Feeds:
पोस्ट
टिप्पणियाँ

Archive for the ‘brahminism’ Category

                        
एक अत्यन्त मेधावी, सुन्दर , और सं
वेदनशील युवा राजनैतिक तरुण की मौत ने भारतीय समाज को हिला दिया है। इस युवा में जोखिम उठाने का साहस था और अपने से ऊपर की पीढ़ी के उसूलों को आंख मूंद कर न मानने की फितरत थी। वह एक राजनैतिक कार्यकर्ता था,उसका संघर्ष राजनैतिक था । वह आतंक के आरोप में दी गई फांसी के विरुद्ध था तो साथ-साथ आतंक फैलाने के लिए सीमा पार से आये घुसपैठियों से मुकाबला करते हुए मारे गए जवानों की शहादत के प्रति श्रद्धावनत होकर उसने कहा था, ‘अम्बेडकरवादी होने के नाते मैं जिन्दगी का पक्षधर हूं । इसलिए उन जवानों की शहादत के प्रति नमन करता हूं।‘ उसकी मेधा से टक्कर लेने की औकात उसकी विरोधी विचारधारा से जुड़े उस शिक्षण संस्था के छात्रों में नहीं थी और न ही उस शैक्षणिक संस्था के बौने कर्णधारों में थी इसलिए सत्ता के शीर्ष पर बैठे आकाओं की मदद से एक चक्रव्यूह रचा गया था । सत्ताधारी ताकतें रोहित द्वारा फांसी की सजा के विरोध की चर्चा करती हैं लेकिन रोहित के समूह (अम्बेडकर स्टुडेन्ट्स एसोशियेशन) द्वारा मनु-स्मृति दहन तथा गत नौ वर्षों में 9 दलित छात्रों द्वारा शैक्षणिक उत्पीडन के कारण की गई आत्महत्याओं के विरोध की चर्चा करने का साहस नहीं जुटा पातीं।
  लखनऊ में अम्बेडकर विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह में छात्रों के प्रत्यक्ष विरोध के बाद प्रधानमंत्री जिस भाषण में ‘मां भारती के लाल की मृत्यु’ के प्रति अपनी संवेदना प्रकट करते हैं वहीं यह कहने से हिचकिचाते नहीं हैं कि बाबासाहब अपने जीवन में आने वाले कष्ट चुपचाप सहन कर जाते थे , किसी से शिकवा तक नहीं करते थे। बाबासाहब के बारे में प्रधानमंत्री का दावा निराधार है। बाबासाहब द्वारा महाड सत्याग्रह (अस्पृश्यों के वर्जित तालाब से घोषणा करके ,समर्थकों के साथ पानी पीना) तथा मनुस्मृति दहन चुपचाप सहन करते जाने का विलोम थे। पुणे करार के दौरान हुई बातचीत में गांधीजी ने उनकी वकालत के बारे में पूछा था। बाबासाहब ने उन्हें बताया था कि अपने राजनैतिक-सांगठनिक काम के कारण वे वकालत में कम समय दे पा रहे हैं। उसी मौके पर शैशव से तब तक उनके साथ हुए सामाजिक भेदभाव और उत्पीड़न की उनके द्वारा बताई गई कथा गांधी के विचार पत्रों -हरिजनबंधु (गुजराती), हरिजनसेवक (हिन्दी) तथा हरिजन (अंग्रेजी) में छपे थे।
भारतीय समाज और राजनीति में सकारात्मक बदलाव आ रहे हैं। पिछड़े और दलित खुली स्पर्धा में अनारक्षित सीटों पर दाखिला पाते हैं,वजीफा हासिल करते हैं और लोक सेवा आयोग की अनारक्षित सीटों पर चुन जाते हैं । यह समाज की सकारात्मक दिशा में गतिशीलता का मानदण्ड बनता है। ऐसे युवाओं की तादाद उत्तरोत्तर बढ़ रही है और बढ़ती रहेगी। गैर आरक्षित खुली सीटों पर चुने जाने वाले ऐसे अभ्यर्थियों के कारण आरक्षित वर्गों के उतने अन्य अभ्यर्थियों को आरक्षण के अन्तर्गत अवसर मिल जाता है। यहां यह स्पष्ट रहे कि यदि अनारक्षित खुली स्पर्धा की सीटों पार आरक्षित वर्गों के अभ्यर्थियों को जाने से रोका जाए तब उसका मतलब गैर-आरक्षित तबकों के लिए पचास फीसदी आरक्षण देना हो जाएगा। सामाजिक यथास्थिति की ताकतें इस सकारात्मक परिवर्तन से खार खाती हैं। इस प्रकार पढ़ाई-लिखाई में कमजोर ही नहीं मेधावी छात्र-छात्राओं को भी विद्वेष का सामना करना पड़्ता है। यानी उत्पीडन का आधार छात्र का पढ़ाई में कमजोर या मजबूत होना नहीं अपितु उसकी जाति होती है।
