर शादी होती तो क्या इतना सब कुछ होता………सोचिये अगर वो गर्भवती न हुई होती तो….क्या इस समाज की सोच में अंतर होता ?

मेरे मन में बस एक सवाल आता है ……

गर इस प्रक्रिया में मां भाई ओर पिता के साथ है..तो…..ये मेंटल कंडिशनिंग कितनी स्ट्रोंग है … .यदि निरुपमा की जगह उसका नाम निरुपम होता ….ओर उससे किसी ओर जाती की लड़की गर्भवती हुई होती तो क्या तब भी उनके परिवार पिता..भाई …मां की यही प्रतिक्रिया होती ?

क्यों कभी लड़के का परिवार गर्भवती करने के लिए अपने लड़के की ओनर किलिंग नहीं करता ?

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[ निरुपमा की मौत ने झकझोर दिया है । विवाह,जाति-प्रथा और यौन शुचिता जैसे प्रश्न चर्चा में आये हैं । मैं इन सवालों पर डॉ. राममनोहर लोहिया के विचार यहां देना प्रासंगिक समझता हूं। सामाजिक यथास्थिति की ताकतों की सडाँध को पहचानने में मुझे इन विचारों से मदद मिलती है। – अफ़लातून ]

हिन्दुस्तान आज विकृत हो गया है ; यौन पवित्रता की लम्बी चौड़ी बातों के बावजूद , आमतौर पर विवाह और यौन के सम्बन्ध में लोगों के विचार सड़े हुए हैं ।

… नाई या ब्राह्मण के द्वारा पहले जो शादियाँ तय की जाती थीं उसकी बनिस्बत फोटू देख कर या सकुचाती शरमाती लड़की द्वारा चाय की प्याली लाने के दमघोंटू वातावरण में शादी तय करना हर हालत में बेहुदा है। यह ऐसा ही है जैसे किसी घोड़े को खरीदते समय घोड़ा ग्राहक के सामने तो लाया जाए , पर न उसके खुर छू सकते हैं और न ही उसके दाँत गिन सकते हैं ।

..लड़की की शादी करना माँ बाप की जिम्मेदारी नहीं ; अच्छा स्वास्थ्य और अच्छी शिक्षा दे देने पर उनकी जिम्मेदारी ख़तम हो जाती है । अगर कोई लड़की इधर उधर घूमती है और किसी के साथ भाग जाती है और दुर्घटना वश उसके अवैध बच्चा , तो यह औरत और मर्द के बीच स्वाभाविक सम्बन्ध हासिल करने के सौदे का एक अंग है , और उसके चरित्र पर किसी तरह का कलंक नहीं ।

लेकिन समाज क्रूर है । और औरतें भी बेहद क्रूर बन सकती हैं । उन औरतों के बारे में , विशेषत: अगर वे अविवाहित हों और अलग अलग आदमियों के साथ घूमती फिरती हैं , तो विवाहित स्त्रियां उनके बारे में जैसा व्यवहार करती हैं और कानाफूसी करती हैं उसे देख कर चिढ़ होती है । इस तरह के क्रूर मन के रहते मर्द का औरत से अलगाव कभी नहीं खतम होगा।

….समय आ गया है कि जवान औरतें और मर्द ऐसे बचकानेपन के विरुद्ध विद्रोह करें । उन्हें यह हमेशा याद रखना चाहिए कि यौन आचरण में केवल दो ही अक्षम्य अपराध हैं : बलात्कार और झूठ बोलना या वादों को तोड़ना । दूसरे को तकलीफ़ पहुँचाना या मारना एक और तीसरा भे जुर्म है,जिससे जहां तक हो सके बचना चाहिए।

…. धर्म , राजनीति , व्यापार और प्रचार सभी मिल कर उस कीचड़ को संजो कर रखने की साजिश कर रहे हैं जिसे संस्कृति के नाम पुकारा जाता है । यथास्थिति की यह साजिश अपने आप में इतनी अधिक शक्तिशाली है कि उससे बदनामी और मौत होगी । मुझे पूरा यकीन है है कि मैंने जो कुछ लिखा है उसका और भी भयंकर बदला चुकाया जाएगा , चाहे यह लाजमी तौर पर प्रत्यक्ष या तात्कालिक भले ही न हो ।

जब जवान मर्द और औरतें अपनी ईमानदारी के लिए बदनामी झेलते हैं , तो उन्हें याद रखना चाहिए कि पानी फिर से निर्बन्ध बह सके इसलिए कीचड़ साफ़ करने की उन्हें यह कीमत चुकानी पड़ती है ।

आज जाति और योनि के इन वीभत्स कटघरों को तोड़ने से बढ़ कर और कोई पुण्यकार्य नहीं है। वे सिर्फ इतना ही याद रखें कि चोट या तकलीफ़ न पहुँचाएँ और अभद्र न हों,क्योंकि मर्द और औरत के बीच का रिश्ता बड़ा नाजुक होता है । हो सकता है,हमेशा इससे न बच पायें। किन्तु प्रयत्न करना कभी नहीं बंद होना चाहिए । सर्वोपरि , इस भयंकर उदासी को दूर करें,और जोखिम उठा कर खुशी हासिल करें ।

