डॊ. भीमराव अम्बेडकर : परिनिर्वाण दिवस पर

तथागत की सिखाई बौद्ध दर्शन की विशिष्ट शैली में आलोचना का महत्व है , आत्मालोचना का महत्व तो अनुपम है . सामयिक दलित आन्दोलन के वजूद में बाबासाहब का योगदान पितृतुल्य है . आज के दलित आन्दोलन के संकट को समझने के लिए उनकी और गांधी जी की राजनैतिक व दार्शनिक यात्रा की आलोचना मददगार होगी .

  गांधी और अम्बेडकर की साफ़ तौर पर अलग अलग दिशा थी . दोनों महापुरुष उत्कट सृजनात्मक व्यग्रता के साथ भारतीय समाज- पटल पर उतरे थे . इतिहास की एक सम्मोहक खूबसूरती होती है कि खण्ड दृष्टि के हम इतने कायल हो जाते हैं कि उसे ही पूर्ण मानने लगते हैं . इन दोनों की उत्कट सामाजिक व्यग्रता के साथ भिडन्त भी हुई थी .

  यह गौरतलब है कि तीसरे दशक के प्रारम्भ में हुई इस भिडन्त के फलस्वरूप दोनों की अपनी-अपनी सोच और कार्यक्रमों पर बुनियादी असर पड़ा . इस प्रचन्ड मुठभेड़ के बाद दोनों बदले हुए थे . यह सही है कि अन्त तक एक दूसरे के लिए तीखे शब्दों का प्रयोग दोनों ने नही छोड़ा . एक दूसरे पर पडे प्रभाव की यहां सांकेतिक चर्चा की जा रही है .

  गांधी जी के लिए अस्पृश्यता चिन्ता के विषयों में प्रमुख थी. उनके पहले भी कई योगियों और सामाजिक आन्दोलनों की इसपर समझदारी थी लेकिन यह तथ्य है कि भारत की राजनीति में मुद्दे के तौर पर यह गांधी के कारण स्थापित हुआ . राष्ट्रीय – संघर्ष के बडे लक्ष्य के साथ अस्पृष्यता को धार्मिक और आध्यात्मिक तौर पर उन्होंने लिया . अम्बेड़कर ने बातचीत के शुरुआती दौर में ही गांधी को यह स्पष्ट कर दिया था दलित-वर्गों के आर्थिक – शैक्षणिक उत्थान को वे ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं .

   अम्बेडकर से मुलाकात के पहले गांधी जाति – प्रथा के रोटी – बेटी के बन्धनों को ‘आध्यामिक प्रगति’ में बाधक नहीं मानते थे .अम्बेडकर से चले संवाद के बाद उन्होंने दलितों के शैक्षणिक – आर्थिक उत्थान के लिए उन्होंने ‘हरिजन सेवक संघ’ बनाया और जाति – प्रथा चोट करने के लिए यह निर्णय लिया कि वे सिर्फ़ सवर्ण – अवर्ण विवाहों में ही भाग लेंगे .

   सामाजिक प्रश्न के धार्मिक महत्व को नजर-अन्दाज करने वाले बाबा साहब ने गांधी से संवाद के दौर के बाद इसे अहमियत दी . जाति – प्रथा के नाश हेतु ‘धर्म-चिकित्सा’ और ‘धर्मान्तरण’ को भी जरूरी माना .

  भारतीय समाज में सवर्णों में ‘आत्म-शुद्धि’ तथा दलितों में ‘आत्म-सम्मान’-इन दोनों प्रयासों की आवश्यकता है तथा यह परस्पर पूरक हैं .

  गांधी के मॊडल से पनपे कांग्रेसी-हरिजन नेतृत्व में एक राष्ट्रवादी राजनैतिक अभिव्यक्ति और प्रयत्न था लेकिन सामाजिक – सांस्कृतिक प्रश्नों पर चुप्पी रहती थी . साठ और सत्तर के दशक में उभरे दलित नेतृत्व ने माना कि कांग्रेस का हरिजन नेतृत्व सामाजिक ढ़ाचे में अन्तर्निहित गैर-बराबरी को ढक-छुपा कर रखता है . इस सांस्कृतिक चुप्पी को नए दलित नेतृत्व ने कायरतापूर्ण और असमानता के वातावरण को अपना लेने वाला माना .