  शैक्षणिक संस्थाएं व्यापक समाज का हिस्सा भी हैं और वहीं इनकी अपनी एक दुनिया भी है। हर जमाने के सत्ता संतुलन को बनाये रखने के लिए जिन लोगों की आवश्यकता होती है उनका निर्माण इन संस्थाओं में किया जाता है। रोहित को यथास्थितिवाद का पुर्जा बनाना शिक्षा व्यवस्था के बस की बात न थी। व्यापक समाज और विश्वविद्यालय परिसर को देखने की उसकी दृष्टि सृजनात्मक थी,दकियानुसी नहीं थी। हैदराबाद शहर के बाहर बसाये गये इस परिसर के पेड़-पौधे ,जीव-जंतुओं से लगायत अंतरिक्ष तक उसकी नजर थी। अपनी राजनीतिक पढ़ाई के अलावा कुदरत से मानव समाज की बढ़ रही दूरी को वह शिद्दत से महसूस करता था। उसके फेसबुक चित्रों का एक अल्बम हैदराबाद विश्वविद्यालय की वानस्पतिक और जैविक संपदा के सूक्ष्म निरीक्षण से खींचे गए फोटोग्राफ्स को समर्पित है।
  रोहित जैसा होनहार तरुण की प्रतिभा उच्च शिक्षा के प्रतिष्ठानों में पुष्पित-पल्लवित हो सके यह अत्यन्त दुरूह है। इस दुर्गम पथ पर चलते वक्त उसे कदम-कदम पर लड़ना पड़ा होगा। राजनीति और शिक्षा के संचालकों को उसने चुनौती दी होगी। किसी देश का लोकतंत्र उसकी संस्थाओं के अलोकतांत्रीकरण से कमजोर होता है। उन संस्थाओं में लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी है कि प्रशासनिक तंत्र के हर स्तर पर छात्र-अध्यापक-कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व हो। उच्च शिक्षण संस्थाओं की स्वायत्तता की पोल खुलनी अब शेष नहीं है। दिल्ली विश्वविद्यालय में केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री की शैक्षणिक ‘उपलब्धियों’ की सूचनाओं को देने के जिम्मेदार बाबुओं के खिलाफ कार्रवाई के वक्त ही विश्वविद्यालयी आजादी के बाद केन्द्र सरकार द्वारा उच्च शिक्षा की बाबत पहली समिति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में बनी थी स्वायत्तता की हकीकत सामने आ गई थी। राष्ट्रीय महत्व की संस्थायें आई.आई.टी. से लगायत इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टीट्यूट जैसे तमाम शिक्षण संस्थानों में दिल्ली में बैठे शैक्षणिक तंत्र के नौकरशाहों द्वारा बेहयाई से दखलंदाजियां की गई हैं।
     उच्च शिक्षा केन्द्रों में यौन उत्पीडन की रोकथाम के लिए सर्वोच्च न्यायालय के विशाखा फैसले की सिफारिशों की मूल भावना के अनुरूप समितियां बनी हैं। जातिगत विद्वेष की रोकथाम के लिए भी इस प्रकार की समितियां गठित होनी चाहिए। फिलहाल विश्वविद्यालयों में अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ बने हुए हैं परन्तु वे नख-दन्त विहीन हैं। लाजमी तौर पर इन समितियों में  पिछड़े और दलित समूहों की नुमाइन्दगी भी होनी चाहिए। यह गौरतलब है कि गैर-शिक्षक कर्मचारी चयन,शिक्षक व गैर-शिक्षक आवास आवण्टन समिति में अनुसूचित जाति/जनजाति का प्रतिनिधित्व होता है। इनमें पिछड़ी जातियों तथा महिलाओं का प्रतिनिधित्व भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
  केन्द्रीय विश्वविद्यालयों के विजिटर पदेन राष्ट्रपति होते हैं तथा इन्हें विश्वविद्यालयों की प्रशासनिक-शैक्षणिक जांच के अधिकार का प्रावधान हर केन्द्रीय विश्वविद्यालय के कानून में होता है। इस प्रावधान के तहत सिर्फ काशी विश्वविद्यालय में दो बार विजिटोरियल जांच हुई है न्यायमूर्ति मुदालियर की अध्यक्षता में तथा न्यायमूर्ति गजेन्द्र गडकर की अध्यक्षता में। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की अध्यक्ष रही माधुरी शाह की अध्यक्षता में सभी केन्द्रीय विश्वविद्यालयों की जांच समिति गठित हुई थी। रोहित की मृत्यु के पश्चात एक व्यापक सन्दर्भ की जांच आवश्यक है। निर्भया कान्ड के बाद बने न्यायमूर्ति वर्मा की समयबद्ध कार्यवाही तथा बुनियादी सुधार के सुझावों से हमें सीख लेनी चाहिए तथा उच्च शिक्षा की बाबत उस प्रकार की जांच की जानी चाहिए। केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा घोषित जांच इस व्यापक उद्देश्य की दृष्टि से नाकाफी प्रतीत होती है।
अफलातून

Advertisements

Read Full Post »

“उत्तराधिकारी प्रायः अनुयायी नहीं होता । चाहे वह अपने को विनीत भाव से शिष्य कहलाये । उत्तराधिकारी लकीर का फ़कीर नहीं होता। पूर्वानुवर्ती लोकनेताओं के द्वारा निर्दिष्ट दिशा में वह नए मार्ग प्रशस्त करता है और पगडंडियां खोजता है । “- नारायण देसाई.

