पानी की जंग : गोलबन्दिय़ां
November 19, 2006 by अफ़लातून
तीसरी दुनिया के देशों में पानी के निजीकरण की कोशिशों को जनता के तीव्र प्रतिरोध का सामना करना पड रहा है.इन तीन बडी कम्पनियों ने आपस में तालमेल बनाया है तथा निजीकरण की पक्षधर नीति के निर्धारण हेतु विश्व बैंक और अमीर देशों की आर्थिक मदद से इन कम्पनियों ने कई गठबंधन बना रखे हैं.हर तीन साल पर आयोजित होने वाले विश्व जल मंच (वर्ल्ड वॊटर फोरम) के आयोजन में इन संगठनों की मुख्य भूमिका होती है . व्यापार जगत और सरकारों के नीति निर्धारकों के इस जमावडे में भी आन्दोलनकारियों ने विरोध की आवाजें बुलन्द की हैं.पिछले साल मार्च महीने में जापान के क्योटो शहर में दुनिया भर के जन-आन्दोलनों के प्रतिनिधियों ने माइक कब्जे में ले कर निजीकरण के दुष्परिणामों की दास्तान सुनाई.मेक्सिको के कान्कुन शहर का एक आन्दोलनकारी अपने हाथ में काला और बदबूदार पानी से भरा गिलास ले कर मंच पर चढ गया.उसने बताया कि यह पानी वह अपने घर की टोटी से भर कर लाया है और उस नगर निगम का की जल - आपूर्ति सुवेज कम्पनी द्वारा होती है.उसने आयोजकों से निवेदन किया कि सुवेज के मुख्य कार्यपालक अधिकारी को मंच पर निमंत्रित कर वह गन्दा व बदबूदार पानी पीने को कहा जाए.
पानी व्यवसाय की यह बडी कम्पनियां अब रणनीति बदल रही हैं तथा उत्तरी अमेरिका व यूरोप के ज्यादा सुरक्षित बाजार में निवेश कर रही हैं.संयुक्त राज्य अमेरिका की जल आपूर्ति की सेवा का पचासी प्रतिशत अभी भी सार्वजनिक क्षेत्र में है. इन तीन बडी कम्पनियों ने आगामी दस सालों में अमरीका की सत्तर फ़ीसदी जल-आपूर्ति-सेवा पर कब्जा करने का लक्ष्य रखा है.अमरीका के छोटे कस्बों और समुदायों के बीच जल आपूर्ति करने वाली कई कम्पनियों को इन तीन बडी कम्पनियों ने खरीद लिया है.
छोटी-छोटी कम्पनियों के विलय से बनी विशाल बहुराष्ट्रीय कम्पनी जब नगर निगमों की जल -आपूर्ति अपने हाथों में लेती है तब ऐसा लगता है कि यह सिर्फ़ स्थानीय समस्या है.परन्तु इन्हीं कार्पोरेट खिलाडियों द्वारा दुनिया भर में लोगों के साथ करतूतें की जा रही है उसके मद्दे नजर जनता को भी आपस में सम्पर्क बढाना चाहिए तथा समन्वय बनाना चाहिए ताकि हम एक-दूसरे के अनुभवों से सीख ले सकें तथा सीधे हमले की शुरुआत कर सकें.
हमारी स्थानीय कार्रवाइयां तीन जागतिक उसूलों से संचालित होनी चाहिए.पहला उसूल है कि जल संरक्षण की आवश्यकता व पानी की कमी को हल्के में नहीं लिया जा सकता . पानी कहीं प्रचुर है तो कहीं इसका घोर अभाव है इसलिए जल संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी.पानी एक मौलिक मानवाधिकार है ,यह दूसरा उसूल है.जीने के लिए पानी जरूरी है.सभी लोगों को समानरूप से पानी मिलना चाहिए उसकी कीमत चुकाने की औकात से नहीं . तीसरा सिद्धान्त जल- लोकतंत्र का है.अपने सबसे मूल्यवान संसाधन की जिम्मेदारी हम सरकार में बैठे नौकरशाहों तथा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हवाले कत्तई नहीं सौंप सकते हैं . इन लोगों की नीयत भले ही अच्छी हो अथवा बुरी. हमें इस बुनियादी उसूल को बचाना होगा,उसके लिए संघर्ष करना होगा तथा अपनी उचित भूमिका निभाते हुए जल-लोकतंत्र की मांग करनी होगी.