१९५३, जनवरी । (जाति-प्रथा,समता विद्यालय न्यास,हैदराबाद)

फैसला करो कि कैसा संसार रचाना है । इसमें कोई सन्देह नहीं कि सबसे अच्छी बात होगी , नर-नारी के सम्बन्ध में,एकव्रत रहें, यानी एक तरफ़ पतिव्रत और दूसरी तरफ़ पत्नीव्रत । यह सबसे अच्छी चीज है ,लेकिन अगर वह नहीं रहता है तो फिर क्या अच्छी चीज है । आधुनिक दिमाग के सामने एक संकट आ गया है कि जब तक संसार रहेगा, तब तक मनुष्य रहेगा और तब तक यह आफ़त रहेगी कि बलात्कार और व्यभिचार,दो में से कोई एक प्राय: निश्चित ही रहेगा । अब किसको चाहते हो ? बलात्कार को या व्यभिचार को चाहते हो ? जिस समाज में व्यभिचार को इतना ज्यादा बुरा कह दिया जाता है कि उसको पाप सिर्फ़ नहीं नरक(मिलेगा) और उसके लिए यातना सजा ऐसी कि बहुत बुरी बुरी , उस समाज में बलात्कार हो करके रहता है और बहुत अधिक होता है। आधुनिक दिमाग पसंद करेगा वही एकव्रत वाली अवस्था को । कहीं गलत मत समझ लेना कि मैं व्यभिचार पसंद कर रहा हूँ। लेकिन फिर दूसरे नम्बर की चीज में कहेगा कि मनुष्य है ही ऐसा,तो फिर किया क्या जाए ? बलात्कारी से व्यभिचारी अच्छा। यह आगे देखू दृष्टि है ।

१९६२ ,सितम्बर

(समाजवादी आन्दोलन का इतिहास,समता विद्यालय न्यास,हैदराबाद)


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इस चिट्ठे पर मेरी पिछली पोस्ट पर जो टिप्पणियां आई हैं उनके अलावा फ़ेसबुक के जरिए भी कुछ मित्रों ने उस पर चर्चा की है ।  इस बहस में मेरे लेख की आलोचना में जो प्रमुख बाते कही गयी हैं उन्हें सब से पहले यहाँ एक साथ रख रहा हूँ :

* इस आरक्षण में क्रीमी लेयर का प्रावधान क्यों न हो ?

* ये बड़े लोगों की चाल है छोटे लोगों को सत्ता से दूर रखने की.आखिर इनमें से कितनी महिलाएं खुद के बूते यहाँ पहुची हैं…कोई पति देव की वजह से तो कोई अपने फ़िल्मी दुकान से उठकर आया है…और कोई किसी राजघराने की पताका लहरा रही है…….* ये औरतें (सवर्ण) भी तो वैसे ही ही अपना मुकाम पा सकती हैं जैसा की आप कल्पना कर रहे हैं

* जो आज महिला आरक्षण का समर्थन कर रहीं हैं ज्यादातर वही महिलाएं हैं जिन्होंने दलित आरक्षण का विरोध किया था। इसी से समझा जा सकता है कि ये आरक्षण में आरक्षण का विरोध क्यों कर रही हैं।

* ये महिलायें अब क्यों नहीं कह रही कि आरक्षण के ज़रिए स्त्री-पुरुषों को आपस में लड़ाया जा रहा है , समाज को बाँटा जा रहा है ।