इस उद्धरण के पूरी तरह चरितार्थ करने वाला उदाहरण बाबा साहब अम्बेडकर और कांशीराम का है । कांशीराम की उत्तराधिकारी कही जाने वाली सुश्री मायावती इस परिभाषा पर पूरी तरह खरी उतरती नहीं दीखतीं ।

हाल ही में एक बौद्धिक-दलित-युवा से चर्चा हो रही थी । मैंने उससे पूछा कि ‘पृथक निर्वाचन’ की व्यवस्था में पिछड़ी जाति के लोगों को सवर्णों के साथ रखा गया था अथवा अनुसूचित जाति के साथ ? उसने तपाक से जवाब दिया, ‘ पिछड़े ही सब समस्याओं की जड़ में हैं ।’ मैंने उससे कहा कि कांशीराम के सही अनुयायी को ऐसा नहीं कहना चाहिए ।

कांशीराम

कांशीराम

कांशीराम द्वारा प्रतिपादित पचासी फ़ीसदी में अन्दरूनी एकता के लिए जैसे सामाजिक कार्यक्रम लिए जाने चाहिए उससे उलट दिशा में काम हो रहा है । यह काम यदि बसपा-सपा की सरकार के समय शुरु हो जाता तो शायद देश की राजनीति का भी नक्शा सुधर जाता।उस दौर में भी इलाहाबाद जिले में शिवपति नामक दलित महिला को दबंग कुर्मियों ने नग्न कर घुमाया था।जिन जातियों की तादाद ज्यादा है उनकी राजनैतिक सत्ता ज्यादा है । इन ज्यादा तादाद वाली जातियों में ब्राह्मण ,चमार और अहिर के उदाहरण स्पष्टरूप से देखे जा सकते हैं । हजारों शूद्र ( सछूत व अछूत ) जातियां अपनी-अपनी जाति के आधार पर राजनैतिक दल बनाकर सामाजिक न्याय हासिल नहीं कर सकतीं । अपने वोट-आधार की कीमत टिकट देने में वसूलने की बसपाई शैली इन जाति-दलों ने भी अपना ली है ।

कांशीराम के जीवनकाल का एक प्रसंग उल्लेखनीय है । कर्नाटक की दलित संघर्ष समिति का एक धड़े ने बसपा में सशर्त विलय करने का निर्णय लिया था । उस धड़े ने कहा था कि हम मानते हैं कि विकेन्द्रीकरण की अर्थनीति में दलित हित निहित है इसलिए आप से अनुरोध है कि आप गांधी-निन्दा नहीं करेंगे । कांशीराम ने यह शर्त सार्वजनिक तौर (TOI में खबर छपी थी,खंदन नहीं किया गया) पर कबूली थी।

कर्नाटक दलित संघर्ष समिति की भांति ‘उत्तर बंग आदिवासी ओ तपशिली जाति संगठन’ ने भी अम्बेडकर की सामाजिक नीति और विकेन्द्रीकरण की अर्थनीति मानने के कारण समाजवादी जनपरिषद बनाने में अहम भूमिका अदा की। यह गौरतलब है कि इस समूह को भी बसपा के स्थापना के समय कांशीराम ने निमंत्रित किया था।

कांशीराम के सक्रिय रहते हुए उत्तर प्रदेश के बाहर जिन राज्यों में बसपा का आधार बढ़ा था और बसपा ने राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त दल का दरजा हासिल किया था वह अब बहुत तेजी के साथ सिकुड़ रहा है । पंजाब , मध्य प्रदेश , राजस्थान और कर्नाटक में बसपा वास्तविक तीसरी शक्ति के रूप में उभर सकती थी लेकिन उनकी मृत्यु के बाद उत्तर प्रदेश के अलावा अन्य राज्यों में बसपा का आधार छीजता गया है ।

Read Full Post »

