अकाल तख़्त को माफ़ी नामंजूर ?
June 15, 2007 by अफ़लातून
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डेरा सच्चा सौदा की माफ़ी अकाल-तख्त ने नामंजूर की । गुरु गोविन्दसिंह से क्यों माँगी माफी ? हमसे क्यों नहीं माँगी ? लगता है ‘नारद पर प्रतिबन्धित चिट्ठे’ के लेखक द्वारा सभी आहत चिट्ठेकारों से खेद प्रकट करने और नारद के फैसले से विरोध जारी रखने में ऐसी ही कोई जिच फँस गयी है । चिट्ठेकार ही पाठक हैं तो सर्वोपरि हुए, गुरु गोविन्दसिंहजी की तरह ।
इस दुर्भाग्यपूर्ण प्रसंग पर कार्रवाई करने में नारद द्वारा जितनी चुस्ती दिखाई गई थी , वह अब नदारद है । नारद से जुड़े चिट्ठों पर स्वस्थ बहस और विचारों की अभिव्यक्ति का गला कैसे - कैसे घोंटा जाता रहा है , पहले की मिसाल पेश है :
एक मार्च , २००७ को घुघूती बासूती ने एक जबरदस्त पोस्ट अपने चिट्ठे पर छापी । पोस्ट अभी भी मौजूद है । उस पर टिप्पणीयों में हुई बहस में दो प्रतिक्रियाओं पर आपत्ति आई। चिट्ठाकार भी चाहती थीं कि आपत्तिजनक टिप्पणियाँ हटा दी जाए , अन्य टिप्पणियाँ रहें । उन्हें ऐसा खुद करने में कुछ तकनीकी दिक्कत थी , नतीजन एक जिम्मेदार व्यक्ति ने यह काम कुछ ज्यादा उत्साह में कर दिया , सभी टिप्पणियों को हटा कर । गैर आपत्तिजनक टिप्पणियों के हटने से बहस को धक्का पहुँचा , और पाठक उन्हें पढ़ने से हमेशा के लिए वंचित हो गए । इस दुर्भाग्यपूर्ण कार्रवाई के बाद तीन टिप्पणियाँ उस चिट्ठे पर अंग्रेजी में की गयी हैं , जिनमें से कोई नारद पर प्रदर्शित चिट्ठों का लेखक नहीं है ।
‘ बाजार पर अतिक्रमण ‘ को नारद से हटाने के बाद उसी चिट्ठे पर लेखक द्वारा प्रकाशित खेद वक्तव्य की पोस्ट नारद पर प्रकट नहीं हुई है । लेखक ने अन्य चिट्ठे पर भी उसे प्रकाशित किया जो अब तक नारद से नहीं हटाये गये हैं ।
‘प्रतिबन्धित चिट्ठे’ की कड़ी को आज ही अपने चिट्ठे के ब्लॉग रोल में शामिल करना मेरा प्रथम दायित्व है । उस पर भी कार्रवाई की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। उस प्रविष्टी का विरोध मैंने और अनुभवी चिट्ठाकार आदरणीय धुरविरोधी ने उक्त चिट्ठे पर किया था ।सभी आहत लोग अपनी टिप्पणी दर्ज करते तब भी यह संभव था कि लेखक द्वारा खेद प्रकट कर दिया जाता। अब वह टिप्पणियाँ भी नारद की जल्दबाजी में की गयी कार्रवाई के भेंट चढ़ गयी। ताकि सनद रहे,वक्त पर काम दे हमने उसे अपने पास बचा लिया है। ‘प्याज खाओगे या चप्पल खाओगे ?’ वाली सजा में दोनों खाना पड़ता है ।
कुछ चिट्ठेकारों ने ‘ नारद उवाच ‘ पर हुई टिप्पणियों में हुई बहस के चलते उक्त पोस्ट को भी हटाने की माँग कर दी है। बहस से भाग कर नारद जैसा मंच गलत दिशा में जाए इसकी सम्भावना बनती है। उक्त टिप्पणी से यह मानसिकता प्रकट हुई है।
२६ जून की तारीख आ रही है जिस दिन १९७५ में सभी मौलिक अधिकारों को स्थगित करने का दुर्भाग्यपूर्ण फैसला लिया गया था । उस दु:शासन पर्व के दिन लदे जब आजादी की कीमत पहचान कर जनता ने उस हुकूमत को पलट दिया। सभी नागरिक आजादीपसन्द चिट्ठाकार उस दिन अपनी निष्ठा और संकल्प को पुख्ता करें । हांलाकि , हम नारद संचालक मण्डल द्वारा तत्काल उस चिट्ठे को बहाल कर दिए जाने की आशा पूरी तरह छोड़ नहीं पा रहे हैं ।


नारद के विवेक से हम अभी भी थोड़ी आस बांधे हुए हैं.. मगर उस भरोसे की आज फिर अवमानना हुई तब?.. आगे का रास्ता क्या?..
हम आपके साथ हैं अफलातून जी। अभिव्यक्ति के नागरिक अधिकार से वंचित कर नारद ने पहले ही अपनी मंशा ज़ाहिर की है, अब तमाम आवाज़ों के बाद भी उसे नहीं बहाल करके यह साफ किया जा रहा है कि हुकूमत हमारी है, और चिट्ठकार हमारे पैरों की धूलि। लड़ाई में तेवर और तल्ख करना चाहिए, ताकि इन्हें समझ में आये कि ऐसी हुकूमतों को इतिहास कितनी बेरहमी से मटियामेट करता रहा है।
अफलातून जी,
आपके तर्कों में अब दम नहीं है। आप ऐसे लिख रहे हैं जैसे आपके वोट का मूल्य सौ है और बाकी सौ चिट्ठाकारों के वोट का मूल्य मात्र एक। क्या यही आपके ‘लोकतन्त्र’ की परिभाषा है?
आपके प्रिय रूपक ‘पहरेदारी’ में भी दम नहीं है। आप जानते हैं कि आप ‘समाजवादी जनपरिषद’ के एक कार्यकर्ता के रूप में भारतीय जनजीवन पर ‘पहरेदारी’ की ही तमन्ना रखते हैं। इसी तरह ये ‘पहरेदारी’ वाला रूपक हर जगह दुरपयुक्त किया जा सकता है। आप भली भांति जानते हैं कि ‘पहरेदारी’ की अनुपस्थिति का नाम ‘अराजकता’ है। क्या आप अराजकता में विश्वास रखते हैं?
आपका चिट्ठा ज़रूर पढ़ता हूँ. आपसे एक वैचारिक समानता हमेशा महसूस होती है. इस मामले में मैंने गिरिराज जोशी के चिट्ठे पर एक टिप्पणी छोड़ी है. मुझे ऐसा लगता है कि आपसे कहीं मुलाक़ात हुई है, अगर नहीं हुई है तो दिल्ली आया तो ज़रूर होगी. विचारों से जनवादी हूँ आत्मा से गाँधीवादी, दोनों को मिला दीजिए तो जो रंग बनता है वह शायद समाजवादी ही है. कुछ ऐसा ही है अपना सोचना, आप भी ऐसे ही लगते हैं.
अनामदास
चंदन की चुटकी भली , गाड़ी भरा न काठ ।
चतुर तो एकहि भला , मूरख भले न साठ ॥
— कबीर
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