* गुस्सा आता है जब कोई किसी चीज को खुद के लिये तो मांगता है परन्तु दूसरों को देने पर तमाम तमाम तर्क पेश करता है ।
* आभा राठोर किस की वकालत करेंगी राठोर की या रुचिका की ?मालकिनें क्या दरियादिल हो कर अपनी कामवालियों को दुख सुनायेंगी ? मैनपुरी की ठकुराइनें क्या फूलन की मौत या बलात्कार पर आँसू बहायेंगी ? महिलाओं को एक वर्ग कहकर हम किसे ठग रहे हैं ?
इन आरोपों , आक्षेपों और आशंकाओं की बाबत बात करने के पहले आरक्षण से जुड़ी कुछ बुनियादी बातों पर गौर करें:
समाज में व्याप्त जाति और लिंग जैसे गैर बराबरी के आधारों पर व्याप्त एकाधिकार को विशेष अवसर (समान अवसर से गैर बराबरी बरकरार रहती है) की मदद से तोड़ने का एक साधन आरक्षण है।
जातिविहीन – लिंगभेदविहीन समाज की दिशा में यह एक साधन होता है । यह साध्य नहीं साधन है।  इस साधन का उद्देश्य इन शोषित वर्गों को महत्वपूर्ण ओहदों पर नुमाइन्दगी देना है , उनकी गरीबी दूर करना या बेरोजगारी दूर करना नहीं (भले ही दूरगामी परिणाम के तौर पर इसका  प्रतिफल यह हो)।
व्यक्ति या समूह जीवन के किसीआयाम में शोषक और किसी अन्य में शोषक हो सकता है। आम तौर पर खुद के या अपने समूह के समूह को शोषण को हम देख पाते हैं किन्तु जिस आयाम में हम शोषक की भूमिका में होते हैं वह नहीं देखना चाहते । मसलन उत्तर प्रदेश और बिहार में सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य अंग्रेजी – हटाओ , अलाभकारी जोत पर टैक्स न देने , जाति- तोड़ो और जातिगत आरक्षण के हक में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते थे किन्तु नर – नारी समता के कार्यक्रम तथा उसके लिए संगठन बनाने में फिसड्डी रहते थे । बहुत बाद में समता संगठन जैसे राजनैतिक समूहों ने  अपने सक्रिय सदस्यों की आचार संहिता में पुरुष साथियों द्वारा १. घरेलू श्रम-साध्य काम में हिस्सा बँटाना,२.पत्नी को न पीटना जैसी शर्तें जोड़ीं ।
इसी प्रकार मंडल संस्तुतियों के खिलाफ़ फूटे आक्रोश में सवर्ण महिलाओं का एक बड़ा तबका आरक्षण विरोधी भावना से प्रभावित था । ये महिलायें जतिगत पिछड़ेपन का शिकार नहीं थीं।
बिहार के पीरो के पूर्व विधायक तथा लोहिया के अत्यन निकट सहयोगी रामइकबाल बरसी के शब्दों में ’  हमारे समाज में हर जाति की औरत कहारिन है’ । राम इकबालजी इसी लिए किसी भी घर में भोजन के बाद खुद थाली धोते हैं । काशी विश्वविद्यालय परिसर में नरेन्द्रनाथ तिवारी नामक एक चिकित्सक ने अपनी पत्नी वीणा तिवारी की जलाकर हत्या कर दी थी । हरिशंकर तिवारी जैसे जाति के बाहुबली मठाधीशों ने सिर्फ़ हत्यारे पुरुष की जाति देखकर गवाहों को धमकाने , पसन्दीदा जज की अदालत में मामले को डालने में अहम भूमिका अदा की। सामाजिक चेतना के सामूहिक प्रयास से ही दोषी को सजा मिल पायी ।
जगजीवन राम केन्द्र की हर सरकार में मन्त्री रहे और लम्बे समय तक देश के सबसे बड़े दलित नेता थे । इसके बावजूद उनके हाथों सम्पूर्णानन्द की प्रतिमा का अनावरण करने के बाद काशी के कट्टर पंडितों ने उसे गंगा जल से धोया था। जाति और लिंग के भेद मात्र आर्थिक उन्नति से समाप्त नहीं हो जाते हैं । उन्हें समाप्त करने के लिए विशेष प्रयास करने होते हैं ।
कोई पति देव की वजह से तो कोई अपने फ़िल्मी दुकान से उठकर आया है…और कोई किसी राजघराने की पताका लहरा रही है……. बिना आरक्षण के किन आधारों से महिलायें सत्ता में भागीदारी कर पाती थी यह निश्चित गौरतलब बात है ।
सच , गृहणियों और कामवालियों के बीच भी बहनापा होता है । मुम्बई में हुए एक शोध पर गौर करें।
समाज के तमाम शोषित तबकों को एक वर्ग के रूप में संगठित करना आसान नहीं होता। उनमें आपसी द्वन्द्व पैदा करना ,बढ़ावा देना सरल होता है । नक्सलवादी छोटे किसान को भूमिहीन खेत मजदूर का वर्ग शत्रु बता कर लड़ा देता है । इन्हें लड़ा देना आसान है । पूरी खेती घाटे का धन्धा है,यह समझा कर िन दोनों तबकों को एकजुट कर व्यवस्था परिवर्तन के लिए संघर्ष करने के लिए प्रेरित करना उतना सरल नहीं है, किन्तु वही जरूरी है ।
डॉ. लोहिया सामाजिक नीति पर सच्चे आन्दोलन की बाबत जो कल्पना रख गये उसके दो बिन्दुओं पर गौर करें :
” समाज के दबे हुए समुदायों में सभी औरतों को , द्विज औरतों समेत जो कि उचित ही है , शामिल कर लेने पर पूरी आबादी में इनका (पिछड़ों का) अनुपात ९० प्रतिशत हो जाता है। दबी हुई मानवता का इतना बड़ा समुद्र , हिन्दुस्तान के हर १० में ९ मर्द और औरतें , चुप्पी में ऊँघ रही हैं या , बहुत हुआ तो , जीवन्त प्रतीत होने वाली चिहुँक सुनाई पड़ जाती है । उनके दुबले पतले अंगों पर आर्थिक और राजनीतिक उन्नति से अपने आप कुछ चरबी चढ़ सकती है। “
…… ” इस बात पर बार बार ज़ोर डालना चाहिए कि नीची जातियों के सैंकड़ों लोग , जिन पर अन्यथा ध्यान नहीं जा पाता , उन पर पूर्व नियोजित नीति के द्वारा देना चाहिए , बन्सिबत उन दो वृहत्काया वालों के जो किसी न किसी तरह ध्यान आकर्षित कर ही लेते हैं । “
इन ”दो वृहत्कायों ’ के बारे में जून १९५८ में दिए अपने भाषण में (जाति प्रथा,राममनोहर लोहिया समता विद्यालय न्यास , पृष्ट ७६ ) में डॉ. लोहिया ने बताया है । आज लोहिया की नर्सरी से निकले तीन नेताओं तथा बसपा ने राज्य सभा में जो भूमिका अदा की उसे समझने में शायद इस अनुच्छेद से मदद मिलेगी :
” सारे देश के पैमाने पर अहीर , जिन्हें ग्वाला , गोप भी कहा जाता है , और चमार , जिन्हें महार भी कहा जाता है , सबसे ज्यादा संख्या की छोटी जातियाँ हैं । अहीर तो हैं शूद्र , और चमार हैं हरिजन । हिन्दुस्तान की जाति प्रथा के ये वृहत्काय हैं , जैसे द्विजों में ब्राह्मण और क्षत्रिय ।अहीर, चमार , ब्राह्मण और क्षत्रिय , हर एक २ से ३ करोड़हैं । सब मिलाकर ये हिन्दुस्तान की आबादी का ये के करीब १० से १२ करोड़ हैं । फिर भी इनकी सीमा से हिन्दुस्तान की कुल आबादी के तीन चौथाई से कुछ कम बाहर ही रह जाते हैं । कोई भी आन्दोलन जो उनकी हैसियत और हालत को बदलता नहीं , उसे थोथा ही मानना चाहिए । इन चार वृहत्कायों की हैसियत और हालत के परिवर्तन में उन्हें ही बहुत दिलचस्पी हो सकती है पर पूरे समाज के लिए उनका कोई खास महत्व नहीं है । “
फूलन पर किए गए अत्याचार और उसके द्वारा की गई हत्याएं सभ्य समाज के अनुरूप नहीं थी। अपने क्षेत्र से काफ़ी दूर भदोही आकर जब फूलन ने संसदीय चुनाव में हिस्सा लिया तब उनके प्रतिद्वन्द्वी वीरेन्द्र पहलवान ने मैंनपुरी की विधवाओं को चुनाव में घुमाया था । चुनाव परिणाम फूलन के हक में था। हालांकि पिछड़ी महिला के लिए आरक्षण की उन्हें जरूरत नहीं पड़ी थी।