सामाजिक न्याय के प्रखर प्रवक्ता , औरंगाबाद उच्च न्यायालय के वरिष्ट वकील , समाजवादी जनपरिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सक्रिय सदस्य साथी प्रवीण वाघ हमारे बीच नहीं रहे । युवक क्रांति दल (युक्रांद) से अपनी राजनीति की शुरुआत करने वाले समाजवादी जनपरिषद के संस्थापकों में प्रमुख थे। मराठवाडा विश्वविद्यालय का नाम बाबासाहब अम्बेडकर के नाम पर करने के आन्दोलन में उन्होंने सक्रिय भागीदारी की थी।  आपके पिता चन्द्रमोहन वाघ औरंगाबाद में रिपब्लिकन पार्टी में सक्रिय थे तथा डॉ. अम्बेडकर के निकट सहयोगी थे तथा अम्बेडकर साहब द्वारा शुरु पत्रिका का प्रकाशन करते थे।

प्रवीण वाघ

सामाजिक न्याय के प्रबल प्रवक्ता प्रवीण वाघ

असंगठित मजदूरों के सवाल को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर मजबूती से उठाते थे । वैश्वीकरण की आर्थिक नीतियों के बहुजन समाज पर पड़ने दुष्प्रभाव को वे बखूबी प्रस्तुत करते थे।  कुटुम्बीजन इस अपूरणीय क्षति को सहन करने की शक्ति पायें ।

साथी तेरे सपनों को हम मंजिल तक पहुंचायेंगे।

Read Full Post »

गेहूँ की फसल कट चुकी है । बनारस से बेलथरा रोड की संक्षिप्त रेल यात्रा में वे खेत भी अलग से दिखते हैं जहाँ हार्वेस्टर से कटाई के कारण भूसे में कटौती हुई है । उत्तर प्रदेश शासन ने तीन संस्थाओं के जरिए गेहूँ खरीदने की बात की है तथा खुद सरकार के आँकड़े बताते हैं कि उत्पादन का सिर्फ़ पाँचवाँ हिस्सा अब सरकार द्वारा खरीदा जा रहा है । ७ फीसदी अथवा उससे से अधिक ’सिकुड़न’ वाले गेहूँ को खरीदने से इनकार किया जा रहा है । समाजवादी जनपरिषद के महामन्त्री विक्रमा मौर्य याद करते हैं ,’ सरकार इस दावे के साथ हमें गेहूँ का बीज बेचती है कि यह सौ फीसदी जमेगा। इस दावे को सही मान कर हम बीज खरीद लेते हैं लेकिन सौ फीसदी बीज नहीं जमता !’ किसान के बचे रहने के नाम पर घोषित समर्थन-मूल्य (यह आजीविका मूल्य नहीं है) पर खरीदते वक्त मानो सरकार चिंगुरने (सिकुड़ने) लगती है। दरअसल समर्थन मूल्य पर गेहूं की खरीद और  सार्वजनिक वितरण प्रणाली हेतु इस गेहूँ की खरीद का कोई संतुलन बचा नहीं रह गया है। यह बिलकुल खुली बात है कि बिना किसी सर्वेक्षण ऊपर से निर्देश दिया जाता है कि कितने परिवारों को गरीबी रेखा के नीचे मानना है तथा कितने प्रतिशत को हर साल उसके ऊपर मान कर उस तादाद में कटौती करते जाना है । किसान अपने परिवार की सब जरूरत को पुरा करने के अलावा मेरे जैसे निकम्मे लोगों के लिए भी पैदा करता है। अन्न स्वालम्बन का लाक्ष्य बरसों पहले हासिल कर लेने के बावजूद सार्वजनिक वितरण प्रणाली में श्रेणियां बना दी गई हैं । सार्वजनिक वितरण प्रणाली का नाश करने की दिशा में यह जरूरी कदम माना गया होगा। पूरी आबादी को सस्ते दर पर खिलाने और पैदा करने वाले से ’समर्थन मूल्य’ पर खरीदने की नीयत होती तो सरकार द्वारा घोषित मूल्य अधिकांश उत्पादन की खरीद की जाती।

बनारस से हमारी राज्य समिति में गये रामजनम का कहना है बिजली -पानी जैसे संसाधनों के वितरण में गैर बराबरी को भी मुद्दा बनाना चाहिए। लखनऊ में २०-२२ घण्टे,बनारस में १८-२० घण्टे और देहातों में ४ घण्टे बिजली रहती है।

मर्यादपुर की चट्टी पर दो गाड़ियां हमे पार कर निकल गईं । उन दोनों पर ’फलां परिणय ढिकना’ के पोस्टर लगे थे। साथी सोमनाथ त्रिपाठी ने आश्चर्य के साथ पूछा ,’ लगन शुरु हो गया,क्या?’