  दलित आन्दोलन की कमजोरियों को समझने के लिए १९४४ में जस्टिस पार्टी की मद्रास में हार के बाद  एक रात्रि भोज में दिए गए बाबासाहब के भाषण पर गौर करना काफी होगा . लम्बे समय तक सत्ता में रहने के बाद जस्टिस पार्टी बुरी तरह हारी थी .गैर-ब्राह्मणों में भी कईयों ने उसका साथ छोड़ दिया था .

” मेरी दृष्टि में इस हार के लिए दो बातें मुख्यत: जिम्मेदार थीं .

    पहला,ब्राह्मणवादी तबकों से उनमें कौन से अन्तर हैं यह वे समझ नही पाये . हांलाकि ब्राह्मणों की विषाक्त आलोचना वे करते थे लेकिन उनमें से कोई क्या यह कह सकता है कि वे मतभेद सैद्धान्तिक थे ? उन्होंने खुद को दूसरे दर्जे का ब्राह्मण मान लिया था . ब्राह्मणवाद को त्यागने की बजाए उसकी आत्मा को आदर्श मान कर वे उससे लिपटे हुए थे .ब्राह्मणवाद के प्रति उनका गुस्सा सिर्फ़ इतना था कि वे ( ब्राह्मण) उन्हें दोयम दर्जा देते हैं .

  हार का दूसरा कारण पार्टी का संकीर्ण राजनैतिक कार्यक्रम था . अपने वर्ग के नौजवानों को कुछ नौकरियां दिलवा देना पार्टी का मुख्य मुद्दा बन गया था . मुद्दा पूरी तरह जायज है . परन्तु जिन नौजवानों को सरकारी नौकरियां दिलवाने के लिए पार्टी २० वर्षों तक लगी रही क्या वे वेतन पाने के बाद पार्टी को याद रखते हैं ?इन बीस वर्षों में जब पार्टी सत्ता में रही, उसने गांवों में रहने वाले ,गरीबी और सूदखोरों के चंगुल में फंसे ९० फ़ीसदी गैर-ब्राह्मणों को भुला दिया . “

5 Responses

  1. आप का ब्लोग पढके बहुत अच्छा लगा, मेरे ब्लोग पर टिप्पणी करने के लिये मैं आपका बहुत शुक्रगुज़ार हूं…

  2. दोनों महापुरुष अपने सिद्धान्तों से जुडे हुए थे.इससे सौहार्द मे कमी होती है.
    पर यह समझना आसान है. यह समस्या १०००० साल पुरानी है. समय तो लगेगा ही.
    ज़ाति प्रथा एक रिकार्दिन्ग के अलावा कुछ नही हे. आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से इसके बुरे परिणाम हैं.

  3. पठनीय लेख,
    जिन सिद्धान्तों के पीछे डॉ अम्बेडकर ने अपने जीवन को समर्पित कर दिया, आज उन्ही सिद्धान्तों को उनके उनके ही अनुयायी बर्बाद करने पर तुले हुए हैं।

  4. Gandhi vs Ambedkar
    Final Verdict: Has Ambedkar’s legacy proved more durable than that of Gandhi?
    81 per cent of the viewers said ‘yes it has’ and 19 per cent of them said ‘no’.
    Perhaps Ambedkar’s legacy needs to be re-looked and rediscovered to understand it in its true form. Remember Babasaheb said, “Social democracy and political democracy must go hand-in-hand. And that can happen only if we manage to create a truly equitable society.”
    http://www.ibnlive.com/news/qotd-gandhi-vs-ambedkar/27864-3-single.html
    See video also
    http://www.ibnlive.com/videos/27864/12_2006/facethenation_0612_1/qotd-gandhi-vs-ambedkar.html

    Gandhi – Baba Sahib conversation
    http://www.mkgandhi.org/Selected%20Letters/amb-gandhi%20corr..htm

    Legacy of Dr. BR Ambedkar standsa
    irreconcilably opposed to Hindutva
    By B.Sivaraman
    http://www.countercurrents.org/dalit-sivaraman250903.htm

  5. shri sagar chand nahar ji se sahmat hun

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