* गुस्सा आता है जब कोई किसी चीज को खुद के लिये तो मांगता है परन्तु दूसरों को देने पर तमाम तमाम तर्क पेश करता है । – हर अन्याय के खिलाफ़ गुस्सा आना जरूरी है ।

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लोक सभा और विधान सभा में औरतों के लिए ३३ फीसदी सीटें  आरक्षित किए जाने का कानून बनाने का विरोध सामाजिक न्याय के तथाकथित पुरोधा मुलायम सिंह , मायावती , शरद यादव करते आये हैं । वे आरक्षण में आरक्षण की माँग कर रहे हैं । यानी इन आरक्षित सीटों में पिछड़ी जाति की औरतों के लिए आरक्षण । शरद यादव काफ़ी पहले इस बाबत अपनी विकृत सोच प्रकट कर चुके हैं – ’आरक्षण में आरक्षण न दिया जाना परकटी औरतों के हक में होगा’!

पिछड़े तबकों में आई जागृति के कारण विधायिकाओं में पिछड़े वर्गों के सांसद -विधायक जनता द्वारा बिना आरक्षण चुन कर आने लगे हैं । आबादी की जातिगत बनावट के कारण यह सहज है। शुरुआती चुनावों में ऐसा नहीं होता था । औरतों के लिए सीटें आरक्षित हो जाने के बाद  पिछड़ी औरतों के सफल होने की कल्पना ये पिछड़े नेता नहीं कर पा रहे हैं ,यह अचरज की बात है अथवा स्त्री-विरोधी? आरक्षित सीटों में स्वाभाविक परिणाम पिछड़ी जाति की  औरतों के पक्ष में होंगे।

डॉ. लोहिया स्त्री-पुरुष गैर-बराबरी को आदि- विषमता का दरजा देते थे । वे ’पिछड़ों’ में सभी जाति की औरतों को जोड़ते थे । दल में शूद्र , अछूत और स्त्रियों का नेतृत्व कैसे उभरे इसकी चिन्ता वे बिना लाग-लपेट के व्यक्त करते थे । वे कहते थे ,’ जाति और योनि के ये दो कटघरे परस्पर सम्बन्धित हैं और एक दूसरे को पालते पोसते हैं ”। उनके द्वारा दिया गया यह उदाहरण सोशलिस्ट पार्टी में ओहदों और कमीटियों में महिला नेतृत्व पैदा करने के प्रति उनकी चिन्ता को दरसाता है :

” एक बार ग़ाजीपुर जिले के एक गाँव में सुखदेव चमार की पत्नी सभा में कुछ देर से आयीं , लेकिन सजधज कर और गाँव के द्विजों की गरदनें उस ओर कुछ मुसकुराहट के साथ मुड़ीं । सुखदेव गाँव के खाते पीते किसान हैं , लेकिन आख़िर चमार , इसलिए उन पर और उनके सम्बन्धियों पर तरह तरह के छोटे छोटे जुल्म हुआ ही करते हैं । बाद में मुझे मालूम हुआ कि उकता कर और कांग्रेस वालों की लालच में आ कर सुखदेव जी का दिमाग पार्टी बदलने के लिए  थोड़ा बहुत डाँवाडोल हो रहा था । लेकिन उनकी पत्नी ने कहा कि जिस पार्टी का हाथ एक बार पकड़ चुके हो ,उसे कभी मत छोड़ना जब तक वह तुमसे साफ़ धोखा न करे । इस घटना को हुए २ – ३ वर्ष तो हो ही गये हैं , लेकिन आज तक मैंने यह नहीं सुना कि सुखदेव जी की पत्नी को गाजीपुर की महिला पंचायत या किसान पंचायत या प्रजा सोशलिस्ट पार्टी में कोई कार्यकारिणी की जगह मिली है , और उससे भी ज्यादा कि धीरज के साथ उनको नेतृत्व के लायक बनाने की कोई कोशिश की गयी है । …. जब तक शूद्रों , हरिजनों और औरतों की सोयी हुई आत्मा का जगना देख कर उसी तरह खुशी न होगी जिस तरह किसान को बीज का अंकुर फूटते देख कर होती है , और उसी तरह जतन तथा मेहनत से उसे फूलने फलने और बढ़ाने की कोशिश न होगी तब तक हिन्दुस्तान में कोई भी वाद , किसी भी तरह की नई जान , लायी न जा सकेगी । द्विज अपने संस्कार में मुर्दा रहेगा , क्योंकि शूद्र की जान पशु बना दी गई है। द्विज के संस्कार और शूद्रों की जान का मिश्रण तो करना ही होगा । इसमें ख़तरे भी बहुत हैं और असाधारण मेहनत करनी पड़ेगी । लेकिन इसके सिवाय दूसरा कोई चारा नहीं । “

बम्बई के एक साथी नन्दकिशोर द्वारा लिखे एक पत्र के जवाब में डॉ. लोहिया उन्हें लिखते हैं :

डॉ. लोहिया

” शूद्र और अछूत जब कुछ तरक्की करते हैं तो द्विजों की खराब बातों की नक़ल करने लगते हैं । जहाँ कहीं कोई अहीर अमीर हो जाता है , अपनी अहीरिन को घर के अन्दर बन्द करना शुरु करता है । मैंने हजार बार कहा है कि वे चमारिनें और धोबिनें कहीं अच्छी हैं जो खुले मुँह काम करती हैं , न कि बनियाइनें और ठकुराइनें जो कि घर के अन्दर बन्द रहती हैं । शूद्रों को इस ओर विशेष ध्यान देना होगा । “

चाहे वे अलग – अलग पार्टियों में बंटे हों , और आपसी संघर्ष काफ़ी बड़ा हो , इनका एक तरह का अचेतन संयुक्त मोर्चा चलता रहता है । इस अचेतन संयुक्त मोर्चे से अलग नीतीश कुमार ने महिला आरक्षण बिल का समर्थन कर  साहस और सूझबूझ का परिचय दिया है ।

हम जिस समाज का सपना देखते हैं और उसे हासिल करने के लिए जिस औजार (दल) को गढ़ते हैं उसमें उस समाज का अक्स दीखना चाहिए । सोशलिस्ट पार्टी द्वारा बुनियादी इकाई से ऊपर की समितियों में तथा टिकट के बँटवारे में इन मूल्यों का ख्याल रखा जाता था जिसके फलस्वरूप कर्पूरी , पासवान , लालू , नीतीश , मुलायम,बेनी प्रसाद नेता बन सके । हमारे दल समाजवादी जनपरिषद की हर स्तर की कमीटियों में दस फीसदी महिलाएं यदि चुन कर नहीं आती तब उस संख्या को हासिल करने के लिए अनुमेलन किया जाता है। हमें इस बात का फक्र है कि दल में वैधानिक तौर पर यह प्रावधान किया गया है । इस प्रावधान को हासिल करने में हुई जद्दोजहद भी गौरतलब थी । भाजपा से भाकपा (माले) तक किसी भी दल में वैधानिक तौर पर महिलाओं के लिए स्थान आरक्षित नहीं है एवं  टिकट के बँटवारे में भी महिलाओं के लिए स्थान निर्धारित नहीं हैं ।

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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी : अन्नपूर्णा महाराणा

हिन्दुस्तानकी स्त्रियाँ जिस अँधेरेमें डूबी हुई थीं , उसमें से सत्याग्रहके तरीकेने उन्हें अपने-आप बाहर निकाल लिया है ; और यह भी सच है कि दूसरे किसी तरीकेसे वे इतने कम समयमें , जिस पर विश्वास नहीं हो सकता , आगे न आ पातीं । फिर भी स्त्री-जातिकी सेवाके कामको मैंने रचनात्मक कार्यक्रममें जगह दी है , क्योंकि स्त्रियोंको पुरुषोंके साथ बराबरीके दरजेसे और अधिकारसे स्वराज्यकी लड़ाईमें शामिल करनेके लिए जो कुछ करना चाहिए , वह सब करनेकी बात अभी कांग्रेसवालोंके दिलमें बसी नहीं है । कांग्रेसवाले अभी तक यह नहीं समझ पाये हैं कि सेवाके धार्मिक काममें स्त्री ही पुरुषकी सच्ची सहायक और साथिन है । जिस रूढ़ि और कानूनके बनानेमें स्त्रीका कोई हाथ नहीं था और जिसके लिए सिर्फ़ पुरुष ही जिम्मेदार है , उस कानून और रूढ़िके जुल्मोंने स्त्रीको लगातार कुचला है । अहिंसाकी नींव पर रचे गये जीवनकी योजनामें जितना और जैसा अधिकार पुरुषको अपने भविष्यकी रचनाका है उतना और वैसा ही अधिकार स्त्रीको भी अपना भविष्य तय करनेका है । लेकिन अहिंसक समाजकी व्यवस्थामें जो अधिकार मिलते हैं ,  वे किसी न किसी कर्तव्य या धर्म के पालनसे प्राप्त होते हैं । इसलिए यह भी मानना चाहिएकि सामाजिक आचार-व्यवहारके नियम स्त्री और पुरुष दोनों आपसमें मिलकर और राजी-खुशी से तय करें । इन नियमों का पालन करनेके लिए बाहरकी किसी सत्ता या हुकूमतकी जबरदस्ती काम न देगी । स्त्रियोंके साथ अपने व्यवहार और बरतावमें पुरुषोंने इस सत्यको  पूरी तरह पहचाना नहीं है । स्त्रीको अपना मित्र या साथी मानने के बदले पुरुषने अपनेको उसका स्वामी माना है । कांग्रेसवालोंका यह खास हक है कि वे हिन्दुस्तानकी स्त्रियोंको उनकी इस गिरी हुई हालतसे हाथ पकड़कर ऊपर उठावें । पुराने जमानेका गुलाम यह नहीं जानता था कि उसे आजाद होना है , या कि वह आजाद हो सकता है । औरतों की हालत भी आज कुछ ऐसी ही है । जब उस गुलामको आजादी मिली , तो कुछ समय तक उसे ऐसा मालूम हुआ , मानो उसका सहारा ही जाता रहा । औरतोंको यह सिखाया गया है कि वे अपनेको पुरुषोंकी दासी समझें । इसलिए कांग्रेसवालोंका यह फर्ज है कि वे स्त्रियोंको उनकी मौलिक स्थितिका पूरा बोध करावें और उन्हें इस तरहकी तालीम दें,जिससे वे जीवनमें पुरुषके साथ बराबरीके दरजेके हाथ बँटाने लायक बनेण ।

एक बार मनका निश्चय हो जानेके बाद इस क्रान्तिका काम आसान है । इसलिए कांग्रेसवाले इसकी शुरुआत अपने घरसे करें । वे अपनी पत्नियोंको मन बहलानेकी गुड़िया या भोग-विलासका साधन माननेके बदले उनको सेवाके समान कार्यमें अपना सम्मान्य साथी समझें । इसके लिए जिन स्त्रियोंको स्कूल या कॉलेजकी शिक्षा नहीं मिली है , वे अपने पतियोंसे , जितना बन पड़े ,सीखें । जो बात पत्नियोंके लिए कही है, वही जरूरी हेरफेरके साथ माताओं और बेटियोंके लिए भी समझनी चाहिए।

यह कहनेकी जरूरत नहीं कि हिन्दुस्तानकी स्त्रियोंकी लाचारीका यह एकतरफ़ा चित्र ही मैंने यहाँ दिया है । मैं भली-भाँति जानता हूँ कि गाँवोंमें औरतें अपने मर्दोंके साथ बराबरीसे टक्कर लेती हैं ; कुछ मामलों में वे उनसे बढ़ी-चढ़ी हैं और उन पर हुकूमत भी चलाती हैं । लेकिन हमें बाहरसे देखनेवाला कोई भी तटस्थ आदमी यह कहेगा कि हमारे समूचे समाजमें कानून और रूढ़िकी रूसे औरतोंको जो दरजा मिला है ,उसमें कई खामियाँ हैं और उन्हें जड़मूलसे सुधारनेकी जरूरत है ।

– गांधीजी

[ रचनात्मक कार्यक्रम: उसका रहस्य और स्थान ,ले. गांधीजी,अनुवादक- काशिनाथ त्रिवेदी,पहली आवृत्ति १९४६ ]

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कन्नूर में : साभार ’मातृभूमि’

गाँधी : क्या आप मुझे यह साबित कर सकते हैं कि आपको उन्हें सड़क का इस्तेमाल करने से रोकने का हक है ? मुझे यह बात पक्की तौर पर लगती है कि इन दलित वर्गों के लोगों को सड़क के इस्तेमाल का आप जितना ही हक है ।
नम्बूदरी प्रतिनिधि : महात्माजी , आप इन तबकों के लिए ’ दलित’ शब्द का प्रयोग क्यों करते हैं ? क्या आप जानते हैं कि वे क्यों दलित हैं ?
गाँधी : हाँ , बिल्कुल । जिस वजह से जलियाँवाला बाग में डायर ने बेकसूरों का नरसंहार किया था उसी वजह से वे दलित हैं ।
नम्बूदरी प्रतिनिधि :इसका मतलब इस रिवाज को शुरु करने वाले डायर थे ? क्या आप शंकराचार्य को एक डायर कहेंगे ?
गाँधी : मैं किसी आचार्य को डायर नहीं कह रहा । परन्तु आपके इस क्रियाकलाप को मैं डायरपने की संज्ञा अवश्य देता हूँ तथा सचमुच यदि कोई आचार्य इस रिवाज की शुरुआत के लिए जिम्मेदार हो तब उसकी इस सदोष अज्ञानता को जनरल डायर की राक्षसी अज्ञानता जैसा मानना होगा ।
गाँधीजी ने जाति-विभेद की तुलना किसी ब्रिटिश अफ़सर द्वारा किए गए क्रूरतम हत्या-काण्ड से की यह दलित-शोषण के प्रति उनकी संवेदना को दरशाता है । यह केरल के वाइकोम स्थित महादेव मन्दिर से सट कर गुजरने वाली सड़क से अवर्णों के गुजरने पर लगी रोक को हटाने की बाबत चले सत्याग्रह के दौरान मन्दिर संचालकों के साथ हुई बातचीत का हिस्सा है । यह गौरतलब है कि मन्दिर-प्रवेश का मसला इसके बाद उठा और सलटा । १९२४ से १९३६ तक चले इस सत्याग्रह अभियान के बाद त्रावणकोर राज्य के ४-५ हजार मन्दिर अवर्णों के लिए खुले ।  १२ साल चले इस आन्दोलन तथा इस दौरान कई बार हुई गांधीजी की केरल यात्राओं का विस्तृत विवरण महादेव देसाई की किताब द एपिक ऑफ़ ट्रैवन्कोर में है। श्रीमती सरोजिनी नायडू ने इसे महागाथा अथवा एपिक की उपमा दी ।
विदेशी आधिपत्य और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध संघर्ष साथ-साथ चला । सत्याग्रह के लिए आवश्यक अहिंसक शक्ति का निर्माण रचनात्मक कार्यों से होता है। प्रत्येक सत्याग्रही दिन में हजार गज सूत कातते थे ।
आन्दोलन का एक अहम उसूल था- ’जिसकी लड़ाई , उसका नेतृत्व’ । गांधीजी द्वारा ’यंग इंडिया’ का सम्पादन शुरु करने के पहले उसका सम्पादन ज्यॉर्ज जोसेफ़ करते थे । ज्यॉर्ज जोसेफ़ साहब मोतीलाल नेहरू के इलाहाबाद से निकलने वाले अखबार इंडीपेन्डेन्ट के भी सम्पादक थे । इनके बाद महादेव देसाई इंडीपेन्डेन्ट के सम्पादक बने तथा अंग्रेजों द्वारा छापे खाने पर रोक लगाने के बाद उन्होंने हस्तलिखित प्रतियाँ निकालनी शुरु की । दोनों को साल भर की सजा हुई । आगरा जेल में यह दोनों छ: महीने साथ थे।