हम जिस जीप में बीच की कतार में बैठे थे उसके सामने ( ड्राइवर की लाइन में) बैठे एक स्थानीय पंडिज्जी ने अपनी तरफ़ से हमारा ज्ञान वर्धन किया -”  ’अम्बेडकर – लगन’ शुरु हो चुका है। अम्बेडकर-लगन के कई लाभ हैं । तम्बू-डेरा , रसोइए आदि सहजता से और सस्ते रेट पर मिल जाते हैं। अम्बेडकर-लगन ’खर-मास’ के दुष्प्रभावों से भी मुक्त है । मुझे पसन्द आया अम्बेडकर-लगन का विचार। फसल काट कर खाली हो जाना इस नये प्रकार की लगन में होता है। देवताओं के शयन-काल में विवाह को अशुभ नहीं माना गया।

Read Full Post »

इस चिट्ठे पर मेरी पिछली पोस्ट पर जो टिप्पणियां आई हैं उनके अलावा फ़ेसबुक के जरिए भी कुछ मित्रों ने उस पर चर्चा की है ।  इस बहस में मेरे लेख की आलोचना में जो प्रमुख बाते कही गयी हैं उन्हें सब से पहले यहाँ एक साथ रख रहा हूँ :

* इस आरक्षण में क्रीमी लेयर का प्रावधान क्यों न हो ?

* ये बड़े लोगों की चाल है छोटे लोगों को सत्ता से दूर रखने की.आखिर इनमें से कितनी महिलाएं खुद के बूते यहाँ पहुची हैं…कोई पति देव की वजह से तो कोई अपने फ़िल्मी दुकान से उठकर आया है…और कोई किसी राजघराने की पताका लहरा रही है…….* ये औरतें (सवर्ण) भी तो वैसे ही ही अपना मुकाम पा सकती हैं जैसा की आप कल्पना कर रहे हैं

* जो आज महिला आरक्षण का समर्थन कर रहीं हैं ज्यादातर वही महिलाएं हैं जिन्होंने दलित आरक्षण का विरोध किया था। इसी से समझा जा सकता है कि ये आरक्षण में आरक्षण का विरोध क्यों कर रही हैं।

* ये महिलायें अब क्यों नहीं कह रही कि आरक्षण के ज़रिए स्त्री-पुरुषों को आपस में लड़ाया जा रहा है , समाज को बाँटा जा रहा है ।

* गुस्सा आता है जब कोई किसी चीज को खुद के लिये तो मांगता है परन्तु दूसरों को देने पर तमाम तमाम तर्क पेश करता है ।
* आभा राठोर किस की वकालत करेंगी राठोर की या रुचिका की ?मालकिनें क्या दरियादिल हो कर अपनी कामवालियों को दुख सुनायेंगी ? मैनपुरी की ठकुराइनें क्या फूलन की मौत या बलात्कार पर आँसू बहायेंगी ? महिलाओं को एक वर्ग कहकर हम किसे ठग रहे हैं ?
इन आरोपों , आक्षेपों और आशंकाओं की बाबत बात करने के पहले आरक्षण से जुड़ी कुछ बुनियादी बातों पर गौर करें:
समाज में व्याप्त जाति और लिंग जैसे गैर बराबरी के आधारों पर व्याप्त एकाधिकार को विशेष अवसर (समान अवसर से गैर बराबरी बरकरार रहती है) की मदद से तोड़ने का एक साधन आरक्षण है।
जातिविहीन – लिंगभेदविहीन समाज की दिशा में यह एक साधन होता है । यह साध्य नहीं साधन है।  इस साधन का उद्देश्य इन शोषित वर्गों को महत्वपूर्ण ओहदों पर नुमाइन्दगी देना है , उनकी गरीबी दूर करना या बेरोजगारी दूर करना नहीं (भले ही दूरगामी परिणाम के तौर पर इसका  प्रतिफल यह हो)।
व्यक्ति या समूह जीवन के किसीआयाम में शोषक और किसी अन्य में शोषक हो सकता है। आम तौर पर खुद के या अपने समूह के समूह को शोषण को हम देख पाते हैं किन्तु जिस आयाम में हम शोषक की भूमिका में होते हैं वह नहीं देखना चाहते । मसलन उत्तर प्रदेश और बिहार में सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य अंग्रेजी – हटाओ , अलाभकारी जोत पर टैक्स न देने , जाति- तोड़ो और जातिगत आरक्षण के हक में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते थे किन्तु नर – नारी समता के कार्यक्रम तथा उसके लिए संगठन बनाने में फिसड्डी रहते थे । बहुत बाद में समता संगठन जैसे राजनैतिक समूहों ने  अपने सक्रिय सदस्यों की आचार संहिता में पुरुष साथियों द्वारा १. घरेलू श्रम-साध्य काम में हिस्सा बँटाना,२.पत्नी को न पीटना जैसी शर्तें जोड़ीं ।
इसी प्रकार मंडल संस्तुतियों के खिलाफ़ फूटे आक्रोश में सवर्ण महिलाओं का एक बड़ा तबका आरक्षण विरोधी भावना से प्रभावित था । ये महिलायें जतिगत पिछड़ेपन का शिकार नहीं थीं।
बिहार के पीरो के पूर्व विधायक तथा लोहिया के अत्यन निकट सहयोगी रामइकबाल बरसी के शब्दों में ’  हमारे समाज में हर जाति की औरत कहारिन है’ । राम इकबालजी इसी लिए किसी भी घर में भोजन के बाद खुद थाली धोते हैं । काशी विश्वविद्यालय परिसर में नरेन्द्रनाथ तिवारी नामक एक चिकित्सक ने अपनी पत्नी वीणा तिवारी की जलाकर हत्या कर दी थी । हरिशंकर तिवारी जैसे जाति के बाहुबली मठाधीशों ने सिर्फ़ हत्यारे पुरुष की जाति देखकर गवाहों को धमकाने , पसन्दीदा जज की अदालत में मामले को डालने में अहम भूमिका अदा की। सामाजिक चेतना के सामूहिक प्रयास से ही दोषी को सजा मिल पायी ।
जगजीवन राम केन्द्र की हर सरकार में मन्त्री रहे और लम्बे समय तक देश के सबसे बड़े दलित नेता थे । इसके बावजूद उनके हाथों सम्पूर्णानन्द की प्रतिमा का अनावरण करने के बाद काशी के कट्टर पंडितों ने उसे गंगा जल से धोया था। जाति और लिंग के भेद मात्र आर्थिक उन्नति से समाप्त नहीं हो जाते हैं । उन्हें समाप्त करने के लिए विशेष प्रयास करने होते हैं ।
कोई पति देव की वजह से तो कोई अपने फ़िल्मी दुकान से उठकर आया है…और कोई किसी राजघराने की पताका लहरा रही है……. बिना आरक्षण के किन आधारों से महिलायें सत्ता में भागीदारी कर पाती थी यह निश्चित गौरतलब बात है ।
सच , गृहणियों और कामवालियों के बीच भी बहनापा होता है । मुम्बई में हुए एक शोध पर गौर करें।
समाज के तमाम शोषित तबकों को एक वर्ग के रूप में संगठित करना आसान नहीं होता। उनमें आपसी द्वन्द्व पैदा करना ,बढ़ावा देना सरल होता है । नक्सलवादी छोटे किसान को भूमिहीन खेत मजदूर का वर्ग शत्रु बता कर लड़ा देता है । इन्हें लड़ा देना आसान है । पूरी खेती घाटे का धन्धा है,यह समझा कर िन दोनों तबकों को एकजुट कर व्यवस्था परिवर्तन के लिए संघर्ष करने के लिए प्रेरित करना उतना सरल नहीं है, किन्तु वही जरूरी है ।
डॉ. लोहिया सामाजिक नीति पर सच्चे आन्दोलन की बाबत जो कल्पना रख गये उसके दो बिन्दुओं पर गौर करें :
” समाज के दबे हुए समुदायों में सभी औरतों को , द्विज औरतों समेत जो कि उचित ही है , शामिल कर लेने पर पूरी आबादी में इनका (पिछड़ों का) अनुपात ९० प्रतिशत हो जाता है। दबी हुई मानवता का इतना बड़ा समुद्र , हिन्दुस्तान के हर १० में ९ मर्द और औरतें , चुप्पी में ऊँघ रही हैं या , बहुत हुआ तो , जीवन्त प्रतीत होने वाली चिहुँक सुनाई पड़ जाती है । उनके दुबले पतले अंगों पर आर्थिक और राजनीतिक उन्नति से अपने आप कुछ चरबी चढ़ सकती है। “
…… ” इस बात पर बार बार ज़ोर डालना चाहिए कि नीची जातियों के सैंकड़ों लोग , जिन पर अन्यथा ध्यान नहीं जा पाता , उन पर पूर्व नियोजित नीति के द्वारा देना चाहिए , बन्सिबत उन दो वृहत्काया वालों के जो किसी न किसी तरह ध्यान आकर्षित कर ही लेते हैं । “
इन ”दो वृहत्कायों ’ के बारे में जून १९५८ में दिए अपने भाषण में (जाति प्रथा,राममनोहर लोहिया समता विद्यालय न्यास , पृष्ट ७६ ) में डॉ. लोहिया ने बताया है । आज लोहिया की नर्सरी से निकले तीन नेताओं तथा बसपा ने राज्य सभा में जो भूमिका अदा की उसे समझने में शायद इस अनुच्छेद से मदद मिलेगी :
” सारे देश के पैमाने पर अहीर , जिन्हें ग्वाला , गोप भी कहा जाता है , और चमार , जिन्हें महार भी कहा जाता है , सबसे ज्यादा संख्या की छोटी जातियाँ हैं । अहीर तो हैं शूद्र , और चमार हैं हरिजन । हिन्दुस्तान की जाति प्रथा के ये वृहत्काय हैं , जैसे द्विजों में ब्राह्मण और क्षत्रिय ।अहीर, चमार , ब्राह्मण और क्षत्रिय , हर एक २ से ३ करोड़हैं । सब मिलाकर ये हिन्दुस्तान की आबादी का ये के करीब १० से १२ करोड़ हैं । फिर भी इनकी सीमा से हिन्दुस्तान की कुल आबादी के तीन चौथाई से कुछ कम बाहर ही रह जाते हैं । कोई भी आन्दोलन जो उनकी हैसियत और हालत को बदलता नहीं , उसे थोथा ही मानना चाहिए । इन चार वृहत्कायों की हैसियत और हालत के परिवर्तन में उन्हें ही बहुत दिलचस्पी हो सकती है पर पूरे समाज के लिए उनका कोई खास महत्व नहीं है । “
फूलन पर किए गए अत्याचार और उसके द्वारा की गई हत्याएं सभ्य समाज के अनुरूप नहीं थी। अपने क्षेत्र से काफ़ी दूर भदोही आकर जब फूलन ने संसदीय चुनाव में हिस्सा लिया तब उनके प्रतिद्वन्द्वी वीरेन्द्र पहलवान ने मैंनपुरी की विधवाओं को चुनाव में घुमाया था । चुनाव परिणाम फूलन के हक में था। हालांकि पिछड़ी महिला के लिए आरक्षण की उन्हें जरूरत नहीं पड़ी थी।