बहरहाल, ज्यॉर्ज जोसेफ़ वाईकोम सत्याग्रह के शुरुआती नेताओं में एक थे । मन्दिर के निकट से गुजरने वाले मुद्दे पर श्री टी.के. माधवन एवं श्री के.पी. केशव मेनन के जेल जाने के बाद उन्होंने गांधीजी से उपवास करने की इजाजत मांगी । इसी प्रकार सिखों ने सत्याग्रह स्थल पर लंगर चलाने की इच्छा प्रकट की । गांधी यह मानते थे कि अस्पृश्यता हिन्दू धर्म की व्याधि है इसलिए इसके समाधान का नेतृत्व वे ही करेंगे- लिहाजा दोनों इजाजत नहीं मिलीं । ठीक इसी प्रकार प्लाचीमाड़ा में चले दानवाकार बहुदेशीय कम्पनी कोका-कोला विरोधी संघर्ष को दुनिया-भर से समर्थन मिला- फ़्रान्स के गांधी-प्रभावित वैश्वीकरण विरोधी किसान नेता जोशे बोव्हे , कैनेडा के ’ब्लू गोल्ड’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक के लेखक द्वय मॉड बार्लो तथा टोनी क्लार्क , नर्मदा बचाओ आन्दोलन की मेधा पाटकर एवं समाजवादी नेता वीरेन्द्रकुमार ने इस आन्दोलन को समर्थन दिया लेकि उसकी रहनुमा उस गाँव की आदिवासी महिला मायलम्मा ही रहीं । इसी कम्पनी ने जब बनारस के मेंहदीगंज आन्दोलन के दौरान कथित राष्ट्रीय समाचार-समूह को करोड़ों रुपये के विज्ञापन दिए तब मातृभूमि के वीरेन्द्रकुमार जैसे सम्पादक ने प्रथम-पेज सम्पादकीय लिख कर कोक-पेप्सी के विज्ञापन न लेने की घोषणा की तथा उसका पालन किया ।
प्लाचीमाड़ा के आन्दोलन को इस बात का गर्व भी होना चाहिए कि जब साहित्य के क्षेत्र में उपभोक्तावाद का प्रवेश बदनाम बहुराष्ट्रीय कम्पनी के पैसे से साहित्य अकादमी के पुरस्कार प्रायोजित कर हो रहा हो तब देश के वरिष्टतम साहित्यकारों में से एम.टी वासुदेवन नायर , एम.एन विजयन और सारा जोसेफ़ जैसे मलयाली साहित्यकारों ने कोका-कोला विरोधी समर समिति को खुला समर्थन दिया ।
यह तथ्य अत्यन्त रोचक व उल्लेखनीय है कि १२ साल चले केरल के सामाजिक सत्याग्रह के ठीक बीचोबीच बाबासाहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर तथा गांधीजी की यरवडा जेल में ऐतिहासिक बात-चीत हुई । इतिहासकार बाबासाहब को दलितों में स्वाभिमान का जनक तथा गांधीजी को सवर्णों में आत्म-शुद्धि का प्रेरक मानते हैं । इनकी ऐतिहासिक बातचीत की शुरुआत में बाबासाहब दलित वर्गों के शैक्षणिक-आर्थिक उत्थान पर जोर दे रहे थे तथा गांधी इस समस्या के मूल में धार्मिक वजह मान रहे थे । बातचीत के बाद गांधी ने शैक्षणिक-आर्थिक उत्थान के लिए ’हरिजन सेवक संघ’ बनाया तथा बाबासाहब ’धर्म-चिकित्सा’ एवं धर्मान्तरण तक गये । केरल के सत्याग्रह में हम आत्म-शुद्धि और आत्मसम्मान दोनों का संयोग देख सकते हैं ।
कन्नूर भी मेरे शहर बनारस की तरह हथकरघे के लिए मशहूर है । खेती के बाद हथकरघा ही सबसे बड़ा रोजगार मुहैया कराता था । अगूँठा-काट वस्त्र नीति ने यह परिदृश्य पूरी तरह बदल दिया है । इस नीति का तिहरा प्रभाव पड़ा है : गरीब तबके पोलियस्टर पहनने के लिए मजबूर हो गये हैम चूँकि यह सरकारी नीति और सब्सिडी के कारण अब सते हो गये हैं  , सरकार की इस नीति के कारण एक अज्ञात परिवार देश का सबसे बड़ा औद्योगिक घराना बन गया है तथा हथकरघा बुनकर अस्तित्व रक्षा के लिए सम्घर्ष कर रहे हैं ।
’मातृभूमि’ पत्र की साल भर चलने वाली यह मुहिम बुनकरों की रक्षा के लिए उपायों पर भी विचार करेगी , यह मैं आशा करता हूँ ।
स्वतंत्रता-संग्राम सेनानियों को मेरे हाथों सम्मानित कराने से एक नैतिक बोझ मेरे सिर पर आ पड़ा है। आजादी की लड़ाई के मूल्य : रचना-संघर्ष साथ-साथ ,जिसकी लड़ाई उसका नेतृत्व जैसे मूल्यों के साथ लड़ाई जारी रखने के लिए उनका आशीर्वाद मेरे जैसों को मिले यह प्रार्थना है ।
अफ़लातून , सदस्य राष्ट्रीय कार्यकारिणी , समाजवादी जनपरिषद .
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