* गुस्सा आता है जब कोई किसी चीज को खुद के लिये तो मांगता है परन्तु दूसरों को देने पर तमाम तमाम तर्क पेश करता है । – हर अन्याय के खिलाफ़ गुस्सा आना जरूरी है ।

Read Full Post »

राष्ट्र की हिटलरी कल्पना फासीवाद के नाम से कुख्यात है । हिटलर ने ‘नस्ल’ की कथित शुद्धता और यहूदी विद्वेष की विक्षिप्तता को फैलाकर जर्मनी को भीषण बर्बरता और रक्तपात में डुबो दिया और विश्व भर की लांछना का पात्र बना दिया । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का धर्म आधारित राष्ट्र भी उसी प्रकार का एक बर्बर उद्देश्य है । हिटलर से तुलना करके या हिटलर का उदाहरण देकर हम संघ-परिवार पर कोई काल्पनिक आरोप नहीं लगा रहे हैं । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गौरव-पुरुष गुरु गोलवलकर ने खुद १९३९ में लिखी अपनी पुस्तक ‘ वी ऑर आवर नेशनहुड डिफाइन्ड ‘ ( हम या हमारी राष्ट्रीयता परिभाषित ) ( अब उनके चेले अधिकृत रूप से कहने लगे हैं कि यह उनकी लिखी किताब नहीं है , उनका अनुवाद है ) में कहा था –

नस्ल और इसकी संस्कृति की पवित्रता को बनाए रखने के लिए जर्मनी ने यहूदियों से अपने देश को रिक्त कर दुनिया को स्तम्भित कर दिया । नस्ल का गर्व यहाँ अपनी उच्चतम अभिव्यक्ति पाता है। जर्मनी ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि संस्कृतियों और नस्लों के फर्क जो बुनियाद तक जाते हैं , एक संपूर्ण इकाई में जज़्ब नहीं किए जा सकते । हम भारतीयों के लिए यह एक अच्छा सबक है जिससे लाभ उठाना चाहिए । “

    यह सचमुच बड़े शर्म की बात है कि जिस विद्वेष और क्रूरता के लिए हिटलर का जर्मनी पूरी दुनिया में लांछित हुआ , गोलवलकर ने ने उसी की प्रशंसा की और भारत के लिए उसी हिटलरी रास्ते की सिफारिश की । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गुरु गोलवलकर के बताए हुए फासीवाद के रास्ते पर चल रहा है । वह जिस हिन्दू राष्ट्र की बात करता है , वह सिर्फ मुस्लिम विद्वेष तक सीमित नहीं है । स्त्रियों और शूद्र कही जाने वाली जातियों , जिन्हें सबसे अधिक धर्माचार्यों द्वारा अनुमोदित क्रूर प्रथाओं और परम्परागत ऊँच-नीच का शिकार होना पड़ा है , की दुर्दशा कम होने के बजाए , धर्म आधारित राष्ट्र में काफ़ी बढ़ जाएगी । सती प्रथा और बाल-विवाह पर रोक सम्बन्धी कानून हटाने और वर्ण व्यवस्था को स्थापित करने की मांग धर्म-संसद के प्रस्तावों में होने लगी थीं । स्त्रियों को सम्पत्ति में हक देने वाले हिन्दू कोड बिल का भी गोलवलकर ने विरोध किया था ।

   इसलिए यदि आप कूप मंडूकता , धर्मान्धता , स्त्री उत्पीड़न और दलितों तथा पिछड़ों की सामाजिक दुर्दशा को देश की नियति नहीं बनाना चाहते तो हिन्दू राष्ट्र के नारे से सतर्क रहे। हम किस प्रकार पूजा पाठ करें , त्योहार किस ढंग से मनाएं , धार्मिक प्रतीकों का क्या अर्थ ग्रहण करें और दूसरे धर्म के अनुयायियों के साथ क्या व्यवहार करें , इन बातों को संघ परिवार और महंत मठाधीश नियंत्रित करनी की कोशिश करते हैं । इनके चलते हमारे धार्मिक आचरण की स्वाधीनता सुरक्षित नहीं है । ऐसे तत्वों को धार्मिक मान्यता और राजनैतिक समर्थन देना बन्द करें नहीं तो ये हमें एक अन्धी सुरंग में पहुंचा देंगे ।

    दुनिया के कई धर्म आधारित राष्ट्रों में जनता का उत्पीड़न और रुदन हमसे छिपा नहीं है। धर्म आधारित राष्ट्र के रूप में हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान के बारे में हम जानते हैं कि इस्लामियत के नाम पर कैसे कठमुल्लों , सामन्तों , फौजी अफसरों , भ्रष्ट नेताओं और असामाजिक तत्वों का वह चारागाह बन गया है । क्या हम भारत में भी उसी दुष्चक्र को स्थापित करना चाहता हैं ? धर्म आधारित राष्ट्र लोकतंत्र विरोधी अवधारणा है । किसी धर्म आधारित राष्ट्र में लोकतंत्र कभी पनप नहीं सकता । संविधान , न्यायपालिका , और प्रेस का हाल के वर्षों में बड़े पैमाने पर अपमान कट्टरपंथियों के लोकतंत्र विरोधी रुख की ही बानगी है । गोलवलकरपंथी राष्ट्रतोड़क ‘राष्ट्रवादियों’ के चंगुल में में देश चला गया तो यह उसके अस्तित्व के लिए घातक होगा । इसलिए समय रहते इनके हिटलरी मंसूबों को उजागर करें और इनके खिलाफ़ चौतरफ़ा ढंग से सक्रिय हों ।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

[ दोनों चित्रों का स्रोत :  विकीपीडिया ]

Read Full Post »

गांधी बनाम अम्बेडकर की बहस में गांधी जी की धारा के दो प्रमुख उत्तराधिकारियों – डॉ. लोहिया और जयप्रकाश नारायण के आन्दोलनों में सामाजिक परिवर्तन के कार्यक्रमों को नजरअन्दाज करने पर बहस अपूर्ण रहेगी । संपूर्ण क्रांति के आन्दोलन के बीच लोकनायक जयप्रकाश की उपस्थिति में तोड़ी गयी जनेऊ का ढेर लग जाता था तथा हजारों नवयुवकों ने जातिसूचक चिह्न त्याग दिये थे । समाजिक विभाजन कम से कम हो इसलिए डॉ. लोहिया ने ‘साठ संकड़ा’ के सिद्धान्त में औरत , आदिवासी , दलित और पिछड़ों को एक ही राजनैतिक परिभाषा में संगठित करने के प्रयास किए । उनकी पार्टी में हर स्तर साठ सैंकड़ा का सिद्धान्त लागू होने के कारण दलितों और पिचड़ों का नेतृत्व भी पैदा हुआ ।

    यह निश्चित तौर पर स्पष्त रहना चाहिए कि इस बहस में गांधी जी की पैरवी में मुखर हो रहे धार्मिक सहिष्णुता विरोधी दल तथा नव-साम्राज्यवाद का बंदनवार सजा कर स्वागत करने वाले दल के कंधे से कंधा मिलाना जयप्रकाश , विनोबा तथा लोहिया के अनुगामियों के लिए संभव नहीं है । इसे प्रकार अम्बेडकरवादी स्मूहों को भी नयी आर्थिक नीति के सन्दर्भ में एक स्पष्ट सोच प्रकट करनी होगी ।

    गांधी बनाम अम्बेडकर की बहस में हिस्सा लेने वालों के लिए गांधी जी की यह सलाह सर्वथा उचित है – ” हम बड़ों के बल का अनुसरण करें , उनकी कमजोरी का कभी नहीं । बड़ों की लाल आँखों में अमृत देखें , उनके लाड़ से दूर भागें , मोहमयी दया के वश होकर वे बहुत कुछ करने की इजाजत दें , बहुत कुछ करने को कहें , तब लोहे जैसे सख्त बनकर उससे इनकार करें । मैं एक बार यदि कहूँ कि हरगिज झूठ न बोलना , मगर मुश्किल में पड़कर झूठ के सामने आँखें बन्द कर लूँ , तब मेरी आँखों की पलकों को पकड़कर जोर से खोल देने में तुम्हारी भक्त होगी , मेरे इस दोष को दरगुजर करने में द्रोह होगा । ” ( पत्र – मगनभाई देसाई को, महादेवभाई की डायरी , खण्ड तीन, पृ. ११२  ) *

(

 

Read Full Post »

Older Posts »

%d bloggers like this: